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Sri Rajarajeshwari Asatvati Stotram – श्रीराजराजेश्वरी असत्वती स्तोत्रम्

Sri Rajarajeshwari Asatvati Stotram – श्रीराजराजेश्वरी असत्वती स्तोत्रम्
॥ ॐ नमो भवान्यै ॥ ॥ श्रीराजराजेश्वरी असत्वती स्तोत्रम् ॥ ॐ छन्दःपादयुगा निरुक्तसुमुखा शिक्षा च जङ्घायुगा ऋग्वेदोरुयुगा युजःसुजघना या सामवेदोदरा । तर्कन्यायकुचा श्रुतिस्मृतियुक् काव्यादिवेदानना वेदान्तामृतलोचना भगवती श्रीराजराजेश्वरी ॥ १ ॥ ईशाधीश्वरयोगिवृन्दविधृता स्वानन्दभूता परा पश्यन्तीत्यनु मध्यमा विलसती श्रीवैखरीरूपिणी । आत्मानात्मविचारिणी त्रिनयना विद्यावती भारती श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ २ ॥ कल्याणायुतपूर्णबिम्बवदना पूर्णेश्वरी नन्दिनी पूर्णा पूर्णतरा परेशमहिषी पूर्णामृतास्वादिनी । सम्पूर्णा परमोत्तमामृतकला विद्यावती भारती श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ ३ ॥ एकाकारमनेकवर्णविविधाकारकचिद्रपिणी चैतन्यात्मकएकचक्ररचिता चक्राङ्गएकाकिनी । भावाभावविभाविनी भयहरा सद्भक्तचिन्तामणिः श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ ४ ॥ लक्ष्यालक्ष्यनिरीक्षणा निरुपमा रुद्राक्षमालाधरा साक्षात्कारणदतवंशकलिता दीर्घातिदीर्घेश्वरी । भद्रा भद्र वरप्रदा भगवती भद्रेश्वरी भद्रदा श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ ५ ॥ ह्रिम्बीजानलनादबिन्दुभरिता सत्कार (ओङ्कार) नादात्मिका ब्रह्मानन्दघनोदरी गुणवती ज्ञानेश्वरी ज्ञानदा । इच्छाज्ञानक्रियावती जितवती गन्धर्वसंसेविता श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ ६ ॥ हर्षोन्मत्तसुवर्णपात्रभरिता पार्थोन्नता घूर्णिता हुङ्कारप्रियशब्दब्रह्म निरता स्वारस्वतोल्लासिनी । सारासारविचारचारुचरिता वर्णाश्रमाकारिणी श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ ७ ॥ सर्वज्ञानकलावती सकरुणा सन्नादिनी नन्दिनी सर्वान्तर्गतशालिनी शिवतनूसन्दीपिणी दीपिनी । संयोगप्रियरूपिणी प्रियवती प्रीता प्रतापोन्नता श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ ८ ॥ कर्माकर्मविवर्जिता कुलवती कर्मप्रदा कोलिनी कारुण्यावधि सर्वकर्मनिरता सिन्धुप्रिया शालिनी । पूर्णब्रह्मसनातनान्तरगता ज्ञेया स्वयोगात्मिका श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ ९ ॥ हस्तिकुम्भसहक पयोधरवरा पीनोनता नम्रगा हाराद्याभरणा सुरन्द्र विनुता श‍ृङ्गाटपीठालया । योन्याकारकयोनिमुद्रितकरा नित्यं सुवर्णात्मिका श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ १० ॥ लक्ष्मीलक्षणपूर्णकुम्भवरदा लीलाविनोदस्थिता लाक्षारञ्जितपद्मपाद युगला ब्रह्माण्डसंसेविता । लोकालोकितलोककामजयिनी लोकाश्रयाकाश्रया श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ ११ ॥ ह्रीङ्कारातिशङ्करप्रियतनुः श्रीयोगपीठेश्वरी माङ्गल्यायुतपङ्कजाभनयनामाइग्ल्यसिद्धिप्रदा । तारुण्यात्तपसार्चिता तरुणिका तन्त्रोपमातन्विता श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ १२ ॥ सर्वेशाङ्गविहारिणी सकरुणा सर्वेश्वरी सर्वगा सत्या सर्वमयी सहस्र दलगा सप्तार्णवोपस्थिता । सङ्गासङ्ग विवर्जिता सुखकरी बालार्ककोटिप्रभा श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ १३ ॥ लक्ष्मीशादिविरि ञ्चिचक्रमुकुटाद्यष्टाङ्गपीठार्चिता सूर्येन्द्वग्निमयैकपीठानलया चिन्मात्रकौलेश्वरी । गोप्त्री गुर्विणिगर्विता गगनगा गङगा गणेशप्रिया श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ १४ ॥ कादिक्षान्तसुवर्णबिन्दुसुतनुः स्वर्णादिसिंहासना नानारत्नविचित्रचित्ररचिता चातुर्यचिन्तामणिः । चित्तानन्दविधायिनी सुविपुला कोटित्रयीश्यम्बिका श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ १५ ॥ हीकारत्रयरूपिणी समयिनी संसारिणी हंसिनी वामाचारपरायणा सु-मुकुटा बीजावती मुद्रिणी । कामाक्षी करुणाविचित्ररचिता श्री श्री त्रिमूर्त्यात्मिका श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ १६ ॥ साबिम्बप्रतिबिम्बलम्बित सलत् बिम्बाधरा याम्बिका जम्बीरोत्पलकर्णशोभतमुखा जम्बूफल श्रीकुचा । नानारत्नकिरीटदीप्तिलसिता प्रत्यक्षदीक्षात्मिका श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी ॥ १७ ॥ यत्तेजो निधिमिस्त्वनन्त घृणिभिर्नोपाद्यते प्रेरितु हाद ध्वान्तमपास्य सिक्षणपि तद्धयान मात्रा दृशा । यत्सद्वादनुभाति सर्वमुदितं भानुं यथा पद्मिनी प्रत्यग्दाम नमाम तत्तव वपुः श्रीराजराजेश्वरी ॥ १८ ॥ ॥ इति श्रीराजराजेश्वरी असत्वती स्तोत्रं समाप्तम् ॥

