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Sri Suktam Pauranikam – श्रीसूक्तं पौराणिकम्

Sri Suktam Pauranikam – श्रीसूक्तं पौराणिकम्
॥ श्रीसूक्तं पौराणिकम् ॥ ॥ विनियोगः ॥ देव्यभिषेके पौराणं श्रीसूक्तम् - ॥ स्तोत्रम् ॥ हिरण्यवर्णां हिमरौप्यहारां चन्द्रां त्वदीयां च हिरण्यरूपाम् । लक्ष्मीं मृगीरूपधरां (१) श्रियं त्वं मदर्थमाकारय जातवेदः ॥ १॥ यस्यां सुलक्ष्म्यामहमागतायां हिरण्यगोऽश्वात्मजमित्रदासान् । लभेयमाशु ह्यनपायिनीं तां मदर्थमाकारय जातवेदः ॥ २॥ प्रत्याह्वये तामहमश्वपूर्वां देवीं श्रियं मध्यरथां समीपम् । प्रबोधिनीं हस्तिसुबृंहितेनाहूता मया सा किल सेवतां माम् ॥ ३॥ कांसोस्मितां तामिहद्मवर्णामाद्रां सुवर्णावरणां ज्वलन्तीम् । तृप्तां हि भक्तानथ तर्पयन्तीमुपह्वयेऽहं कमलासनस्थाम् ॥ ४॥ लोके ज्वलन्तीं यशसा प्रभासां चन्द्रामुदामुत देवजुष्टाम् । तां पद्मरूपां शरणं प्रपद्ये श्रियं वृणे त्वों व्रजतामलक्ष्मीः ॥ ५॥ वनस्पतिस्ते तपसोऽधिजातो वृक्षोऽथ बिल्वस्तरुणार्कवर्णे । फलानि तस्य त्वदनुग्रहेण माया अलक्ष्मीश्च नुदन्तु बाह्याः ॥ ६॥ उपैतु मां देवसखः कुबेरः सा दक्षकन्या मणिना च कीर्तिः । जातोऽस्मि राष्ट्रे किल मर्त्यलोके कीर्तिं समृद्धिं च ददातु मह्यम् ॥ ७॥ क्षुत्तृट्कृशाङ्गी मलिनामलक्ष्मीं तवाग्रजां तामुतनाशयामि । सर्वामभूतिं ह्यसमृद्धिमम्बे गृहाञ्च (गृहाच्च) निष्कासय मे द्रुतं त्वम् ॥ ८॥ केनाप्यधर्षाम्मथ गन्धचिह्नां पुष्टां गवाश्वादियुतां च नित्यम् । पद्मालये सर्वजनेश्वरीं तां प्रत्याह्वयेऽहं खलु मत्समीपम् ॥ ९॥ लभेमहि श्रीमनसश्च कामं वाचस्तु सत्यं च सुकल्पितं वै । अन्नस्य भक्ष्यं च पयः पशूनां सम्पद्धि मय्याश्रयतां यशश्च ॥ १०॥ मयि प्रसादं कुरु कर्दम त्वं प्रजावती श्रीरभवत्त्वया हि । कुले प्रतिष्ठापय में श्रियं वै त्वन्मातरं तामुत पद्ममालाम् ॥ ११॥ स्निग्धानि चापोऽभिसृजन्त्वजस्रं चिक्लीतवासं कुरु मद्गृहे त्वम् । कुले श्रियं मातरमाशुमेऽद्य श्रीपुत्र संवासयतां च देवीम् ॥ १२॥ तां पिङ्गलां पुष्करिणीं च लक्ष्मीमाद्रां च पुष्टिं शुभपद्ममालाम् । चन्द्रप्रकाशां च हिरण्यरूपां मदर्थमाकारय जातवेदः ॥ १३॥ आद्रां(आद्रीं) तथा यष्टिकरां सुवर्णां तां यष्टिरूपामथ हेममालाम् । सूर्यप्रकाशां च हिरण्यरूपां मदर्थमाकारय जातवेदः ॥ १४॥ यस्यां प्रभूतं कनकं च गावो दास्यस्तुरङ्गान्पुरुषांश्च सत्याम् । विन्देयमाशु ह्यनपायिनीं तां मदर्थमाकारय जातवेदः ॥ १५॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ श्रियः पञ्चदशश्लोकं सूक्तं पौराणमन्वहम् । यः पठेज्जुहुयाच्चाज्यं श्रीयुतः सततं भवेत् ॥ १६॥ ॥ इति पौराणीकम् श्रीसूक्तं समाप्तम् ॥
(१) मृगीरूपधरां: "श्रीर्धृत्वा हरिणीरूपमरण्ये सञ्चार ह" — पुराणों के अनुसार, एक बार देवी लक्ष्मी ने सुनहरी हिरणी (मृगी) का रूप धारण कर वन में विचरण किया था।

