Sri Rahu Stotram 2 – श्री राहु स्तोत्रम् २

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व
श्री राहु स्तोत्रम् (Sri Rahu Stotram) कश्यप ऋषि द्वारा मुनियों को सुनाया गया एक अत्यंत दिव्य स्तोत्र है। इसे 'रावण संहिता' में भी स्थान मिला है।
इस स्तोत्र की मुख्य विशेषता इसमें वर्णित 12 नाम हैं (श्लोक 3-4) जो राहु के विभिन्न पहलुओं को उजागर करते हैं। इसके पाठ के साथ-साथ इसमें राहु की प्रतिमा पूजन और हवन की विधि भी बताई गई है (श्लोक 5-6), जो इसे एक पूर्ण साधना बनाती है।
राहु के 12 नाम (The 12 Names of Rahu)
इस स्तोत्र में वर्णित राहु के 12 नाम:
- राहु - ग्रहण करने वाला
- सूर्यरिपु - सूर्य का शत्रु
- विषज्वाली - जिसके मुख से विष की ज्वाला निकलती है
- भयानक - भय उत्पन्न करने वाला
- सुधांशुवैरि - चंद्रमा (सुधांशु) का शत्रु
- श्यामात्मा - श्याम (काले/नीले) वर्ण वाला
- विष्णुचक्राहित - विष्णु के चक्र से पीड़ित (सिर कटने के कारण)
- बली - अत्यंत बलशाली
- भुजगेश - सर्पों का स्वामी
- तीक्ष्णदंष्ट्र - तीखे दाँतों वाला
- क्रूरकर्मा - क्रूर कर्म करने वाला
- ग्रहाधिप - ग्रहों का स्वामी (प्रभाव की दृष्टि से)
स्तोत्र के प्रमुख लाभ (Benefits)
रोग निवारण: "सर्वान् रोगान् विनाशयेत्" - त्वचा रोग, अज्ञात भय और मानसिक रोगों में विशेष लाभकारी।
विष भय मुक्ति: "विषभीतिहरं परम्" - विष (सर्प दंश आदि) का भय नहीं रहता।
राज्य प्राप्ति: "नष्टं राज्यमवाप्नुयात्" - खोया हुआ पद, प्रतिष्ठा या राज्य पुनः प्राप्त होता है।
मनोकामना पूर्ति: "सर्वान् कामानवाप्नोति" - सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं।
ग्रह शांति: "सर्वेग्रहा विषमगाः सुरतिप्रसन्नाः" - प्रतिकूल ग्रह भी अनुकूल और प्रसन्न हो जाते हैं।
पाठ करने की विधि (Method of Chanting)
पूजन विधि: श्लोक 5-6 में विशेष विधि वर्णित है - सीसा (Lead) धातु की प्रतिमा बनाकर, उड़द (माष) पर स्थापित कर नीले फूल और चंदन से पूजा करें। दूर्वा, अन्न और घी से 108 आहुतियां दें।
सामान्य विधि: यदि उपरोक्त विधि संभव न हो, तो केवल स्तोत्र का पाठ (विशेषकर 12 नामों का) नित्य करने से भी लाभ मिलता है।
दिन: शनिवार या अमावस्या।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)
1. राहु स्तोत्र का पाठ किसे करना चाहिए?
जिनकी कुंडली में राहु नीच, वक्री या अशुभ स्थान (दुष्टस्थानगत) में हो, या जो राहु की महादशा/अंतर्दशा से गुजर रहे हों, उन्हें इसका पाठ अवश्य करना चाहिए।
2. 'सीसजां' प्रतिमा का क्या अर्थ है?
सीसा (Lead) राहु की धातु मानी जाती है। तांत्रिक उपायों में सीसे की राहु प्रतिमा का विशेष महत्व है।
3. 'माषसंस्थिताम्' का क्या तात्पर्य है?
माष = उड़द की दाल। राहु की पूजा में काले उड़द का प्रयोग होता है। प्रतिमा को उड़द की ढेरी पर स्थापित करने का विधान है।
4. क्या यह स्तोत्र त्वचा रोगों में लाभकारी है?
हाँ, राहु त्वचा रोगों (कुष्ठ आदि) का कारक है। "सर्वान् रोगान् विनाशयेत्" के अनुसार यह स्तोत्र ऐसे हठी रोगों में लाभकारी हो सकता है।
5. 'सिंहवाह' किसे कहा गया है?
श्लोक 9 में राहु को 'सिंहवाह' (सिंह जिसका वाहन है) कहा गया है। सामान्यतः राहु का वाहन सिंह माना जाता है।
6. 'करालवदन' का अर्थ क्या है?
कराल = विकराल/भयानक, वदन = मुख। राहु का स्वरूप उग्र और डरावना है, इसलिए उन्हें करालवदन कहा जाता है।
7. क्या केवल 12 नामों का पाठ पर्याप्त है?
श्लोक 4 में कहा है: "द्वादशैतानि नामानि नित्यं यो नियतः पठेत्" - जो नियम से केवल इन 12 नामों का भी पाठ करता है, उसे पूरा लाभ मिलता है।
8. 'विष्णुचक्राहित' का क्या संदर्भ है?
मोहिनी अवतार में विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से राहु का सिर काटा था। तब से वे 'विष्णु चक्र से आहत' (विष्णुचक्राहित) कहलाते हैं।
9. क्या इस स्तोत्र से शत्रु बाधा दूर होती है?
हाँ, राहु स्वयं शत्रुओं (देवताओं) के शत्रु हैं। उनके पाठ से शत्रुओं का भय समाप्त होता है और विजय प्राप्त होती है।
10. 'वामदेव ऋषि' कौन हैं?
विनियोग में वामदेव ऋषि का उल्लेख है। वे इस मंत्र के द्रष्टा ऋषि हैं जिन्होंने सबसे पहले इस मंत्र का साक्षात्कार किया।