Sri Saraswati Stuti (Vasudevananda) – श्री सरस्वती स्तुतिः (वासुदेवानन्दसरस्वती कृतम्)

॥ श्री सरस्वती स्तुतिः (वासुदेवानन्दसरस्वती कृतम्) ॥
हृद्वक्षःस्थितविद्रुमाधिकमदा त्रीशस्य या स्फूर्तिदा
मालापुस्तकपद्मभृच्च वरदा या सर्वभाषास्पदा ।
या शङ्खस्फटिकर्क्षनाथविशदा या शारदा सर्वदा
प्रीता तिष्ठतु मन्मुखे सुवरदा वाग्जाड्यदा सर्वदा ॥ १ ॥
(जो हृदय और वक्ष में स्थित होकर आनंद देती हैं, जो ब्रह्मा-विष्णु-महेश (त्रीश) को स्फूर्ति देती हैं, जो माला, पुस्तक और पद्म धारण करती हैं; जो शंख, स्फटिक और चन्द्रमा के समान श्वेत (विशदा) हैं, वह वरदायिनी शारदा मेरे मुख में सदा प्रसन्न होकर निवास करें और मेरी वाणी की जड़ता को हरे।)
यस्यास्त्रीणि गुहागतानि हि पदान्येकं त्वनेकेडितं
स्तोतुं तां निगमेडितां बुधकुलं जातं त्वलं व्रीडितम् ।
ब्रह्माद्या अपि देवता नहि विदुर्यस्याः परं क्रीडितं
प्रारब्धात्र नुतिर्मयेव रुरुणा शार्दूलविक्रीडितम् ॥ २ ॥
(जिनके वाणी रूपी तीन पद गुहा (गुप्त) में हैं और एक पद (वैखरी) अनेक लोगों द्वारा उच्चारित होता है; जिनकी स्तुति वेद करते हैं, परन्तु विद्वान भी जिनका वर्णन करने में लज्जित (असमर्थ) हो जाते हैं; ब्रह्मादि देवता भी जिनकी लीला को नहीं जानते, उनकी स्तुति मैंने वैसे ही आरम्भ की है जैसे कोई मृग (रुरु) शेर के साथ खेलने (शार्दूलविक्रीडितम्) का साहस करे।)
अयि सर्वगुहास्थितेऽजिते
मयि तेऽपाङ्गदृगस्तु पूजिते ।
त्वदृते नहि वागधीश्वरि
व्यवहारोऽपि परावरेश्वरि ॥ ३ ॥
(हे सबके हृदय-गुहा में स्थित अजीता देवी! मुझ पर आपकी कृपादृष्टि हो। हे वागधीश्वरी! आपके बिना इस संसार में न तो कोई व्यवहार (बातचीत) संभव है और न ही परमार्थ।)
समयोचितवाक्प्रदे मुदे
विदुषां संसदि वादिवाददे ।
मयि मातरशेषधारणा
दयितेऽजस्य सदास्तु तारणा ॥ ४ ॥
(हे समयोचित (सही समय पर सही) वाणी देने वाली! हे विद्वानों की सभा में वाद-विवाद की शक्ति देने वाली! हे ब्रह्मा (अज) की प्रिया! मुझ पर आपकी दया और तारण शक्ति सदा बनी रहे।)
यद्धस्ते कमलं च तत्र कमला लीलाविहारी हरि-
-स्तस्याः सन्निकटेऽस्य नाभिकमले स्याल्लोकमूले विधिः ।
वेदा भेदभिदो मुखेषु च विधेर्ये स्वप्रमाणा नृणां
तेभ्यो यज्ञविधिस्ततोऽमरगणा जीवन्ति सा पातु वाक् ॥ ५ ॥
(जिनके हाथ में कमल है और वहाँ लक्ष्मी (कमला) हैं, जहाँ लीलाविहारी हरि(विष्णु) हैं; उनके पास ब्रह्मा जी (विधि) हैं; ब्रह्मा के मुख से जो भेद-रहित वेद निकले हैं, जिनसे यज्ञ होते हैं और देवताओं को हवि मिलती है - वे सब जिनकी कृपा से संभव है, वह वाग्देवी मेरी रक्षा करें।)
नमो नमस्तेऽस्तु महासरस्वति
प्रसीद मातर्जगतो महस्वति ।
परेशि वाग्वादिनि देवि भास्वति
प्रकाशके तेऽस्तु नभो यशस्वति ॥ ६ ॥
(हे महासरस्वती! आपको बार-बार नमस्कार है। हे जगत की माता! हे महस्वती (तेजस्विनी)! आप मुझ पर प्रसन्न हों। हे वाग्वादिनी! हे प्रकाशमयी देवी! आपको नमन है।)
त्रिषष्टिवर्णाऽऽशुगयुक्परा या
भूत्वाथ पश्यन्त्यभिधाथ मध्या ।
स्थानप्रयत्नादिवशान्मुखे च
या वैखरीति प्रणमामि तां गाम् ॥ ७ ॥
