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Sri Bagala Pratyangira Kavacham – श्री बगला प्रत्यङ्गिरा कवचम्

Sri Bagala Pratyangira Kavacham – श्री बगला प्रत्यङ्गिरा कवचम्
॥ श्री बगला प्रत्यङ्गिरा कवचम् ॥ विनियोगः अस्य श्री बगला प्रत्यङ्गिरा मन्त्रस्य नारद ऋषिः, त्रिष्टुप् छन्दः, प्रत्यङ्गिरा देवता, ह्लीं बीजं, हूं शक्तिः, ह्रीं कीलकं, मम शत्रुनाशने विनियोगः ॥ मन्त्रः ॐ प्रत्यङ्गिरायै नमः । प्रत्यङ्गिरे सकल कामान् साधय मम रक्षां कुरु कुरु, सर्वान् शत्रून् खादय खादय, मारय मारय, घातय घातय, ॐ ह्रीं फट् स्वाहा ॥ कवचम् भ्रामिणी स्तम्भिनी देवी क्षोभिणी मोहिनी तथा । संहारिणी द्राविणी च जृम्भिणी रौद्ररूपिणी ॥ १ ॥ इत्यष्टौ शक्तयो देवि शत्रुपक्षे नियोजिताः । धारयेत् कण्ठदेशे च सर्वशत्रुविनाशिनी ॥ २ ॥ अष्ट शक्ति मन्त्रः ॐ ह्रीं भ्रामिणी मम शत्रून् भ्रामय भ्रामय ॐ ह्रीं स्वाहा । ॐ ह्रीं स्तम्भिनी मम शत्रून् स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्रीं स्वाहा । ॐ ह्रीं क्षोभिणी मम शत्रून् क्षोभय क्षोभय ॐ ह्रीं स्वाहा । ॐ ह्रीं मोहिनी मम शत्रून् मोहय मोहय ॐ ह्रीं स्वाहा । ॐ ह्रीं संहारिणी मम शत्रून् संहारय संहारय ॐ ह्रीं स्वाहा । ॐ ह्रीं द्राविणी मम शत्रून् द्रावय द्रावय ॐ ह्रीं स्वाहा । ॐ ह्रीं जृम्भिणी मम शत्रून् जृम्भय जृम्भय ॐ ह्रीं स्वाहा । ॐ ह्रीं रौद्री मम शत्रून् सन्तापय सन्तापय ॐ ह्रीं स्वाहा ॥ ३ ॥ फलश्रुतिः इयं विद्या महाविद्या सर्वशत्रुनिवारिणी । धारिता साधकेन्द्रेण सर्वान् दुष्टान् विनाशयेत् ॥ ४ ॥ त्रिसन्ध्यमेकसन्ध्यं वा यः पठेत् स्थिरमानसः । न तस्य दुर्लभं लोके कल्पवृक्ष इव स्थितः ॥ ५ ॥ यं यं स्पृशति हस्तेन यं यं पश्यति चक्षुषा । स एव दासतां याति सारात्सारामिमं मनुम् ॥ ६ ॥ ॥ इति श्रीरुद्रयामले शिवपार्वतिसंवादे श्री बगला प्रत्यङ्गिरा कवचम् सम्पूर्णम् ॥

श्री बगला प्रत्यङ्गिरा कवचम् - परिचय (Introduction)

श्री बगला प्रत्यङ्गिरा कवचम् (Sri Bagala Pratyangira Kavacham) शक्ति साधना के इतिहास में एक अत्यंत प्रभावशाली और दुर्लभ स्तोत्र है। यह पवित्र पाठ श्री रुद्रयामल तन्त्र (Sri Rudrayamala Tantra), जो कि भगवान शिव और माता पार्वती के बीच का संवाद है, से लिया गया है।

यह कवच दो महान शक्तियों का अद्वितीय संगम है:

  1. बगलामुखी (Bagalamukhi): जिनकी मुख्य शक्ति 'स्तम्भन' (Paralyzing) है, जो शत्रुओं की वाणी, गति और बुद्धि को रोक देती हैं।
  2. प्रत्यङ्गिरा (Pratyangira): जो 'उग्र कृत्य' की देवी हैं और शत्रुओं द्वारा भेजे गए किसी भी तांत्रिक वार को उलटकर (Reverse) उन्हीं पर वापस भेजने की क्षमता रखती हैं।

जब साधक चौतरफा संकटों से घिर जाए, अदालती मामलों में फंसा हो, या अज्ञात शत्रुओं का भय हो, तब यह कवच एक अजेय सुरक्षा घेरा प्रदान करता है। यह न केवल रक्षा करता है, बल्कि आक्रामक रूप से शत्रुओं की नकारात्मकता का दमन भी करता है।

