Sri Rajarajeshwari Ashtottara Shatanamavali – श्री राजराजेश्वर्यष्टोत्तरशतनामावली

॥ श्री राजराजेश्वर्यष्टोत्तरशतनामावली ॥
ॐ भुवनेश्वर्यै नमः ।
ॐ राजेश्वर्यै नमः ।
ॐ राजराजेश्वर्यै नमः ।
ॐ कामेश्वर्यै नमः ।
ॐ बालात्रिपुरसुन्दर्यै नमः ।
ॐ सर्वेश्वर्यै नमः ।
ॐ कल्याण्यै नमः ।
ॐ सर्वसङ्क्षोभिण्यै नमः ।
ॐ सर्वलोकशरीरिण्यै नमः ।
ॐ सौगन्धिकपरिमलायै नमः । १०
ॐ मन्त्रिणे नमः ।
ॐ मन्त्ररूपिण्यै नमः ।
ॐ प्रकृत्यै नमः ।
ॐ विकृत्यै नमः ।
ॐ अदित्यै नमः ।
ॐ सौभाग्यवत्यै नमः ।
ॐ पद्मावत्यै नमः ।
ॐ भगवत्यै नमः ।
ॐ श्रीमत्यै नमः ।
ॐ सत्यवत्यै नमः । २०
ॐ प्रियकृत्यै नमः ।
ॐ मायायै नमः ।
ॐ सर्वमङ्गलायै नमः ।
ॐ सर्वलोकमोहाधीशान्यै नमः ।
ॐ किङ्करीभूतगीर्वाण्यै नमः ।
ॐ परब्रह्मस्वरूपिण्यै नमः ।
ॐ पुराणागमरूपिण्यै नमः ।
ॐ पञ्चप्रणवरूपिण्यै नमः ।
ॐ सर्वग्रहरूपिण्यै नमः ।
ॐ रक्तगन्धकस्तुरीविलेप्यै नमः । ३०
ॐ नायिकायै नमः ।
ॐ शरण्याय नमः ।
ॐ निखिलविद्येश्वर्यै नमः ।
ॐ जनेश्वर्यै नमः ।
ॐ भूतेश्वर्यै नमः ।
ॐ सर्वसाक्षिण्यै नमः ।
ॐ क्षेमकारिण्यै नमः ।
ॐ पुण्यायै नमः ।
ॐ सर्वरक्षिण्यै नमः ।
ॐ सकलधर्मिण्यै नमः । ४०
ॐ विश्वकर्मिण्यै नमः ।
ॐ सुरमुनिदेवनुतायै नमः ।
ॐ सर्वलोकाराध्यायै नमः ।
ॐ पद्मासनासीनायै नमः ।
ॐ योगीश्वरमनोध्येयायै नमः ।
ॐ चतुर्भुजायै नमः ।
ॐ सर्वार्थसाधनाधीशायै नमः ।
ॐ पूर्वायै नमः ।
ॐ नित्यायै नमः ।
ॐ परमानन्दायै नमः । ५०
ॐ कलायै नमः ।
ॐ अनङ्गायै नमः ।
ॐ वसुन्धरायै नमः ।
ॐ शुभदायै नमः ।
ॐ त्रिकालज्ञानसम्पन्नायै नमः ।
ॐ पीताम्बरधरायै नमः ।
ॐ अनन्तायै नमः ।
ॐ भक्तवत्सलायै नमः ।
ॐ पादपद्मायै नमः ।
ॐ जगत्कारिण्यै नमः । ६०
ॐ अव्ययाय नमः ।
ॐ लीलामानुषविग्रहायै नमः ।
ॐ सर्वमायायै नमः ।
ॐ मृत्युञ्जयाय नमः ।
ॐ कोटिसूर्यसमप्रभायै नमः ।
ॐ पवित्रायै नमः ।
ॐ प्राणदायै नमः ।
ॐ विमलायै नमः ।
ॐ महाभूषायै नमः ।
ॐ सर्वभूतहितप्रदायै नमः । ७०
ॐ पद्मालयायै नमः ।
ॐ सुधायै नमः ।
ॐ स्वाङ्गायै नमः ।
ॐ पद्मरागकिरीटिण्यै नमः ।
ॐ सर्वपापविनाशिन्यै नमः ।
ॐ सकलसम्पत्प्रदायिन्यै नमः ।
ॐ पद्मगन्धिन्यै नमः ।
ॐ सर्वविघ्नक्लेशध्वंसिन्यै नमः ।
ॐ हेममालिन्यै नमः ।
ॐ विश्वमूर्त्यै नमः । ८०
ॐ अग्निकल्पायै नमः ।
ॐ पुण्डरीकाक्षिण्यै नमः ।
ॐ महाशक्त्यै नमः ।
ॐ बुद्ध्यै नमः ।
ॐ भूतेश्वर्यै नमः ।
ॐ अदृश्यायै नमः ।
ॐ शुभेक्षणायै नमः ।
ॐ सर्वधर्मिण्यै नमः ।
ॐ प्राणायै नमः ।
ॐ श्रेष्ठायै नमः । ९०
ॐ शान्तायै नमः ।
ॐ तत्त्वायै नमः ।
ॐ सर्वजनन्यै नमः ।
ॐ सर्वलोकवासिन्यै नमः ।
ॐ कैवल्यरेखिन्यै नमः ।
ॐ भक्तपोषणविनोदिन्यै नमः ।
ॐ दारिद्र्यनाशिन्यै नमः ।
ॐ सर्वोपद्रववारिण्यै नमः ।
ॐ संहृदानन्दलहर्यै नमः ।
ॐ चतुर्दशान्तकोणस्थायै नमः । १००
ॐ सर्वात्मायै नमः ।
ॐ सत्यवक्त्रे नमः ।
ॐ न्यायायै नमः ।
ॐ धनधान्यनिध्यै नमः ।
ॐ कायकृत्यै नमः ।
ॐ अनन्तजित्यै नमः ।
ॐ अनन्तगुणरूपिण्यै नमः ।
ॐ स्थिरेश्वर्यै नमः । १०८
॥ इति श्री राजराजेश्वर्यष्टोत्तरशतनामावली सम्पूर्णम् ॥
श्री राजराजेश्वरी अष्टोत्तरशतनामावली — विस्तृत परिचय एवं दार्शनिक स्वरूप (Introduction)
