श्री द्वादशार्या सूर्य स्तुति – Sri Dwadasa Arya Surya Stuti | Samba Krit Stotram

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व
श्री द्वादशार्या सूर्य स्तुतिः भगवान श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब द्वारा रचित एक अत्यंत प्रभावशाली सूर्य स्तोत्र है। पौराणिक कथा के अनुसार, जब साम्ब को कुष्ठ रोग हुआ तब उन्होंने चंद्रभागा नदी के तट पर 12 वर्षों तक सूर्य की उपासना की।
'द्वादश' का अर्थ है 12 और 'आर्या' संस्कृत का एक प्रसिद्ध छन्द है। यह स्तोत्र 12 आर्या छन्द के श्लोकों और एक फलश्रुति से मिलकर बना है। फलश्रुति में कहा गया है कि यह स्तोत्र आकाश से साम्ब के समक्ष प्रकट हुआ (नभः स्थलात् पतितम्)।
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें सूर्य को विभिन्न देवताओं के समकक्ष बताया गया है — शिव रूप से ज्ञान, जनार्दन (विष्णु) रूप से मुक्ति, और अग्नि रूप से ऐश्वर्य प्राप्त होता है। प्रसिद्ध पंक्ति 'त्वं माता त्वं शरणम्' इसी स्तोत्र से है।
श्लोकों का भाव और लाभ
श्लोक 1 (हृद्रोग निवारण): आज उदय होने वाले, उत्तर दिशा में आरोहण करने वाले विवस्वान् सूर्य देव मेरे हृद्रोग और पीलापन (Jaundice/Anemia) को शीघ्र नष्ट करें।
श्लोक 2 (अद्भुत गति): आधे निमिष में 2202 (दो सहस्र दो शत दो) योजन चलने वाले, कमलों के स्वामी (नलिननाथ) को नमस्कार।
श्लोक 3 (द्वादश मूर्ति): कर्म, ज्ञान, दस इन्द्रियां, मन और जीव — इस विश्व सृष्टि हेतु जो 12 रूपों में विचरण करते हैं, वे द्वादश मूर्ति हमें आनंद दें।
श्लोक 4 (वेद स्वरूप): आप ही यजुर्वेद, ऋग्वेद, सामवेद हैं। आप आगम हैं, वषट्कार हैं। आप विश्व हैं, हंस हैं और परमहंस हैं।
श्लोक 5 (त्रिमूर्ति से वरदान): मैं आपके शिव रूप से ज्ञान, जनार्दन रूप से मुक्ति, अग्नि रूप से ऐश्वर्य और सूर्य रूप से आरोग्य चाहता हूँ।
श्लोक 6 (सर्व दोष दहन): त्वचा, नेत्र, हृदय और समस्त इंद्रियों के दोषों को निर्दोष पूषा (सूर्य) अपने क्रोध की अग्नि से जला दें।
श्लोक 7 (चतुर्वर्ग प्राप्ति): जो रोग धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष में बाधा डालते हैं और इंद्रियों को बंदी बनाते हैं, उन्हें चंडांशु (प्रचंड किरणों वाले सूर्य) नष्ट करें।
श्लोक 8 (तिमिर नाशक): जिनके बिना यह जगत अंधकार में डूब जाता है, उन बोधस्वरूप, कमलिनी प्रिय, आपदा हर्ता की मैं स्तुति करता हूँ।
श्लोक 9 (विपद् भंजक): जिनकी सहस्र किरणों का एक अंश (लेश) ही चंद्रमा में जाकर रात्रि को प्रकाशित करता है, वे अरुण देव मेरी विपदाओं को नष्ट करें।
श्लोक 10 (रोग पटल नाश): जैसे अंधकार को, नेत्र के तिमिर (मोतियाबिंद) को, समस्त रोगों के समूह को — काल के पिता (सूर्य) रोगयुक्तता को हर लें।
श्लोक 11 (विशिष्ट रोग निवारण): वात, अश्मरी (पथरी), बवासीर, त्वक्दोष (त्वचा रोग), महोदर (जलोदर), प्रमेह (मधुमेह), ग्रहणी, भगंदर — इन महान रुजाओं को आप नष्ट करते हैं।
श्लोक 12 (त्वं माता त्वं शरणम्): आप माता हैं, शरण हैं, धाता हैं, धन हैं, आचार्य हैं, त्राता हैं, विपदाओं के हर्ता हैं — हे अर्क! हे भानो! मुझ पर प्रसन्न हों।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
समय: प्रातःकाल सूर्योदय के समय पाठ करना सर्वोत्तम है।
दिशा: पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े होकर या बैठकर पाठ करें।
आसन: लाल, पीला या केसरिया रंग का आसन उत्तम है।
जल अर्पण: पाठ के पश्चात् तांबे के पात्र में जल लेकर सूर्य को अर्घ्य दें।
विशेष दिवस: रविवार, रथ सप्तमी (माघ शुक्ल सप्तमी), और मकर संक्रांति पर विशेष पुण्य।
संकल्प: रोग निवारण के लिए 40 या 48 दिन का अनुष्ठान करें।
विशेष रोग: हृद्रोग के लिए श्लोक 1, त्वचा रोग के लिए श्लोक 6 और 11 का विशेष जाप करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)