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Sri Pitambara Panjara Stotram – श्री पीताम्बरा पञ्जर स्तोत्रम्

Sri Pitambara Panjara Stotram – श्री पीताम्बरा पञ्जर स्तोत्रम्
॥ श्रीबगलापञ्जरस्तोत्रम् अथवा श्रीपीताम्बरापञ्जरस्तोत्रम् ॥ सूत उवाच - सहस्रादित्यसङ्काशं शिवं साम्बं सनातनम् । प्रणम्य नारदः प्राह विनम्रो नतकन्धरः ॥ १॥ श्रीनारद उवाच - भगवन् साम्ब तत्त्वज्ञ सर्वदुःखापहारक । श्रीमत्पीताम्बरादेव्याः पञ्जरं पुण्यदं सताम् ॥ २॥ प्रकाशय विभो नाथ कृपां कृत्वा ममोपरि । यद्यहं तव पादाब्जधूलिधूसरितोऽभवत् ॥ ३॥ ॥ विनियोगः ॥ अस्य श्रीमद्बगलामुखी पीताम्बरा पञ्जररूपस्तोत्रमन्त्रस्य भगवान् नारदऋषिः, अनुष्टुप्छन्दः, जगद्वश्यकरी श्रीपीताम्बरा बगलामुखी देवता, ह्लीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, क्लीं कीलकं, मम विपक्षपरसैन्यमन्त्र-तन्त्र-यन्त्रादिकृत्यक्षयार्थं श्रीमत्पीताम्बरा बगलामुखी देवताप्रीत्यर्थे च जपे विनियोगः ॥ ॥ ऋष्यादि न्यासः ॥ भगवान् नारदऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप्छन्दसे नमः मुखे । जगद्वश्यकरी श्रीपीताम्बरा बगलामुखी देवतायै नमः हृदये । ह्लीं बीजाय नमः दक्षिणस्तने स्वाहा । शक्त्यै नमः वामस्तने । क्लीं कीलकाय नमः नाभौ । मम विपक्षपरसैन्यमन्त्रतन्त्रयन्त्रादिकृत्यक्षयार्थं श्रीमत्पीताम्बरा बगलादेव्याः प्रीतये जपे विनियोगः । करसम्पुटेन करमूलेन करशुद्धिः । ह्लामिति षट्दीर्घेण षडङ्गः । मूलेन व्यापकन्यासं कुर्यात् ॥ ॥ करन्यासः ॥ ह्लां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ह्लीं तर्जनीभ्यां स्वाहा । ह्लूं मध्यमाभ्यां वषट् । ह्लैं अनामिकाभ्यां हुम् । ह्लौं कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । ह्लः करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् ॥ ॥ अङ्गन्यासः ॥ ह्लां हृदयाय नमः । ह्लीं शिरसे स्वाहा । ह्लूं शिखायै वषट् । ह्लैं कवचाय हुम् । ह्लौ नेत्रत्रयाय वौषट् । ह्लः अस्त्राय फट् ॥ ॥ व्यापकन्यासः ॥ ॐ ह्लीं अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ॐ बगलामुखी तर्जनीभ्यां स्वाहा । ॐ सर्वदुष्टानां मध्यमाभ्यां वषट् । ॐ वाचं मुखं पदं स्तम्भय अनामिकाभ्यां हुम् । ॐ जिह्वां कीलय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । ॐ बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा करतलकरपृष्ठाभ्यां फट् ॥ ॥ अङ्गन्यासः ॥ ॐ ह्लीं हृदयाय नमः । ॐ बगलामुखि शिरसे स्वाहा । ॐ सर्वदुष्टानां शिखायै वषट् । ॐ वाचं मुखं पदं स्तम्भय कवचाय हुम् । ॐ जिह्वां कीलय नेत्रत्रयाय वौषट् । ॐ बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ स्वाहा, अस्त्राय फट् ॥ ॥ ध्यानम् ॥ मध्ये सुधाब्धिमणिमण्डपरत्नवेद्यां सिंहासनोपरिगतां परिपीतवर्णाम् । पीताम्बराभरणमाल्यविभूषिताङ्गीं देवीं स्मरामि धृतमुद्गरवैरिजिह्वाम् ॥ इति ध्यात्वा मनसा सम्पूज्य, योनिमुद्रां एवं मुद्गरमुद्रां प्रदर्शय, ऋष्यादिन्यासं कृत्वा, पञ्जरं न्यस्येत्त् । श्रीपीताम्बरायै नमः लं पृथिव्यात्मकं गन्धं परिकल्पयामि । श्रीपीताम्बरायै नमः हं आकाशात्मकं पुष्पं परिकल्पयामि । श्रीपीताम्बरायै नमः यं वायव्यात्मकं धूपं परिकल्पयामि । श्रीपीताम्बरायै नमः वं अमृतात्मकं नैवेद्यं परिकल्पयामि ॥ ॥ अथ पञ्जरस्तोत्रम् ॥ श्रीशिव उवाच - पञ्जरं तत्प्रवक्ष्यामि देव्याः पापप्रणाशनम् । यं प्रविश्य च बाधन्ते बाणैरपि नराः क्वचित् ॥ १॥ ॐ ऐं ह्लीं श्रीं श्रीमत्पीताम्बरादेवी बगला बुद्धिवर्द्धिनी । पातु मामनिशं साक्षात् सहस्रार्कसमद्युतिः ॥ २॥ ॐ ऐं ह्लीं श्रीं शिखादिपादपर्यन्तं वज्रपञ्जरधारिणी । ब्रह्मास्त्रसंज्ञा या देवी पीताम्बराविभूषिता ॥ ३॥ ॐ ऐं ह्लीं श्रीं श्रीबगला ह्यवत्वत्र चोर्ध्वभागं महेश्वरी । कामाङ्कुशा कला पातु बगला शास्त्रबोधिनी ॥ ४॥ ॐ ऐं ह्लीं श्रीं पीताम्बरा सहस्राक्षा ललाटं कामितार्थदा । पातु मां बगला नित्यं पीताम्बरसुधारिणी ॥ ५॥ ॐ ऐं ह्लीं श्रीं कर्णयोश्चैव युगपदातिरत्नप्रपूजिता । पातु मां बगलादेवी नासिकां मे गुणाकरा ॥ ६॥ ॐ ऐं ह्लीं श्रीं पीतपुष्पैः पीतवस्त्रैः पूजिता वेददायिनी । पातु मां बगला नित्यं ब्रह्मविष्ण्वादिसेविता ॥ ७॥ ॐ ऐं ह्लीं श्रीं पीताम्बरा प्रसन्नास्या नेत्रयोर्युगपद्भ्रुवौ । पातु मां बगला नित्यं बलदा पीतवस्त्रधृक् ॥ ८॥ ॐ ऐं ह्लीं श्रीं अधरोष्ठौ तथा दन्तान् जिह्वां च मुखगां मम । पातु मां बगलादेवी पीताम्बरसुधारिणी ॥ ९॥ ॐ ऐं ह्लीं श्रीं गले हस्ते तथा बाह्वोः युगपद्बुद्धिदासताम् । पातु मां बगलादेवी दिव्यस्रगनुलेपना ॥ १०॥ ॐ ऐं ह्लीं श्रीं हृदये च स्तने नाभौ करावपि कृशोदरी । पातु मां बगला नित्यं पीतवस्त्रघनावृता ॥ ११॥ जङ्घायां च तथा चोर्वोर्गुल्फयोश्चातिवेगिनी । अनुक्तमपि यत्स्थानं त्वक्केशनखलोमकम् ॥ १२॥ असृङ्मांसं तथास्थीनी सन्धयश्चापि मे परा । ताः सर्वा बगलादेवी रक्षेन्मे च मनोहरा ॥ १३॥ ॥ फलश्रुतिः ॥ इत्येतद्वरदं गोप्यं कलावपि विशेषतः । पञ्जरं बगलादेव्याः घोरदारिद्र्यनाशनम् । पञ्जरं यः पठेद्भक्त्या स विघ्नैर्नाभिभूतये ॥ १४॥ अव्याहतगतिश्चास्य ब्रह्मविष्ण्वादिसत्पुरे । स्वर्गे मर्त्ये च पाताले नारयस्तं कदाचन ॥ १५॥ न बाधन्ते नरव्याघ्रं पञ्जरस्थं कदाचन । अतो भक्तैः कौलिकैश्च स्वरक्षार्थं सदैव हि ॥ १६॥ पठनीयं प्रयत्नेन सर्वानर्थविनाशनम् । महादारिद्र्यशमनं सर्वमाङ्गल्यवर्धनम् ॥ १७॥ विद्याविनयसत्सौख्यं महासिद्धिकरं परम् । इदं ब्रह्मास्त्रविद्यायाः पञ्जरं साधु गोपितम् ॥ १८॥ पठेत्स्मरेद्ध्यानसंस्थः स जयेन्मरणं नरः । यः पञ्जरं प्रविश्यैव मन्त्रं जपति वै भुवि ॥ १९॥ कौलिकोऽकौलिको वापि व्यासवद्विचरेद्भुवि । चन्द्रसूर्यसमो भूत्वा वसेत्कल्पायुतं दिवि ॥ २०॥ श्रीसूत उवाच - इति कथितमशेषं श्रेयसामादिबीजम् । भवशतदुरितघ्नं ध्वस्तमोहान्धकारम् । स्मरणमतिशयेन प्राप्तिरेवात्र मर्त्यः । यदि विशति सदा वै पञ्जरं पण्डितः स्यात् ॥ २१॥ ॥ इति परमरहस्यातिरहस्ये श्रीपीताम्बरापञ्जरस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री पीताम्बरा पञ्जर स्तोत्रम् — परिचय एवं रहस्य (Introduction)

