Sri Surya Nama Varnana Stotram – श्री सूर्य नामवर्णन स्तोत्रम् (Bhavishya Purana)

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व
श्री सूर्य नामवर्णन स्तोत्रम् का उल्लेख भविष्य पुराण में मिलता है, जो सूर्य उपासना का प्रधान ग्रंथ माना जाता है। इस स्तोत्र में ब्रह्मा जी सूर्य के उन विशिष्ट नामों का वर्णन करते हैं जो साधना और सिद्धि के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इसमें सूर्य को वैदिक देवताओं (अर्यमा, वरुण, पूषा, मित्र) के रूप में, त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) के रूप में, और प्राकृतिक शक्तियों (अग्नि, पर्जन्य) के रूप में नमन किया गया है।
श्लोक 16 में इसे 'रहस्य' कहा गया है और बताया गया है कि सन्ध्योपासन (सुबह-शाम की प्रार्थना) के समय इसका जप करने मात्र से मनुष्य पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोकों में वर्णित प्रमुख नाम और अर्थ
मार्तण्ड (श्लोक 2): प्रलय काल में मृत अण्ड (ब्रह्माण्ड) में प्राण का संचार करने वाले।
मिहिर (श्लोक 3): जल वृष्टि कराने वाले, और प्राचीन सौर परंपरा का नाम।
गोपति (श्लोक 4): सुष्मना आदि दिव्य किरणों के स्वामी।
हरिताश्व (श्लोक 6): हरे रंग के (या दिशाओं को जीतने वाले) घोड़ों वाले।
सप्तलोकेश (श्लोक 7): भू, भुवः, स्वः आदि सातों लोकों के एकमात्र स्वामी।
एकचक्ररथ (श्लोक 8): जिनका रथ एक पहिए (काल चक्र) पर चलता है।
पद्मप्रबोध (श्लोक 9): कमलों को जगाने (खिलाने) वाले।
द्वादशमूर्ति (श्लोक 9): वर्ष के 12 महीनों में तपते 12 आदित्यों के स्वरूप।
पाठ करने की विधि और लाभ
पाप मुक्ति: 'एतेन जपमात्रेण नरः पापात् प्रमुच्यते' — जप मात्र से पापों का नाश होता है।
मनोकामना सिद्धि: जो सायं-प्रात: पवित्र होकर पाठ करता है, उसकी सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं।
आरोग्य और बंधन मुक्ति: रोगी रोग से और बंधन में पड़ा व्यक्ति (जेल या संकट) बंधन से मुक्त होता है।
श्री (धन) और राज्य: धन चाहने वाले को लक्ष्मी और राज्य चाहने वाले को अधिकार/पद प्राप्त होता है।
समय: सूर्योदय और सूर्यास्त (संध्या काल) के समय इसका पाठ सर्वश्रेष्ठ है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)