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Sri Rahu Panchavimshati Nama Stotram – श्री राहु पञ्चविंशतिनाम स्तोत्रम्

Sri Rahu Panchavimshati Nama Stotram – श्री राहु पञ्चविंशतिनाम स्तोत्रम्
॥ श्री राहु पञ्चविंशतिनाम स्तोत्रम् ॥ (स्कन्दपुराणान्तर्गतम्) राहुर्दानवमन्त्री च सिंहिकाचित्तनन्दनः । अर्धकायः सदा क्रोधी चन्द्रादित्यविमर्दनः ॥ १ ॥ रौद्रो रुद्रप्रियो दैत्यः स्वर्भानुर्भानुभीतिदः । ग्रहराजः सुधापायी राकातिथ्यभिलाषकः ॥ २ ॥ कालदृष्टिः कालरूपः श्रीकण्ठहृदयाश्रयः । विधुन्तुदः सैंहिकेयो घोररूपो महाबलः ॥ ३ ॥ ग्रहपीडाकरो दंष्ट्री रक्तनेत्रो महोदरः । पञ्चविंशतिनामानि स्मृत्वा राहुं सदा नरः ॥ ४ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ यः पठेन्महती पीडा तस्य नश्यति केवलम् । आरोग्यं पुत्रमतुलां श्रियं धान्यं पशूंस्तथा ॥ ५ ॥ ददाति राहुस्तस्मै तु यः पठेत् स्तोत्रमुत्तमम् । सततं पठते यस्तु जीवेद्वर्षशतं नरः ॥ ६ ॥ ॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे श्री राहु पञ्चविंशतिनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

श्री राहु पञ्चविंशतिनाम स्तोत्रम् (Sri Rahu Panchavimshati Nama Stotram) स्कन्दपुराण में वर्णित राहु ग्रह के 25 दिव्य नामों का एक अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है।



इस स्तोत्र में राहु को 'दानवमन्त्री' (दानवों के मंत्री) और 'रुद्रप्रिय' (शिव को प्रिय) जैसे विशेषणों से संबोधित किया गया है। यह स्तोत्र विशेष रूप से उन लोगों के लिए लाभकारी है जो राहु की महादशा या अंतर्दशा में भीषण कष्ट (महती पीडा) भोग रहे हैं। सिर्फ 6 श्लोकों का यह लघु स्तोत्र राहु दोष की शांति के लिए रामबाण उपाय माना जाता है।

राहु के 25 दिव्य नाम (25 Names of Rahu)

इस स्तोत्र में वर्णित राहु के 25 नाम और उनके अर्थ:

  1. राहु - ग्रहण करने वाले
  2. दानवमन्त्री - दानवों के मंत्री/सलाहकार
  3. सिंहिकाचित्तनन्दन - सिंहिका के मन को आनंद देने वाले (पुत्र)
  4. अर्धकाय - आधे शरीर वाले
  5. सदा क्रोधी - सदैव क्रोध में रहने वाले
  6. चन्द्रादित्यविमर्दन - चंद्र और सूर्य को पीड़ित करने वाले
  7. रौद्र - भयंकर रूप वाले
  8. रुद्रप्रिय - भगवान शिव के प्रिय
  9. दैत्य - दिति के वंशज
  10. स्वर्भानु - स्वयं प्रकाशमान (राहु का मूल नाम)
  11. भानुभीतिद - सूर्य (भानु) को भय देने वाले
  12. ग्रहराज - ग्रहों के राजा
  13. सुधापायी - अमृत पीने वाले
  14. राकातिथ्यभिलाषक - पूर्णिमा (राका) की तिथि की अभिलाषा रखने वाले
  15. कालदृष्टि - काल (मृत्यु) जैसी दृष्टि वाले
  16. कालरूप - साक्षात काल स्वरूप
  17. श्रीकण्ठहृदयाश्रय - शिव (श्रीकण्ठ) के हृदय में आश्रय पाने वाले
  18. विधुन्तुद - चंद्रमा को व्यथित करने वाले
  19. सैंहिकेय - सिंहिका के पुत्र
  20. घोररूप - घोर (बिकराल) रूप वाले
  21. महाबल - महाबलशाली
  22. ग्रहपीडाकर - ग्रहों को पीड़ा देने वाले
  23. दंष्ट्री - बड़े दांतों/दाढ़ों वाले
  24. रक्तनेत्र - लाल नेत्रों वाले
  25. महोदर - बड़े पेट वाले

