श्री रवि अष्टकम् – Sri Ravi Ashtakam | Surya 8 Verse Prayer

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व
श्री रवि अष्टकम् (जिसे सूर्य अष्टकम् भी कहा जाता है) साम्ब पुराण से प्रकट एक अत्यंत प्रभावशाली सूर्य स्तोत्र है। 'रवि' सूर्य का एक प्रसिद्ध नाम है और 'अष्टकम्' का अर्थ है 8 श्लोकों का संग्रह।
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि प्रत्येक श्लोक के अंत में दो महत्वपूर्ण पंक्तियाँ समान हैं: 'गदपङ्कशोषणमघौघनाशनं' (रोग रूपी कीचड़ को सुखाने वाले, पापों के समूह को नष्ट करने वाले) और 'शरणं गतोऽस्मि रविमंशुमालिनम्' (किरणमाला धारी रवि की मैं शरण लेता हूँ)।
फलश्रुति में कहा गया है कि जो व्यक्ति प्रातःकाल भक्तिपूर्वक रवि को प्रणाम करके इस अष्टक का पाठ करता है, वह समस्त रोग और कल्मष (पाप) से मुक्त होता है और सवितृलोक (सूर्यलोक) को प्राप्त करता है।
श्लोकों का भाव और लाभ
श्लोक 1 (उदयाद्रि मणि): उदयाचल पर्वत के शिखर पर महान मणि की भांति चमकने वाले, कमल समूहों के एकमात्र मित्र, महान ओजस्वी, रोग-पाप नाशक, किरणमाली रवि की शरण लेता हूँ। लाभ: तेज और ओजस्विता।
श्लोक 2 (तिमिरापहार): अंधकार हटाने में निरत, निरोग, अपने लाल रंग से तीनों लोकों को रंजित करने वाले, सर्वव्यापी रवि की शरण। लाभ: अंधकार (अज्ञान, रोग) का नाश।
श्लोक 3 (दिन-रात्रि भेदकर): दिन और रात का विभाजन करने वाले, अद्भुत, परम, देवताओं द्वारा स्तुत चरित्र वाले, अविनाशी रवि की शरण। लाभ: समय की सद्गति।
श्लोक 4 (श्रुतिसार): वेदों के सार का पारगामी, अजर-अमर, परम, रमणीय स्वरूप वाले, उग्र प्रकाश वाले रवि की शरण। लाभ: वैदिक ज्ञान और सौंदर्य।
श्लोक 5 (सप्ताश्व): तोते के पंख और चोंच जैसे (हरे-लाल) अश्वों के मण्डल वाले, पर्वतों के अवरोहण में गाए जाने वाले साहस वाले रवि की शरण। लाभ: साहस और शक्ति।
श्लोक 6 (जगदेक दीप): वेदतत्त्व से ही जाने जा सकने वाले परन्तु सभी आँखों को दिखने वाले, जगत के एकमात्र दीपक, उदय-अस्त के अनुराग वाले रवि की शरण। लाभ: आध्यात्मिक और भौतिक प्रकाश।
श्लोक 7 (भक्तवत्सल): शरणागत भक्तों के प्रति वत्सल, समस्त पापों के क्षय का कारण, अक्षय फल देने वाले रवि की शरण। लाभ: भक्ति और अक्षय पुण्य।
श्लोक 8 (महामही): प्रतिदिन अश्वों द्वारा न छुई गई वन-भूमि को शत-कोटि हलों की भांति जोतने वाले, महान पृथ्वी-धन वाले रवि की शरण। लाभ: कृषि और समृद्धि।
पाठ करने की विधि और विशेष अवसर
समय: फलश्रुति में 'अहर्मुखे' (प्रातःकाल) कहा गया है। सूर्योदय के समय पाठ करें।
प्रणाम: पाठ से पहले 'रविं प्रणिपत्य' (रवि को प्रणाम करके) कहा गया है। पहले सूर्य को नमस्कार करें।
दिशा: पूर्व दिशा की ओर मुख करके खड़े होकर या बैठकर पाठ करें।
भक्ति: 'भक्तितो नरः' — भक्तिपूर्वक पाठ करना अनिवार्य है।
विशेष दिवस: रविवार, रथ सप्तमी, मकर संक्रांति पर विशेष पुण्य।
आवृत्ति: नित्य 1, 3, 7 या 11 बार पाठ करें।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)