श्रीसूक्तं पौराणिकम् — परिचय एवं महत्व

श्रीसूक्तं पौराणिकम् सनातन धर्म में धन और समृद्धि की अधिष्ठात्री देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने वाला एक अत्यंत लोकप्रिय और सरल पाठ है। मूल रूप से 'श्रीसूक्त' ऋग्वेद (Vedic) का हिस्सा है, जिसे सस्वर (Intonation) पढ़ना कठिन होता है। सामान्य जनों के कल्याण हेतु पुराणों में उसी वैदिक सूक्त के भावों को सरल छंदों में पिरोकर यह 'पौराणिक श्रीसूक्त' रचा गया है।

अग्नि देव से संवाद: इस सूक्त की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें भक्त सीधे लक्ष्मी जी से बात नहीं करता, बल्कि 'जातवेदस' (अग्नि देव) से मध्यस्थता (Mediation) करने की प्रार्थना करता है। मंत्र है — "मदर्थमाकारय जातवेदः" (हे अग्नि देव! मेरे लिए उस लक्ष्मी का आवाहन करें)। अग्नि को देवताओं का मुख माना गया है, इसलिए अग्नि के माध्यम से दी गई आहुति या प्रार्थना सीधे महालक्ष्मी तक पहुँचती है।

अभिषेक और सौंदर्य: जहाँ वैदिक सूक्त में तेज और ओज की प्रधानता है, वहीं पौराणिक सूक्त में माँ के 'सौंदर्य' और 'करुणा' का वर्णन है। श्लोक 1 में उन्हें "हिरण्यवर्णां" (सोने जैसे रंग वाली), "हिम-रौप्य-हारां" (बर्फ और चांदी जैसे हार पहनने वाली) और "मृगीरूपधरां" (स्वर्ण मृगी का रूप धरने वाली) कहा गया है। यह सूक्त देवी की मूर्तियों के अभिषेक (Abhishekam) के लिए विशेष रूप से निर्धारित है।

श्लोकों का गूढ़ अर्थ और लाभ (Benefits)

इस सूक्त के 16 श्लोक (मंत्र) जीवन की 16 कलाओं और पूर्णता के प्रतीक हैं। इसके पाठ से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:

  • स्वर्ण और धन की प्राप्ति: "हिरण्यगोऽश्वात्मजमित्रदासान्" (श्लोक 2) — साधक को केवल पैसा नहीं, बल्कि सोना (Gold), गाय (पशुधन), घोड़े (वाहन), पुत्र, मित्र और सेवक—ये सभी प्रकार की संपदाएं प्राप्त होती हैं।
  • अलक्ष्मी का नाश: श्लोक 8 में एक बहुत शक्तिशाली प्रयोग है — "क्षुत्तृट्कृशाङ्गी मलिनामलक्ष्मीं... नाशयामि"। यह मंत्र घर से 'दरिद्रता' (Poverty), भूख, प्यास और मलिनता (गंदगी/नकारात्मकता) को बलपूर्वक बाहर निकाल देता है।
  • कर्दम और चिक्लीत ऋषि: श्लोक 11 और 12 में माँ लक्ष्मी के पुत्रों—कर्दम और चिक्लीत—का आवाहन किया गया है। मान्यता है कि माँ अपने पुत्रों के बिना नहीं रहतीं। अतः इन ऋषियों के निवास से लक्ष्मी जी का घर में स्थायी वास हो जाता है।
  • कीर्ति और समृद्धि: श्लोक 7 में कुबेर (धन के देवता) और कीर्ति (यश) का आवाहन है। यह पाठ समाज में मान-सम्मान और व्यापार में वृद्धि (मणिना च कीर्तिः) दिलाता है।
  • हवन का फल: अंतिम श्लोक (16) के अनुसार, जो व्यक्ति प्रतिदिन इसका पाठ करता है और घी (Ghee) की आहुति देता है, वह सदा 'श्रीयुक्त' (धनवान) बना रहता है।

साधना एवं हवन विधि (Ritual & Havan Method)