(जो 63 वर्णों और प्राणवायु (आशुग) से युक्त होकर पहले 'परा', फिर 'पश्यन्ती', फिर 'मध्यमा' और अंत में स्थान-प्रयत्न के संयोग से मुख में 'वैखरी' वाणी बनकर प्रकट होती हैं, उन वाग्देवी को मैं प्रणाम करता हूँ।)
त्वं ब्रह्मयोनिरपरा सरस्वति परावरा ।
साक्षात् स्वभक्तहृत्संस्थे प्रसीद मतिचेतने ॥ ८ ॥
(हे सरस्वती! आप ही ब्रह्मयोनि हैं, आप ही अपरा और परा (विद्या) हैं। आप साक्षात् अपने भक्तों के हृदय में स्थित हैं। हे मति (बुद्धि) को चेतना देने वाली! मुझ पर प्रसन्न हों।)
सरस्वतीस्तुतिमिमां वासुदेवसरस्वती ।
चक्रे यमनुजप्राह नरसिंहसरस्वती ॥ ९ ॥
(इस सरस्वती स्तुति की रचना वासुदेवानन्द सरस्वती ने की, जिसे नरसिंह सरस्वती (नृसिंह सरस्वती) ने भी लोगों से कहने के लिए (या प्रेरणा से) कहा है।)
॥ इति श्रीवासुदेवानन्दसरस्वती विरचितं श्री सरस्वती स्तुतिः सम्पूर्णम् ॥
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परिचय: श्री सरस्वती स्तुति
श्री सरस्वती स्तुति की रचना महान दत्त-अवतारी संत श्री वासुदेवानन्द सरस्वती (टेम्बे स्वामी महाराज) ने की है। वे संस्कृत के प्रकांड के विद्वान थे और उनकी वाणी में साक्षात् सरस्वती का वास माना जाता था।
यह स्तुति अत्यंत दार्शनिक और गूढ़ है। इसमें माँ सरस्वती को केवल विद्या की देवी नहीं, बल्कि 'नाद ब्रह्म' और 'सृष्टि का मूल' बताया गया है।
इस स्तुति की विशेषताएं
- वाणी के 4 स्तर: श्लोक 7 में 'परा', 'पश्यन्ती', 'मध्यमा' और 'वैखरी' वाणी का अद्भुत वर्णन है। स्वामीजी समझाते हैं कि कैसे एक विचार (परा) अंततः हमारे मुख से शब्द (वैखरी) बनकर निकलता है।
- समयसूचक बुद्धि (Presence of Mind): श्लोक 4 में माँ को 'समयोचित-वाक्-प्रदे' कहा गया है। अर्थात वे हमें सिखाती हैं कि किस समय क्या बोलना चाहिए, जो सफलता की कुंजी है।
- विनम्रता: श्लोक 2 में स्वामीजी अपनी तुलना एक 'रुरु' (मृग/हिरण) से करते हैं जो 'शार्दूल' (शेर) के साथ खिलवाड़ करने चला है। यह दर्शाता है कि माँ की महिमा (शेर) के सामने कवि की बुद्धि (मृग) कितनी तुच्छ है।
पाठ के लाभ
इस दिव्य स्तुति के पाठ से:
- वाक सिद्धि: वाणी में प्रभाव और सत्यता आती है।
- जड़ता का नाश: श्लोक 1 में प्रार्थना है 'वाग्जाड्यदा' (जड़ता को हरने वाली), जिससे मूक या हकलाने वाले लोगों को लाभ मिलता है।
- सभा में विजय: श्लोक 4 में 'विदुषां संसदि वादिवाददे' कहा गया है, यानी यह वाद-विवाद, डिबेट या इंटरव्यू में विजय दिलाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. वासुदेवानन्द सरस्वती कौन थे?
वासुदेवानन्द सरस्वती (1854-1914), जिन्हें टेम्बे स्वामी के नाम से भी जाना जाता है, भगवान दत्तात्रेय के परम भक्त और एक महान परिव्राजक सन्यासी थे। उन्होंने नंगे पैर पूरे भारत की यात्रा की थी।
2. 'वैखरी' वाणी क्या है?
वाणी का स्थूल रूप जो हम कानों से सुनते हैं और मुख से बोलते हैं, उसे 'वैखरी' कहते हैं। इससे पहले वाणी 'परा' (नाभि में), 'पश्यन्ती' (हृदय में) और 'मध्यमा' (कंठ में) के रूप में होती है।
3. इस स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
जो लोग वक्ता (Speaker), वकील, शिक्षक या विद्यार्थी हैं, उनके लिए यह स्तोत्र अमृत समान है क्योंकि यह 'समयोचित वाणी' प्रदान करता है।