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Sri Bagalamukhi Kavacham (Vishwa Vijay) – श्री बगलामुखी कवचम्

Sri Bagalamukhi Kavacham (Vishwa Vijay) – श्री बगलामुखी कवचम्
॥ श्री बगलामुखी कवचम् (विश्वविजय) ॥ (श्रीविश्वसारोद्धारतन्त्रे) ॥ पार्वतीशिवसंवादः ॥ कैलासाचलमध्यगं पुरवहं शान्तं त्रिनेत्रं शिवं वामस्था कवचं प्रणम्य गिरिजा भूतिप्रदं पृच्छति । देवी श्रीबगलामुखी रिपुकुलारण्याग्निरूपा च या तस्याश्चापविमुक्त मन्त्रसहितं प्रीत्याऽधुना ब्रूहि माम् ॥ १ ॥ श्रीशङ्कर उवाच । देवी श्रीभववल्लभे शृणु महामन्त्रं विभूतिप्रदं देव्या वर्मयुतं समस्तसुखदं साम्राज्यदं मुक्तिदम् । तारं रुद्रवधूं विरिञ्चिमहिला विष्णुप्रिया कामयु- -क्कान्ते श्रीबगलानने मम रिपून्नाशाय युग्मन्त्विति ॥ २ ॥ ऐश्वर्याणि पदं च देहि युगलं शीघ्रं मनोवाञ्छितं कार्यं साधय युग्मयुक्छिववधू वह्निप्रियान्तो मनुः । कंसारेस्तनयं च बीजमपराशक्तिश्च वाणी तथा कीलं श्रीमिति भैरवर्षिसहितं छन्दो विराट् सम्युतम् ॥ ३ ॥ स्वेष्टार्थस्य परस्य वेत्ति नितरां कार्यस्य सम्प्राप्तये नानासाध्यमहागदस्य नियतन्नाशाय वीर्याप्तये । ध्यात्वा श्रीबगलाननामनुवरं जप्त्वा सहस्राख्यकं दीर्घैः षट्कयुतैश्च रुद्रमहिलाबीजैर्विन्यास्याङ्गके ॥ ४ ॥ ॥ ध्यानम् ॥ सौवर्णासनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोलासिनीं हेमाभाङ्गरुचिं शशाङ्कमुकुटां स्रक्चम्पकस्रग्युताम् । हस्तैर्मद्गरपाशबद्धरसनां सम्बिभ्रतीं भूषण- -व्याप्ताङ्गीं बगलामुखीं त्रिजगतां संस्तम्भिनीं चिन्तये ॥ ५ ॥ ॥ विनियोगः ॥ ओं अस्य श्रीबगलामुखी ब्रह्मास्त्रमन्त्र कवचस्य भैरव ऋषिः विराट् छन्दः श्रीबगलामुखी देवता क्लीं बीजं ऐं शक्तिः श्रीं कीलकं मम परस्य च मनोभिलषितेष्टकार्यसिद्धये विनियोगः । ॥ ऋष्यादिन्यासः ॥ भैरव ऋषये नमः शिरसि । विराट् छन्दसे नमः मुखे । श्री बगलामुखी देवतायै नमः हृदि । क्लीं बीजाय नमः गुह्ये । ऐं शक्तये नमः पादयोः । श्रीं कीलकाय नमः सर्वाङ्गे । ॥ करन्यासः ॥ ओं ह्रां अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । ओं ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः । ओं ह्रूं मध्यमाभ्यां नमः । ओं ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः । ओं ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः । ओं ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः । ॥ हृदयादि षडङ्गन्यासः ॥ ओं ह्रां हृदयाय नमः । ओं ह्रीं शिरसे स्वाहा । ओं ह्रूं शिखायै वषट् । ओं ह्रैं कवचाय हुम् । ओं ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् । ओं ह्रः अस्त्राय फट् । भूर्भुवस्सुवरोमिति दिग्बन्धः । ॥ मन्त्रोद्धारः ॥ ओं ह्रीं ऐं श्रीं क्लीं श्रीबगलानने मम रिपून्नाशय नाशय ममैश्वर्याणि देहि देहि शीघ्रं मनोवाञ्छितकार्यं साधयः साधयः ह्रीं स्वाहा । ॥ कवचम् ॥ शिरो मे पातु ओं ह्रीं ऐं श्रीं क्लीं पातु ललाटकम् । सम्बोधनपदं पातु नेत्रे श्रीबगलानने ॥ १ ॥ श्रुतौ मम रिपुं पातु नासिकान्नाशय द्वयम् । पातु गण्डौ सदा मामैश्वर्याण्यं तं तु मस्तकम् ॥ २ ॥ देहि द्वन्द्वं सदा जिह्वां पातु शीघ्रं वचो मम । कण्ठदेशं मनः पातु वाञ्छितं बाहुमूलकम् ॥ ३ ॥ कार्यं साधय द्वन्द्वन्तु करौ पातु सदा मम । मायायुक्ता तथा स्वाहा हृदयं पातु सर्वदा ॥ ४ ॥ अष्टाधिकचत्वारिंशद्दण्डाढ्या बगलामुखी । रक्षां करोतु सर्वत्र गृहेऽरण्ये सदा मम ॥ ५ ॥ ब्रह्मास्त्राख्यो मनुः पातु सर्वाङ्गे सर्वसन्धिषु । मन्त्रराजः सदा रक्षां करोतु मम सर्वदा ॥ ६ ॥ ओं ह्रीं पातु नाभिदेशं कटिं मे बगलाऽवतु । मुखी वर्णद्वयं पातु लिङ्गं मे मुष्कयुग्मकम् ॥ ७ ॥ जानुनी सर्वदुष्टानां पातु मे वर्णपञ्चकम् । वाचं मुखं तथा पदं षड्वर्णा परमेश्वरी ॥ ८ ॥ जङ्घायुग्मे सदा पातु बगला रिपुमोहिनी । स्तम्भयेति पदं पृष्ठं पातु वर्णत्रयं मम ॥ ९ ॥ जिह्वां वर्णद्वयं पातु गुल्फौ मे कीलयेति च । पादोर्ध्वं सर्वदा पातु बुद्धिं पादतले मम ॥ १० ॥ विनाशय पदं पातु पादाङ्गुल्योर्नखानि मे । ह्रीं बीजं सर्वदा पातु बुद्धीन्द्रियवचांसि मे ॥ ११ ॥ सर्वाङ्गं प्रणवः पातु स्वाहा रोमाणि मेऽवतु । ब्राह्मी पूर्वदले पातु चाग्नेयां विष्णुवल्लभा ॥ १२ ॥ माहेशी दक्षिणे पातु चामुण्डा राक्षसेऽवतु । कौमारी पश्चिमे पातु वायव्ये चापराजिता ॥ १३ ॥ वाराही चोत्तरे पातु नारसिंही शिवेऽवतु । ऊर्ध्वं पातु महालक्ष्मीः पाताले शारदाऽवतु ॥ १४ ॥ इत्यष्टौ शक्तयः पान्तु सायुधाश्च सवाहनाः । राजद्वारे महादुर्गे पातु मां गणनायकः ॥ १५ ॥ श्मशाने जलमध्ये च भैरवश्च सदाऽवतु । द्विभुजा रक्तवसनाः सर्वाभरणभूषिताः ॥ १६ ॥ योगिन्यः सर्वदा पातु महारण्ये सदा मम । इति ते कथितं देवि कवचं परमाद्भुतम् ॥ १७ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ श्रीविश्वविजयन्नाम कीर्तिश्रीविजयप्रदम् । अपुत्रो लभते पुत्रं धीरं शूरं शतायुषम् ॥ १८ ॥ निर्धनो धनमाप्नोति कवचस्यास्य पाठतः । जपित्वा मन्त्रराजं तु ध्यात्वा श्रीबगलामुखीम् ॥ १९ ॥ पठेदिदं हि कवचं निशायां नियमात्तु यः । यद्यत्कामयते कामं साध्यासाध्ये महीतले ॥ २० ॥ तत्तत्काममवाप्नोति सप्तरात्रेण शङ्करी । गुरुं ध्यात्वा सुरां पीत्वा रात्रौ शक्तिसमन्वितः ॥ २१ ॥ कवचं यः पठेद्देवि तस्याऽसाध्यं न किञ्चन । यं ध्यात्वा प्रजपेन्मन्त्रं सहस्रं कवचं पठेत् ॥ २२ ॥ त्रिरात्रेण वशं याति मृत्युं तं नात्र संशयः । लिखित्वा प्रतिमां शत्रोः सतालेन हरिद्रया ॥ २३ ॥ लिखित्वा ह्यदि तं नाम तं ध्यात्वा प्रजपेन्मनुम् । एकविंशद्दिनं यावत्प्रत्यहं च सहस्रकम् ॥ २४ ॥ जप्त्वा पठेत्तु कवचं चतुर्विंशतिवारकम् । संस्तम्भं जायते शत्रोर्नात्र कार्या विचारणा ॥ २५ ॥ विवादे विजयं तस्य सङ्ग्रामे जयमाप्नुयात् । श्मशाने च भयं नास्ति कवचस्य प्रभावतः ॥ २६ ॥ नवनीतं चाभिमन्त्र्य स्त्रीणां दद्यान्महेश्वरि । वन्ध्यायां जायते पुत्रो विद्याबलसमन्वितः ॥ २७ ॥ श्मशानाङ्गारमादाय भौमे रात्रौ शनावथ । पादोदकेन स्पृष्ट्वा च लिखेल्लोहशलाकया ॥ २८ ॥ भूमौ शत्रोः स्वरूपं च हृदि नाम समालिखेत् । हस्तं तद्धृदये दत्वा कवचं तिथिवारकम् ॥ २९ ॥ ध्यात्वा जपेन्मन्त्रराजं नवरात्रं प्रयत्नतः । म्रियते ज्वरदाहेन दशमेऽह्नि न संशयः ॥ ३० ॥ भूर्जपत्रेष्विदं स्तोत्रमष्टगन्धेन संलिखेत् । धारयेद्दक्षिणे बाहौ नारी वामभुजे तथा ॥ ३१ ॥ सङ्ग्रामे जयमाप्नोति नारी पुत्रवती भवेत् । ब्रह्मास्त्रादीनि शस्त्राणि नैव कृन्तन्ति तं जनम् ॥ ३२ ॥ सम्पूज्य कवचं नित्यं पूजायाः फलमालभेत् । बृहस्पतिसमो वापि विभवे धनदोपमः ॥ ३३ ॥ कामतुल्यश्च नारीणां शत्रूणां च यमोपमः । कवितालहरी तस्य भवेद्गङ्गाप्रवाहवत् ॥ ३४ ॥ गद्यपद्यमयी वाणी भवेद्देवीप्रसादतः । एकादशशतं यावत्पुरश्चरणमुच्यते ॥ ३५ ॥ पुरश्चर्याविहीनं तु न चेदं फलदायकम् । न देयं परशिष्येभ्यो दुष्टेभ्यश्च विशेषतः ॥ ३६ ॥ देयं शिष्याय भक्ताय पञ्चत्वं चाऽन्यथाप्नुयात् । इदं कवचमज्ञात्वा भजेद्यो बगलामुखीम् । शतकोटि जपित्वा तु तस्य सिद्धिर्न जायते ॥ ३७ ॥ दाराढ्यो मनुजोस्य लक्षजपतः प्राप्नोति सिद्धिं परां विद्यां श्रीविजयं तथा सुनियतं धीरं च वीरं वरम् । ब्रह्मास्त्राख्यमनुं विलिख्य नितरां भूर्जेष्टगन्धेन वै धृत्वा राजपुरं व्रजन्ति खलु ये दासोऽस्ति तेषां नृपः ॥ ३८ ॥ ॥ इति विश्वसारोद्धारतन्त्रे पार्वतीश्वरसंवादे बगलामुखीकवचं सम्पूर्णम् ॥

