Sri Sharada Bhujanga Prayata Stuti – श्री शारदा भुजङ्ग प्रयात स्तुतिः

॥ श्री शारदा भुजङ्ग प्रयात स्तुतिः ॥
स्मितोद्धूतराकानिशानायकायै
कपोलप्रभानिर्जितादर्शकायै ।
स्वनेत्रावधूताङ्गजातध्वजायै
सरोजोत्थसत्यै नमः शारदायै ॥ १ ॥
(जिनकी मन्द मुस्कान ने पूर्णिमा के चन्द्रमा (राकानिशानायक) को भी तिरस्कृत कर दिया है, जिनके कपोलों (गालों) की कांति ने दर्पण को जीत लिया है, जो कमल पर विराजमान हैं, उन सत्यस्वरूपा शारदा को नमस्कार है।)
भवाम्भोधिपारं नयन्त्यै स्वभक्ता-
-न्विनायासलेशं कृपानौकयैव ।
भवाम्भोजनेत्रादिसंसेवितायै
अजस्रं हि कुर्मो नमः शारदायै ॥ २ ॥
(जो अपनी कृपा रूपी नौका से भक्तों को बिना किसी परिश्रम के संसार सागर के पार ले जाती हैं, और जो शिव (भव), विष्णु (अम्भोजनेत्र) आदि द्वारा पूजित हैं, उन शारदा को हम निरंतर नमस्कार करते हैं।)
सुधाकुम्भमुद्राविराजत्करायै
व्यथाशून्यचित्तैः सदा सेवितायै ।
क्रुधाकामलोभादिनिर्वापणायै
विधातृप्रियायै नमः शारदायै ॥ ३ ॥
(जिनके हाथों में अमृत कलश और ज्ञान मुद्रा सुशोभित है, जो शांत चित्त वाले मुनियों द्वारा सदा सेवित हैं, और जो क्रोध, काम, लोभ आदि अग्नि को शांत करने वाली हैं, उन ब्रह्माजी की प्रिया (शारदा) को नमस्कार है।)
नतेष्टप्रदानाय भूमिं गतायै
गतेनाच्छबर्हाभिमानं हरन्त्यै ।
स्मितेनेन्दुदर्पं च तोषं व्रजन्त्यै
सुतेनेव नम्रैर्नमः शारदायै ॥ ४ ॥
(जो भक्तों की इच्छाओं को पूरा करने के लिए ही मानो पृथ्वी पर अवतरित हुई हैं, जिनकी चाल (गति) ने मयूरों का अभिमान हर लिया है, और जो पुत्रवत विनम्र भक्तों पर प्रसन्न होती हैं, उन शारदा को नमस्कार है।)
नतालीयदारिद्र्यदुःखापहन्त्र्यै
तथा भीतिभूतादिबाधाहरायै ।
फणीन्द्राभवेण्यै गिरीन्द्रस्तनायै
विधातृप्रियायै नमः शारदायै ॥ ५ ॥
(जो अपने भक्तों की दरिद्रता और दुःखों का नाश करती हैं, जो भय और प्रेत बाधाओं को दूर करती हैं, जिनकी वेणी (चोटी) सर्पराज शेषनाग के समान है, उन विधाता (ब्रह्मा) की प्रिया शारदा को नमस्कार है।)
सुधाकुम्भमुद्राक्षमालाविराज-
-त्करायै कराम्भोजसम्मर्दितायै ।
सुराणां वराणां सदा मानिनीनां
मुदा सर्वदा ते नमः शारदायै ॥ ६ ॥
(जिनके करकमलों में अमृत कलश, ज्ञान मुद्रा और अक्षमाला (जप माला) सुशोभित है, जो देवताओं और श्रेष्ठ जनों द्वारा सदा सम्माननीय हैं, उन शारदा को मैं सदा प्रसन्नतापूर्वक नमस्कार करता हूँ।)
समस्तैश्च वेदैः सदा गीतकीर्त्यै
निराशान्तरङ्गाम्बुजातस्थितायै ।
पुरारातिपद्माक्षपद्मोद्भवाद्यै-
-र्मुदा पूजितायै नमः शारदायै ॥ ७ ॥
(सारे वेद जिनकी कीर्ति का गान करते हैं, जो निष्काम पुरुषों के हृदय-कमल में निवास करती हैं, और शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदि जिनकी प्रसन्नतापूर्वक पूजा करते हैं, उन शारदा को नमस्कार है।)
अविद्याऽऽपदुद्धारबद्धादरायै
तथा बुद्धिसम्पत्प्रदानोत्सुकायै ।
नतेभ्यः कदाचित्स्वपादाम्बुजाते
विधेः पुण्यतत्यै नमः शारदायै ॥ ८ ॥
(जो अविद्या रूपी आपदा से (भक्तों का) उद्धार करने के लिए वचनबद्ध हैं, जो बुद्धि रूपी संपत्ति देने के लिए उत्सुक रहती हैं, और जो अपने चरण कमलो में झुकने वालों के लिए विधि (ब्रह्मा) की पुण्य राशि के समान हैं, उन शारदा को नमस्कार है।)
पदाम्भोजनम्रान्कृते भीतभीतान्
द्रुतं मृत्युभीतेर्विमुक्तान्विधातुम् ।
सुधापूर्णकुम्भं करे किं विधत्से
द्रुतं पाययित्वा यथातृप्ति वाणि ॥ ९ ॥
(हे वाणी! आपके चरण कमलों में नतमस्तक जो भक्त मृत्यु से डरे हुए हैं, क्या उन्हें मृत्यु के भय से मुक्त करने के लिए और तृप्त करने के लिए ही आपने हाथ में अमृत से भरा कलश धारण किया है?)
