Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Pratyangira Stotram 2 – श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् (सिद्धिलक्ष्मी महाविद्या)

Sri Pratyangira Stotram 2 – श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् (सिद्धिलक्ष्मी महाविद्या)
॥ श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् (सिद्धिलक्ष्मी महाविद्या) ॥ ॥ ऐं ख्फ्रेम् ॥ नमोऽस्तु ते महामाये देहातीते निरञ्जने । प्रत्यङ्गिरा जगद्धात्रि राजलक्ष्मि नमोऽस्तु ते ॥ १ ॥ वर्णदेहा महागौरी साधकेच्छाप्रवर्तिता । पददेहा महास्फाल महासिद्धिसमुत्थिता ॥ २ ॥ तत्त्वदेहस्थिता देवि साधकानुग्रहा स्मृता । महाकुण्डलिनी भित्त्वा सहस्रदलभेदिनी ॥ ३ ॥ इडापिङ्गलमध्यस्था वायुभूता खगामिनी । मृणालतन्तुरूपिण्या सुषुम्णामध्यचारिणी ॥ ४ ॥ नादान्तेनादसंस्थाना नादातीता निरञ्जना । सूक्ष्मेस्थूलेति सम्पूज्ये अचिन्त्याचिन्त्यविग्रहे ॥ ५ ॥ परापरपरे शान्ते ब्रह्मलीने परे शिवे । अचिन्त्यरूपचरिते अचिन्त्यार्थफलप्रदे ॥ ६ ॥ एकाकिनी विश्वमाता करवीरनिवासिनी । महास्फालप्रदा नित्या महामेलापकारिणी ॥ ७ ॥ बिन्दुमध्ये स्थिता देवी कुटिले चार्धचन्द्रिके । द्वादशान्तालया देवी षोडशाधारवासिनी ॥ ८ ॥ कार्यकारणसम्भिन्ना चैतन्यानाडिमध्यगा । शक्तिमूले महाचक्रे नवधा संव्यवस्थिता ॥ ९ ॥ अशरीरा परादेवी शरीरे प्राणरूपिणी । सुधाद्रवसमाकारा ओङ्कारपरविग्रहा ॥ १० ॥ विद्युल्लतनिभा देवी भावाभावविवर्जिता । स्वान्तपद्मस्थिता नित्या परेशी शान्तविग्रहा ॥ ११ ॥ सत्त्वरूपा रजोरूपा तमोरूपा त्रयात्मिका । त्वमेव देवी सर्वेषां भूतानां प्राणदायिनी ॥ १२ ॥ त्वयैव सृज्यते विश्वं लीलया बहुधा स्थिता । मालिनी परमा देवी श्मशानपरबन्धनी ॥ १३ ॥ हृत्तालुभेदिनी चक्रे विचक्रे चक्रसुन्दरी । बिन्दुद्वारनिरोधेन दिव्यव्याप्ता नमोऽस्तु ते ॥ १४ ॥ सूर्यकोटिप्रतीकाशे चन्द्रकोट्यतिनिर्मले । कन्दर्पकोटिलावण्यकोटिब्रह्माण्डविग्रहे ॥ १५ ॥ निराकारे निराभासे निर्लेपे निर्विनिग्रहे । सकलाख्ये महामाये वरदे सुरपूजिते ॥ १६ ॥ खकारफकारवह्निस्थैकारान्तर सुन्दरि । मकारान्तर वर्गेषु पञ्चपिण्डात्मके शिवे ॥ १७ ॥ सर्पवत्कुटिलाकार नादशक्तिपरे मते । बिन्दुचक्रस्थिता देवी जालन्धरस्वरूपिणी ॥ १८ ॥ भूर्यवैडूर्यपीठस्थे पूर्णपीठव्यवस्थिते । कामस्थिते कलातीते कामाख्ये च भगोद्भवे ॥ १९ ॥ ब्रह्मग्रन्थिकलाटोपमध्येस्रोतप्रवाहिनी । शिवे सर्वगते सूक्ष्मे नित्यानन्दमहोत्सवे ॥ २० ॥ मन्त्रनायिकि मन्त्रज्ञे विद्येकोशान्तवासिनी । पञ्चपीठिकमध्यस्थे मेरुनायकि शर्वरी ॥ २१ ॥ खेचरी भूचरी चैव शक्तित्रयप्रवाहिनी । कालान्ताग्निसमुद्भूता कालकालान्तकालिनी ॥ २२ ॥ कालिकाक्रमसम्बन्धि कालिद्वादशमण्डले । त्रैलोक्यदहनी देवी सा च मूर्तिस्त्रयोदशी ॥ २३ ॥ सृष्टि स्थिति च संहारे अनाख्याख्ये महाक्रमे । भासाख्या गुह्यकाली च निर्वाणेशी परेश्वरी ॥ २४ ॥ झङ्कारिणी भैरवी च स्वर्णकोटेश्वरी शिवा । राजराजेश्वरी चण्डा अघोरेशी निशेश्वरी ॥ २५ ॥ सुन्दरी त्रिपुरा पद्मा तारा पूर्णेश्वरी जया । क्रममण्डलमध्यस्था क्रमेशी कुब्जिकाम्बिका ॥ २६ ॥ ज्येष्ठबालविभेदेन कुब्जाख्या उग्रचण्डिका । ब्राह्माणी रौद्री कौमारी वैष्णवी दीर्घनासिका ॥ २७ ॥ वज्रिणी चर्चिकालक्ष्मी पूजयेद्दिव्यमातरः । असिताङ्गोरुरुश्चण्डः क्रोधीशोन्मत्त सञ्ज्ञकम् ॥ २८ ॥ कपाली भीषणाख्याश्च संहारश्चाष्टमस्तथा । भक्तानां साधकानां च लक्ष्मीं सिद्धिं प्रयच्छ मे ॥ २९ ॥ सिद्धिलक्ष्मीर्महादेवीं भैरवेनानुकीर्तिता । साधकद्वेष्टकानां च सर्वकर्मविभञ्जिनी ॥ ३० ॥ विपरीतकरी देवी प्रत्यङ्गिरा नमोऽस्तु ते । कालादि ग्रसिते सर्वं ग्रहभूतादि डाकिनी ॥ ३१ ॥ साधकं रक्षते देवी कालसङ्कर्षणीं नुमः । शिवं प्रयच्छते देवी रक्षते लीलया जगत् ॥ ३२ ॥ राज्यलाभप्रदां देवी रक्षणी भक्तवत्सलाम् । प्रत्यङ्गिरां नमस्यामि अचिन्तितार्थसिद्धये ॥ ३३ ॥ सर्वशत्रून् प्रमर्दन्ती दुरितक्लेशनाशिनीम् । प्रत्यङ्गिरां नमस्यामि अचिन्तितार्थसिद्धये ॥ ३४ ॥ आपदाम्भोधितरणिं परं निर्वाणदायिनीम् । प्रत्यङ्गिरां नमस्यामि सिद्धिलक्ष्मीं जयप्रदाम् ॥ ३५ ॥ राज्यदां धनदां लक्ष्मीं मोक्षदां दुःखनाशिनीम् । प्रत्यङ्गिरां नमस्यामि सिद्धिलक्ष्मीं जयप्रदाम् ॥ ३६ ॥ दुष्टशत्रुप्रशमनीं महाव्याधिविनाशिनीम् । प्रत्यङ्गिरां नमस्यामि सिद्धिलक्ष्मीं जयप्रदाम् ॥ ३७ ॥ कलिदुःखप्रशमनीं महापातकनाशिनीम् । प्रत्यङ्गिरां नमस्यामि सिद्धिलक्ष्मीं जयप्रदाम् ॥ ३८ ॥ अचिन्त्यसिद्धिदां देवी चिन्तितार्थफलप्रदाम् । प्रत्यङ्गिरां नमस्यामि सिद्धिलक्ष्मीं जयप्रदाम् ॥ ३९ ॥ राजोपसर्गशमनीं मृत्युपद्रवनाशिनीम् । प्रत्यङ्गिरां नमस्यामि सिद्धिलक्ष्मीं जयप्रदाम् ॥ ४० ॥ राजमातां राजलक्ष्मीं राज्येष्टफलदायिनीम् । प्रत्यङ्गिरां नमस्यामि सिद्धिलक्ष्मीं जयप्रदाम् ॥ ४१ ॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ सिद्धिलक्ष्मीर्महाविद्या महासिद्धिप्रदायिका । पठेद्वा पाठयेद्वापि स्तोत्रं प्रत्यङ्गिराभिधम् ॥ ४२ ॥ पठनाच्छत्रुसैन्यानि स्तम्भयेज्जम्भयेत् क्षणात् । अचिन्तितानि सिद्ध्यन्ति पठनात् सिद्धिमाप्नुयात् ॥ ४३ ॥ महादोषप्रशमनं महाव्याधिविनाशनम् । सिंहव्याघ्रग्रहभये राजोपद्रवनाशनम् ॥ ४४ ॥ ग्रहपीडा जलाग्नीनां नाशनं देवि शान्तिदम् । पूजाकाले महास्तोत्रं ये पठिष्यन्ति साधकाः ॥ ४५ ॥ तेषां सिद्धिर्नदूरेऽस्ति देव्याः सन्तुष्टिदायकम् । ते नास्ति यन्नसिद्ध्येत कौलिके कुलशासने ॥ ४६ ॥ यं यं चिन्तयते कामं स स सिद्ध्यति लीलया । सत्यं सत्यं महादेवी कौलिके तत्समो न हि ॥ ४७ ॥ अर्धरात्रे समुत्थाय दीपः प्रज्वल्यते निशि । पठ्यते स्तोत्रमेतत्तु सर्वं सिद्ध्यति चिन्तितम् ॥ ४८ ॥ पुरश्चर्यां विनानेन स्तोत्रपाठेन सिद्ध्यति । मण्डले प्रतिमाग्रे वा मण्डलाग्रे पठेद्यदि ॥ ४९ ॥ इदं प्रोक्तं महास्तोत्रं अचिन्तितार्थसिद्धिदम् । अन्यदेवरतानां तु न देयं तु कदाचन ॥ ५० ॥ दातव्यं भक्तियुक्ताय कुलदीक्षारताय च । अन्यथा पतनं यान्ति इत्याज्ञा पारमेश्वरी ॥ ५१ ॥ ॥ इति त्रिदशडामरे कानवीरे श्रीसिद्धिलक्ष्मी महामाया स्तवं नाम श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् (सिद्धिलक्ष्मी महाविद्या) - परिचय

