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Sri Chandika Stotram – श्री चण्डिका स्तोत्रम् | Markandeya Purana

Sri Chandika Stotram – श्री चण्डिका स्तोत्रम् | Markandeya Purana
॥ श्री चण्डिका स्तोत्रम् ॥ या देवी खड्गहस्ता सकलजनपदव्यापिनी विश्वदुर्गा श्यामाङ्गी शुक्लपाशा द्विजगणगणिता ब्रह्मदेहार्धवासा । ज्ञानानां साधयित्री यतिगिरिगमनज्ञान दिव्य प्रबोधा सा देवी दिव्यमूर्तिः प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा ॥ १ ॥ ह्रां ह्रीं ह्रूं चर्ममुण्डे शवगमनहते भीषणे भीमवक्त्रे क्रां क्रीं क्रूं क्रोधमूर्तिर्विकृतकुचमुखे रौद्रदंष्ट्राकराले । कं कं कं कालधारि भ्रमसि जगदिदं भक्षयन्ती ग्रसन्ती हुङ्कारं चोच्चरन्ती प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा ॥ २ ॥ ह्रां ह्रीं ह्रूं रुद्ररूपे त्रिभुवननमिते पाशहस्ते त्रिनेत्रे रां रीं रूं रङ्गरङ्गे किलिकिलितरवे शूलहस्ते प्रचण्डे । लां लीं लूं लम्बजिह्वे हसति कहकहाशुद्ध घोराट्‍टहासे कङ्काली कालरात्रिः प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा ॥ ३ ॥ घ्रां घ्रीं घ्रूं घोररूपे घघघघघटितैर्घुर्घुरारावघोरे निर्मांसी शुष्कजङ्घे पिबतु नरवसा धूम्रधूम्रायमाने । द्रां द्रीं द्रूं द्रावयन्ती सकलभुवि तथा यक्षगन्धर्वनागान् क्षां क्षीं क्षूं क्षोभयन्ती प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा ॥ ४ ॥ भ्रां भ्रीं भ्रूं चण्डवर्गे हरिहरनमिते रुद्रमूर्तिश्च कीर्ति- -श्चन्द्रादित्यौ च कर्णौ जडमुकुटशिरोवेष्टिता केतुमाला । स्रक् सर्वौ चोरगेन्द्रौ शशिकिरणनिभा तारकाहारकण्ठा सा देवी दिव्यमूर्तिः प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा ॥ ५ ॥ खं खं खं खड्गहस्ते वरकनकनिभे सूर्यकान्ते स्वतेजो- -विद्युज्ज्वालावलीनां नवनिशितमहाकृत्तिका दक्षिणेन । वामे हस्ते कपालं वरविमलसुरापूरितं धारयन्ती सा देवी दिव्यमूर्तिः प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा ॥ ६ ॥ ओं हुं हुं फट् कालरात्री रु रु सुरमथनी धूम्रमारी कुमारी ह्रां ह्रीं ह्रूं हत्तिशोरौक्षपितुकिलिकिलाशब्द अट्‍टाट्‍टहासे । हाहाभूतप्रसूते किलिकिलितमुखा कीलयन्ती ग्रसन्ती हुङ्कारं चोच्चरन्ती प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा ॥ ७ ॥ भृङ्गी काली कपालीपरिजनसहिते चण्डि चामुण्डनित्या रों रों रोङ्कारनित्ये शशिकरधवले कालकूटे दुरन्ते । हुं हुं हुङ्कारकारी सुरगणनमिते कालकारी विकारी वश्ये त्रैलोक्यकारी प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा ॥ ८ ॥ वन्दे दण्डप्रचण्डा डमरुरुणिमणिष्टोपटङ्कारघण्टै- -र्नृत्यन्ती याट्‍टपातैरटपटविभवैर्निर्मला मन्त्रमाला । सुक्षौ कक्षौ वहन्ती खरखरितसखाचार्चिनी प्रेतमाला- -मुच्चैस्तैश्चाट्‍टहासैर्घुरुघुरितरवा चण्डमुण्डा प्रचण्डा ॥ ९ ॥ त्वं ब्राह्मी त्वं च रौद्रा शवशिखिगमना त्वं च देवी कुमारी त्वं चक्री चक्रहस्ता घुरुघुरितरवा त्वं वराहस्वरूपा । रौद्रे त्वं चर्ममुण्डा सकलभुवि परे संस्थिते स्वर्गमार्गे पाताले शैलशृङ्गे हरिहरनमिते देवि चण्डे नमस्ते ॥ १० ॥ रक्ष त्वं मुण्डधारी गिरिवरविहरे निर्झरे पर्वते वा सङ्ग्रामे शत्रुमध्ये विश विश भविके सङ्कटे कुत्सिते वा । व्याघ्रे चौरे च सर्पेऽप्युदधिभुवि तथा वह्निमध्ये च दुर्गे रक्षेत्सा दिव्यमूर्तिः प्रदहतु दुरितं चण्डमुण्डा प्रचण्डा ॥ ११ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इत्येवं बीजमन्त्रैः स्तवनमतिशिवं पातकव्याधिनाशं प्रत्यक्षं दिव्यरूपं ग्रहगणमथनं मर्दनं शाकिनीनाम् । इत्येवं वेगवेगं सकलभयहरं मन्त्रशक्तिश्च नित्यं मन्त्राणां स्तोत्रकं यः पठति स लभते प्रार्थितां मन्त्रसिद्धिम् ॥ १२ ॥ ॥ इति श्रीमार्कण्डेय विरचितं चण्डिका स्तोत्रम् ॥