श्री पीताम्बरा पञ्जर स्तोत्रम् (Sri Pitambara Panjara Stotram) दश महाविद्याओं में स्तम्भन की अधिष्ठात्री देवी माँ बगलामुखी (पीताम्बरा) का एक अत्यंत शक्तिशाली और गुप्त तांत्रिक पाठ है। तंत्र शास्त्र में इसे 'वज्रपञ्जर स्तोत्र' भी कहा जाता है। यह दिव्य स्तोत्र पुराणों में सूत जी द्वारा शौनकादि ऋषियों को सुनाया गया है, जिसमें देवर्षि नारद और भगवान सदाशिव के मध्य हुए परम रहस्यमय संवाद का वर्णन है।

रचना संदर्भ: स्तोत्र के आरंभ में (श्लोक 1-3) देवर्षि नारद भगवान शिव (साम्ब) को प्रणाम करके अत्यंत विनम्रता से निवेदन करते हैं— "भगवन् साम्ब तत्त्वज्ञ सर्वदुःखापहारक। श्रीमत्पीताम्बरादेव्याः पञ्जरं पुण्यदं सताम्॥" अर्थात् 'हे सर्वदुःखहारी शिव! मुझ पर कृपा करके माँ पीताम्बरा के उस पुण्यदायी पञ्जर का उपदेश दीजिए।' तब भगवान शिव अपने परम भक्त नारद को इस रहस्यमयी विद्या का ज्ञान देते हैं।

'पञ्जर' (Panjara) का तांत्रिक अर्थ: साधारण भाषा में 'पञ्जर' का अर्थ पिंजरा (Cage) होता है। एक सामान्य कवच (Kavach) जहाँ शरीर के अंगों पर अस्त्र के समान पहना जाता है, वहीं 'पञ्जर' साधक के चारों ओर एक 'वज्र का पिंजरा' (Impenetrable Force Field) बना देता है। श्लोक 1 में शिव जी कहते हैं— "यं प्रविश्य च बाधन्ते बाणैरपि नराः क्वचित्" अर्थात् इस पञ्जर में प्रवेश करने के बाद यदि कोई तीखे बाणों से भी प्रहार करे, तो भी वह साधक को भेद नहीं सकता।

ब्रह्मास्त्र विद्या का पूर्ण प्रयोग: विनियोग में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया है कि इस पाठ का मुख्य उद्देश्य "मम विपक्षपरसैन्यमन्त्र-तन्त्र-यन्त्रादिकृत्यक्षयार्थं" है। इसका अर्थ है— विरोधियों की सेना, उनके द्वारा किए गए काले जादू (Black Magic), मारण, तंत्र और यंत्र के दूषित प्रयोगों को समूल नष्ट करना। यह स्तोत्र ब्रह्मास्त्र के समान कार्य करता है जो शत्रु के हर प्रहार को विफल कर देता है।

बीज मंत्रों का रहस्य (Significance of Bija Mantras)

इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके हर रक्षा-श्लोक के आरंभ में तीन महाशक्तिशाली तांत्रिक बीजाक्षरों— "ॐ ऐं ह्लीं श्रीं" का प्रयोग किया गया है:

  • ऐं (Aim): सरस्वती बीज— वाक् शक्ति, बुद्धि और ज्ञान का प्रदाता। (बगलामुखी वाक् स्तम्भन की देवी हैं)।
  • ह्लीं (Hleem): बगलामुखी का मूल बीजाक्षर (माया/स्तम्भन बीज)— जो शत्रुओं की बुद्धि और गति को रोक देता है।
  • श्रीं (Shreem): लक्ष्मी बीज— यह दरिद्रता का नाश कर भौतिक ऐश्वर्य प्रदान करता है।