आठ योगिनी शक्तियाँ (The 8 Yogini Shaktis)

इस कवच का सबसे महत्वपूर्ण भाग अष्ट शक्ति मंत्र है। इसमें ८ उग्र योगिनी शक्तियों को शत्रु पक्ष में नियुक्त (Deploy) किया जाता है। प्रत्येक शक्ति का अपना विशिष्ट कार्य है:

  • १. भ्रामिणी (Bhramini): यह शत्रुओं के मन को भ्रमित (Confuse) कर देती है, जिससे वे सही निर्णय नहीं ले पाते।
  • २. स्तम्भिनी (Stambhini): यह शत्रु की हर गतिविधि को जड़ (Freeze) कर देती है। उनकी वाणी मूक हो जाती है और हाथ-पैर शिथिल पड़ जाते हैं।
  • ३. क्षोभिणी (Kshobhini): यह शत्रु के भीतर घबराहट और उथल-पुथल (Agitation) पैदा करती है, जिससे उसका मनोबल टूट जाता है।
  • ४. मोहिनी (Mohini): यह शत्रु को सम्मोहित (Delude) करके उसे साधक के वश में या उसके अनुकूल कर देती है।
  • ५. संहारिणी (Samharini): यह शत्रुता और दुर्भावना का समूल नाश (Destroy) कर देती है।
  • ६. द्राविणी (Dravini): यह शत्रु के अहंकार और शक्ति को पिघला (Melt/Drive away) देती है, जिससे वह भागने पर विवश हो जाता है।
  • ७. जृम्भिणी (Jrimbhini): यह शत्रु को आलस्य और निद्रा में डाल देती है, जिससे वह कोई भी हानिकारक कार्य नहीं कर पाता।
  • ८. रौद्री (Raudri): यह शत्रुओं के लिए भयानक रूप धारण कर उन्हें संताप (Torment/Fear) देती है, जिससे वे साधक से दूर रहते हैं।

फलश्रुति - पाठ के लाभ (Benefits)

शास्त्रों के अनुसार, श्रद्धापूर्वक इस कवच का पाठ करने से निम्नलिखित लाभ प्राप्त होते हैं:
  • शत्रु नाश व विजय: "सर्वशत्रुनिवारिणी" - यह कवच सभी प्रकार के शत्रुओं का निवारण करता है और साधक को विजय दिलाता है।

  • अदालती सफलता: कोर्ट-कचहरी के मामलों में, जहाँ विपक्ष प्रबल हो, वहाँ 'स्तम्भिनी' और 'मोहिनी' शक्तियाँ विपक्ष को कमजोर कर साधक के पक्ष में निर्णय लाने में सहायक होती हैं।

  • काले जादू से मुक्ति: यह कवच 'कृत्या-नाशक' है। यदि किसी ने तंत्र प्रयोग, मूठ, या मारण प्रयोग किया हो, तो यह उसे काटकर वापस भेजने वाला (Reverser) है।

  • सर्वसिद्धि और कल्पवृक्ष: श्लोक ५ के अनुसार, जो व्यक्ति एकाग्र होकर इसका पाठ करता है, वह इस लोक में 'कल्पवृक्ष' के समान हो जाता है। उसके लिए कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं रहती।

  • वशीकरण शक्ति: श्लोक ६ में उल्लेख है कि साधक जिसे हाथ से छू ले या आँखों से देख ले, वह उसका दास (अनुकूल) हो जाता है ("स एव दासतां याति")।

पाठ विधि (Ritual Method)

इस शक्तिशाली कवच की साधना के लिए विशेष नियमों का पालन अपेक्षित है:
  1. शुभ समय: मंगलवार या शुक्रवार की रात्रि, अथवा अमावस्या की रात (निशीथ काल - मध्यरात्रि) इस पाठ के लिए सर्वश्रेष्ठ है।

  2. वस्त्र और आसन: स्नान के बाद पीले वस्त्र (बगलामुखी के लिए) या लाल वस्त्र (प्रत्यङ्गिरा के लिए) धारण करें। आसन का रंग भी वस्त्र के समान ही रखें।

  3. दिशा: पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करके बैठें।

  4. सामग्री: एक लकड़ी की चौकी पर पीला वस्त्र बिछाएं। उस पर माँ बगलामुखी और प्रत्यङ्गिरा (या माँ दुर्गा) का चित्र स्थापित करें। सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