श्री बगलामुखी कवचम् (विश्वविजय) — परिचय (Introduction)

श्री बगलामुखी कवचम् (Sri Bagalamukhi Kavacham), जिसे तंत्र शास्त्रों में 'विश्वविजय कवच' (Vishwa Vijay Kavacham) के नाम से भी जाना जाता है, माँ पीताम्बरा की साधना का एक अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली अंग है। यह कवच 'विश्वसारोद्धार तंत्र' (Vishwasaaroddhara Tantra) के पार्वती-ईश्वर संवाद से उद्धृत है।

इस कवच का प्रादुर्भाव भगवान शिव और माता पार्वती के संवाद से हुआ है। जब माता पार्वती ने भगवान शिव से पूछा कि — "हे प्रभु! वह कौन सा उपाय है जिससे शत्रु रूपी वन को अग्नि की तरह भस्म किया जा सके और साधक को 'विभूति' (ऐश्वर्य/सम्पदा) प्राप्त हो?" तब भगवान शिव ने करुणावश इस परम शक्तिशाली कवच का उपदेश दिया। शिवजी कहते हैं कि यह कवच न केवल शत्रुओं का नाश करता है, बल्कि साधक को 'साम्राज्य' (Empire) और 'मुक्ति' (Liberation) दोनों प्रदान करने में सक्षम है।

इस कवच को 'विश्वविजय' इसलिए कहा जाता है क्योंकि यह साधक को केवल एक शत्रु पर नहीं, बल्कि समस्त विश्व (परिस्थितियों) पर विजय दिलाता है। 'बगलामुखी' दस महाविद्याओं में 'ब्रह्मास्त्र विद्या' (Brahmastra Vidya) मानी जाती हैं। जिस प्रकार ब्रह्मास्त्र का कोई काट नहीं होता, उसी प्रकार इस कवच से सुरक्षित साधक का कोई अहित नहीं कर सकता। चाहे वह राजदरबार (कोर्ट-कचहरी) हो, युद्ध का मैदान हो, या श्मशान की तांत्रिक क्रियाएं हों — यह कवच हर जगह एक अभेद्य दीवार बनकर साधक की रक्षा करता है।