श्लोक 3 में कहा गया है— "शिखादिपादपर्यन्तं वज्रपञ्जरधारिणी"। ये बीज मंत्र शिखा से लेकर पैरों तक एक ऐसा वज्र-रूपी पिंजरा बनाते हैं जिसमें प्रवेश कर साधक पूर्ण रूप से निर्भय हो जाता है।

पञ्जर स्तोत्र के लाभ — फलश्रुति (Phala Shruti Benefits)

स्तोत्र के अंत में (श्लोक 14 से 21) भगवान शिव और सूत जी ने इस पाठ के असीमित फलों का वर्णन किया है:

  • दरिद्रता का समूल नाश: (श्लोक 14, 17) "घोरदारिद्र्यनाशनम्" और "महादारिद्र्यशमनं" — यह केवल शत्रुओं से नहीं बचाता, बल्कि जीवन की घोर दरिद्रता और आर्थिक संकटों को भी नष्ट कर देता है।
  • त्रैलोक्य में अबाध गति: (श्लोक 15) "स्वर्गे मर्त्ये च पाताले नारयस्तं कदाचन" — स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में ऐसा कोई भी शत्रु नहीं है जो इस पञ्जर में बैठे साधक को हानि पहुँचा सके। साधक की गति सर्वत्र अबाध (Unstoppable) हो जाती है।
  • मृत्यु पर विजय: (श्लोक 19) "स जयेन्मरणं नरः" — जो व्यक्ति ध्यानमग्न होकर इस पञ्जर का पाठ करता है, वह अकाल मृत्यु पर विजय प्राप्त कर लेता है।
  • महासौभाग्य और सिद्धि: (श्लोक 18) यह पाठ विद्या, विनम्रता, उत्तम सुख (सत्सौख्य) और परम महासिद्धियां (महासिद्धिकरं परम्) प्रदान करने वाला है।
  • मोह और पाप का अंत: (श्लोक 21) यह भवसागर के सैकड़ों पापों को हरने वाला (भवशतदुरितघ्नं) और अज्ञान रूपी अंधकार (ध्वस्तमोहान्धकारम्) को नष्ट करने वाला है।

पाठ विधि एवं तांत्रिक अनुष्ठान (Ritual Method for Panjara Stotra)

चूँकि यह एक विशुद्ध तांत्रिक स्तोत्र है, अतः इसके मूल पाठ से पूर्व न्यास (Nyasa) करना परम आवश्यक है। न्यास के बिना इस स्तोत्र की शक्ति शरीर में स्थापित नहीं होती।

संपूर्ण अनुष्ठान विधि

  • पवित्रीकरण एवं संकल्प: पीले वस्त्र धारण कर, पीले आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें। हाथ में जल लेकर "विनियोग" पढ़ें और जल भूमि पर छोड़ दें।
  • ऋष्यादि न्यास: मंत्र में बताए अनुसार सिर (नारद ऋषि), मुख (अनुष्टुप छंद), हृदय (देवता), स्तन और नाभि पर उँगलियों का स्पर्श करते हुए न्यास करें।
  • करन्यास एवं अंगन्यास: "ह्लां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः" से उँगलियों का और "ह्लां हृदयाय नमः" से शरीर के अंगों का स्पर्श कर उनमें ऊर्जा स्थापित करें।
  • व्यापक न्यास: यह बगलामुखी साधना का सबसे महत्वपूर्ण अंग है। पूरे ३६ अक्षरी मंत्र (ॐ ह्लीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां...) को अपने कर-कमलों और अंगों पर स्थापित करें।
  • ध्यान एवं मानस पूजा: सुधा-सागर के मध्य मणिमंडप में, पीले वस्त्र पहने हुए, एक हाथ में मुदगर और दूसरे में शत्रु की जीभ पकड़े हुए माँ पीताम्बरा का ध्यान करें। "लं पृथिव्यात्मकं..." मंत्रों से गंध, पुष्प, धूप और नैवेद्य मन ही मन (मानस पूजा) अर्पित करें।
  • मुख्य पाठ: उपरोक्त विधि के पश्चात शिव द्वारा उपदिष्ट "पञ्जरस्तोत्रम्" (श्लोक 1 से 13) का एकाग्रचित्त होकर पाठ करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

1. श्री पीताम्बरा पञ्जर स्तोत्र किसने किसको बताया था?

