Sri Shukra Stotram (Daitya Guru) – श्री शुक्र स्तोत्रम् (दैत्यगुरु)

शुक्र के विशेषण (Epithets of Venus)
| संस्कृत नाम | अर्थ | विशेष |
|---|---|---|
| कवीश्वर | कवियों के स्वामी | ज्ञान और काव्य के ईश्वर |
| मृतसञ्जीवनप्रिय | संजीवनी विद्या से प्रेम | मृतकों को जीवित करने वाले |
| दैत्यपूज्य | दैत्यों द्वारा पूजित | असुरों के आराध्य |
| बलिजीवप्रभावन | बलि को जीवन देने वाले | राजा बलि के गुरु |
| प्रह्लादपरमाह्लाद | प्रह्लाद के परम आनंद | प्रह्लाद के गुरु |
| विरोचनगुरु | विरोचन के गुरु | बलि के पिता के गुरु |
| खेचराधीश | ग्रहों के स्वामी | आकाश में विचरण करने वाले |
| मुक्तामणिसमप्रभ | मोती जैसी कांति | श्वेत वर्ण |
| शुकवाहन | तोते पर सवार | शुक्र का वाहन |
| जीवरिपु | बृहस्पति के प्रतिद्वंद्वी | देव-असुर युद्ध में विरोधी |
श्लोकों का अर्थ (Meaning)
श्लोक 1: कवीश्वर को नमस्कार! हव्य-कव्य (देव-पितृ आहुति) में पारंगत, सरस्वती के उपासक, संजीवनी विद्या प्रिय।
श्लोक 2: दैत्यों द्वारा पूजित, दैत्यराज के शासन कर्ता, नीतिशास्त्र-कला में निपुण, बलि को जीवन देने वाले।
श्लोक 3: प्रह्लाद के परम आनंद, विरोचन के गुरु, श्वेत वर्ण, शत्रुओं को जीतने वाले, भृगुनंदन को नमस्कार।
श्लोक 4: देवताओं के शत्रुओं (असुरों) के मन में स्थित, उशना, सभी प्राणियों के प्राणों के आश्रय।
श्लोक 5: खेचरों (ग्रहों) के स्वामी, शुक्ल यश देने वाले, वारुणी (मदिरा) के नाथ, मोती जैसी कांति वाले।
श्लोक 6: कच के उद्भव का कारण, बृहस्पति के प्रतिद्वंद्वी, देवयानी-ययाति के इष्ट, पुत्री से स्नेह करने वाले।
श्लोक 7: अग्नि कोण (दक्षिण-पूर्व) के स्वामी, ग्रहों के नायक, शिव के तीसरे नेत्र में स्थित, तोते पर सवार।
फलश्रुति (श्लोक 8-9): जो मनुष्य इस दैत्यगुरु के स्तोत्र का स्मरण करे, उसके लिए शुक्र दशा और गोचर में विघ्नहर होते हैं। चंद्रमा जैसी कांति वाले, असुरों के गुरु, शत्रुओं को जीतने वाले काव्य (शुक्र) मुझ पर प्रसन्न हों।
पाठ विधि (Recitation Method)
- विशेष अवसर: शुक्र दशा-अंतर्दशा, शुक्र गोचर
- शुभ दिन: शुक्रवार
- शुभ समय: प्रातः या संध्या, शुक्र होरा
- वस्त्र: सफेद वस्त्र
- विशेष फल: विघ्न हरण, शत्रु विजय
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)