स्तोत्र के प्रमुख लाभ (Benefits)

  • पीड़ा नाश: "महती पीडा तस्य नश्यति केवलम्" - इस स्तोत्र के पाठ मात्र से बड़ी से बड़ी पीड़ा नष्ट हो जाती है।

  • आरोग्य प्राप्ति: साधक को उत्तम स्वास्थ्य (आरोग्य) की प्राप्ति होती है।

  • संतान सुख: "पुत्रमतुलां" - उत्तम पुत्र और अतुलनीय ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है।

  • दीर्घायु: "जीवेद्वर्षशतं नरः" - जो सतत पाठ करता है वह सौ वर्ष तक जीवित रहता है।

  • धन-धान्य: श्री (लक्ष्मी), धान्य और पशु धन की वृद्धि होती है।

पाठ करने की विधि (Method of Chanting)

  • सतत पाठ: फलश्रुति में "सततं पठेत्" और "स्मृत्वा राहुं सदा" कहा गया है, जिसका अर्थ है नित्य निरंतर पाठ करना।

  • समय: राहु काल में या संध्या के समय पाठ करना विशेष लाभकारी है।

  • दीप: तिल के तेल या सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

  • दिन: शनिवार, बुधवार या अमावस्या को विशेष रूप से पाठ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. राहु पञ्चविंशतिनाम स्तोत्र में कितने नाम हैं?

इस स्तोत्र में राहु ग्रह के 25 (पञ्चविंशति) दिव्य नाम हैं।

2. इस स्तोत्र का स्रोत क्या है?

यह स्तोत्र स्कन्दपुराण से लिया गया है।

3. 'श्रीकण्ठहृदयाश्रय' का क्या अर्थ है?

श्रीकण्ठ भगवान शिव का नाम है। राहु भगवान शिव के परम भक्त हैं और उनके हृदय में आश्रय (स्थान) पाते हैं। यह राहु की शिव भक्ति को दर्शाता है।

4. राहु को 'दानवमन्त्री' क्यों कहा जाता है?

राहु अपनी अत्यंत तीक्ष्ण बुद्धि और कूटनीति के लिए जाने जाते हैं, इसलिए उन्हें दानवों का मंत्री या सलाहकार माना जाता है।

5. 'राकातिथ्यभिलाषक' का क्या तात्पर्य है?

राका = पूर्ण चंद्र (पूर्णिमा)। राहु पूर्णिमा के चंद्रमा को ग्रसित करने की अभिलाषा रखते हैं (चंद्र ग्रहण), इसलिए उन्हें यह नाम दिया गया है।

6. क्या यह स्तोत्र बीमारी में लाभ देता है?

हाँ, फलश्रुति में "आरोग्यं... ददाति" स्पष्ट कहा गया है। यह स्तोत्र उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करता है और राहु जनित रोगों को दूर करता है।

7. 'सुधापायी' का क्या अर्थ है?

सुधा = अमृत, पायी = पीने वाला। राहु ने समुद्र मंथन के समय अमृत पान किया था, इसलिए उन्हें सुधापायी कहा जाता है।

8. 'ग्रहराज' क्यों कहा गया है?

कलयुग में राहु का प्रभाव अत्यंत प्रबल है और वे राजा को रंक और रंक को राजा बनाने की क्षमता रखते हैं, इसलिए उन्हें ग्रहों का राजा (शक्तिशाली ग्रह) कहा गया है।

9. राहु का मूल नाम क्या है?

स्तोत्र में 'स्वर्भानु' नाम आया है, जो राहु का मूल नाम था (सिर कटने से पहले)।

10. क्या इस स्तोत्र से आयु वृद्धि होती है?

हाँ, श्लोक 6 में कहा है: "जीवेद्वर्षशतं नरः" - इसके पाठ से व्यक्ति सौ वर्ष तक जीवित रहता है।