श्रीराजराजेश्वरी असत्वती स्तोत्रम् — विस्तृत परिचय (Introduction & Philosophical Depth)

श्रीराजराजेश्वरी असत्वती स्तोत्रम् शाक्त दर्शन और श्री विद्या (Sri Vidya) परंपरा का एक अत्यंत रहस्यमयी और ज्ञानवर्धक स्तोत्र है। इस स्तोत्र का नाम 'असत्वती' (Asatvati) अत्यंत गूढ़ है। भारतीय दर्शन में 'सत्' (Sat) का अर्थ है जो शाश्वत और व्यक्त (Manifest) है, और 'असत्' (Asat) का अर्थ है अव्यक्त (Unmanifest) या शून्य। भगवती राजराजेश्वरी उस अव्यक्त 'असत्' को अपने भीतर धारण करने वाली (असत्वती) हैं, जो प्रलय के समय संपूर्ण ब्रह्मांड को स्वयं में समेट लेती हैं और सृष्टि के समय उसे पुनः 'सत्' रूप में प्रकट करती हैं।

वेद स्वरूपिणी माँ (The Embodiment of Vedas): स्तोत्र का प्रथम श्लोक देवी के 'वेद-स्वरूप' का अद्वितीय चित्रण करता है। इसमें कहा गया है कि छंद उनके चरण हैं, निरुक्त उनका सुंदर मुख है, शिक्षा उनकी जंघाएं हैं, ऋग्वेद उनकी ऊरु (Thighs) हैं, यजुर्वेद उनका जघन (Hips) है, सामवेद उनका उदर (Stomach) है, तर्क और न्याय उनके वक्ष हैं, श्रुति और स्मृति उनका कंठ हैं, तथा वेदान्त (उपनिषद) उनके अमृतमयी नेत्र हैं। अर्थात्, संपूर्ण वैदिक ज्ञान और वांग्मय भगवती राजराजेश्वरी का ही साक्षात् शरीर है।