महान्तो हि मह्यं हृदम्भोरुहाणि
प्रमोदात्समर्प्यासते सौख्यभाजः ।
इति ख्यापनायानतानां कृपाब्धे
सरोजान्यसङ्ख्यानि धत्से किमम्ब ॥ १० ॥
(हे दया की सागर माँ! "महान पुरुष अपने हृदय-कमल मुझे अर्पण करके सुखी हो गए हैं" - अपने भक्तों को यह बताने के लिए ही क्या आप (हाथों में/माला के रूप में) असंख्य कमल धारण करती हैं?)
शरच्चन्द्रनीकाशवस्त्रेण वीता
कनद्भर्मयष्टेरहङ्कारभेत्त्री ।
किरीटं सताटङ्कमत्यन्तरम्यं
वहन्ती हृदब्जे स्फुरत्वम्ब मूर्तिः ॥ ११ ॥
(शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा के समान श्वेत वस्त्र धारण करने वाली, जो स्वर्ण यष्टि (दंड) के अहंकार को भी तोड़ने वाली (कांति वाली) हैं, और अत्यंत सुंदर मुकुट व कुंडल धारण करती हैं, ऐसी आपकी मूर्ति मेरे हृदय-कमल में स्फुरित हो।)
निगृह्याक्षवर्गं तपो वाणि कर्तुं
न शक्नोमि यस्मादवश्याक्षवर्गः ।
ततो मय्यनाथे दया पारशून्या
विधेया विधातृप्रिये शारदाम्ब ॥ १२ ॥
(हे वाणी! मैं अपनी इंद्रियों (अक्षवर्ग) को वश में करके तपस्या करने में असमर्थ हूँ क्योंकि इंद्रियां अनियंत्रित हैं। इसलिए, हे ब्रह्मा की प्रिया माँ शारदा! मुझ अनाथ पर अपार दया कीजिये।)
कवित्वं पवित्वं द्विषच्छैलभेदे
रवित्वं नतस्वान्तहृद्ध्वान्तभेदे ।
शिवत्वं च तत्त्वप्रबोधे ममाम्ब
त्वदङ्घ्र्यब्जसेवापटुत्वं च देहि ॥ १३ ॥
(हे माँ! मुझे कवित्व (Poetry) और पवित्रता दीजिये। शत्रुओं के पहाड़ को तोड़ने के लिए वज्र जैसी शक्ति, भक्तों के हृदय के अंधकार को मिटाने के लिए सूर्य जैसा तेज, और तत्व ज्ञान में शिवत्व (कल्याण) तथा आपके चरण कमलों की सेवा में कुशलता प्रदान कीजिये।)
विलोक्यापि लोको न तृप्तिं प्रयाति
प्रसन्नं मुखेन्दुं कलङ्कादिशून्यम् ।
यदीयं ध्रुवं प्रत्यहं तां कृपाब्धिं
भजे शारदाम्बामजस्रं मदम्बाम् ॥ १४ ॥
(जिस कलंक-रहित प्रसन्न मुख-चन्द्रमा को देखकर लोग तृप्त नहीं होते, उस दया की सागर और अपनी माता शारदाम्बा को मैं नित्य निरंतर भजता हूँ।)
पुरा चन्द्रचूडो धृताचार्यरूपो
गिरौ शृङ्गपूर्वे प्रतिष्ठाप्य चक्रे ।
समाराध्य मोदं ययौ यामपारं
भजे शारदाम्बामजस्रं मदम्बाम् ॥ १५ ॥
(प्राचीन काल में भगवान शिव (चंद्रचूड) ने आचार्य (शंकराचार्य) का रूप धारण करके शृंगेरी पर्वत पर जिनकी स्थापना की, और जिनकी आराधना करके अपार आनंद प्राप्त किया, उन माँ शारदा को मैं निरंतर भजता हूँ।)
भवाम्भोधिपारं नयन्त्यै स्वभक्तान्
भवाम्भोजनेत्राजसम्पूज्यमानाम् ।
भवद्भव्यभूताघविध्वंसदक्षां
भजे शारदाम्बामजस्रं मदम्बाम् ॥ १६ ॥
(जो भक्तों को भवसागर से पार ले जाती हैं, जो शिव-विष्णु-ब्रह्मा द्वारा पूजित हैं, और जो भूत, भविष्य और वर्तमान के पापों को नष्ट करने में कुशल हैं, उन माँ शारदा को मैं निरंतर भजता हूँ।)
वराक त्वरा का तवेष्टप्रदाने
कथं पुण्यहीनाय तुभ्यं ददानि ।
इति त्वं गिरां देवि मा ब्रूहि यस्मा-
-दघारण्यदावानलेति प्रसिद्धा ॥ १७ ॥
(हे माँ! आप मुझसे ऐसा मत कहियेगा कि - "अरे नीच! तुझे वरदान देने की क्या जल्दी है? तू तो पुण्यहीन है, तुझे कैसे दूँ?" क्योंकि हे वाणी देवी! आप तो पापों के जंगल को जलाने वाली दावानल (वन-ग्नि) के रूप में प्रसिद्ध हैं।)