स्तोत्र का महत्त्व (Significance of Chandika Stotram)

श्री चण्डिका स्तोत्रम् कोई साधारण पद्य नहीं है; यह 'बीज मंत्रों' की माला है। मार्कण्डेय ऋषि द्वारा रचित यह स्तोत्र देवी के उस स्वरूप का आह्वान करता है जो ब्रह्मांड की समस्त नकारात्मकता को भस्म करने में सक्षम है। 'चण्डिका' का अर्थ है - वह जो क्रोध में उग्र है।

जब जीवन में चारों ओर से शत्रु, रोग और बाधाएं घेर लें, और कोई उपाय न सूझे, तब इस स्तोत्र का पाठ 'वज्र' के समान कार्य करता है। यह न केवल रक्षा करता है बल्कि साधक के आत्मविश्वास (तेज) को भी जगाता है।

इसमें 'चामुण्डा' और 'प्रचण्डा' कहकर देवी की उस गतिशीलता को नमन किया गया है जो पल भर में सृष्टि का संहार और पुनर्निर्माण कर सकती है।

मन्त्र रहस्य (Decoding the Mantras)

  • ह्रां ह्रीं ह्रूं (Hraam Hreem Hroom): ये सूर्य और शक्ति के बीज मंत्र हैं। 'ह्रीं' को भुवनेश्वरी बीज कहा जाता है जो समस्त माया को नियंत्रित करता है। इनका उच्चारण शरीर के ऊर्जा केंद्रों (चक्रों) को शुद्ध करता है।

  • कङ्काली कालरात्रिः: यहाँ देवी को समय (काल) की भी स्वामिनी बताया गया है। वह मृत्यु के भय को समाप्त करने वाली 'कालरात्रि' हैं।

  • भ्रां भ्रीं भ्रूं: ये भ्रम और अज्ञान को तोड़ने वाले बीज मंत्र हैं। 'चण्डवर्गे' का अर्थ है कि देवी अपने उग्र गणों के साथ उपस्थित होकर भक्त के मोह को नष्ट करती हैं।

  • खड्गहस्ता: हाथ में तलवार (खड्ग) ज्ञान का प्रतीक है जो अज्ञान रूपी अंधकार को काट देती है।

  • हुङ्कारं चोच्चरन्ती: देवी का 'हुंकार' ही शत्रुओं के लिए प्रलय के समान है। यह ध्वनि नाद ब्रह्म का प्रतीक है।

पाठ के लाभ (Benefits)