शब्द ब्रह्म की चार अवस्थाएं (The Four Stages of Sound): दूसरे श्लोक में अत्यंत उच्च तांत्रिक दर्शन प्रस्तुत किया गया है। ध्वनि या वाणी (Speech) की चार अवस्थाएं होती हैं — परा (नाभि में उत्पन्न होने वाली सूक्ष्मतम ध्वनि), पश्यंती (हृदय में), मध्यमा (कंठ में), और वैखरी (मुख से निकलने वाली स्पष्ट वाणी)। माँ राजराजेश्वरी ही इन चारों वाणियों के रूप में (परा पश्यन्तीत्यनु मध्यमा विलसती श्रीवैखरीरूपिणी) हमारे भीतर प्रवाहित होकर ज्ञान का संचार करती हैं।

श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा (The Core Refrain): श्लोक 2 से लेकर 17 तक हर श्लोक का अंत एक ही महावाक्य से होता है — "श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा श्रीराजराजेश्वरी"। इसका अर्थ है, "वह भगवती राजराजेश्वरी जो श्रीचक्र (Sri Chakra) के मध्य बिंदु (Bindu / Sarvanandamaya Chakra) में किए गए तर्पण (Oblations) से अत्यंत प्रसन्न होती हैं और उसी में तत्पर रहती हैं।" श्री विद्या साधना में 'बिंदु तर्पण' सबसे रहस्यमयी और सर्वोच्च अनुष्ठान माना जाता है, जहाँ शिव और शक्ति का पूर्ण अद्वैत (एकत्व) घटित होता है।

विशिष्ट महत्व (Significance in Sri Vidya Tantra)

यह स्तोत्र केवल एक प्रार्थना नहीं है, बल्कि यह श्री विद्या के उपासकों के लिए एक 'ध्यान सूत्र' (Meditative Formula) है। श्लोक 6 में "ह्रिम्बीजानलनादबिन्दुभरिता" कहा गया है। 'ह्रीं' (Hreem) भुवनेश्वरी या माया बीज है, जिसमें अग्नि (अनल), नाद और बिंदु का समावेश है। देवी इसी मंत्र के गर्भ में निवास करती हैं।

श्लोक 16 में उल्लेख है — "वामाचारपरायणा सु-मुकुटा बीजावती मुद्रिणी"। तंत्र शास्त्र के वाम मार्ग (Vamachara) के गूढ़ रहस्यों और पंच-मकार की आन्तरिक साधना (Internal Alchemy) की अधिष्ठात्री भी वही राजराजेश्वरी हैं। वे कादी-विद्या (कादिक्षान्तसुवर्णबिन्दुसुतनुः) अर्थात् 'क' वर्ण से लेकर 'क्ष' वर्ण तक मातृका (अक्षरों) की देवी हैं। यह स्तोत्र साधक को बाहरी पूजा से हटाकर आंतरिक चक्रों (Inner Chakras) की ओर ले जाता है।

स्तोत्र के लाभ — फलश्रुति (Benefits from Phala Shruti)

यद्यपि इस स्तोत्र में अलग से फलश्रुति का कोई लंबा अध्याय नहीं है, परंतु अंतिम श्लोक (18) और स्तोत्र के भीतर प्रयुक्त विशेषणों में ही इसके चमत्कारी लाभ छिपे हुए हैं:

