श्री रवि सप्तति रहस्यनाम स्तोत्रम् – Sri Ravi Saptati Nama Stotram | 70 Names of Surya

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व
श्री रवि सप्तति रहस्यनाम स्तोत्रम् स्कन्द पुराण के प्रसिद्ध काशीखण्ड (नवम अध्याय) से प्रकट है। 'सप्तति' का अर्थ है 70 और 'रहस्य' का अर्थ है गोपनीय। यह स्तोत्र सूर्य के 70 गूढ़ नामों का संकलन है।
काशी (वाराणसी) भगवान शिव की नगरी है, परन्तु यहाँ सूर्य उपासना का भी अत्यंत महत्व है। काशीखण्ड में सूर्य के इन 70 नामों को 'पुण्य नाम' (एभिः पुण्यैः सूर्यस्य नामभिः) कहा गया है।
इस स्तोत्र में सूर्य के विविध स्वरूपों का वर्णन है — हंस (परमहंस), भानु (प्रकाशमान), सहस्रांशु (हजार किरणों वाले), मार्तण्ड (अदिति पुत्र), मिहिर (पारसी नाम), ग्रहेश्वर (ग्रहों के स्वामी), लोकचक्षु (जगत के नेत्र), और कश्यपात्मज (कश्यप ऋषि के पुत्र)।
70 नामों की सूची और अर्थ
| क्र. | नाम | अर्थ |
|---|---|---|
| 1 | हंस | परमहंस, सार-असार विवेकी |
| 2 | भानु | प्रकाशमान, दीप्तिमान |
| 3 | सहस्रांशु | सहस्र (हजार) किरणों वाले |
| 4 | तपन | ताप देने वाले |
| 5 | तापन | गर्मी उत्पन्न करने वाले |
| 6 | रवि | शब्द करने वाले (रव = शब्द) |
| 7 | विकर्तन | अंधकार काटने वाले |
| 8 | विवस्वान् | प्रकाश फैलाने वाले |
| 9 | विश्वकर्मा | विश्व के निर्माता |
| 10 | विभावसु | अग्नि, प्रकाश का धन |
| 11-20 | विश्वरूप, विश्वकर्ता, मार्तण्ड, मिहिर, अंशुमान्, आदित्य, उष्णगु, सूर्य, अर्यमा, ब्रध्न | विश्व स्वरूप, जगत निर्माता, 8वें आदित्य, पारसी नाम, किरणधारी, अदिति पुत्र, गर्म किरण, सर्वगामी, मित्र देवता, लाल अश्व |
| 21-30 | दिवाकर, द्वादशात्मा, सप्तहय, भास्कर, हस्कर, खग, सूर, प्रभाकर, श्रीमान्, लोकचक्षु | दिन बनाने वाले, 12 रूप, 7 अश्व, प्रकाश देने वाले, हास देने वाले, आकाशगामी, वीर, प्रभा उत्पन्न करने वाले, श्री युक्त, जगत के नेत्र |
| 31-40 | ग्रहेश्वर, त्रिलोकेश, लोकसाक्षी, तमोऽरि, शाश्वत, शुचि, गभस्तिहस्त, तीव्रांशु, तरणि, सुमहोरणि | ग्रहों के स्वामी, तीन लोकों के ईश्वर, जगत के साक्षी, अंधकार के शत्रु, सनातन, पवित्र, किरण हाथों वाले, तीव्र किरण, तैराने वाले, महान ध्वनि वाले |
| 41-50 | द्युमणि, हरिदश्व, अर्क, भानुमान्, भयनाशन, छन्दोश्व, वेदवेद्य, भास्वान्, पूषा, वृषाकपि | आकाश की मणि, हरे अश्व वाले, अर्क वृक्ष, किरणयुक्त, भय नाशक, वेद रूप अश्व, वेदों से जाने जाने वाले, दीप्तिमान, पोषक, वृषभ+कपि |
| 51-60 | एकचक्ररथ, मित्र, मन्देहारि, तमिस्रहा, दैत्यहा, पापहर्ता, धर्म, धर्मप्रकाशक, हेलिक, चित्रभानु | एक पहिए के रथ वाले, मित्र देवता, मन्देह दैत्य का शत्रु, अंधकार नाशक, दैत्य संहारक, पाप हरने वाले, धर्म स्वरूप, धर्म प्रकाशक, क्रीड़ाशील, चित्र-विचित्र किरण |
| 61-70 | कलिघ्न, तार्क्ष्यवाहन, दिक्पति, पद्मनीनाथ, कुशेशयकर, हरि, घर्मरश्मि, दुर्निरीक्ष्य, चण्डांशु, कश्यपात्मज | कलि नाशक, गरुड़ वाहन वाले, दिशाओं के स्वामी, कमलों के नाथ, कमल धारी, विष्णु रूप, गर्म किरण, देखने में कठिन, प्रचंड किरण, कश्यप ऋषि के पुत्र |
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय पाठ करें।
दिशा: पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े होकर या बैठकर पाठ करें।
विशेष दिवस: रविवार, रथ सप्तमी, मकर संक्रांति पर विशेष पुण्य।
जप विधि: प्रत्येक नाम के आगे 'ॐ' और अंत में 'नमः' लगाकर जप करें। जैसे: 'ॐ हंसाय नमः', 'ॐ भानवे नमः'।
माला: स्फटिक या लाल चंदन की माला से जप करें।
आवृत्ति: नित्य 1, 3, 7 या 11 बार पाठ करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)