श्री सूर्यसहस्रनामस्तोत्रम् २
Sri Surya Sahasranama Stotram 2 | Rudrayamala Tantra

श्री सूर्यसहस्रनामस्तोत्रम् (रुद्रयामल) का परिचय
श्री सूर्यसहस्रनामस्तोत्रम् (द्वितीय) श्रीरुद्रयामल तन्त्र के श्रीदेवीरहस्य खण्ड से लिया गया है। यह ग्रन्थ के 34वें पटल (अध्याय) में भगवान भैरव और देवी पार्वती के दिव्य संवाद के रूप में प्रकट हुआ है। यह पहले वाले सूर्यसहस्रनामस्तोत्र (भविष्य पुराण) से पूर्णतः भिन्न है — नाम, संवाद और तान्त्रिक पद्धति सभी अलग हैं।
इस स्तोत्र का आरम्भ अत्यन्त भावपूर्ण है। भैरव कहते हैं — "त्वं मे प्राणप्रिया प्रीता वरदोऽहं तव स्थितः" (तुम मेरी प्राणप्रिया हो, मैं तुम्हें वर देने को तत्पर हूँ)। देवी प्रार्थना करती हैं — "देवदेवस्य सवितुर्वद नामसहस्रकम्" (देवदेव सविता के हज़ार नाम बताइए)। भैरव इसे 'गुह्यतम' (अत्यन्त गोपनीय), 'सर्वस्व' (अपना सब कुछ), 'सर्वदेवानां रहस्य' (सभी देवताओं का रहस्य) और 'कामनावह' (सभी कामनाएँ पूर्ण करने वाला) बताते हैं।
उपसंहार में (श्लोक 170-171) इसे किसे दिया जाए, इसके नियम बताए गए हैं — केवल शान्त, गुरुभक्त, कुलीन, सुभक्त और सूर्यभक्तिरत शिष्य को ही। इसे 'तत्त्वों का तत्त्व', 'वेद-आगम का रहस्य', 'सर्वमन्त्रमय' और 'स्वयोनिवत् गोपनीय' (अपने जन्म-रहस्य की तरह गोपनीय) कहा गया है — जो तान्त्रिक परम्परा की अत्यधिक गम्भीरता दर्शाता है।
रुद्रयामल तन्त्र शैव-शाक्त परम्परा का एक प्रमुख आगम ग्रन्थ है। इसमें शिव-पार्वती (भैरव-देवी) संवाद के रूप में मन्त्र, तन्त्र, यन्त्र, उपासना विधि, सहस्रनाम और रहस्य विद्याओं का विस्तृत वर्णन है। 'देवीरहस्य' इसका एक विशिष्ट खण्ड है जिसमें देवी की जिज्ञासा पर विभिन्न देवताओं के गूढ़ रहस्य प्रकट किए गए हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)