Sri Pitambara Ashtottara Shatanama Stotram – श्री पीताम्बरा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

श्री पीताम्बरा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् — परिचय एवं रहस्य (Introduction)
श्री पीताम्बरा अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् दश महाविद्याओं में अष्टम महाविद्या माँ बगलामुखी (जिन्हें पीताम्बरा भी कहा जाता है) का एक अत्यंत उग्र, गुप्त और शक्तिशाली तांत्रिक स्तोत्र है। यह दुर्लभ स्तोत्र 'श्रीउत्कट शम्बर नागेन्द्रप्रयाण तंत्र' के 'षोडश साहस्रग्रंथ' से उद्धृत है। इस स्तोत्र का प्राकट्य भगवान विष्णु और भगवान शिव के मध्य हुए एक दिव्य रहस्यमय संवाद के रूप में हुआ है।
स्तोत्र की पृष्ठभूमि: कथा के अनुसार, जब मधु और कैटभ नामक महाभयंकर दैत्यों ने सृष्टि में हाहाकार मचा रखा था और ब्रह्मा जी अत्यंत भयभीत थे, तब भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को माँ पीताम्बरा के इन 108 नामों (और सहस्रनाम के सार) का उपदेश दिया। श्लोक 28 में स्पष्ट वर्णित है कि ब्रह्मा जी ने इन नामों का पाठ किया, जिसके प्रभाव से उन महापराक्रमी दैत्यों की गति, शक्ति और बुद्धि सहसा स्तम्भित (Paralyzed) हो गई।
माँ का 'पीताम्बरा' स्वरूप: संस्कृत में 'पीत' का अर्थ है पीला और 'अम्बर' का अर्थ है वस्त्र या आकाश। देवी का संपूर्ण स्वरूप स्वर्ण के समान पीला (कनकप्रभा), पीले वस्त्र धारण करने वाली और पीले आभूषणों से सुसज्जित है। श्लोक 16 में उन्हें "सुवर्णमालासञ्जप्ताहरिद्रास्रक् निषेविता" (स्वर्णमाला और हल्दी की माला से सुशोभित) कहा गया है। यह पीला रंग ज्ञान, गुरुत्व, शोधन (purification) और आकर्षण का प्रतीक है।
ब्रह्मास्त्र विद्या: इस स्तोत्र को तंत्र शास्त्र में साक्षात 'ब्रह्मास्त्र विद्या' माना गया है ("परं ब्रह्मास्त्र विद्याया भुक्ति मुक्ति फलप्रदम्" - श्लोक 29)। जिस प्रकार ब्रह्मास्त्र का कोई काट नहीं होता, उसी प्रकार इस स्तोत्र के पाठ से शत्रु का प्रहार, तांत्रिक अभिचार, कोर्ट-कचहरी के विवाद और जीवन की असाध्य बाधाएं अचूक रूप से नष्ट हो जाती हैं। यह वाक् स्तम्भन (Speech Paralysis), गति स्तम्भन और बुद्धि स्तम्भन की सर्वोच्च साधना है।
विशिष्ट महत्व एवं स्तम्भन शक्ति (Significance & Stambhana Power)
माँ पीताम्बरा की उपासना का मुख्य उद्देश्य 'स्तम्भन' (Stambhana) है। इस स्तोत्र के 108 नामों में देवी के उसी उग्र और स्तम्भनकारी स्वरूप का वर्णन है। श्लोक 18-20 में देवी के अद्भुत कार्यों का वर्णन है:
- ✦"स्तम्भिनी परसैन्यानां" — यह विद्या शत्रुओं की विशाल सेना (या विरोधी गुटों) को स्तम्भित (निष्क्रिय) कर देती है।
- ✦"त्रासिनी सर्वदुष्टानां" — सभी प्रकार के दुष्टों और दुर्जन शक्तियों को त्रस्त और भयभीत कर देती है।
- ✦"आकर्षिणी नरेन्द्राणां" — राजाओं, अधिकारियों और शासकों का वशीकरण या आकर्षण करने वाली है।
- ✦"रोधिनी शस्त्रपाणिनाम्" — हाथों में शस्त्र लिए हुए शत्रुओं के प्रहार को रोक देती है।
यह केवल बाह्य शत्रुओं का ही नाश नहीं करती, बल्कि आंतरिक शत्रुओं (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर) का भी स्तम्भन कर साधक को 'जीवामुक्ति' की ओर ले जाती है (श्लोक 34)।