संरचना की दृष्टि से, यह कवच अत्यंत वैज्ञानिक है। इसमें साधक के शरीर के प्रत्येक अंग — सिर से लेकर पैर तक — की रक्षा के लिए माँ के विभिन्न स्वरूपों का आह्वान किया गया है। उदाहरण के लिए, पूर्व दिशा में ब्राह्मी, दक्षिण में माहेश्वरी, पश्चिम में कौमारी, और उत्तर में वाराही शक्ति की स्थापना की गई है (दिग्बन्ध)। यह चारों ओर एक ऐसा सुरक्षा घेरा (Aura) बना देता है जिसे कोई भी नकारात्मक शक्ति भेद नहीं सकती।

यह कवच न केवल रक्षात्मक है, बल्कि सुधारात्मक भी है। यह साधक की वाणी (Speech) को इतना प्रभावशाली बना देता है कि वह निरुत्तर हो जाता है ("वाचं मुखं तथा पदं षड्वर्णा परमेश्वरी")। जो भी साधक इसका नित्य पाठ करता है या इसे विधिपूर्वक धारण करता है, वह बृहस्पति के समान बुद्धिमान और कुबेर के समान धनवान हो जाता है।

पाठ के लाभ — फलश्रुति (Benefits)

इस कवच की फलश्रुति अत्यंत विस्तृत और चमत्कारी है:

  • शत्रु और युद्ध में विजय: "संग्रामे जयमाप्नोति" — युद्ध, वाद-विवाद, या मुकदमे में साधक की निश्चित जीत होती है। ब्रह्मास्त्र आदि शस्त्र भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकते।
  • पुत्र प्राप्ति: "अपुत्रो लभते पुत्रं" — नि:संतान दम्पतियों को वीर और शतायु पुत्र की प्राप्ति होती है।
  • अपार धन-सम्पदा: "निर्धनो धनमाप्नोति" — दरिद्रता का नाश होकर कुबेर और बृहस्पति के समान ऐश्वर्य प्राप्त होता है।
  • वाक सिद्धि: "गद्यपद्यमयी वाणी" — साधक की वाणी गंगा प्रवाह की तरह ओजस्वी और कवित्वमयी हो जाती है।

पाठ विधि एवं कवच धारण (Ritual Method)

कवच धारण विधि

  • लेखन: कवच को भूर्जपत्र (Bhojpatra) पर अष्टगंध से लिखकर धारण करना सर्वश्रेष्ठ बताया गया है (श्लोक ३१)।
  • धारण: पुरुष इसे दाहिनी भुजा (Right Arm) पर और स्त्रियां वाम भुजा (Left Arm) पर धारण करें।
  • प्रभाव: ऐसा करने से राजदरबार (सरकार/कोर्ट) में सम्मान मिलता है और राजा भी दास बन जाता है ("दासोऽस्ति तेषां नृपः")।

पाठ नियम

  • समय: रात्रिकालीन पाठ (विशेषकर मंगलवार या शनिवार) सर्वश्रेष्ठ है।
  • पुरश्चरण: इस कवच का पुरश्चरण ११०० (ग्यारह सौ) पाठ का है (श्लोक ३५)।
  • न्यास: पाठ से पूर्व विनियोग, करन्यास और हृदयादि न्यास अवश्य करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. क्या स्त्रियां यह कवच धारण कर सकती हैं?

जी हाँ। श्लोक ३१ और ३२ में स्पष्ट निर्देश है — "नारी वामभुजे तथा... नारी पुत्रवती भवेत्"। स्त्रियां इसे बायीं भुजा में धारण कर पुत्र और सौभाग्य प्राप्त कर सकती हैं।

2. 'ब्रह्मास्त्र विद्या' (Brahmastra Vidya) क्या है?

बगलामुखी साधना को ही 'ब्रह्मास्त्र विद्या' कहते हैं क्योंकि इसका वार कभी खाली नहीं जाता। यह कवच उसी ब्रह्मास्त्र विद्या का अंग है, जो साधक को अभेद्य सुरक्षा प्रदान करता है।

3. क्या इसे कागज पर लिखकर रख सकते हैं?

परंपरागत रूप से 'भूर्जपत्र' श्रेष्ठ है, लेकिन यदि वह उपलब्ध न हो तो पीले कागज पर अष्टगंध या केसर-चंदन की स्याही से लिखकर पूजा स्थल में या ताबीज में रख सकते हैं।

4. क्या बिना गुरु के कवच पाठ कर सकते हैं?

कवच का नित्य पाठ सुरक्षा के लिए किया जा सकता है। लेकिन तांत्रिक प्रयोग (जैसे शत्रु मारण आदि) या पूर्ण पुरश्चरण बिना गुरु के नहीं करना चाहिए। अंतिम श्लोक चेतावनी देता है — "इदं कवचमज्ञात्वा... सिद्धिर्न जायते"।