॥ इति श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनवनृसिंहभारतीस्वामिभिः विरचिता श्री शारदा भुजङ्ग प्रयात स्तुतिः सम्पूर्णम् ॥
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परिचय: श्री शारदा भुजङ्ग प्रयात स्तुतिः
श्री शारदा भुजङ्ग प्रयात स्तुतिः 17 श्लोकों की एक अत्यंत मधुर रचना है। इसे शृंगेरी पीठ की महान गुरु परंपरा के अंतर्गत श्री सच्चिदानन्द शिवाभिनव नृसिंह भारती स्वामीजी द्वारा रचित माना जाता है।
इस स्तोत्र में माँ शारदा को 'सुधा-कुम्भ' (अमृत कलश), 'अक्षमाला' (जप माला) और 'ज्ञान मुद्रा' धारण किए हुए वर्णित किया गया है। यह वही दिव्य स्वरूप है जिसके दर्शन आज भी शृंगेरी शारदा पीठ में होते हैं।
इस स्तुति का महत्व
- आदि शंकराचार्य का स्मरण: श्लोक 15 में स्पष्ट रूप से आदि शंकराचार्य ('चंद्रचूडो धृताचार्यरूपो') का उल्लेख है, जिन्होंने "शृङ्गपूर्वे गिरौ" (शृंगेरी पर्वत) पर माँ शारदा की स्थापना की थी। यह ऐतिहासिक महत्व का श्लोक है।
- अमृत कलश का रहस्य: श्लोक 9 में कवि पूछते हैं - "हे माँ! क्या आपने हाथ में अमृत कलश इसलिए रखा है ताकि मृत्यु से डरे हुए अपने भक्तों को आप शीघ्र अमृत पिलाकर अभय कर सकें?"
- तीनों शक्तियों का रूप: श्लोक 13 में कवि माँ से 'कवित्व' (Poetic skill), 'पवित्व' (Purity), और 'शिवत्व' (Self-realization) तीनों की मांग करते हैं।
- पापों का नाश: अंतिम श्लोक (17) में माँ को 'अघारण्यदावानल' (पाप रूपी जंगल को जलाने वाली दावानल अग्नि) कहा गया है।
पाठ के लाभ
इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक को निम्नलिखित सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं:
- भय मुक्ति: श्लोक 5 के अनुसार, यह दरिद्रता (Poverty), दुःख और 'भीति-भूत' (डर और प्रेत बाधा) का नाश करता है।
- बुद्धि और सम्पत्ति: श्लोक 8 में माँ को 'बुद्धिसम्पत्प्रदानोत्सुका' (बुद्धि रूपी सम्पत्ति देने के लिए उत्सुक) बताया गया है।
- मोक्ष की प्राप्ति: यह भक्तों को अनायास ही (बिना प्रयास के) 'भवाम्भोधि' (संसार सागर) के पार ले जाता है (श्लोक 2)।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. शृंगेरी शारदा का स्वरूप कैसा है?
इस स्तोत्र के अनुसार, वे श्वेत वस्त्र धारण करती हैं (शरच्चन्द्रनीकाशवस्त्रेण), उनके हाथों में अमृत कलश, माला और ज्ञान मुद्रा है, और वे अत्यंत सौम्य और करुणामयी हैं।
2. 'भुजङ्ग प्रयात' छंद का क्या प्रभाव है?
इसकी लय बहुत ही मनमोहक और तीव्र होती है, जिससे पाठ करते समय मन एकाग्र हो जाता है। यह छंद शिव तांडव स्तोत्र के लिए भी प्रसिद्ध है।
3. क्या यह स्तोत्र पापों को नष्ट कर सकता है?
हाँ, श्लोक 17 में स्पष्ट आश्वासन है कि माँ शारदा पापों को वैसे ही जला देती हैं जैसे जंगल की आग सूखी लकड़ियों को।
4. इस स्तोत्र में आदि शंकराचार्य का उल्लेख कहाँ है?
श्लोक 15 में कहा गया है कि "पुरा चन्द्रचूडो धृताचार्यरूपो" - अर्थात साक्षात् भगवान शिव ने आचार्य शंकर का रूप धरकर शृंगेरी में माँ की स्थापना की।