श्री रवि स्तोत्रम् (साम्बपुराणे) – Sri Ravi Stotram | Samba Purana 10 Verses

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व
श्री रवि स्तोत्रम् साम्ब पुराण के 43वें अध्याय (त्रिचत्वारिंशोऽध्याये) से प्रकट है। साम्ब पुराण एक उपपुराण है जो मुख्यतः सूर्य उपासना को समर्पित है।
पौराणिक कथा के अनुसार, साम्ब (श्रीकृष्ण और जाम्बवती के पुत्र) को दुर्वासा ऋषि के शाप से कुष्ठ रोग हो गया। तब नारद मुनि ने उन्हें सूर्य उपासना का मार्ग बताया। साम्ब ने चंद्रभागा नदी (अब चनाब) के तट पर 12 वर्षों तक सूर्य की आराधना की और मित्रवन (अब मुल्तान) में सूर्य मंदिर की स्थापना की।
इस स्तोत्र में सूर्य के गहन आध्यात्मिक स्वरूपों का वर्णन है — वे प्रकृति और पुरुष दोनों हैं, सृष्टि-स्थिति-संहार के कर्ता हैं, न्यायमूर्ति हैं, ध्यानियों के ध्यान और योगियों के योग हैं, और बंधुहीनों के बंधु हैं।
श्लोकों का भाव और लाभ
श्लोक 1 (प्रकृति-पुरुष): हे देव! आप ऋषियों के कर्ता, प्रकृति (मूल तत्व) और पुरुष (चेतना), प्रभु, छाया और संज्ञा (आपकी दोनों पत्नियाँ), प्रतिष्ठा, निरालम्ब (बिना सहारे) और निराश्रय हैं। लाभ: आत्मज्ञान।
श्लोक 2 (सर्वाश्रय): आप सर्व प्राणियों के आश्रय हैं, आपको सदा नमस्कार। आप सब ओर नेत्र वाले, सर्वत्र, सर्वदा गति (गंतव्य) हैं। लाभ: शरण और सुरक्षा।
श्लोक 3 (योग-ध्यान): आप सर्वदाता, सर्वत्र, सर्वसेव्य और आर्तिहा (कष्ट हरने वाले) हैं। आप ध्यानियों के ध्यान और योगियों के उत्तम योग हैं। लाभ: योग सिद्धि।
श्लोक 4 (पापहर): आप भाषा का फल देने वाले, तुरंत पाप हरने वाले, सर्वव्यापी, सर्वार्ति नाशक और करुणामय हैं। लाभ: पाप नाश।
श्लोक 5 (त्रिमूर्ति): आप दया की शक्ति, क्षमा के निवास, दयालु, करुणामूर्ति, सृष्टि-संहार-स्थिति स्वरूप और देवाधिपति हैं। लाभ: त्रिदेवों की कृपा।
श्लोक 6 (योगमूर्ति): आप बक (बगुला — एकाग्रता का प्रतीक), शोष, वृक, उदाह, तुषार (हिम) और दहन (अग्नि) स्वरूप, प्रणतार्तिहर और योगी हैं — योगमूर्ति को नमस्कार। लाभ: योग और तप।
श्लोक 7 (बोधक): हे देव! आप हृदय के आनंद, शिरोरत्न प्रभामणि, बोधक (ज्ञान देने वाले), पाठक, ध्यायी, ग्राहक (ग्रहण करने वाले) और ग्रहणात्मक हैं। लाभ: ज्ञान और बोध।
श्लोक 8 (न्यायमूर्ति): हे देव! आप नियम, न्यायी, न्याय करने वाले, न्याय वर्धक, अनित्य, नियत और नित्य हैं — न्यायमूर्ति को नमस्कार। लाभ: न्याय और सत्य।
श्लोक 9 (लोकचक्षु): हे देव! आप शरणागतों की रक्षा करते हैं, स्थितों का पालन करते हैं, ऊर्ध्व से पीड़ित लोकों की रक्षा करते हैं — लोकचक्षु को नमस्कार। लाभ: रक्षा और पालन।
श्लोक 10 (बंधुरूप): आप दुर्दांतों के दमनकर्ता, साध्यों के साधक और बंधुहीनों के बंधु हैं — बंधुरूप को नमस्कार। लाभ: अनाथों को आश्रय।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय पाठ करें।
दिशा: पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े होकर या बैठकर पाठ करें।
विशेष दिवस: रविवार, रथ सप्तमी, मकर संक्रांति पर विशेष पुण्य।
रोग निवारण: त्वचा रोगों से पीड़ित व्यक्ति 40 दिन का अनुष्ठान करें।
आवृत्ति: नित्य 1, 3, 7 या 11 बार पाठ करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)