पौराणिक श्रीसूक्त का प्रयोग मुख्य रूप से दो कार्यों में होता है: अभिषेक और हवन

  • अभिषेक विधि: शुक्रवार या दीपावली के दिन माँ लक्ष्मी की चांदी/पीतल की मूर्ति या श्रीयंत्र को थाली में रखें। अब इस सूक्त के 15 मंत्रों को बोलते हुए क्रमशः दूध, दही, घी, शहद, शक्कर और अंत में शुद्ध जल से अभिषेक करें। यह प्रयोग कर्जे और आर्थिक तंगी को तत्काल दूर करता है।
  • हवन विधि: एक छोटा हवन कुंड लें। आम की लकड़ी जलाएं। गाय के घी में थोड़ी सी खीर (चावल-दूध) और कमल गट्टा मिलाएं। अब "हिरण्यवर्णां... स्वाहा", "ताम म आवह... स्वाहा" बोलते हुए 15 मंत्रों से 15 आहुतियां दें। अंत में 16वें श्लोक से पूर्णाहुति दें।
  • दैनिक पाठ: यदि हवन या अभिषेक संभव न हो, तो नित्य सुबह दीपक जलाकर केवल इन 16 श्लोकों का श्रद्धापूर्वक पाठ करें। पाठ के बाद माँ को मिश्री का भोग लगाएं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. पौराणिक श्रीसूक्त और वैदिक श्रीसूक्त में क्या अंतर है?

वैदिक श्रीसूक्त ऋग्वेद का हिस्सा है जिसे 'स्वर' (विशिष्ट उच्चारण/Accent) के साथ पढ़ा जाता है, जो कठिन होता है। पौराणिक श्रीसूक्त उसी भाव को सरल श्लोकों में प्रस्तुत करता है, जिसे सामान्य जन बिना कठिन वैदिक नियमों के आसानी से पढ़ सकते हैं।

2. इस सूक्त में 'जातवेदस' किसे कहा गया है?

'जातवेदस' अग्नि देव का नाम है। इस स्तोत्र में साधक अग्नि देव से प्रार्थना करता है कि वे माँ लक्ष्मी को उनके लिए बुलाएं (आवह)। अग्नि को देवताओं का मुख (Messenger) माना जाता है।

3. श्लोक 1 में माँ को 'मृगीरूपधरां' क्यों कहा गया है?

पुराणों के अनुसार, एक बार माँ लक्ष्मी ने 'हरिणी' (मृगी/सोने की हिरणी) का रूप धारण कर अरण्य (वन) में विचरण किया था। हिरण की तरह चंचल लक्ष्मी को भक्ति के पाश में बांधने का संकेत यहाँ दिया गया है।

4. क्या यह पाठ देवी के अभिषेक के लिए प्रयोग होता है?

हाँ, इस स्तोत्र की विनियोग पंक्ति में ही लिखा है 'देव्यभिषेके पौराणं श्रीसूक्तम्'। मूर्ति या श्रीयंत्र पर दूध, जल या पंचामृत से अभिषेक करते समय इसका पाठ सर्वश्रेष्ठ और सिद्ध माना जाता है।

5. कर्दम और चिक्लीत कौन हैं?

कर्दम और चिक्लीत माँ लक्ष्मी के मानस पुत्र (ऋषि) माने जाते हैं। इस सूक्त में उनसे प्रार्थना की गई है कि वे (पुत्र रूप में) साधक के घर में निवास करें, क्योंकि जहाँ पुत्र होंगे, वहाँ माता लक्ष्मी अवश्य ममतामयी होकर रहेंगी।

6. अलक्ष्मी का नाश कैसे होता है?

श्लोक 8 में साधक कहता है—'क्षुत्तृट्कृशाङ्गी...' अर्थात भूख और प्यास से कमजोर, मलिन 'अलक्ष्मी' (दरिद्रता/ज्येष्ठा देवी) को मैं नष्ट करता हूँ। यह पाठ घर से नकारात्मक ऊर्जा और कलह को बाहर निकालता है।

7. क्या इस स्तोत्र से हवन किया जा सकता है?

जी हाँ, अंतिम श्लोक (16) में स्पष्ट निर्देश है—'यः पठेत् जुहुयाच्चाज्यं'—अर्थात जो इसका पाठ करे और घी (आज्य) से हवन करे, वह सदा श्रीयुक्त (धनी) रहता है। कमल गट्टे के साथ हवन करना और भी उत्तम है।

8. 'गंधद्वारां' और 'दुराधर्षां' का क्या अर्थ है?

माँ लक्ष्मी 'गंधद्वारा' हैं (पृथ्वी तत्व की सुगंध से जानी जाती हैं) और 'दुराधर्षा' हैं (जिन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता, जो अजेय हैं)। यह उनके स्थायित्व और शक्ति को दर्शाता है।

9. पाठ के लिए कौन सा समय उत्तम है?

शुक्रवार की सुबह अभिषेक के समय या दीपावली, शरद पूर्णिमा और अक्षय तृतीया की रात्रि में हवन के समय इसका पाठ अमोघ फलदायी है।

10. इस पाठ का मुख्य फल क्या है?

श्लोक 2 और 15 के अनुसार, इससे सुवर्ण (Gold), गाय, अश्व (वाहन), दास-दासी (सेवक), पुत्र, मित्र, सत्य और अन्न-धन की प्रचुर प्राप्ति होती है।