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श्री रवि स्तोत्रम् (साम्बपुराणे) – Sri Ravi Stotram | Samba Purana 10 Verses

श्री रवि स्तोत्रम् (साम्बपुराणे) – Sri Ravi Stotram | Samba Purana 10 Verses
॥ श्री रवि स्तोत्रम् ॥ ॥ साम्बपुराणे त्रिचत्वारिंशोऽध्याये ॥ त्वं देव ऋषिकर्ता च प्रकृतिः पुरुषः प्रभुः । छाया सञ्ज्ञा प्रतिष्ठापि निरालम्बो निराश्रयः ॥ १ ॥ आश्रयः सर्वभूतानां नमस्तेऽस्तु सदा मम । त्वं देव सर्वतश्चक्षुः सर्वतः सर्वदा गतिः ॥ २ ॥ सर्वदः सर्वदा सर्वः सर्वसेव्यस्त्वमार्तिहा । त्वं देव ध्यानिनां ध्यानम् योगिनां योग उत्तमः ॥ ३ ॥ त्वं भाषाफलदः सर्वः सद्यः पापहरो विभुः । सर्वार्तिनाशं नो नाशीकरणं करुणा विभुः ॥ ४ ॥ ॥ सृष्टि-स्थिति-संहार स्वरूप ॥ दयाशक्तिः क्षमावासः सघृणिर्घृणिमूर्तिमान् । त्वं देव सृष्टिसंहारस्थितिरूपः सुराधिपः ॥ ५ ॥ बकः शोषो वृकोदाहस्तुषारो दहनात्मकः । प्रणतार्तिहरो योगी योगमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥ ६ ॥ त्वं देव हृदयानन्द शिरोरत्नप्रभामणिः । बोधकः पाठको ध्यायी ग्राहको ग्रहणात्मकः ॥ ७ ॥ ॥ न्याय स्वरूप ॥ त्वं देव नियमो न्यायी न्यायको न्यायवर्धनः । अनित्यो नियतो नित्यो न्यायमूर्ते नमोऽस्तु ते ॥ ८ ॥ ॥ लोकचक्षु ॥ त्वं देव त्रायसे प्राप्तान् पालयस्यर्पवस्थितान् । ऊर्द्वत्राणार्दितान् लोकान् लोकचक्षुर्नमोऽस्तु ते ॥ ९ ॥ ॥ बंधुहीनों के बंधु ॥ दमनोऽसि त्वं दुर्दान्तः साध्यानां चैव साधकः । बन्धुः स्वबन्धुहीनानां नमस्ते बन्धुरूपिणे ॥ १० ॥ ॥ इति श्रीसाम्बपुराणे त्रिचत्वारिंशोऽध्याये रवि स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

श्री रवि स्तोत्रम् साम्ब पुराण के 43वें अध्याय (त्रिचत्वारिंशोऽध्याये) से प्रकट है। साम्ब पुराण एक उपपुराण है जो मुख्यतः सूर्य उपासना को समर्पित है।

पौराणिक कथा के अनुसार, साम्ब (श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र) को दुर्वासा ऋषि के शाप से कुष्ठ रोग हो गया। तब नारद मुनि ने उन्हें सूर्य उपासना का मार्ग बताया। साम्ब ने चंद्रभागा नदी (अब चनाब) के तट पर 12 वर्षों तक सूर्य की आराधना की और मित्रवन (अब मुल्तान) में सूर्य मंदिर की स्थापना की।

इस स्तोत्र में सूर्य के गहन आध्यात्मिक स्वरूपों का वर्णन है — वे प्रकृति और पुरुष दोनों हैं, सृष्टि-स्थिति-संहार के कर्ता हैं, न्यायमूर्ति हैं, ध्यानियों के ध्यान और योगियों के योग हैं, और बंधुहीनों के बंधु हैं।

श्लोकों का भाव और लाभ

  • श्लोक 1 (प्रकृति-पुरुष): हे देव! आप ऋषियों के कर्ता, प्रकृति (मूल तत्व) और पुरुष (चेतना), प्रभु, छाया और संज्ञा (आपकी दोनों पत्नियाँ), प्रतिष्ठा, निरालम्ब (बिना सहारे) और निराश्रय हैं। लाभ: आत्मज्ञान।

  • श्लोक 2 (सर्वाश्रय): आप सर्व प्राणियों के आश्रय हैं, आपको सदा नमस्कार। आप सब ओर नेत्र वाले, सर्वत्र, सर्वदा गति (गंतव्य) हैं। लाभ: शरण और सुरक्षा।

  • श्लोक 3 (योग-ध्यान): आप सर्वदाता, सर्वत्र, सर्वसेव्य और आर्तिहा (कष्ट हरने वाले) हैं। आप ध्यानियों के ध्यान और योगियों के उत्तम योग हैं। लाभ: योग सिद्धि।

  • श्लोक 4 (पापहर): आप भाषा का फल देने वाले, तुरंत पाप हरने वाले, सर्वव्यापी, सर्वार्ति नाशक और करुणामय हैं। लाभ: पाप नाश।

  • श्लोक 5 (त्रिमूर्ति): आप दया की शक्ति, क्षमा के निवास, दयालु, करुणामूर्ति, सृष्टि-संहार-स्थिति स्वरूप और देवाधिपति हैं। लाभ: त्रिदेवों की कृपा।

