Sri Surya Kavacham (Trailokya Mangalam) – श्री सूर्य कवचम् (त्रैलोक्यमङ्गलम्)

कवच का महत्व और विनियोग
श्री सूर्य कवचम् (त्रैलोक्यमङ्गलम्) तन्त्र शास्त्र के उच्च कोटि के ग्रंथ 'ब्रह्मयामल तन्त्र' से उद्धृत है। यह कवच संवाद रूप में है जहाँ भगवान सूर्य स्वयं अपने पुत्र और भक्त साम्ब को उपदेश दे रहे हैं।
इसे 'त्रैलोक्यमङ्गलम्' कहा गया है क्योंकि यह तीनों लोकों (स्वर्ग, मृत्यु, पाताल) में मंगलकारी और दुर्लभ है। श्लोक 18 में चेतावनी दी गई है कि जो साधक इस कवच को जाने बिना सूर्य मंत्र का जप करता है, उसे करोड़ों कल्पों में भी सिद्धि प्राप्त नहीं होती (सिद्धिर्न जायते तस्य कल्पकोटिशतैरपि)।
विनियोग: अस्य श्रीसूर्य कवचस्य ब्रह्मा ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, श्रीसूर्यो देवता, यश-आरोग्य-मोक्षेषु विनियोगः।
न्यास और मंत्र विज्ञान
शिर: 'प्रणव' (ॐ) रक्षा करे।
भाल (माथा): 'घृणिः' रक्षा करे।
नेत्र: 'सूर्य' रक्षा करे।
कान: 'आदित्य' रक्षा करे।
मुख: 'ह्रीं' बीज मंत्र रक्षा करे।
हृदय: 'भुवनेश्वरी' रक्षा रक्षा।
गुह्य स्थान: 'चन्द्रबिम्ब' रक्षा करे।
सर्व शरीर: 'मनूत्तम' (श्रेष्ठ मंत्र) सिर से पैर तक रक्षा करे।
पाठ करने की विधि और लाभ
रोग मुक्ति: यह कवच 'कुष्ठादिरोगशमनं महाव्याधिविनाशनम्' है। कुष्ठ और अन्य गंभीर रोगों के नाश के लिए इसका पाठ रामबाण है।
रक्षा: 'भूतप्रेतपिशाचाश्च... न द्रष्टुमपि तं क्षमाः' — भूत, प्रेत, पिशाच, और ब्रह्मराक्षस इसके साधक को देखने में भी समर्थ नहीं होते, दूर से ही भाग जाते हैं।
ऐश्वर्य: इसे धारण करने से ही शिव गणाधिपति बने, विष्णु पालक बने और इन्द्र ऐश्वर्यवान हुए।
धारण विधि: रवि-पुष्य योग, संक्रांति या रविवार सप्तमी को भूर्जपत्र पर रोचना, अगरु, कुंकुम (केशर) से लिखकर, त्रिलौह (सोना, चाँदी, तांबा) के ताबीज में दाहिनी भुजा या गले में धारण करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)