श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम्, जिसे 'सिद्धिलक्ष्मी महाविद्या' या 'महामाया स्तव' भी कहा जाता है, शक्ति साधना का एक दुर्लभ और गोपनीय रत्न है। यह स्तोत्र 'त्रिदशडामर तंत्र' (Tridasha Damara Tantra) के 'कानवीर' खंड से उद्धृत है और भगवान शिव के अवतार श्री सिद्धिनाथ द्वारा जगत के कल्याण के लिए प्रकट किया गया है।
इस स्तोत्र में माँ प्रत्यङ्गिरा को 'महाकुण्डलिनी' (श्लोक 3) और 'सहस्रदलभेदिनी' कहा गया है, जो यह दर्शाता है कि यह केवल एक रक्षा कवच नहीं, बल्कि आत्म-साक्षात्कार और कुण्डलिनी जागरण की उच्च स्तरीय साधना है। यहाँ देवी का वर्णन 'विद्युल्लतनिभा' (बिजली की लता जैसी चमक वाली) और 'नादातीता' (नाद से परे) के रूप में किया गया है, जो उनके निराकार और ब्रह्म स्वरूप को इंगित करता है।
यह स्तोत्र साधक को 'भोग' (सांसारिक सुख) और 'मोक्ष' (आध्यात्मिक मुक्ति) दोनों प्रदान करने में सक्षम है, इसीलिए इसे 'सिद्धिलक्ष्मी' कहा गया है। यह शत्रुओं के स्तम्भन (रोकने/जड़ करने) के लिए अमोघ अस्त्र माना जाता है।

स्तोत्र पाठ के लाभ (Benefits)

'फलश्रुति' (श्लोक 42-51) के अनुसार, इस स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित अद्भुत लाभ प्राप्त होते हैं:
  • शत्रु सेना का स्तम्भन: श्लोक 43 में स्पष्ट कहा गया है - 'पठनाच्छत्रुसैन्यानि स्तम्भयेज्जम्भयेत् क्षणात्'। यह शत्रुओं की पूरी सेना या समूह को क्षण भर में रोक देने और उनकी शक्ति को कुंठित करने में सक्षम है।
  • सर्व कार्य सिद्धि: 'अचिन्तितानि सिद्ध्यन्ति' - साधक जो भी मन में सोचता है या जिसकी कल्पना भी नहीं की होती, वे सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं।
  • महाव्याधि और दोष निवारण: यह बड़े से बड़े रोगों ('महाव्याधिविनाशनम्') और दोषों का नाश करता है।
  • ग्रह और भय से मुक्ति: सिंह, व्याघ्र जैसे हिंसक जीवों का भय और क्रूर ग्रहों (शनि, राहु, केतु) की पीड़ा ('ग्रहपीडा') इससे शांत हो जाती है।
  • राज्य और धन प्राप्ति: यह साधक को 'राज्यदां' (राज्य देने वाली) और 'धनदां' (धन देने वाली) लक्ष्मी की प्राप्ति कराता है।
  • शीघ्र सिद्धि: बिना लम्बी तपस्या या पुरश्चरण के, केवल भक्तिपूर्वक पाठ करने से ही यह सिद्ध हो जाता है (श्लोक 49)।