श्री राजराजेश्वर्यष्टोत्तरशतनामावली (Sri Rajarajeshwari Ashtottara Shatanamavali) सनातन धर्म के शाक्त संप्रदाय और "श्री विद्या" (Sri Vidya) पद्धति की एक अत्यंत पवित्र और रहस्यमयी स्तुति है। भगवती राजराजेश्वरी साक्षात् माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी का वह परमोच्च और वैभवशाली स्वरूप हैं, जिन्हें "त्रिभुवन की साम्राज्ञी" माना जाता है। "राजराजेश्वरी" का शाब्दिक अर्थ है — "वह जो राजाओं के भी राजा (ईश्वर) की अधिष्ठात्री है"। हिंदू दर्शन के अनुसार, माँ ललिता को श्रीचक्र (Sri Chakra) की प्रधान देवी माना जाता है, जहाँ वे "बिंदु" स्थान पर शिव के साथ अद्वैत रूप में एकाकार होकर निवास करती हैं। १०८ पावन नामों का यह संग्रह भक्त को उस दिव्य चेतना से जोड़ता है जहाँ प्रेम, ज्ञान और क्रिया शक्ति का पूर्ण संतुलन विद्यमान है।
पौराणिक और तांत्रिक पृष्ठभूमि: ब्रह्माण्ड पुराण के 'ललिता उपाख्यान' में माँ राजराजेश्वरी की महिमा का विस्तार से वर्णन मिलता है। वे कामदेव को पुनर्जीवित करने वाली और भण्डासुर जैसे अजेय असुर का वध करने वाली "ललिताम्बिका" हैं। राजराजेश्वरी नामावली में प्रयुक्त प्रत्येक नाम देवी के एक विशिष्ट तांत्रिक और आध्यात्मिक गुण का आह्वान करता है। उदाहरण के तौर पर, "भुवनेश्वर्यै नमः" नाम उन्हें समस्त ब्रह्मांड की संरक्षिका के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जबकि "पञ्चप्रणवरूपिण्यै नमः" नाम उन्हें सृष्टि की मूल ध्वनियों (Beja Mantras) का साक्षात् विग्रह बताता है। ये १०८ नाम वास्तव में १०८ तांत्रिक मंत्र हैं जो साधक के अंतःकरण की शुद्धि और दिव्य शक्तियों के जागरण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
दार्शनिक गहराई: दार्शनिक दृष्टि से, माँ राजराजेश्वरी "इच्छा, ज्ञान और क्रिया" — इन तीनों शक्तियों का संगम हैं। उनके हाथों में स्थित 'पाश' (मोह का नियंत्रण), 'अंकुश' (अहंकार का दमन), 'गन्ने का धनुष' (मन) और 'पुष्प बाण' (पंच तन्मात्राएं) यह संकेत देते हैं कि वे साधक की इंद्रियों और मन को अनुशासित कर उसे आध्यात्मिक शिखर तक पहुँचाती हैं। नामावली के नामों में उन्हें "सच्चिदानन्दलहर्यै" और "परब्रह्मस्वरूपिण्यै" कहा गया है, जो यह सिद्ध करता है कि वे केवल एक साकार विग्रह नहीं, बल्कि निराकार शुद्ध आनंद का शाश्वत स्रोत भी हैं। १०८ की संख्या ब्रह्मांडीय पूर्णता और मानव शरीर के १०८ ऊर्जा केंद्रों (मर्म स्थानों) का प्रतीक है।
कलियुग में प्रासंगिकता: वर्तमान काल के अशांत और भौतिकवादी वातावरण में, माँ राजराजेश्वरी की नामावली का पाठ एक "अदृश्य सुरक्षा कवच" की तरह कार्य करता है। जब हम प्रत्येक नाम के आरंभ में ॐ और अंत में "नमः" (समर्पण) जोड़कर अर्चन करते हैं, तो वह नाम जाग्रत होकर साधक के आभा मंडल को तेजस्वी बनाता है। आदि गुरु शंकराचार्य ने माँ की स्तुति करते हुए 'सौंदर्य लहरी' की रचना की थी, जिसका आधार यही राजसी स्वरूप है। यह पाठ न केवल वाणी को मधुर और प्रभावशाली बनाता है, बल्कि जातक के परिवार में सुख, अखंड सौभाग्य और प्रचुर समृद्धि का संचार करता है। माँ की असीम कृपा से साधक के जीवन से मानसिक दरिद्रता और अज्ञानता का समूल नाश होता है, और उसे उस परम शांति की प्राप्ति होती है जो हर जीव का अंतिम लक्ष्य है।
विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व एवं श्रीचक्र का संबंध (Significance)
राजराजेश्वरी नामावली का महत्व इसलिए अद्वितीय है क्योंकि यह श्री चक्र के नौ आवरणों (Nava-Avarana) की समस्त ऊर्जाओं को १०८ नामों के लघु रूप में समाहित कर लेती है। इसमें देवी को "चक्रेश्यै" और "बिन्दुमण्डलवासिन्यै" कहा गया है, जो उन्हें संपूर्ण सृष्टि के केंद्र के रूप में सिद्ध करता है।
विशेष रूप से "योगीश्वरमनोध्येयायै नमः" नाम यह स्पष्ट करता है कि परम योगी महादेव भी निरंतर माँ के ही श्रीचरणों का ध्यान करते हैं। यह नामावली जातक के जीवन में "श्री" (ऐश्वर्य) और "धी" (बुद्धि) का अद्भुत संतुलन स्थापित करती है। श्री विद्या की परंपरा में इस नामावली का अर्चन "अखंड सौभाग्य" का प्रदाता माना गया है।
फलश्रुति: नामावली पाठ के अभूतपूर्व लाभ (Benefits)
शास्त्रों और महाविद्या उपासकों के अनुभवों के अनुसार, माँ राजराजेश्वरी की नामावली के नियमित पाठ से निम्नलिखित लाभ मिलते हैं:
- राजयोग और ऐश्वर्य की प्राप्ति: माँ की कृपा से जातक को समाज में उच्च पद, मान-सम्मान और अटूट धन-संपदा प्राप्त होती है।
- अखंड सौभाग्य और वैवाहिक सुख: यह पाठ परिवार में कलह को समाप्त कर पति-पत्नी के बीच प्रेम और सामंजस्य बढ़ाता है।
- मानसिक शांति और सौंदर्य: तनाव और चिंता को दूर कर यह नामावली चेहरे पर ओज (Glow) और मन को हिमालय जैसी शांति प्रदान करती है।
- बाधा निवारण और शत्रु विजय: "सर्वविघ्नक्लेशध्वंसिन्यै" — माँ की शक्ति से शत्रुओं के कुचक्र और कार्यों की बाधाएं स्वतः समाप्त हो जाती हैं।
- मोक्ष और आत्मज्ञान: "कैवल्यरेखिन्यै" — निरंतर अर्चन से जीव के अज्ञान का नाश होता है और उसे आत्मज्ञान की पात्रता प्राप्त होती है।
पाठ विधि एवं अर्चना विधान (Ritual Method)
माँ राजराजेश्वरी प्रेम और सौंदर्य की देवी हैं, अतः उनकी पूजा अत्यंत प्रसन्न और सात्विक भाव से की जानी चाहिए:
साधना के मुख्य नियम:
- समय: प्रातःकाल 'ब्रह्म मुहूर्त' या संध्या काल। शुक्रवार (Friday) और पूर्णिमा की तिथि माँ के पूजन के लिए विशेष फलदायी हैं।
- शुद्धि और वस्त्र: स्नान के पश्चात लाल (Red) या श्वेत वस्त्र धारण करें। मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर रखें।
- अर्चन सामग्री: १०८ नामों के साथ लाल पुष्प (गुड़हल या गुलाब), अक्षत या 'कुङ्कुम' से माँ के श्री चक्र या चित्र पर अर्पित करें।
- नैवेद्य: देवी को केसरिया खीर, मिश्री, या ताजे लाल फलों (जैसे अनार) का भोग लगाएँ।
- विशेष: पाठ के दौरान गाय के शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित रखें और पूर्ण एकाग्रता से प्रत्येक नाम का सस्वर उच्चारण करें।
विशेष प्रयोग:
- मनोकामना सिद्धि हेतु: लगातार २१ शुक्रवार तक १०८ नामों के साथ "कुमकुम अर्चन" करने से अभीष्ट फल शीघ्र प्राप्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. 'राजराजेश्वरी' नाम का वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ क्या है?
