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Sri Saraswati Stuti (Varaha Purana) – श्री सरस्वती स्तुतिः (वराहपुराणे ब्रह्म कृतम्)

Sri Saraswati Stuti (Varaha Purana) – श्री सरस्वती स्तुतिः (वराहपुराणे ब्रह्म कृतम्)
॥ श्री सरस्वती स्तुतिः (वराहपुराणे ब्रह्म कृतम्) ॥ ब्रह्मोवाच (ब्रह्मा जी बोले): जयस्व सत्यसम्भूते ध्रुवे देवि धरेऽक्षरे । सर्वगे सर्वजननि सर्वभूतमहेश्वरि ॥ १ ॥ (हे सत्य से उत्पन्न होने वाली देवी! आपकी जय हो। आप ध्रुव (अचल) हैं, धरा (आधार) हैं, और अक्षर (विनाश रहित) हैं। आप सर्वत्र व्याप्त हैं, सबकी जननी हैं और समस्त प्राणियों की महेश्वरी हैं।) सर्वज्ञा त्वं वरारोहे सर्वसिद्धिप्रदायिनी । सिद्धिबुद्धिकरे देवि प्रसूतिः परमेश्वरि ॥ २ ॥ (हे सुंदरी (वरारोहे)! आप सर्वज्ञ हैं, समस्त सिद्धियाँ प्रदान करने वाली हैं। आप ही सिद्धि और बुद्धि देती हैं। हे परमेश्वरी! आप ही प्रसूति (सृष्टि का मूल कारण) हैं।) त्वं स्वाहा त्वं स्वधा देवि त्वमुत्पत्तिर्वरानने । त्वमोङ्कारः स्थिता देवि वेदोत्पत्तिस्त्वमेव च ॥ ३ ॥ (हे वरानने! आप ही 'स्वाहा' (देवताओं की पुष्टि) हैं, आप ही 'स्वधा' (पितरों की तृप्ति) हैं। आप ही उत्पत्ति हैं। आप ही 'ओंकार' रूप में स्थित हैं और वेदों की उत्पत्ति भी आप ही हैं।) देवानां दानवानां च यक्षगन्धर्वरक्षसाम् । पशूनां वीरुधां चापि त्वमुत्पत्तिर्वरानने ॥ ४ ॥ (हे वरानने! देवताओं, दानवों, यक्षों, गंधर्वों, राक्षसों, पशुओं और लताओं (वनस्पतियों) की उत्पत्ति भी आपसे ही हुई है।) विद्या विद्येश्वरी सिद्धा प्रसिद्धा त्वं सुरेश्वरी । सर्वज्ञा त्वं वरारोहे सर्वसिद्धिविधायिनी ॥ ५ ॥ (आप विद्या हैं, विद्या की ईश्वरी हैं। आप सिद्धा और प्रसिद्धा हैं। आप सुरेश्वरी (देवताओं की देवी) हैं। आप सर्वज्ञ हैं और सभी सिद्धियों का विधान करने वाली हैं।) सर्वगा गतसन्देहा सर्वशत्रुनिबर्हिणी । सर्वविद्येश्वरी देवी नमस्ते स्वस्तिकारिणि ॥ ६ ॥ (आप सर्वत्र जाने वाली, संदेहों से रहित और सभी शत्रुओं का नाश करने वाली हैं। हे सर्व-विद्याओं की ईश्वरी! हे कल्याण (स्वस्ति) करने वाली देवी! आपको नमस्कार है।) ॥ फलश्रुति ॥ ऋतुस्नातां स्त्रियं गच्छेद्यस्त्वां स्तुत्वा वरानने । तस्यावश्यं भवेत् सृष्टिस्त्वत् प्रसादात् प्रजेश्वरि । स्वरूपा विजया भद्रे सर्वशत्रुविनाशिनी ॥ ७ ॥ (हे वरानने! जो पुरुष आपकी स्तुति करके ऋतुस्नात स्त्री (पत्नी) के पास (गर्भाधान के लिए) जाता है, उसके घर में अवश्य ही संतान (सृष्टि) उत्पन्न होती है। हे प्रजेश्वरी! हे भद्रे! आपकी कृपा से वह संतान स्वरूपवान, विजयी और शत्रुओं का नाश करने वाली होती है।) ॥ इति श्रीवराहपुराणे एकनवतितमोऽध्याये ब्रह्म कृत श्री सरस्वती स्तुतिः सम्पूर्णम् ॥

