Sri Rajarajeshwari Churnika – श्री राजराजेश्वरी चूर्णिका

श्रीमत्कमलापुर कनकधराधर वर निरुपम परम पावन मनोहर प्रान्ते, सरसिजभवोपम विश्वम्भरामरवर्गनिर्गलत्ससम्भ्रम पुङ्खानुपुङ्ख निरन्तर पठ्यमान निखिल निगमागम शास्त्र पुराणेतिहास कथा निर्मल निनाद समाक्रान्ते ।
तत्र प्रवर्धित मन्दार मालूर कर्णिकार सिन्धुवार खर्जूर कोविदार जम्बीर जम्बू निम्ब कदम्बोदुम्बर साल रसाल तमाल तक्कोल हिन्ताल नालिकेर कदली क्रमुक मातुलुङ्ग नारङ्ग लवङ्ग बदरी चम्पकाशोक मधूक पुन्नागागरु चन्दननाग करुवक मरुवक एला द्राक्षा मल्लिका मालती माधवी लता शोभायमान पुष्पित फलित ललित विविध वन तरुवाटिका मध्यप्रदेशे ।
शुकपिक शारिका निकर चकोर मयूर चक्रवाक बलाक भरद्वाज पिङ्गल टिट्टिभ गरुड विहङ्ग कुलायन कोलाहलारव परिपूरिताशे, तत्र सुधारसोपम पानीय परिपूर्ण कासार तटाक स्फुटाकलितारविन्द (पुण्डरीक) कुमुदेन्दीवर षण्डसञ्चरन्मराल चक्रवाक कारण्डव प्रमुख जलजाण्डजमण्डली शोभायमाने, नन्दनवन कृत बहुमाने ।
चारुचामीकर रत्न गोपुर प्राकार वलयिते, सुललिते, सुस्निग्ध विराजित वज्रस्तम्भ सहस्र पद्मरागोफलभरगजात नूतन निर्मित प्रथममण्डप द्वितीयमण्डपान्तरालमण्डप मूलमहामण्डपस्थाने, शिल्पिशास्त्रप्रधाने ।
खचित वज्र वैडूर्य माणिक्य गोमेदक पद्मराग मरकत नील मुक्ता प्रवालाख्य नवरत्न तेजो विराजित बिन्दु त्रिकोण षट्कोण वसुकोण दशारयुग्म मन्वन्तराष्टदल षोडशदल चतुर्द्वारयुत भूपुरत्रय श्रीचक्रस्वरूप भद्रसिंहासनासीने, सकलदेवताप्रधाने ।
चरणाङ्गुलि नखमुखरुचिनिचय पराभूत तारके, श्रीमन्माणिक्य मञ्जीर रञ्जित श्रीपदाम्बुजद्वये, अद्वये, मीनकेतनमणि तूणीर विलास विजयि जङ्घायुगले, कनकरम्भा स्तम्भ जृम्भितोरुद्वये, कन्दर्प स्वर्ण स्यन्दन पटुतर शकट सन्निभ नितम्ब बिम्बे, कुचभार नम्र दृष्टावलग्न विभूषित कमनीय काञ्ची कलापे ।
दिनकरोदयावसर अर्धविकसितारविन्द कुड्मलतुल्य नाभिप्रदेशे, रोमराजीविराजितवलित्रयी भासुरकरभोदरे, जम्भासुररिपु कुम्भिकुम्भसमुज्जृम्भित शातकुम्भकुम्भायमान सम्भावित पयोधरद्वये, अद्वये, गोप्लुत कुच कलश कक्षद्वयारुणारुणित सूर्यपुटाभिधान परिधान निर्मित मुक्तामणिप्रोत कञ्चुक विराजमाने, कोमलतर कल्पवल्ली समान पाशाङ्कुश वराभय मुद्रामुद्रित कङ्कण झणझणत्कार विराजित चतुर्भुजे ।
त्रैलोक्य जैत्रयात्रागमन समनन्तर सङ्गत सुरवर कनकगिरीश्वर करबद्ध मङ्गलसूत्र त्रिरेखा शोभित कन्धरे, नव प्रवाल पल्लव पक्वबिम्ब फलाधरे, निरन्तर कर्पूर ताम्बूल चर्वणारुणित रदन पङ्क्तिद्वये, चम्पक प्रसून तिल पुष्प समान नासापुटाग्रोदञ्चित मौक्तिकाभरणे, कर्णावतंसीकृतेन्दीवर विराजित कपोलभागे, अरविन्ददल सदृश दीर्घलोचने ।
कुसुमशर कोदण्ड लेखालङ्कारकारि मनोहारि भ्रूलतायुगले, बाल प्रभाकर शशिकर पद्मराग मणिनिकराकार सुरुचिर रुचिमण्डल कर्णकुण्डल मण्डित गण्डभागे, सुललिताष्टमी चन्द्र लावण्य ललाट फलके, कस्तूरिका तिलके, हरिनीलमणि द्विरेफावलि प्रकाश केशपाशे, कनकाङ्गद हार केयूर नानाविधायुध भूषाविशेषाद्ययुत स्थिरीभूत सौदामिनी तुलित ललित नूतन तनूलते ।
काश्यपात्रि भरद्वाज व्यास पराशर मार्कण्डेय विश्वामित्र कण्व कपिल गौतम गर्ग पुलस्त्यागस्त्यादि सकलमुनि मनोध्येय ब्रह्मतेजोमये, चिन्मये ।
