श्री सूर्यमाला स्तोत्रम्
Sri Surya Mala Stotram | Surya Mala Mantra

श्री सूर्यमाला स्तोत्र का परिचय एवं महत्व
श्री सूर्यमाला स्तोत्रम् एक अत्यन्त शक्तिशाली तान्त्रिक सूर्य महामन्त्र है जो सामान्य स्तोत्रों से बिलकुल भिन्न है। जहाँ अधिकांश सूर्य स्तोत्र भक्ति और स्तुति पर आधारित होते हैं, वहीं यह स्तोत्र 'अस्त्र-मन्त्र' की श्रेणी में आता है। इसके ऋषि भगवान वसिष्ठ हैं, छन्द अनुष्टुप् है और देवता श्री सूर्यनारायण हैं।
इस स्तोत्र की विशेषता इसकी सम्पूर्ण तान्त्रिक संरचना है। इसमें पहले सङ्कल्प (Sankalpa - संकल्प लेना), फिर विनियोग (Viniyoga - मन्त्र का उद्देश्य), करन्यास (Kar Nyasa - हाथों पर स्थापना), हृदयन्यास (Hridaya Nyasa - शरीर पर स्थापना), दिग्बन्ध (Digbandha - दिशा बन्धन), और अंत में ध्यान (Dhyana - मानसिक चित्र) की पूर्ण विधि दी गई है। यह एक 'मालामन्त्र' (Mala Mantra) है, अर्थात् लम्बे सूत्र की तरह बिना रुके पढ़ा जाने वाला अनुष्ठान मन्त्र।
स्तोत्र के मुख्य भाग (मालाप्रारम्भ) में सूर्यनारायण को सुदर्शन-चक्रधारी, जगत् के आधार, शतकोटि विष्णुभुजङ्ग (अनन्त शेषनाग जैसे), शौर्य-पराक्रमी बताकर उनसे अष्टदिक्षु बन्ध (आठों दिशाओं में सुरक्षा), नवग्रह बन्ध, सकल रोग निवारण, भूत-प्रेत-पिशाच-ब्रह्मराक्षस हरण, इन्द्रजाल-महेन्द्रजाल से रक्षा और शत्रु स्तम्भन की प्रार्थना की जाती है।
इस स्तोत्र में प्रयुक्त बीज मन्त्र विशेष महत्व रखते हैं — ह्रां (बीज - सूर्य की ऊर्जा), ह्रीं (शक्ति - माया/प्रकृति), ह्रूं (कीलक - स्थिरता/ताला)। ये तीनों मिलकर सूर्य की सम्पूर्ण शक्ति को जागृत करते हैं। ध्यान श्लोक में सूर्य को 'हरितहयरथ' (हरे अश्वों के रथ पर), 'कनकमयाम्बुजरेणुवञ्जर' (स्वर्ण कमल की पराग से अलंकृत), 'हिरण्यकेतन' (स्वर्ण ध्वज वाले) के रूप में देखा जाता है।
'बन्ध बन्ध' शब्दावली इस स्तोत्र का सबसे शक्तिशाली अंश है। पूर्व, दक्षिण, पश्चिम, उत्तर और चारों कोनों (आग्नेय, नैऋत्य, वायव्य, ईशान) — कुल आठ दिशाओं में अभेद्य सुरक्षा कवच स्थापित किया जाता है। फिर नवग्रहों और स्थलग्रहों को भी बाँधा जाता है। 'कह कह, किरि किरि, विवि विवि' आदि ध्वन्यात्मक बीजाक्षर हैं जो सूक्ष्म स्तर पर ऊर्जा क्षेत्र (Energy Field) स्थापित करते हैं। अन्त में 'ॐ फट् स्वाहा' से मन्त्र को अस्त्र के रूप में प्रक्षेपित किया जाता है।
न्यास विधि और बीज मन्त्रों का अर्थ
| बीज | करन्यास | हृदयन्यास | गुण |
|---|---|---|---|
| ॐ ह्रां | अङ्गुष्ठ (Thumb) | हृदयाय नमः | अघोर सूर्यनारायण |
| ॐ ह्रीं | तर्जनी (Index) | शिरसे स्वाहा | चतुर्वेदपारायण |
| ॐ ह्रूं | मध्यमा (Middle) | शिखायै वषट् | उग्रभयंकर |
| ॐ ह्रैं | अनामिका (Ring) | कवचाय हुं | सूर्यनारायण |
| ॐ ह्रौं | कनिष्ठिका (Little) | नेत्रत्रयाय वौषट् | कौपीनमौञ्जीधर |
| ॐ ह्रः | करतल-पृष्ठ (Palms) | अस्त्राय फट् | सहस्रकिरण |
अष्टदिक्षु बन्ध — आठ दिशाओं की सुरक्षा
इस स्तोत्र का सबसे विशिष्ट अंश 'बन्ध बन्ध' विधि है। इसमें क्रमशः आठों दिशाओं में सूर्यनारायण की शक्ति से अभेद्य सुरक्षा स्थापित की जाती है:
| द्वार | दिशा | दिक्पाल |
|---|---|---|
| पूर्वद्वार | पूर्व (East) | इन्द्र |
| दक्षिणद्वार | दक्षिण (South) | यम |
| पश्चिमद्वार | पश्चिम (West) | वरुण |
| उत्तरद्वार | उत्तर (North) | कुबेर |
| आग्नेयद्वार | आग्नेय (South-East) | अग्नि |
| नैरृतिद्वार | नैऋत्य (South-West) | निऋति |
| वायव्यद्वार | वायव्य (North-West) | वायु |
| ईशानद्वार | ईशान (North-East) | ईशान (शिव) |
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)