  • श्लोक 6 (योगमूर्ति): आप बक (बगुला — एकाग्रता का प्रतीक), शोष, वृक, उदाह, तुषार (हिम) और दहन (अग्नि) स्वरूप, प्रणतार्तिहर और योगी हैं — योगमूर्ति को नमस्कारलाभ: योग और तप।

  • श्लोक 7 (बोधक): हे देव! आप हृदय के आनंद, शिरोरत्न प्रभामणि, बोधक (ज्ञान देने वाले), पाठक, ध्यायी, ग्राहक (ग्रहण करने वाले) और ग्रहणात्मक हैं। लाभ: ज्ञान और बोध।

  • श्लोक 8 (न्यायमूर्ति): हे देव! आप नियम, न्यायी, न्याय करने वाले, न्याय वर्धक, अनित्य, नियत और नित्य हैं — न्यायमूर्ति को नमस्कारलाभ: न्याय और सत्य।

  • श्लोक 9 (लोकचक्षु): हे देव! आप शरणागतों की रक्षा करते हैं, स्थितों का पालन करते हैं, ऊर्ध्व से पीड़ित लोकों की रक्षा करते हैं — लोकचक्षु को नमस्कारलाभ: रक्षा और पालन।

  • श्लोक 10 (बंधुरूप): आप दुर्दांतों के दमनकर्ता, साध्यों के साधक और बंधुहीनों के बंधु हैं — बंधुरूप को नमस्कारलाभ: अनाथों को आश्रय।

पाठ करने की विधि और विशेष अवसर

  • समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय पाठ करें।

  • दिशा: पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े होकर या बैठकर पाठ करें।

  • विशेष दिवस: रविवार, रथ सप्तमी, मकर संक्रांति पर विशेष पुण्य।

  • रोग निवारण: त्वचा रोगों से पीड़ित व्यक्ति 40 दिन का अनुष्ठान करें।

  • आवृत्ति: नित्य 1, 3, 7 या 11 बार पाठ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. रवि स्तोत्रम् (साम्ब पुराण) किसने रचा?

यह स्तोत्र साम्ब (श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र) ने रचा। दुर्वासा ऋषि के शाप से कुष्ठ रोग होने पर नारद मुनि के मार्गदर्शन में उन्होंने चंद्रभागा नदी के तट पर 12 वर्षों तक सूर्य उपासना की।

2. साम्ब पुराण में यह स्तोत्र कहाँ है?

यह स्तोत्र साम्ब पुराण के 43वें अध्याय (त्रिचत्वारिंशोऽध्याये) में है। साम्ब पुराण एक उपपुराण है जो मुख्यतः सूर्य उपासना को समर्पित है।

3. 'प्रकृति पुरुष' का क्या अर्थ है?

श्लोक 1 में 'प्रकृतिः पुरुषः' का अर्थ है सूर्य सांख्य दर्शन की प्रकृति (मूल प्रकृति/माया) और पुरुष (चेतना/आत्मा) — दोनों के स्वरूप हैं। वे द्वैत से परे हैं।

4. 'सृष्टि-स्थिति-संहार' स्वरूप का क्या तात्पर्य है?

श्लोक 5 में 'सृष्टिसंहारस्थितिरूपः' का अर्थ है सूर्य ब्रह्मा (सृष्टि), विष्णु (स्थिति) और शिव (संहार) — तीनों के समान हैं। वे त्रिमूर्ति स्वरूप हैं।

5. 'न्यायमूर्ते' का क्या अर्थ है?

श्लोक 8 में 'न्यायमूर्ते नमोऽस्तु ते' का अर्थ है 'न्याय के साक्षात् स्वरूप को नमस्कार'। सूर्य निष्पक्ष न्यायकर्ता हैं — वे सभी पर समान रूप से प्रकाश डालते हैं।

6. 'बंधुहीनों के बंधु' का क्या भाव है?

श्लोक 10 में 'बन्धुः स्वबन्धुहीनानां' का अर्थ है जिनका कोई सहारा नहीं, कोई रिश्तेदार नहीं, उनके लिए सूर्य ही बंधु हैं। यह अनाथों और असहायों के लिए अत्यंत आश्वासनदायक है।

7. 'लोकचक्षु' का क्या अर्थ है?

श्लोक 9 में 'लोकचक्षुर्नमोऽस्तु ते' का अर्थ है 'जगत के नेत्रों को नमस्कार'। सूर्य के बिना कुछ दिखाई नहीं देता — वे समस्त लोकों के नेत्र हैं।

8. रवि स्तोत्रम् के क्या लाभ हैं?

रोग निवारण (विशेषकर त्वचा रोग), पाप नाश, आर्ति (कष्ट) हरण, और आध्यात्मिक उन्नति। साम्ब ने इसी स्तोत्र से कुष्ठ रोग से मुक्ति पाई थी।

9. यह स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?

प्रातःकाल सूर्योदय के समय पूर्व दिशा में मुख करके पढ़ें। रविवार को विशेष लाभ। त्वचा रोगों के लिए 40 दिन का अनुष्ठान करें।

10. 'दयाशक्तिः क्षमावासः' का क्या अर्थ है?

श्लोक 5 में इसका अर्थ है 'दया की शक्ति, क्षमा का निवास'। सूर्य दयालु और क्षमाशील हैं — वे अपने भक्तों के अपराधों को क्षमा करते हैं।