सेवार्थागताङ्ग वङ्ग कलिङ्ग काम्भोज काश्मीर कामरूप सौवीर सौराष्ट्र महाराष्ट्र मागध विराट गूर्जर मालव निषध चोल चेर पाण्ड्य पाञ्चाल गौड ब्रह्मल द्रविड द्राविड घोटलाट वराट मराट कर्णाटकान्ध्र भोज कुरु गान्धार विदेह विदर्भ विजृम्भ बाह्लीक बर्बर केरल केकय कोसल शूरसेन च्यवन टङ्कण कोङ्कण मत्स्य माध्व सैन्धव बल्हूक भूचक्रयुग गान्धार काशी भद्राशी ऐन्द्रगिरी नागपुरी घण्टानगरी उत्तरगिर्याख्य षट्पञ्चाशद्देशाधीशादि गन्धर्व हेषारव सिन्धु सिन्धूर हीत्कारवरथाङ्ग क्रेङ्कार भेरी झङ्कार मद्दल ध्वनि हुङ्कारयुक्त चतुरङ्ग समेत जित राज सुरराजाधिराज पुङ्खानुपुङ्ख गमनागमन विशीर्णाभरणाद्ययुत समुत्पन्न पराग पाटली वालुकायमान प्रथम मण्डप सन्निधाने ।
तत्तत् पूजाकाल क्रियमाण पाद्यार्घ्याचमनीय स्नान वस्त्राभरण गन्ध पुष्पाक्षत धूप दीप नैवेद्य ताम्बूल मन्त्रपुष्प स्वर्णपुष्प प्रदक्षिण नमस्कार स्तोत्रपारायण सन्तोषित स्वान्त सन्तत वरप्रदानशीले, सुशीले ।
रम्भोर्वशी मेनका तिलोत्तमा हरिणी घृताची मञ्जुघोषालम्बुसाद्ययुताप्सरस्त्री धिमिन्धिमित चित्रोपचित्र नर्तनोल्लासावलोकन प्रिये, कृत्तिवासः प्रिये ।
भण्डासुर प्रेषिताखण्ड बलदोर्दण्ड रक्षोमण्डली खण्डने निजकर पल्लवाङ्गुलीयकादि मत्स्य कूर्म वराह नारसिंह वामन परशुराम श्रीराम बलराम श्रीकृष्ण कल्क्याख्य नारायण दशावतार हेतुभूते, हिमवत्कुलाचलराजकन्ये, सर्वलोकमान्ये ।
कोटि कन्दर्प लावण्य तारुण्य कनकगिरीश्वर त्यागराज वामपार्श्वद्वये, त्रिभुवनेश्वरी, सर्वप्रदायिनी ।
श्रीविद्याधीश रचित चूर्णिका श्रवण पठनानन्दिनां सम्प्राप्तितायुरारोग्य सौन्दर्य विद्या बुद्धि पुत्र पौत्र कलत्रैश्वर्यादि सकलसौख्यप्रदे, त्रिभुवनेश्वरी, श्रीमत्कमलाम्बिके पराशक्ते मातः, नमस्ते नमस्ते नमस्ते, पाहि मां पाहि मां पाहि मां, देवि तुभ्यं नमो देवि तुभ्यं नमः ॥
मुक्ताविद्रुमहेमकुण्डलधरा सिंहाधिरूढा शिवा ।
रक्ताम्भोजसमानकान्तिवदना श्रीमत्किरीटान्विता ॥
मुक्ताहेमविचित्रहारकटकैः पीताम्बरा शङ्करी ।
भक्ताभीष्टवरप्रदानचतुरा मां पातु हेमाम्बिका ॥
इति श्रीविद्याधीश विरचित श्री राजराजेश्वरी चूर्णिका ।
श्री राजराजेश्वरी चूर्णिका - परिचय
श्री राजराजेश्वरी चूर्णिका माँ ललिता त्रिपुरसुन्दरी को समर्पित है। माँ ललिता "श्रीविद्या" की अधिष्ठात्री देवी हैं। इनकी उपासना से साधक को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है।
पाठ के लाभ (Benefits)
- ऐश्वर्य प्राप्ति: माँ ललिता की कृपा से सुख, समृद्धि और राजयोग मिलता है।
- सौंदर्य और आरोग्य: साधक को शारीरिक कांति और निरोगी काया प्राप्त होती है।
- शत्रु नाश: समस्त बाधाओं और शत्रुओं का शमन होता है।
- ब्रह्मज्ञान: अंततः साधक को आत्मज्ञान और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पाठ विधि (Recitation Method)
- समय: प्रातःकाल या रात्रि (विशेषकर शुक्रवार और पूर्णिमा) को पाठ करना श्रेयस्कर है।
- आसन: लाल आसन पर बैठकर, पूर्वाभिमुख होकर पाठ करें।
- शुद्धि: स्नान कर लाल वस्त्र धारण करें और कुमकुम का तिलक लगाएं।
- नैवेद्य: देवी को खीर, मिश्री या फलों का भोग लगाएं।
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. श्री राजराजेश्वरी चूर्णिका का पाठ किस तिथि को करना चाहिए?
शुक्रवार (Friday), पूर्णिमा और नवरात्रि के दिनों में इसका पाठ विशेष फलदायी होता है।
2. क्या बिना दीक्षा के श्रीविद्या उपासना की जा सकती है?
सामान्य स्तोत्र पाठ (जैसे ललिता सहस्रनाम) भक्ति भाव से कोई भी कर सकता है, परन्तु बीज मंत्रों का जप गुरु दीक्षा के बाद ही करना चाहिए।