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Sri Chamundeshwari Ashtottara Shatanama Stotram – श्री चामुण्डेश्वरी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Chamundeshwari Ashtottara Shatanama Stotram – श्री चामुण्डेश्वरी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री चामुण्डेश्वरी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ श्रीचामुण्डा माहामाया श्रीमत्सिंहासनेश्वरी । श्रीविद्यावेद्यमहिमा श्रीचक्रपुरवासिनी ॥ १ ॥ श्रीकण्ठदयिता गौरी गिरिजा भुवनेश्वरी । महाकाली महालक्ष्मीः महावाणी मनोन्मनी ॥ २ ॥ सहस्रशीर्षसम्युक्ता सहस्रकरमण्डिता । कौसुम्भवसनोपेता रत्नकञ्चुकधारिणी ॥ ३ ॥ गणेशस्कन्दजननी जपाकुसुमभासुरा । उमा कात्यायनी दुर्गा मन्त्रिणी दण्डिनी जया ॥ ४ ॥ कराङ्गुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिः । सचामररमावाणीसव्यदक्षिणसेविता ॥ ५ ॥ इन्द्राक्षी बगला बाला चक्रेशी विजयाम्बिका । पञ्चप्रेतासनारूढा हरिद्राकुङ्कुमप्रिया ॥ ६ ॥ महाबलाद्रिनिलया महिषासुरमर्दिनी । मधुकैटभसंहर्त्री मथुरापुरनायिका ॥ ७ ॥ कामेश्वरी योगनिद्रा भवानी चण्डिका सती । चक्रराजरथारूढा सृष्टिस्थित्यन्तकारिणी ॥ ८ ॥ अन्नपूर्णा ज्वलज्जिह्वा कालरात्रिस्वरूपिणी । निशुम्भशुम्भदमनी रक्तबीजनिषूदिनी ॥ ९ ॥ ब्राह्म्यादिमातृकारूपा शुभा षट्चक्रदेवता । मूलप्रकृतिरूपाऽऽर्या पार्वती परमेश्वरी ॥ १० ॥ बिन्दुपीठकृतावासा चन्द्रमण्डलमध्यगा । चिदग्निकुण्डसम्भूता विन्ध्याचलनिवासिनी ॥ ११ ॥ हयग्रीवागस्त्यपूज्या सूर्यचन्द्राग्निलोचना । जालन्धरसुपीठस्था शिवा दाक्षायणीश्वरी ॥ १२ ॥ नवावरणसम्पूज्या नवाक्षरमनुस्तुता । नवलावण्यरूपाढ्या ज्वलद्द्वात्रिंशतायुधा ॥ १३ ॥ कामेशबद्धमाङ्गल्या चन्द्ररेखाविभूषिता । चराचरजगद्रूपा नित्यक्लिन्नाऽपराजिता ॥ १४ ॥ ओड्याणपीठनिलया ललिता विष्णुसोदरी । दंष्ट्राकरालवदना वज्रेशी वह्निवासिनी ॥ १५ ॥ सर्वमङ्गलरूपाढ्या सच्चिदानन्दविग्रहा । अष्टादशसुपीठस्था भेरुण्डा भैरवी परा ॥ १६ ॥ रुण्डमालालसत्कण्ठा भण्डासुरविमर्दिनी । पुण्ड्रेक्षुकाण्डकोदण्डा पुष्पबाणलसत्करा ॥ १७ ॥ शिवदूती वेदमाता शाङ्करी सिंहवाहना । चतुःषष्ट्युपचाराढ्या योगिनीगणसेविता ॥ १८ ॥ वनदुर्गा भद्रकाली कदम्बवनवासिनी । चण्डमुण्डशिरश्छेत्री महाराज्ञी सुधामयी ॥ १९ ॥ श्रीचक्रवरताटङ्का श्रीशैलभ्रमराम्बिका । श्रीराजराजवरदा श्रीमत्त्रिपुरसुन्दरी ॥ २० ॥ शाकम्भरी शान्तिदात्री शतहन्त्री शिवप्रदा । राकेन्दुवदना रम्या रमणीयवराकृतिः ॥ ॥ फलश्रुति ॥ श्रीमच्चामुण्डिकादेव्या नाम्नामष्टोत्तरं शतम् । पठन् भक्त्याऽर्चयन् देवीं सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ २१ ॥ ॥ इति श्री चामुण्डेश्वरी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥

स्तोत्र का महत्त्व (Significance)

श्री चामुण्डेश्वरी अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र आदिशक्ति के उस उग्र और करुणामयी स्वरूप का वर्णन है जो मैसूर (कर्नाटक) की अधिष्ठात्री देवी हैं। 'चामुण्डा' वह शक्ति हैं जिन्होंने 'चण्ड' और 'मुण्ड' नामक महादित्यों का वध करके देवताओं की रक्षा की थी।

इस स्तोत्र में केवल शत्रु-संहार ही नहीं, बल्कि श्री विद्या (Tantric Knowledge) का भी गूढ़ ज्ञान छिपा है। इसमें देवी को 'श्रीविद्यावेद्यमहिमा' और 'श्रीचक्रपुरवासिनी' कहा गया है, जो बताता है कि वे श्री यंत्र के केंद्र में स्थित परम शक्ति हैं।

यह स्तोत्र ललिता सहस्त्रनाम और दुर्गा सप्तशती का सार है। इसमें 'मन्त्रिणी' (राजश्यामला), 'दण्डिनी' (वाराही) और 'भण्डासुरविमर्दिनी' (ललिता) जैसे नामों का समावेश है, जो इसे अत्यंत शक्तिशाली बनाता है।