राजराजेश्वरी का अर्थ है — "वह जो राजाओं के भी राजा (परमेश्वर) की स्वामिनी है"। यह नाम उनकी ब्रह्मांडीय सर्वोच्च प्रभुसत्ता और समस्त शक्तियों के मूल स्रोत को दर्शाता है।
2. क्या राजराजेश्वरी और ललिता त्रिपुरसुन्दरी एक ही देवी हैं?
हाँ, तात्विक रूप से माँ राजराजेश्वरी साक्षात् ललिता त्रिपुरसुन्दरी का ही वह पूर्ण विकसित, राजसी और वैभवशाली स्वरूप हैं जो भक्तों को आशीर्वाद देने के लिए सिंहासन पर विराजमान हैं।
3. इस नामावली का पाठ कब करना सर्वोत्तम माना जाता है?
इसका पाठ प्रतिदिन प्रातःकाल करना सर्वोत्तम है। विशेष रूप से शुक्रवार, पूर्णिमा और नवरात्रि के नौ दिनों में इसका पाठ अनंत गुना फलदायी होता है।
4. क्या १०८ नामों के अर्चन के लिए 'श्री यंत्र' का होना अनिवार्य है?
यदि श्री यंत्र (मेरु) उपलब्ध है तो अति उत्तम है, क्योंकि यह देवी का साक्षात् विग्रह माना जाता है। यंत्र के अभाव में आप माँ के चित्र के सामने भी श्रद्धापूर्वक पुष्प अर्पित कर सकते हैं।
5. क्या बिना 'श्री विद्या' की दीक्षा लिए यह नामावली पढ़ सकते हैं?
हाँ, एक भक्तिमयी नामावली और स्तुति के रूप में कोई भी श्रद्धालु इसे पढ़ सकता है। बीजाक्षरों के तांत्रिक अनुष्ठान के लिए गुरु दीक्षा श्रेष्ठ है, पर नाम जप हेतु शुद्ध भाव ही मुख्य है।
6. 'पञ्चप्रणवरूपिण्यै' नाम का क्या तात्पर्य है?
इसका अर्थ है कि माँ राजराजेश्वरी श्रीविद्या के पाँच मुख्य प्रणव अक्षरों (मंत्रों) का ही मानवीकृत रूप हैं, जो सृष्टि की मूल चेतना हैं।
7. क्या इस पाठ से वैवाहिक समस्याओं का समाधान संभव है?
जी हाँ, माँ राजराजेश्वरी अखंड सौभाग्य और प्रेम की अधिष्ठात्री हैं। उनके नाम जप से वैवाहिक संबंधों में मधुरता आती है और पारिवारिक कलह शांत होती है।
8. पाठ के दौरान ॐ और नमः का क्या महत्व है?
ॐ ब्रह्मांड की आदि ध्वनि है जो मंत्र को शक्ति प्रदान करती है, और नमः हमारे अहंकार को देवी के चरणों में विसर्जित करने का प्रतीक है।
9. क्या बच्चे भी इस नामावली का पाठ कर सकते हैं?
हाँ, इससे बच्चों की एकाग्रता, बौद्धिक क्षमता और वाणी की मधुरता बढ़ती है। माँ का 'बाला' स्वरूप विद्यार्थियों के लिए विशेष प्रेरणादायक है।
10. 'कैवल्यरेखिनी' नाम का रहस्य क्या है?
कैवल्य का अर्थ है अंतिम मुक्ति या मोक्ष। यह नाम दर्शाता है कि माँ राजराजेश्वरी ही वह परम शक्ति हैं जो साधक को भवसागर से पार उतारकर मोक्ष की रेखा तक ले जाती हैं।