पाठ विधि (Recitation Method)

तन्त्र शास्त्रों में इस स्तोत्र की विशिष्ट विधि बताई गई है:
  • विशेष समय: इसका पाठ 'अर्धरात्रि' (मध्यरात्रि/निशीथ काल) में करना सर्वश्रेष्ठ माना गया है (श्लोक 48)।
  • दीपक: रात्रि में देवी के समक्ष दीपक प्रज्वलित करें ('दीपः प्रज्वल्यते निशि')।
  • स्थान: एकांत स्थान, पूजा गृह, या किसी सिद्ध पीठ ('मण्डले प्रतिमाग्रे वा') में बैठकर पाठ करें।
  • नियम: साधक को 'कुलदीक्षारत' (गुरु परंपरा में दीक्षित) और भक्ति युक्त होना चाहिए। इसे अपात्र या निंदक व्यक्तियों को नहीं देना चाहिए।
  • समर्पण: पूर्ण समर्पण और विश्वास के साथ पाठ करने से देवी की 'लीला' से ही समस्त कार्य सिद्ध हो जाते हैं।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री प्रत्यङ्गिरा स्तोत्रम् (सिद्धिलक्ष्मी) क्या है?

यह 'त्रिदशडामर तंत्र' से लिया गया एक अत्यंत दुर्लभ और शक्तिशाली स्तोत्र है। इसे 'सिद्धिलक्ष्मी महाविद्या' भी कहा जाता है। यह साधक को भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करता है।

2. इस स्तोत्र के पाठ का सबसे बड़ा लाभ क्या है?

इसका सबसे बड़ा लाभ 'शत्रु स्तम्भन' (पठनाच्छत्रुसैन्यानि स्तम्भयेत्) है। यह विरोधियों की बुद्धि और शक्ति को कुंठित कर देता है और साधक को विजय दिलाता है।

3. क्या इससे कुण्डलिनी जागरण में मदद मिलती है?

हाँ, श्लोक 3 में देवी को 'महाकुण्डलिनी भित्त्वा सहस्रदलभेदिनी' कहा गया है। यह स्तोत्र मूलाधार से सहस्रार चक्र तक ऊर्जा के प्रवाह को जागृत करने में सहायक है।

4. पाठ करने की विधि क्या है?

अर्धरात्रि (मध्यरात्रि) के समय दीपक जलाकर इसका पाठ करना सर्वश्रेष्ठ बताया गया है ('अर्धरात्रे समुत्थाय दीपः प्रज्वल्यते निशि')। इससे शीघ्र सिद्धि मिलती है।

5. क्या इसे बिना 'पुरश्चरण' के सिद्ध किया जा सकता है?

जी हाँ, श्लोक 49 में स्पष्ट लिखा है - 'पुरश्चर्यां विनानेन स्तोत्रपाठेन सिद्ध्यति'। अर्थात केवल भक्तिपूर्वक पाठ करने से ही मंत्र सिद्ध हो जाता है।

6. क्या यह शारीरिक रोगों को दूर करता है?

हाँ, यह 'महाव्याधिविनाशनम्' (श्लोक 44) है। बड़े से बड़े रोग और शारीरिक कष्ट इसके प्रभाव से नष्ट हो जाते हैं।

7. देवी का स्वरूप इस स्तोत्र में कैसा बताया गया है?

देवी को 'विद्युल्लतनिभा' (बिजली की चमक जैसी), 'सूक्ष्मेस्थूलेति' (सूक्ष्म और स्थूल दोनों), और 'नादातीता' (नाद से परे) बताया गया है। वे निराकार और साकार दोनों हैं।

8. 'सिद्धिलक्ष्मी' नाम का क्या महत्व है?

'सिद्धिलक्ष्मी' वह शक्ति है जो साधक को अणिमा, महिमा आदि अष्ट सिद्धियाँ और सांसारिक ऐश्वर्य (लक्ष्मी) एक साथ प्रदान करती है।

9. क्या ग्रहण और ग्रह पीड़ा में यह उपयोगी है?

हाँ, श्लोक 45 के अनुसार यह 'ग्रहपीडा' और जल-अग्नि के भय का नाश करता है। शनि, राहु आदि की दशा में यह राम-बाण उपाय है।

10. क्या यह स्तोत्र गुप्त रखना चाहिए?

हाँ, श्लोक 50 में निर्देश है कि इसे 'अन्यदेवरतानां' (दूसरों की निंदा करने वाले या अयोग्य) को नहीं देना चाहिए। यह केवल गुरु भक्तों ('कुलदीक्षारताय') के लिए है।