  5. नैवेद्य: पीले फल (केला), बेसन के लड्डू, या गुड़ का भोग लगाएं।

  6. विनियोग: सर्वप्रथम हाथ में जल लेकर विनियोग मंत्र ("अस्य श्री...") पढ़ें और जल भूमि पर छोड़ दें।

  7. पाठ: शांत और स्थिर मन से कवच का पाठ करें। विशेषकर "अष्ट शक्ति मंत्र" वाले भाग में प्रत्येक पंक्ति को पूरी एकाग्रता से पढ़ें।

विशेष सावधानी: यह एक उग्र साधना है। इसका प्रयोग कभी भी अकारण किसी निर्दोष को सताने के लिए न करें। केवल आत्मरक्षा और न्याय प्राप्ति के लिए ही इसका सहारा लें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री बगला प्रत्यङ्गिरा कवचम् का मूल स्रोत क्या है?

यह कवच 'श्री रुद्रयामल तन्त्र' (Sri Rudrayamala Tantra) के अंतर्गत भगवान शिव और पार्वती के संवाद से लिया गया है। यह तन्त्र शास्त्र के अत्यंत गोपनीय और शक्तिशाली कवचमों में से एक है।

2. इस कवच में किन दो देवियों का आवाहन है?

इसमें 'बगलामुखी' (पीताम्बरा) और 'प्रत्यङ्गिरा' (अथर्वण भद्रकाली) की संयुक्त शक्तियों का आवाहन है। बगलामुखी शत्रुओं को मूक करती हैं, जबकि प्रत्यङ्गिरा शत्रुओं के द्वारा किए गए वार को उन्हीं पर लौटा देती हैं।

3. कवच में वर्णित आठ योगिनी शक्तियाँ कौन सी हैं?

८ योगिनी शक्तियाँ हैं: १. भ्रामिणी (भ्रमित करने वाली), २. स्तम्भिनी (रोकने वाली), ३. क्षोभिणी (उद्वेलित करने वाली), ४. मोहिनी (मोहित करने वाली), ५. संहारिणी (नाश करने वाली), ६. द्राविणी (पिघलाने वाली/भगाने वाली), ७. जृम्भिणी (जड़वत करने वाली), और ८. रौद्री (डराने वाली)।

4. इस कवच का पाठ करने का सर्वोत्तम समय क्या है?

रात्रि काल (विशेषकर निशीथ काल) या संध्या समय सर्वोत्तम है। मंगलवार, शुक्रवार और अमावस्या की तिथियाँ इस पाठ की सिद्धि के लिए विशेष शुभ मानी जाती हैं।

5. पाठ के लिए किस रंग के वस्त्र और आसन का प्रयोग करें?

चूंकि यह दो देवियों का संगम है, इसलिए 'पीला' (बगलामुखी के लिए) या 'लाल' (प्रत्यङ्गिरा के लिए) वस्त्र और आसन दोनों उपयुक्त हैं। शत्रु नाश के लिए लाल रंग अधिक प्रभावी माना गया है।

6. क्या यह कवच काले जादू (Black Magic) को काट सकता है?

जी हाँ, यह कवच विशेष रूप से 'अभिचार कर्म' (काले जादू) को काटने और उसे करने वाले के पास वापस भेजने (Reverse) की क्षमता रखता है।

7. क्या गृहस्थ व्यक्ति इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, गृहस्थ जन अपनी आत्मरक्षा और परिवार की सुरक्षा के लिए इसका पाठ कर सकते हैं। उन्हें सात्विक रहकर और केवल 'रक्षा' के भाव से पाठ करना चाहिए।

8. 'त्रिसन्ध्यम' पाठ का क्या अर्थ है?

'त्रिसन्ध्यम' का अर्थ है - प्रातः (सूर्योदय), मध्याह्न (दोपहर), और सायं (सूर्यास्त) - इन तीनों संधि कालों में पाठ करना। ऐसा करने वाले साधक के लिए तीनों लोकों में कुछ भी दुर्लभ नहीं रहती।

9. इस पाठ के दौरान कौन सी माला का प्रयोग करें?

हल्दी की माला (Bagalamukhi) या रुद्राक्ष की माला (Pratyangira) का प्रयोग किया जा सकता है। दोनों ही इस साधना के लिए सिद्ध मानी गई हैं।

10. क्या मुकदमे (Court Case) में जीत के लिए यह उपयोगी है?

अदालती मामलों में यह कवच अत्यंत चमत्कारी माना जाता है क्योंकि यह विरोधी पक्ष की बुद्धि को भ्रमित (भ्रामिणी) और उनकी गवाही को स्तंभित (स्तम्भिनी) कर देता है।