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Sri Sharada Pancharatna Stuti – श्री शारदा पञ्चरत्न स्तुतिः

Sri Sharada Pancharatna Stuti – श्री शारदा पञ्चरत्न स्तुतिः
॥ श्री शारदा पञ्चरत्न स्तुतिः ॥ श्रीमच्छङ्करदेशिकेन्द्ररचिते तुङ्गापगातीरगे शृङ्गेर्याख्यपुरस्थिते सुविमले सन्मौनिसंसेविते । पीठे तां रविकोटिदीप्तिसहितां राराज्यमानां शिवां राजीवाक्षमुखामरार्चितपदां वन्दे सदा शारदाम् ॥ १ ॥ पादानम्रजनार्तिनाशनिपुणां नादानुसन्धायिनीं वेदान्तप्रतिपाद्यमानविभवां वादादिशक्तिप्रदाम् । विद्याकल्पलतां चतुर्मुखमुखाम्भोजातसूर्यायितां विद्यातीर्थगुरूत्तमैरहरहः संसेव्यमानां भजे ॥ २ ॥ ईषत्स्मेरमुखाम्बुजां कुचभरानम्रां त्रिलोकावनीं दैत्यव्रातविनाशिनीं कचजितप्रावृट्पयोदां शिवम् । संसारार्णवमग्नदीनजनतासन्तापसन्नाशिनीं वन्दे तां शुभदामनन्यशरणः स्वान्ते सदा शारदाम् ॥ ३ ॥ कारुण्यामृतवारिराशिमनिशं केयूरहारैर्वृतां कामारेः सहजां कराब्जविलसत्कीरां कुबेरार्चिताम् । कामक्रोधमुखारिवर्गशमनीं कैवल्यसम्पत्प्रदां कञ्जोद्भूतमनःप्रियां हृदि भजे भक्त्या सदा शारदाम् ॥ ४ ॥ नित्याऽनित्यविवेकदाननिपुणां स्तुत्यां मुकुन्दादिभिः यत्याकारशशाङ्कमौलिविनुतां सत्यापितस्वाश्रवाम् । नत्या केवलमेव तुष्टहृदयां त्यक्त्वाऽन्यदेवानहं भक्त्या मे हृदयाम्बुजेऽनवरतं वन्दे सदा शारदाम् ॥ ५ ॥ ॥ इति श्री शारदा पञ्चरत्न स्तुतिः सम्पूर्णम् ॥

परिचय: श्री शारदा पञ्चरत्न स्तुतिः

श्री शारदा पञ्चरत्न स्तुतिः दक्षिण भारत के प्रसिद्ध तीर्थ शृंगेरी (Sringeri) में विराजमान माँ शारदाम्बा की एक अत्यंत लोकप्रिय और शक्तिशाली प्रार्थना है। इसके रचयिता के रूप में अक्सर जगद्गुरु शंकराचार्य परंपरा के आचार्यों (विशेषकर श्री भारती तीर्थ महास्वामीजी) का नाम लिया जाता है।

यह स्तुति तुङ्गा नदी के तट पर स्थित, मुनियों द्वारा पूजित और करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी माँ शारदा का गुणगान करती है।

इस स्तुति का विशिष्ट महत्व

  • शृंगेरी पीठ का वर्णन: पहले ही श्लोक में 'तुङ्गापगातीरगे' (तुङ्गा नदी के तीर पर) और 'शृङ्गेर्याख्यपुरस्थिते' (शृंगेरी नामक नगर में स्थित) का स्पष्ट वर्णन है, जो इसे ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से शृंगेरी से जोड़ता है।
  • विवेक और वैराग्य: श्लोक 5 में माँ को 'नित्याऽनित्यविवेकदाननिपुणां' कहा गया है, अर्थात वे साधक को यह समझने की शक्ति देती हैं कि संसार में क्या नित्य (शाश्वत) है और क्या अनित्य (नाशवान)।
  • शत्रुओं का नाश: श्लोक 4 में उन्हें 'काम-क्रोध' रूपी आंतरिक शत्रुओं का नाश करने वाली देवी बताया गया है।
  • मोक्ष प्रदायिनी: वे केवल विद्या ही नहीं, बल्कि 'कैवल्य' (मोक्ष) रूपी संपत्ति भी प्रदान करती हैं (श्लोक 4)।

पाठ के लाभ

नियमित रूप से इस पञ्चरत्न का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • तीक्ष्ण बुद्धि: यह वाणी और बुद्धि को निर्मल करती है। छात्रों के लिए यह अत्यंत लाभकारी है।
  • वाक सिद्धि: श्लोक 2 में उन्हें 'वादादिशक्तिप्रदाम्' कहा गया है, यानी वे वाद-विवाद और तर्क में विजय और वाक शक्ति प्रदान करती हैं।
  • मानसिक शांति: श्लोक 3 के अनुसार, वे 'संसारार्णव' (संसार रूपी सागर) में डूबे हुए दुखी जनों के संताप को हर लेती हैं।
  • समग्र सुरक्षा: वे 'त्रिलोकावनीं' (तीनों लोकों की रक्षा करने वाली) हैं, अतः भक्त को हर प्रकार के भय से मुक्ति मिलती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'पञ्चरत्न' का क्या अर्थ है?

'पञ्चरत्न' का अर्थ है 'पाँच रत्न'। हिंदू स्तोत्र साहित्य में, जब 5 श्लोकों का कोई समूह अत्यंत महत्वपूर्ण और प्रभावकारी माना जाता है, तो उसे 'पञ्चरत्न' कहा जाता है।

2. माँ शारदा के हाथ में 'कीर' (तोता) क्यों है?

श्लोक 4 में 'कराब्जविलसत्कीरां' (जिनके कमल समान हाथ में तोता सुशोभित है) का वर्णन है। शृंगेरी शारदाम्बा माँ सरस्वती का ही स्वरूप हैं, और तोता (शुक) वेदों के पवित्र ज्ञान का प्रतीक है।

3. क्या इस स्तोत्र को नवरात्रि में ही पढ़ना चाहिए?

वैसे तो नवरात्रि (विशेषकर शारदा नवरात्रि) श्रेष्ठ समय है, परंतु विद्या और ज्ञान प्राप्ति के इच्छुक लोग इसका नित्य प्रात:काल पाठ कर सकते हैं।

4. 'विद्यातीर्थ' कौन हैं जिनका उल्लेख श्लोक 2 में है?

श्री विद्यातीर्थ (1229-1333 ई.) शृंगेरी पीठ के 10वें जगद्गुरु थे, जो एक महान संत और तपस्वी थे। उनके नाम का उल्लेख यह दर्शाता है कि यह स्तोत्र शृंगेरी परंपरा से गहरा जुड़ा है।

5. 'कैवल्य' का क्या अर्थ है?

कैवल्य का अर्थ है 'केवलता' या मोक्ष। यह अद्वैत वेदांत का परम लक्ष्य है, जहाँ जीवात्मा और परमात्मा की एकता का अनुभव होता है। माँ शारदा इसे प्रदान करने वाली हैं।