  • अज्ञान और अंधकार का नाश: "हाद ध्वान्तमपास्य" (श्लोक 18) — भगवती के इस स्तोत्र का ध्यान मात्र हृदय के गहन अंधकार (अज्ञान) को तत्काल नष्ट कर देता है, ठीक वैसे ही जैसे सूर्य के उदय होने पर कमल (पद्मिनी) खिल उठता है।
  • वाक सिद्धि (Power of Speech): चूँकि देवी परा, पश्यंती, मध्यमा और वैखरी रूप हैं (श्लोक 2), अतः इसका पाठ करने वाले साधक की वाणी सिद्ध हो जाती है। वह जो भी बोलता है, वह सत्य हो जाता है (सरस्वती सिद्धि)।
  • भय मुक्ति और मनोरथ पूर्ति: "भयहरा सद्भक्तचिन्तामणिः" (श्लोक 4) — देवी सभी भयों को हरने वाली और सच्चे भक्तों के लिए 'चिंतामणि' (सभी इच्छाओं को पूर्ण करने वाली मणि) के समान हैं।
  • पूर्णता की प्राप्ति: "पूर्णा पूर्णतरा..." (श्लोक 3) — जो व्यक्ति जीवन में अधूरापन, निराशा या अवसाद महसूस करता है, उसे यह पाठ भीतर से पूर्ण (Complete) और आनंदित कर देता है।
  • तंत्र और कुण्डलिनी जागरण: यह स्तोत्र 'श्रीचक्र' के बिंदु का ध्यान करवाता है, जो मानव शरीर में सहस्रार चक्र (Sahasrara) का प्रतीक है। इसके पाठ से कुण्डलिनी शक्ति जागृत होकर सहस्रार में शिव से मिलन के लिए तत्पर होती है।

पाठ विधि एवं बिंदु तर्पण साधना (Ritual Method & Bindu Tarpana)

यह स्तोत्र विशेष रूप से नवावरण पूजा (Navavarana Puja) और श्रीचक्र अर्चना के समय पढ़ा जाता है। इसे नित्य पूजा के रूप में भी अपनाया जा सकता है।

