श्री सूक्तम् - ऋग्वेदीय (Sri Suktam - Rigvediya)
Sri Suktam (Rigvediya - The Vedic Hymn for Wealth)

॥ श्री सूक्त (ऋग्वेदीय) ॥
विनियोगः
ॐ हिरण्यवर्णामिति पञ्चदशर्चस्य सूक्तस्य आनन्द कर्दम श्रीद चिक्लीता ऋषयः ।
श्रीर्देवता । आद्यास्तिस्रोऽनुष्टुभः ।
चतुर्थी बृहती । पञ्चम्याद्या अष्टावनुष्टुभः ।
त्रयोदशी चतुर्दशी च त्रिष्टुभौ । पञ्चदशी प्रस्तारपङ्क्तिः ।
शेष अनुष्टुभः । श्री महालक्ष्मी प्रसादात् दारिद्र्य ध्भंसार्थं धान्य धन पशु बहुपुत्र लाभार्थं शतसंवत्सर दीर्घायुरार्थं जपे विनियोगः ॥
न्यासः
ॐ हिरण्यवर्णायै अङ्गुष्ठाभ्यां नमः ।
ॐ सुवर्णरजतस्रजायै तर्जनीभ्यां नमः ।
ॐ चन्द्राय़ै मध्यमाभ्यां नमः ।
ॐ हिरण्मय्यै अनामिकाभ्यां नमः ।
ॐ लक्ष्म्यै कनिष्ठिकाभ्यां नमः ।
ॐ जातवेदसे करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ।
(एवं हृदयादिन्यासः)
ध्यानम्
अरुणकमलसंस्था तद्रजः पुञ्जवर्णा करकमलधृतेष्टा भीतिरयुग्माम्बुजा च ।
मणिमुकुटविचित्रालङ्कृता कल्पजालैर्भवतु भुवनमाता सन्ततं श्रीः श्रियै नः ॥
॥ श्री सूक्तम् ॥
ॐ ॥ हिरण्यवर्णां हरिणीं सुवर्णरजतस्रजाम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं विन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् ॥ २॥
अश्वपूर्वां रथमध्यां हस्तिनादप्रबोधिनीम् ।
श्रियं देवीमुपह्वये श्रीर्मादेवीर्जुषताम् ॥ ३॥
कां सोस्मितां हिरण्यप्राकारामार्द्रां ज्वलन्तीं तृप्तां तर्पयन्तीम् ।
पद्मे स्थितां पद्मवर्णां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ४॥
चन्द्रां प्रभासां यशसा ज्वलन्तीं श्रियं लोके देवजुष्टामुदाराम् ।
तां पद्मिनीमीं शरणमहं प्रपद्येऽलक्ष्मीर्मे नश्यतां त्वां वृणे ॥ ५॥
आदित्यवर्णे तपसोऽधिजातो वनस्पतिस्तव वृक्षोऽथ बिल्वः ।
तस्य फलानि तपसा नुदन्तु मायान्तरायाश्च बाह्या अलक्ष्मीः ॥ ६॥
उपैतु मां देवसखः कीर्तिश्च मणिना सह ।
प्रादुर्भूतोऽस्मि राष्ट्रेऽस्मिन् कीर्तिमृद्धिं ददातु मे ॥ ७॥
क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम् ।
अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णुद मे गृहात् ॥ ८॥
गंधद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् ।
ईश्वरीꣳ सर्वभूतानां तामिहोपह्वये श्रियम् ॥ ९॥
मनसः काममाकूतिं वाचः सत्यमशीमहि ।
पशूनां रूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयतां यशः ॥ १०॥
कर्दमेन प्रजाभूता मयि सम्भव कर्दम ।
श्रियं वासय मे कुले मातरं पद्ममालिनीम् ॥ ११॥
आपः सृजन्तु स्निग्धानि चिक्लीत वस मे गृहे ।
नि च देवीं मातरं श्रियं वासय मे कुले ॥ १२॥
आर्द्रां पुष्करिणीं पुष्टिं पिङ्गलां पद्ममालिनीम् ।
चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १३॥
आर्द्रां यः करिणीं यष्टिं सुवर्णां हेममालिनीम् ।
सूर्यां हिरण्मयीं लक्ष्मीं जातवेदो म आवह ॥ १४॥
तां म आवह जातवेदो लक्ष्मीमनपगामिनीम् ।
यस्यां हिरण्यं प्रभूतं गावो दास्योऽश्वान्विन्देयं पुरुषानहम् ॥ १५॥
यः शुचिः प्रयतो भूत्वा जुहुयादाज्य मन्वहम् ।
श्रियः पञ्चदशर्चं च श्रीकामः सततं जपेत् ॥ १६॥
॥ फलश्रुति ॥
पद्मानने पद्म ऊरू पद्माक्षी पद्मसम्भवे ।
