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Sri Shukra Ashtottara Shatanama Stotram – श्री शुक्र अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Shukra Ashtottara Shatanama Stotram – श्री शुक्र अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री शुक्र अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ ॥ 108 नाम ॥ शुक्रः शुचिः शुभगुणः शुभदः शुभलक्षणः । शोभनाक्षः शुभ्ररूपः शुद्धस्फटिकभास्वरः ॥ १ ॥ दीनार्तिहारको दैत्यगुरुः देवाभिवन्दितः । काव्यासक्तः कामपालः कविः कल्याणदायकः ॥ २ ॥ भद्रमूर्तिर्भद्रगुणो भार्गवो भक्तपालनः । भोगदो भुवनाध्यक्षो भुक्तिमुक्तिफलप्रदः ॥ ३ ॥ चारुशीलश्चारुरूपश्चारुचन्द्रनिभाननः । निधिर्निखिलशास्त्रज्ञो नीतिविद्याधुरन्धरः ॥ ४ ॥ सर्वलक्षणसम्पन्नः सर्वावगुणवर्जितः । समानाधिकनिर्मुक्तः सकलागमपारगः ॥ ५ ॥ भृगुर्भोगकरो भूमिसुरपालनतत्परः । मनस्वी मानदो मान्यो मायातीतो महाशयः ॥ ६ ॥ बलिप्रसन्नोऽभयदो बली बलपराक्रमः । भवपाशपरित्यागो बलिबन्धविमोचकः ॥ ७ ॥ घनाशयो घनाध्यक्षो कम्बुग्रीवः कलाधरः । कारुण्यरससम्पूर्णः कल्याणगुणवर्धनः ॥ ८ ॥ श्वेताम्बरः श्वेतवपुश्चतुर्भुजसमन्वितः । अक्षमालाधरोऽचिन्त्यो अक्षीणगुणभासुरः ॥ ९ ॥ नक्षत्रगणसञ्चारो नयदो नीतिमार्गदः । वर्षप्रदो हृषीकेशः क्लेशनाशकरः कविः ॥ १० ॥ चिन्तितार्थप्रदः शान्तमतिः चित्तसमाधिकृत् । आधिव्याधिहरो भूरिविक्रमः पुण्यदायकः ॥ ११ ॥ पुराणपुरुषः पूज्यः पुरुहूतादिसन्नुतः । अजेयो विजितारातिर्विविधाभरणोज्ज्वलः ॥ १२ ॥ कुन्दपुष्पप्रतीकाशो मन्दहासो महामतिः । मुक्ताफलसमानाभो मुक्तिदो मुनिसन्नुतः ॥ १३ ॥ रत्नसिंहासनारूढो रथस्थो रजतप्रभः । सूर्यप्राग्देशसञ्चारः सुरशत्रुसुहृत् कविः ॥ १४ ॥ तुलावृषभराशीशो दुर्धरो धर्मपालकः । भाग्यदो भव्यचारित्रो भवपाशविमोचकः ॥ १५ ॥ गौडदेशेश्वरो गोप्ता गुणी गुणविभूषणः । ज्येष्ठानक्षत्रसम्भूतो ज्येष्ठः श्रेष्ठः शुचिस्मितः ॥ १६ ॥ अपवर्गप्रदोऽनन्तः सन्तानफलदायकः । सर्वैश्वर्यप्रदः सर्वगीर्वाणगणसन्नुतः ॥ १७ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ एवं शुक्रग्रहस्यैव क्रमादष्टोत्तरं शतम् । सर्वपापप्रशमनं सर्वपुण्यफलप्रदम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ १८ ॥ ॥ इति श्री शुक्र अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

प्रमुख 108 नामों की सूची (Key Names from 108)

श्रेणीनामअर्थ
शुभशुभद, शुभलक्षण, शुभगुणशुभ देने वाले
श्वेतश्वेताम्बर, श्वेतवपु, शुभ्ररूपश्वेत वर्ण वाले
गुरुदैत्यगुरु, भृगु, काव्यअसुरों के गुरु
बलिबलिप्रसन्न, बलिबन्धविमोचकबलि के गुरु
कल्याणकल्याणदायक, कल्याणगुणवर्धनमंगल देने वाले
भद्रभद्रमूर्ति, भद्रगुण, भार्गवशुभ स्वरूप
मुक्तिभुक्तिमुक्तिफलप्रद, मुक्तिदभोग-मोक्ष दाता
राशितुलावृषभराशीशतुला-वृषभ के स्वामी
नक्षत्रज्येष्ठानक्षत्रसम्भूत, नक्षत्रगणसञ्चारज्येष्ठा नक्षत्र
सर्वसर्वैश्वर्यप्रद, सर्वलक्षणसम्पन्नसर्व ऐश्वर्य दाता

फलश्रुति - तीन विशेष फल (Three Blessings)

सर्वपापप्रशमन
सभी पापों का शमन
सर्वपुण्यफलप्रद
सभी पुण्यों का फल
सर्वकामावाप्ति
सभी कामनाओं की पूर्ति

पाठ विधि (Recitation Method)

  • शुभ दिन: शुक्रवार
  • शुभ समय: प्रातः या संध्या, शुक्र होरा
  • जप संख्या: 1, 3, 11, 108 बार
  • वस्त्र: सफेद वस्त्र
  • विशेष अवसर: शुक्र दशा, शुक्र गोचर, विवाह बाधा

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'अष्टोत्तरशतनाम' का क्या अर्थ है?

अष्ट (8) + उत्तर (अधिक) + शत (100) = 108 नाम। यह स्तोत्र रूप में है।

2. 'बलिप्रसन्न' का क्या अर्थ है?

राजा बलि पर प्रसन्न। शुक्राचार्य बलि के गुरु थे और उन पर सदा प्रसन्न रहते थे।

3. 'तुलावृषभराशीश' का क्या अर्थ है?

तुला और वृषभ राशि के स्वामी। ज्योतिष में शुक्र इन दोनों राशियों के स्वामी ग्रह हैं।

4. 'भुक्तिमुक्तिफलप्रद' का क्या अर्थ है?

भुक्ति (भोग) + मुक्ति (मोक्ष) + फल + प्रद = भोग और मोक्ष दोनों का फल देने वाले।

5. 'ज्येष्ठानक्षत्रसम्भूत' का क्या अर्थ है?

ज्येष्ठा नक्षत्र में जन्मे। यह शुक्र का विशेष नक्षत्र माना जाता है।

6. 'गौडदेशेश्वर' का क्या अर्थ है?

गौड देश (बंगाल) के स्वामी। ज्योतिष में शुक्र का विशेष क्षेत्र।

7. 'बलिबन्धविमोचक' का क्या अर्थ है?

बलि के बंधन से मुक्त करने वाले। वामन अवतार में बलि को बाँधा गया था।

8. 'सुरशत्रुसुहृत्' का क्या अर्थ है?

सुर (देव) + शत्रु (असुर) + सुहृत् (मित्र) = असुरों के मित्र। शुक्राचार्य असुरों के गुरु हैं।

9. 'चतुर्भुजसमन्वित' का क्या अर्थ है?

चार भुजाओं से युक्त। शुक्र देव का चतुर्भुज स्वरूप।

10. इस स्तोत्र का मुख्य फल क्या है?

तीन विशेष फल - सर्वपाप शमन, सर्वपुण्य फल, सर्वकामना पूर्ति।