परिचय: वराह पुराणोक्त सरस्वती स्तुति

श्री सरस्वती स्तुतिः वराह पुराण के 91वें अध्याय में वर्णित है। जब भगवान ब्रह्मा सृष्टि की रचना कर रहे थे और उन्हें शक्ति की आवश्यकता थी, तब उन्होंने 'वाग्देवी' (सरस्वती) की यह स्तुति की।

ब्रह्मा जी ने उन्हें 'सर्वजननि' (सबकी माता) और 'प्रसूति' (Origin) कह कर संबोधित किया, जो यह दर्शाता है कि सरस्वती केवल ज्ञान की नहीं, बल्कि जीवन और अस्तित्व की भी देवी हैं।

इस स्तुति का महत्व

  • स्वाहा और स्वधा: श्लोक 3 में माँ को 'स्वाहा' (यज्ञ में देवताओं का भोजन) और 'स्वधा' (पितरों का भोजन) कहा गया है। इसका अर्थ है कि समस्त धार्मिक कर्मकांड सरस्वती के बिना अधूरे हैं।
  • सर्व-योनियों की जननी: श्लोक 4 में कहा गया है कि देवता, दानव, यक्ष, गंधर्व, यहाँ तक कि पशु और वनस्पतियाँ भी सरस्वती से ही उत्पन्न हुई हैं। यह एक दुर्लभ और व्यापक दृष्टिकोण है।
  • शत्रु नाश: श्लोक 6 में उन्हें 'सर्वशत्रुनिबर्हिणी' कहा गया है, जो अज्ञान और बाहरी शत्रुओं दोनों का नाश करती हैं।

पाठ के लाभ (विशेष: संतान प्राप्ति)

पुराण में इसका एक विशिष्ट फल बताया गया है:
  • वंश वृद्धि: जो दम्पति संतान सुख से वंचित हैं, यदि वे श्रद्धापूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करें, तो ब्रह्मा जी के वचन अनुसार उन्हें 'अवश्यं' (निश्चित रूप से) संतान प्राप्ति होती है।
  • तेजस्वी संतान: माँ सरस्वती की कृपा से वह संतान 'विजया' (विजयी) और 'स्वरूप' (सुंदर/गुणी) होती है।
  • सर्व सिद्धि: यह स्तुति साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—चारों पुरुषार्थ देने में सक्षम है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. वराह पुराण क्या है?

वराह पुराण 18 महापुराणों में से एक है। इसमें भगवान विष्णु के 'वराह' अवतार की कथा और विभिन्न व्रतों, तीर्थों व स्तुतियों का वर्णन है।

2. क्या सरस्वती पूजा से संतान प्राप्ति होती है?

सामान्यतः सरस्वती को विद्या की देवी माना जाता है, लेकिन इस पुराणिक स्तुति में ब्रह्मा जी ने स्पष्ट रूप से उन्हें 'प्रसूति' (Creator) और 'प्रजेश्वरी' (Goddess of Progeny) कहा है।

3. 'ओंकार' रूप का क्या अर्थ है?

श्लोक 3 में माँ को 'ओंकार' कहा गया है। ॐ सृष्टि की पहली ध्वनि (नाद) है, और सरस्वती नाद-ब्रह्म हैं। इसलिए सारा ब्रह्मांड उन्हीं का विस्तार है।