त्वं मां भजस्व पद्माक्षी येन सौख्यं लभाम्यहम् ॥
अश्वदायी गोदायी धनदायी महाधने ।
धनं मे जुषतां देवि सर्वकामांश्च देहि मे ॥
पुत्रपौत्र धनं धान्यं हस्त्यश्वादिगवे रथम् ।
प्रजानां भवसि माता आयुष्मन्तं करोतु माम् ॥
धनमग्निर्धनं वायुर्धनं सूर्यो धनं वसुः ।
धनमिन्द्रो बृहस्पतिर्वरुणं धनमश्नु ते ॥
वैनतेय सोमं पिब सोमं पिबतु वृत्रहा ।
सोमं धनस्य सोमिनो मह्यं ददातु सोमिनः ॥
न क्रोधो न च मात्सर्यं न लोभो नाशुभा मतिः ॥
भवन्ति कृतपुण्यानां भक्तानां श्रीसूक्तं जपेत्सदा ॥
वर्षन्तु ते विभावरि दिवो अभ्रस्य विद्युतः ।
रोहन्तु सर्वबीजान्यव ब्रह्म द्विषो जहि ॥
पद्मप्रिये पद्मिनि पद्महस्ते पद्मालये पद्मदलायताक्षि ।
विश्वप्रिये विष्णु मनोऽनुकूले त्वत्पादपद्मं मयि सन्निधत्स्व ॥
या सा पद्मासनस्था विपुलकटितटी पद्मपत्रायताक्षी ।
गम्भीरा वर्तनाभिः स्तनभर नमिता शुभ्र वस्त्रोत्तरीया ।
लक्ष्मीर्दिव्यैर्गजेन्द्रैर्मणिगण खचितैस्स्नापिता हेमकुम्भैः ।
नित्यं सा पद्महस्ता मम वसतु गृहे सर्वमाङ्गल्ययुक्ता ॥
लक्ष्मीं क्षीरसमुद्र राजतनयां श्रीरंगधामेश्वरीम् ।
दासीभूतसमस्त देव वनितां लोकैक दीपांकुराम् ।
श्रीमन्मन्दकटाक्षलब्ध विभव ब्रह्मेन्द्रगङ्गाधराम् ।
त्वां त्रैलोक्य कुटुम्बिनीं सरसिजां वन्दे मुकुन्दप्रियाम् ॥
सिद्धलक्ष्मीर्मोक्षलक्ष्मीर्जयलक्ष्मीस्सरस्वती ।
श्रीलक्ष्मीर्वरलक्ष्मीश्च प्रसन्ना मम सर्वदा ॥
वरांकुशौ पाशमभीतिमुद्रां करैर्वहन्तीं कमलासनस्थाम् ।
बालार्क कोटि प्रतिभां त्रिणेत्रां भजेहमाद्यां जगदीश्वरीं ताम् ॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके ।
शरण्ये त्र्यम्बके देवि नारायणि नमोऽस्तु ते ॥
सरसिजनिलये सरोजहस्ते धवलतरांशुक गन्धमाल्यशोभे ।
भगवति हरिवल्लभे मनोज्ञे त्रिभुवनभूतिकरिप्रसीद मह्यम् ॥
विष्णुपत्नीं क्षमां देवीं माधवीं माधवप्रियाम् ।
विष्णोः प्रियसखींम् देवीं नमाम्यच्युतवल्लभाम् ॥
महालक्ष्मी च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमही ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
(आनन्दः कर्दमः श्रीदश्चिक्लीत इति विश्रुताः ।
ऋषयः श्रियः पुत्राश्च श्रीर्देवीर्देवता मताः (स्वयम्
श्रीरेव देवता ॥ )
(चन्द्रभां लक्ष्मीमीशानाम् सूर्यभां श्रियमीश्वरीम् ।
चन्द्र सूर्यग्नि सर्वाभाम् श्रीमहालक्ष्मीमुपास्महे ॥
श्रीवर्चस्यमायुष्यमारोग्यमाविधात् पवमानं महीयते ।
धनं धान्यं पशुं बहुपुत्रलाभं शतसंवत्सरं दीर्घमायुः ॥
ऋणरोगादिदारिद्र्यपापक्षुदपमृत्यवः ।
भयशोकमनस्तापा नश्यन्तु मम सर्वदा ॥
श्रिये जात श्रिय आनिर्याय श्रियं वयो जनितृभ्यो दधातु ।
श्रियं वसाना अमृतत्वमायन् भजंति सद्यः सविता विदध्यून् ॥
श्रिय एवैनं तच्छ्रियामादधाति । सन्ततमृचा वषट्कृत्यं
सन्धत्तं सन्धीयते प्रजया पशुभिः । य एवं वेद ।
ॐ महादेव्यै च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि ।
तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात् ॥
॥ ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥
वैदिक समृद्धि का मंत्र (Introduction)
श्री सूक्तम् (Sri Suktam) वेदों का सबसे प्राचीन और शक्तिशाली लक्ष्मी स्तोत्र है। यह ऋग्वेद के परिशिष्ट (खिल-भाग) में पाया जाता है।