  • समय और आसन: प्रातःकाल या संध्या के समय (विशेषकर शुक्रवार या पूर्णिमा को) लाल रंग के आसन पर पूर्व या उत्तर की ओर मुख करके बैठें।
  • श्रीचक्र स्थापना: यदि आपके पास प्राण-प्रतिष्ठित श्रीयंत्र या महामेरु है, तो उसे एक ताम्र या रजत पात्र में स्थापित करें।
  • तर्पण विधि (Tarpana): "श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा" का अर्थ है बिंदु में तर्पण। एक छोटे पात्र में शुद्ध जल, कच्चा दूध, या पंचामृत लें। 'श्री विद्या' के बीज मंत्रों या इस स्तोत्र के प्रत्येक श्लोक को पढ़ते हुए श्रीयंत्र के बिल्कुल मध्य भाग (बिंदु चक्र) पर एक-एक बूंद (अदरक या फूल की पंखुड़ी से) अर्पित करें।
  • पुष्प और नैवेद्य: भगवती राजराजेश्वरी को लाल पुष्प (गुड़हल या लाल कमल), कुमकुम और अनार का भोग अत्यंत प्रिय है।
  • मानसिक ध्यान: यदि श्रीयंत्र नहीं है, तो अपने भृकुटी (दोनों भौहों के मध्य - आज्ञा चक्र) को ही बिंदु मानकर वहां देवी के तेजोमय स्वरूप का ध्यान करते हुए मानसिक पाठ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्रीराजराजेश्वरी असत्वती स्तोत्रम् का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य माँ राजराजेश्वरी के 'वेद-स्वरूप' और 'शब्द-ब्रह्म' स्वरूप की स्तुति करना है, तथा श्रीचक्र के मध्य बिंदु (Bindu) में निवास करने वाली परम सत्ता के साथ साधक का एकाकार (Union) स्थापित करना है।
2. स्तोत्र के नाम में 'असत्वती' का क्या अर्थ है?
'असत्' का दार्शनिक अर्थ है 'अव्यक्त' (Unmanifest) या वह आदि-शून्य जहाँ से सृष्टि उत्पन्न होती है। भगवती राजराजेश्वरी प्रलयकाल में संपूर्ण ब्रह्मांड को अव्यक्त रूप में अपने भीतर धारण करती हैं, इसलिए उन्हें 'असत्वती' कहा गया है।
3. 'श्रीचक्रप्रियबिन्दुतर्पणपरा' का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है — वह देवी जो श्रीचक्र के सर्वोच्च केंद्र 'बिंदु' (Sarvanandamaya Chakra) में किए जाने वाले तर्पण (समर्पण/Oblation) से अत्यंत प्रेम करती हैं और उसी में तत्पर रहती हैं।
4. स्तोत्र में वर्णित 'परा, पश्यंती, मध्यमा, वैखरी' क्या हैं?
ये ध्वनि (Sound / Speech) की चार तांत्रिक अवस्थाएं हैं। 'परा' नाभि में उत्पन्न अव्यक्त ध्वनि है, 'पश्यंती' हृदय में विचार रूप है, 'मध्यमा' कंठ में आकार लेती है, और 'वैखरी' मुख से निकलने वाले स्पष्ट शब्द हैं। देवी इन चारों की अधिष्ठात्री (वाग्देवी) हैं।
5. पहले श्लोक में देवी का रूप वेदों से कैसे जोड़ा गया है?
प्रथम श्लोक में संपूर्ण वैदिक वांग्मय को देवी का शरीर बताया गया है। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, वेदांत, तर्क, न्याय, श्रुति और स्मृति उनके अंगों (जैसे चरण, उदर, वक्ष, नेत्र) के रूप में वर्णित किए गए हैं।
6. क्या इस स्तोत्र को पढ़ने के लिए दीक्षा आवश्यक है?
बिंदु तर्पण और श्री विद्या के तांत्रिक अनुष्ठान (नवावरण पूजा) के लिए गुरु दीक्षा आवश्यक है। परंतु, एक स्तुति या प्रार्थना के रूप में, कोई भी शुद्ध भक्त निष्काम भाव से इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।
7. 'ह्रिम्बीजानलनादबिन्दुभरिता' से क्या अभिप्राय है?
'ह्रीं' (Hreem) भुवनेश्वरी बीज है। इस बीज मंत्र में 'ह' (शिव), 'र' (अग्नि/अनल), 'ई' (शक्ति), नाद (अर्धचंद्र) और बिंदु (अनुस्वार) समाहित हैं। देवी इसी एकाक्षर मंत्र से परिपूर्ण हैं।
8. यह स्तोत्र भयमुक्ति कैसे प्रदान करता है?
श्लोक 4 में देवी को 'भावाभावविभाविनी भयहरा सद्भक्तचिन्तामणिः' कहा गया है। अर्थात् जो देवी जन्म-मृत्यु (भाव-अभाव) की रचयिता हैं, वे ही सभी प्रकार के लौकिक और अलौकिक भयों को दूर करके भक्तों की चिंतामणि बन जाती हैं।
9. क्या स्त्रियां इस स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?
जी हाँ, पूर्ण रूप से। श्री विद्या साधना में मातृशक्ति का सर्वोच्च स्थान है। स्त्रियां अपने आत्मज्ञान, वाक सिद्धि और अखंड सुख-सौभाग्य के लिए इसका नित्य पाठ कर सकती हैं।
10. पाठ के अंत में वर्णित 'प्रत्यग्दाम' का क्या अर्थ है?
अंतिम श्लोक में 'प्रत्यग्दाम नमाम' कहा गया है। 'प्रत्यक्' का अर्थ है अंतरात्मा (Inner Self) और 'धाम' का अर्थ है प्रकाश। अर्थात्, हम उस भगवती को नमन करते हैं जो हमारे हृदय के भीतर आत्म-ज्योति (Inner Light) के रूप में चमक रही हैं और अज्ञान के अंधकार को नष्ट कर रही हैं।