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Sri Rahu Stotram – श्री राहु स्तोत्रम्

Sri Rahu Stotram – श्री राहु स्तोत्रम्
॥ श्री राहु स्तोत्रम् ॥ (प्रभात स्तोत्रनिध्यन्तर्गतम्) नमस्ते दैत्यरूपाय देवारिं प्रणमाम्यहम् । नमस्ते सर्वभक्ष्याय घोररूपाय वै नमः ॥ १ ॥ त्वं ब्रह्मा वरुणो देवस्त्वं विष्णुस्त्वं हरिः शिवः । मर्त्यलोके भवान्प्रीतः संसारजनतारकः ॥ २ ॥ कूटपर्वतदुर्गाणि नगराणि पुराणि च । यस्य क्रोधवशाद्भस्मीभवन्ति क्षणमात्रकम् ॥ ३ ॥ धूम्रवर्णो भवान् राहू रक्ताक्षः पिङ्गलोपमः । क्रूरग्रहस्तथा भीमो यमरूपो महाबलः ॥ ४ ॥ यस्य स्थाने पञ्चमेऽपि षष्ठे चैव तृतीयके । दशमैकादशे चैव तस्य श्रेयः करोत्यलम् ॥ ५ ॥ अन्नं खड्गं च यद्दत्तं राहवे सुफलप्रदम् । पृथिव्यां ब्रह्मपीडां च गोपीडां तन्निवारयेत् ॥ ६ ॥ कृमिकीटपतङ्गेषु चरन्तं सचराचरम् । गोदानं भूमिदानं च ह्यन्नं वस्त्रं च दापयेत् ॥ ७ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ सौवर्णरौप्यदानं च कन्यादानं च तत्क्षणात् । एतद्दानं च सम्पूर्णं राहुमोक्षकरं नृणाम् । अस्य स्तोत्रस्य माहात्म्याद्राहुपीडा विनश्यति ॥ ८ ॥ ॥ प्रार्थना ॥ रक्ताक्षो धूम्रवर्णाभो विजितारिर्महाबलः । अबाहुश्चान्तरिक्षस्थः स राहुः प्रीयतां मम ॥ ९ ॥ ॥ इति श्री राहु स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

श्री राहु स्तोत्रम् (Sri Rahu Stotram) प्रभात स्तोत्रनिधि से संकलित है। यह स्तोत्र राहु की व्यापक शक्तियों और उनके विराट स्वरूप का वर्णन करता है।



इसमें राहु को केवल एक ग्रह नहीं, बल्कि ब्रह्मा, विष्णु और शिव का स्वरूप मानकर पूजा गया है (श्लोक 2)। यह दर्शाता है कि राहु के भीतर सृजन, पालन और संहार तीनों शक्तियां निहित हैं। साथ ही, इसमें राहु के प्रकोप (क्रोध) की भयंकरता का भी वर्णन है कि कैसे वे क्षण भर में नगरों और दुर्गों को भस्म कर सकते हैं (श्लोक 3)।

राहु का स्वरूप (Form of Rahu)

स्तोत्र में राहु के स्वरूप का विशद वर्णन है:

  • घोररूप - अत्यंत भयंकर रूप वाले (श्लोक 1)
  • धूम्रवर्ण - धुएं के समान रंग वाले (श्लोक 4)
  • रक्ताक्ष - लाल नेत्र वाले
  • पिङ्गलोपम - पीली/भूरी चमक वाले
  • अबाहु - भुजाओं से रहित (केवल सिर भाग होने के कारण) (श्लोक 9)
  • अन्तरिक्षस्थ - अंतरिक्ष में स्थित रहने वाले

स्तोत्र के प्रमुख लाभ (Benefits)

  • राहु पीड़ा नाश: "अस्य स्तोत्रस्य माहात्म्याद्राहुपीडा विनश्यति" - इस स्तोत्र के महात्म्य से राहु की पीड़ा नष्ट होती है।

  • संसार तारक: राहु प्रसन्न होकर संसार सागर से पार लगाने वाले (तारक) बन जाते हैं।

  • शुभ फल: यदि राहु जन्म कुंडली में 3, 5, 6, 10 या 11वें भाव में हो, तो इस स्तोत्र का पाठ अत्यंत कल्याणकारी होता है।

  • दोष निवारण: ब्रह्म पीड़ा और गो पीड़ा (ब्रह्म हत्या या गौ हत्या आदि पापों के प्रभाव) का निवारण होता है।

दान और उपाय (Remedies & Donations)

इस स्तोत्र में राहु शांति के लिए विशिष्ट दानों का महत्व बताया गया है:

  • खड्ग दान: तलवार (खड्ग) का दान राहु को सुफलप्रद होता है।
  • धातु दान: सोना (सौवर्ण) और चांदी (रौप्य) का दान।
  • अन्य दान: भूमि, गौ, अन्न और वस्त्र का दान।
  • कन्या दान: कन्या दान को भी राहु मोक्षकर (मुक्तिदायक) माना गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. राहु को 'सर्वभक्ष्य' क्यों कहा गया है?

श्लोक 1 में "सर्वभक्ष्याय" कहा है। राहु में सब कुछ ग्रास करने की क्षमता है - यहाँ तक कि सूर्य और चंद्र जैसे तेजस्वी ग्रहों को भी।

2. 'यमरूप' का क्या अर्थ है?

राहु का स्वभाव यमराज (मृत्यु के देवता) के समान कठोर और दंड देने वाला है, इसलिए उन्हें 'यमरूप' कहा गया है।

3. क्या राहु शुभ भी हो सकते हैं?

हाँ, श्लोक 5 में स्पष्ट है कि 3, 5, 6, 10, 11 भावों में राहु "श्रेयः करोत्यलम्" (अत्यंत कल्याण) करते हैं। ऐसे में उनकी स्तुति से लाभ कई गुना बढ़ जाता है।

4. इस स्तोत्र में राहु को 'देवारि' क्यों कहा है?

'देवारिं' = देवताओं के अरि (शत्रु)। समुद्र मंथन की घटना के कारण राहु देवताओं के शत्रु माने जाते हैं।

5. 'पिङ्गलोपम' का क्या अर्थ है?

पिङ्गल = पीला/भूरा/तांबे जैसा रंग। राहु की आंखों या आभा का वर्णन पिङ्गल वर्ण का किया जाता है।

6. क्या खड्ग (तलवार) का दान करना चाहिए?

प्राचीन ग्रंथों के अनुसार राहु शांति के लिए लौह निर्मित खड्ग का दान बताया गया है। आधुनिक संदर्भ में किसी लोहे की धारदार वस्तु या चाकू का दान भी प्रतीकात्मक रूप से किया जाता है।

7. 'विजितारि' का क्या तात्पर्य है?

श्लोक 9 में राहु को 'विजितारि' (अरि = शत्रु, विजित = जीतने वाला) कहा गया है। राहु शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने वाले हैं।

8. 'अबाहु' क्यों कहा गया है?

विष्णु चक्र से कटने के बाद राहु केवल सिर रह गए और केतु धड़। चूँकि राहु के पास धड़ (और भुजाएं) नहीं हैं, इसलिए उन्हें 'अबाहु' (बिना भुजाओं वाला) कहा जाता है।