यह स्तोत्र भगवान सदाशिव ने देवर्षि नारद जी के पूछने पर उन्हें उपदिष्ट किया था। बाद में इसे सूत जी ने शौनकादि ऋषियों को सुनाया।

2. 'कवच' और 'पञ्जर' स्तोत्र में क्या अंतर है?

कवच (Kavach) शरीर के अंगों को ढकता है (जैसे कवच/Armor)। जबकि 'पञ्जर' (Panjara) का अर्थ है पिंजरा (Cage)। यह साधक के चारों ओर सिर से लेकर पैरों तक एक वज्र-रूपी 3D पिंजरा बना देता है, जिसे कोई नकारात्मक शक्ति या शत्रु का बाण नहीं भेद सकता।

3. इस स्तोत्र में 'ॐ ऐं ह्लीं श्रीं' का क्या महत्व है?

ये तीनों महाबीज मंत्र हैं। 'ऐं' सरस्वती का (बुद्धि/वाक्), 'ह्लीं' बगलामुखी का (स्तम्भन), और 'श्रीं' लक्ष्मी का (धन) बीज है। इनके संयोजन से यह पाठ बुद्धि, रक्षा और ऐश्वर्य तीनों एक साथ प्रदान करता है।

4. 'विपक्षपरसैन्यमन्त्र-तन्त्र-यन्त्रादिकृत्यक्षयार्थं' का क्या अर्थ है?

विनियोग में दिए गए इस वाक्य का अर्थ है कि यह पाठ विपक्षियों (शत्रुओं) की सेना, उनके द्वारा किए गए मारण मंत्र, काले जादू (तंत्र) और यंत्र दोषों को पूर्णतः क्षय (नष्ट) करने के लिए किया जाता है।

5. क्या इसे बिना न्यास के पढ़ा जा सकता है?

सामान्य श्रद्धा-भक्ति के लिए मूल श्लोकों का पाठ किया जा सकता है। परंतु तांत्रिक सुरक्षा (वज्रपञ्जर) का पूर्ण लाभ लेने के लिए विनियोग और न्यास (करन्यास, अंगन्यास, व्यापक न्यास) करना अनिवार्य है।

6. क्या यह स्तोत्र दरिद्रता दूर करने में सहायक है?

जी हाँ, फलश्रुति के श्लोक 14 और 17 में इसे स्पष्ट रूप से "घोरदारिद्र्यनाशनम्" (घोर गरीबी का नाश करने वाला) कहा गया है, क्योंकि इसमें 'श्रीं' (महालक्ष्मी) बीज का प्रयोग हुआ है।

7. क्या स्त्रियां इस पञ्जर स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं?

हाँ, महाविद्या आराधना में स्त्री-पुरुष का भेद नहीं है। स्त्रियां अपने परिवार, संतान और स्वयं की सुरक्षा के लिए पीले वस्त्र पहनकर इस वज्रपञ्जर स्तोत्र का पाठ कर सकती हैं।

8. पाठ के लिए कौन सा समय सबसे उत्तम है?

तंत्र शास्त्र में बगलामुखी साधना के लिए मध्यरात्रि (निशीथ काल - 11:30 PM से 1:30 AM) सर्वोत्तम मानी जाती है। सामान्य रक्षा के लिए इसे प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में भी किया जा सकता है।

9. श्लोक 20 में 'व्यासवद्विचरेद्भुवि' का क्या आशय है?

इसका अर्थ है कि जो इस पञ्जर में प्रवेश कर (पाठ कर) साधना करता है, वह चाहे कौलिक (तांत्रिक) हो या सामान्य भक्त, वह पृथ्वी पर महर्षि वेदव्यास के समान ज्ञानी और सम्मानित होकर विचरण करता है।

10. क्या इसके पाठ के लिए गुरु दीक्षा आवश्यक है?

सुरक्षा और दरिद्रता नाश के लिए इसे पवित्रता पूर्वक पढ़ा जा सकता है। परंतु यदि आप किसी बड़े शत्रु का मारण या घोर तांत्रिक प्रयोग कर रहे हैं, तो इसके लिए बगलामुखी मंत्र की गुरु दीक्षा अनिवार्य है।

11. मानस पूजा (Manasa Puja) क्या है जो ध्यान के बाद दी गई है?

मानस पूजा में भौतिक वस्तुओं की जगह मानसिक रूप से देवी को पंचतत्व अर्पित किए जाते हैं। जैसे 'लं' बीज से पृथ्वी तत्व (गंध), 'हं' से आकाश तत्व (पुष्प), 'यं' से वायु तत्व (धूप) और 'वं' से जल तत्व (अमृत नैवेद्य) अर्पित किया जाता है।