जिस प्रकार पुरुष सूक्त भगवान विष्णु की महिमा का वर्णन है, उसी प्रकार श्री सूक्त माँ लक्ष्मी (श्री) की महिमा, उनके स्वरूप और उनकी कृपा का वैदिक गान है। इसमें कुल 15 मुख्य मंत्र (ऋचाएं) हैं, और बाद में फलश्रुति के श्लोक जोड़े गए हैं।
महत्व: हिरण्यवर्णाम् हरिणीम् (Significance)
श्री सूक्त का आरम्भ "हिरण्यवर्णाम्..." मंत्र से होता है, जिसका अर्थ है "सोने की कांति वाली"। यह सूक्त केवल धन प्राप्ति के लिए नहीं, बल्कि "अलक्ष्मी" (दरिद्रता, कलह, और दुर्भाग्य) के नाश के लिए भी रामबाण है।
"क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्" (श्लोक ८)
इस मंत्र में साधक प्रार्थना करता है कि भूख, प्यास और मलिनता रूपी अलक्ष्मी का नाश हो। यह सूक्त भौतिक और आध्यात्मिक दोनों प्रकार की समृद्धि (श्री) प्रदान करता है।
लाभ (Benefits)
अखंड धन प्राप्ति: इसके नित्य पाठ से घर में धन-धान्य की कभी कमी नहीं होती। यह "कुबेर" के समान ऐश्वर्य देने वाला है।
दरिद्रता नाश: यह ऋण (Debt) और दरिद्रता को जड़ से समाप्त करने के लिए सबसे प्रभावशाली उपाय है।
आरोग्य और यश: इससे न केवल पैसा, बल्कि समाज में मान-सम्मान (कीर्ति) और उत्तम स्वास्थ्य की भी प्राप्ति होती है।
पाठ विधि (Ritual & Vidhi)
- अभिषेक: शुक्रवार को लक्ष्मी जी की मूर्ति या श्री यंत्र पर दूध/जल से अभिषेक करते हुए श्री सूक्त का पाठ करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है।
- हवन: "कमल गट्टा" (कमल के बीज) को घी में डुबोकर श्री सूक्त के एक-एक मंत्र से आहूति देने से महालक्ष्मी शीघ्र प्रसन्न होती हैं।
- संख्या: नित्य 1 पाठ करें। विशेष कामना के लिए 16 पाठ 41 दिनों तक करें।
प्रश्नोत्तरी (FAQ)
श्री सूक्त (Sri Suktam) क्या है?
श्री सूक्त ऋग्वेद के खिल-भाग (Khila Suktas) का एक अत्यंत पवित्र सूक्त है। इसमें 16 मंत्र हैं जो देवी लक्ष्मी (श्री) की स्तुति करते हैं। यह धन, समृद्धि और ऐश्वर्य प्राप्ति का सबसे शक्तिशाली वैदिक साधन माना जाता है।
श्री सूक्त का पाठ कब करना चाहिए?
इसका पाठ नित्य प्रातःकाल या सायंकाल में किया जा सकता है। विशेष रूप से शुक्रवार, पूर्णिमा और दीपावली के दिन इसका पाठ, हवन या इसे सुनते हुए अभिषेक करना अत्यंत फलदायी होता है।
"हिरण्यवर्णाम्" (Hiranyavarnam) का क्या अर्थ है?
हिरण्य का अर्थ है सोना (Gold)। "हिरण्यवर्णाम्" का अर्थ है - जो सोने के समान कांतिवान और चमकदार हैं। यह देवी लक्ष्मी के तेज और समृद्धि स्वरूप का वर्णन है।
अलक्ष्मी नाश (Alakshmi Nashana) क्या है?
अलक्ष्मी दरिद्रता, भूख और दुर्भाग्य की देवी हैं। श्री सूक्त के 8वें मंत्र "क्षुत्पिपासामलां ज्येष्ठामलक्ष्मीं नाशयाम्यहम्" में प्रार्थना की जाती है कि मेरे घर से दरिद्रता और अलक्ष्मी सदा के लिए दूर हो जाएं।
फलश्रुति (Phala Shruti) का महत्व क्या है?
फलश्रुति बताती है कि इस पाठ का फल क्या होगा। श्री सूक्त की फलश्रुति कहती है कि जो व्यक्ति पवित्र होकर इसका पाठ करता है, वह धन, धान्य, आयु, आरोग्य और संतान सुख प्राप्त करता है।