प्रमुख नामों की व्याख्या (Decoding the Names)

  • कराङ्गुलिनखोत्पन्ननारायणदशाकृतिः: जिनके हाथ के नाखूनों से भगवान विष्णु के दस अवतार (नारायण दशाकृति) प्रकट हुए। यह दर्शाता है कि विष्णु की शक्ति भी देवी से ही आती है।

  • पञ्चप्रेतासनारूढा: जो पांच प्रेतों (ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, ईश्वर, सदाशिव) के आसन पर विराजमान हैं। यह तांत्रिक दर्शन में सर्वोच्च सत्ता का प्रतीक है।

  • ज्वलद्द्वात्रिंशतायुधा: जिनके 32 (द्वात्रिंशत्) हाथों में जलते हुए (ज्वलद्) शस्त्र हैं। यह देवी के विश्वरूप दर्शन का संकेत है।

  • ओड्याणपीठनिलया: जो ओड्याण पीठ (शक्ति पीठ) में निवास करती हैं।

  • रक्तबीजनिषूदिनी: जिसने रक्तबीज राक्षस का रक्त पीकर उसका अंत किया। यह आंतरिक बुराइयों (क्रोध, लोभ) को जड़ से मिटाने का प्रतीक है।

पाठ के लाभ (Benefits)

1. राजजोग और विजय

'श्रीराजराजवरदा' - यह स्तोत्र राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में सफलता और सम्मान दिलाता है। मैसूर के राजाओं की यह कुलदेवी हैं।

2. तंत्र बाधा निवारण

'भैरवी' और 'श्मशानवासिनी' (भावार्थ) रूपों का स्मरण करने से काले जादू, नजर दोष और नकारात्मक शक्तियों का प्रभाव नष्ट होता है।

3. ज्ञान और विद्या

'महावाणी' और 'वेदमाता' के रूप में देवी छात्रों और विद्वानों को ज्ञान और वाक् सिद्धि प्रदान करती हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'चामुण्डा' नाम का क्या अर्थ है?

'चण्ड' और 'मुण्ड' नामक असुरों का वध करने के कारण देवी का नाम 'चामुण्डा' पड़ा। यह बुराई और नकारात्मकता के विनाश का प्रतीक है।

2. क्या यह स्तोत्र मैसूर चामुण्डी देवी से संबंधित है?

हाँ, यह मुख्य रूप से मैसूर की चामुण्डी पहाड़ी पर स्थित माँ चामुण्डेश्वरी की स्तुति में ही गाया जाता है, लेकिन यह देवी के सार्वभौमिक स्वरूप का भी वर्णन करता है।

3. 'महिषासुरमर्दिनी' नाम का क्या महत्व है?

यह नाम देवी की उस लीला का स्मरण कराता है जिसमें उन्होंने महिषासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त किया था। यह शक्ति और शौर्य का प्रतीक है।

4. क्या इसका पाठ शत्रु बाधा निवारण के लिए किया जा सकता है?

बिलकुल। इसमें 'चण्डमुण्डशिरश्छेत्री' और 'भण्डासुरविमर्दिनी' जैसे नाम हैं जो शत्रुओं का नाश करने वाली शक्ति का आह्वान करते हैं।

5. क्या इस स्तोत्र में श्री विद्या का उल्लेख है?

हाँ, श्लोक 1 में उन्हें 'श्रीविद्यावेद्यमहिमा' (श्री विद्या द्वारा जानने योग्य महिमा वाली) और 'श्रीचक्रपुरवासिनी' कहा गया है, जो इनके तांत्रिक स्वरूप को दर्शाता है।

6. क्या स्त्रियाँ इसका पाठ कर सकती हैं?

हाँ, माँ चामुण्डा स्वयं शक्ति रूपा हैं, अतः स्त्रियाँ उनका पाठ विशेष श्रद्धा से कर सकती हैं। यह उन्हें आत्मबल प्रदान करता है।

7. 'योगनिद्रा' नाम का क्या अर्थ है?

यह विष्णु भगवान की उस शक्ति का नाम है जिससे सृष्टि प्रलय काल में लीन हो जाती है। देवी चामुण्डा ही वह आदि शक्ति हैं जो सबको नियंत्रित करती हैं।

8. 'रक्तबीजनिषूदिनी' नाम से क्या अभिप्राय है?

रक्तबीज एक ऐसा असुर था जिसके रक्त की हर बूंद से नया असुर पैदा होता था। माँ चामुण्डा ने (काली रूप में) उसका रक्त पीकर उसका अंत किया था।

9. धन प्राप्ति के लिए इसमें कौन सा नाम है?

'महालक्ष्मी' (श्लोक 2) और 'श्रीराजराजवरदा' (श्लोक 20) जैसे नाम धन और ऐश्वर्य देने वाली देवी के रूप में उनकी स्तुति करते हैं।

10. क्या यह स्तोत्र स्वास्थ्य लाभ देता है?

हाँ, 'ज्वरादिरोगशमनी' (रोगों का शमन करने वाली) जैसे भाव इसमें निहित हैं जो स्वास्थ्य और दीर्घायु प्रदान करते हैं।

11. पाठ करने का सर्वोत्तम समय क्या है?

नवरात्रि में, शुक्रवार और मंगलवार को, तथा प्रतिदिन प्रातः या सायं सन्ध्या वंदन के समय इसका पाठ करना उत्तम है।

12. क्या इसके लिए दीक्षा अनिवार्य है?

नहीं, यह अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्र है, कोई बीज मंत्र नहीं। इसे भक्ति भाव से कोई भी पढ़ सकता है।