1. शत्रु और बाधा नाश

'प्रदहतु दुरितं' (पापों को जला दो) के निरंतर जप से बाहरी और भीतरी (कामुकता, क्रोध) दोनों प्रकार के शत्रुओं का नाश होता है।

2. ग्रह बाधा निवारण

श्लोक 12 में स्पष्ट कहा गया है - 'ग्रहगणमथनं', अर्थात यह स्तोत्र नवग्रहों के अशुभ प्रभाव को मथ कर समाप्त कर देता है। शनि और राहु की दशा में यह विशेष फलदायी है।

3. आकस्मिक संकट से रक्षा

जब कोई व्यक्ति घोर संकट ('सङ्कटे कुत्सिते वा') में फंसा हो, तो इस स्तोत्र का पाठ उसे तत्काल सुरक्षा और मानसिक बल प्रदान करता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'चण्डिका' कौन हैं?

चण्डिका देवी दुर्गा का ही एक उग्र रूप हैं, जो बुराई और अन्याय के प्रति अत्यंत क्रोधित (चंड) हो जाती हैं। वे महिषासुर मर्दिनी और चामुंडा का एकीकृत स्वरूप हैं।

2. इस स्तोत्र में बीज मंत्रों का क्या महत्व है?

इस स्तोत्र में 'ह्रां, ह्रीं, हूं' जैसे बीज मंत्रों का प्रचुर प्रयोग है। ये ध्वनियाँ ब्रह्मांडीय ऊर्जा को सक्रिय करती हैं और साधक के चारों ओर एक अभेद्य सुरक्षा कवच बनाती हैं।

3. 'प्रदहतु दुरितं' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है 'पापों और कष्टों को जला डालीए'। भक्त देवी से प्रार्थना करता है कि वे उसके जीवन के सारे दुखों और शत्रुओं को भस्म कर दें।

4. क्या इसका पाठ घर में किया जा सकता है?

हाँ, लेकिन चूंकि यह एक उग्र स्तोत्र है, इसलिए इसका पाठ सौम्य भाव से और शुद्धता के साथ करना चाहिए। क्रोध या द्वेष की भावना से पाठ नहीं करना चाहिए।

5. क्या इसमें 'चामुंडा' का भी उल्लेख है?

हाँ, श्लोक 8 में 'चण्डि चामुण्डनित्या' कहकर उन्हें पुकारा गया है, जो दर्शाता है कि चण्डिका और चामुंडा अभिन्न हैं।

6. पाठ करने का सर्वोत्तम समय क्या है?

रात्रि का समय (विशेषकर महानिशा या अष्टमी की रात) और मंगलवार/शुक्रवार का दिन इसके लिए सर्वश्रेष्ठ माने जाते हैं।

7. 'हयग्रीवागस्त्यपूज्या' का संदर्भ क्या है?

यह बताता है कि देवी की पूजा हयग्रीव (ज्ञान के अवतार) और अगस्त्य मुनि (महान ऋषि) जैसे सिद्धों द्वारा भी की जाती है।

8. शत्रु भय के लिए कौन सा श्लोक उपयोगी है?

श्लोक 11 ('रक्ष त्वं मुण्डधारी...') जिसमें 'सङ्ग्रामे शत्रुमध्ये' (युद्ध और शत्रुओं के बीच) रक्षा की प्रार्थना की गई है।

9. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, स्त्रियाँ अपनी सुरक्षा और आत्मबल के लिए इसका पाठ अवश्य कर सकती हैं।

10. क्या इसके लिए दीक्षा की आवश्यकता है?

सामान्य पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, लेकिन बीज मंत्रों के विशिष्ट अनुष्ठान के लिए गुरु का मार्गदर्शन उत्तम रहता है।

11. यह किस पुराण से लिया गया है?

यह स्तोत्र मार्कण्डेय ऋषि द्वारा विरचित माना जाता है, जो मार्कण्डेय पुराण की परंपरा का हिस्सा है।

12. फलश्रुति में क्या कहा गया है?

अंतिम श्लोक के अनुसार, जो इसका पाठ करता है उसे 'मन्त्रसिद्धि' और 'पातकव्याधिनाशं' (पाप और रोगों का नाश) का फल मिलता है।