स्तोत्र के फलश्रुति लाभ (Benefits from Phala Shruti)
भगवान शिव ने श्लोक 29 से 52 तक इस स्तोत्र की अत्यंत विस्तृत फलश्रुति का वर्णन किया है। यह फलश्रुति इस बात का प्रमाण है कि यह पाठ लौकिक और अलौकिक दोनों प्रकार के फलों को देने में सर्वथा सक्षम है:
- ✦पाप नाश एवं सिद्धि प्राप्ति: (श्लोक 33-34) एक बार पाठ करने से सभी पापों का क्षय होता है। दो बार पाठ करने से साधक गणेश के समान सिद्ध हो जाता है, और तीन बार पाठ करने से समस्त सिद्धियां हस्तगत हो जाती हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।
- ✦मनोवांछित फल की प्राप्ति: (श्लोक 35) मोक्ष की इच्छा रखने वाले को मोक्ष, धन की इच्छा वाले को अपार धन, विद्या चाहने वाले को ज्ञान और वशीकरण चाहने वाले को सम्पूर्ण जगत वशीभूत हो जाता है।
- ✦असाध्य का साधन: (श्लोक 43-46) इसके प्रभाव से राजा (प्रशासन) वश में हो जाते हैं, भयंकर अग्नि शीतल हो जाती है, प्रचंड वायु शांत हो जाती है, और उफनता हुआ समुद्र सूख जाता है। यह अतिशयोक्ति नहीं, बल्कि इस 'ब्रह्मास्त्र विद्या' की शक्ति का प्रतीकात्मक वर्णन है कि यह असंभव को संभव कर देती है।
- ✦वाक् एवं गति स्तम्भन: (श्लोक 45) "स्तम्भयेद्विषतां वाचं गतिं शस्त्रं पराक्रमम्" — यह शत्रुओं की वाणी (बोलने की क्षमता), गति, अस्त्र-शस्त्र और उनके पराक्रम को जड़वत कर देता है। वाद-विवाद, कोर्ट-कचहरी और मुकदमों में विजय के लिए यह सबसे बड़ा प्रमाण है।
- ✦ब्रह्महत्या दोष निवारण: (श्लोक 51) इसके जप मात्र से ब्रह्महत्या जैसे महाघोर पाप भी नष्ट हो जाते हैं और साधक को जन्म-मरण के चक्र (मातृ गर्भ) से मुक्ति मिल जाती है।
पाठ विधि एवं तांत्रिक रहस्य (Ritual Method & Secret Practices)
यह एक अत्यंत उग्र और तांत्रिक स्तोत्र है, अतः इसके पठन-पाठन में कुछ विशिष्ट नियमों का कड़ाई से पालन करना चाहिए। फलश्रुति के श्लोक 48-50 में इसके तांत्रिक विधान का स्पष्ट उल्लेख है।
साधना के नियम एवं विधि
- पाठ का समय: (श्लोक 48) "निशीथकाले प्रजपेदेकाकी स्थिर मानसः" — इस स्तोत्र का पाठ मध्यरात्रि (निशीथ काल) में एकांत में बैठकर स्थिर मन से करना चाहिए। सामान्य पूजा के लिए इसे प्रातः, मध्याह्न और संध्या के समय (त्रिकाल) भी पढ़ा जा सकता है (श्लोक 32)।
- वेशभूषा एवं आसन: (श्लोक 38, 49) "पीताम्बरधरः स्वयम्" — साधक को स्वयं पीले वस्त्र धारण करने चाहिए। पीला आसन (कुश या ऊनी) बिछाएं, माथे पर हल्दी या केसर (पीत गंध) का लेप लगाएं।
- माँ का ध्यान: देवी का ध्यान करें कि उन्होंने पीले वस्त्र पहने हैं, पीले आभूषणों से सुसज्जित हैं, एक हाथ में मुदगर (गदा) है और दूसरे हाथ से शत्रु की जीभ पकड़ी हुई है।
- वामाचार प्रयोग: (श्लोक 50) तंत्र के वामाचार मार्ग में "संस्थाप्य वामभागेतु शक्तिं स्वामि परायणाम्" अर्थात् अपनी पतिव्रता शक्ति (पत्नी/भैरवी) को वाम भाग में स्थापित करके साधना करने से साधक जो भी मन में सोचता है, वह तत्काल सिद्ध हो जाता है। (यह प्रयोग बिना गुरु आज्ञा के वर्जित है)।
- परम गोपन: (श्लोक 38) "गोपनीयं प्रयत्नेन जननीजारवत्प्रिये" — भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं कि इस स्तोत्र को समाज से अत्यंत गुप्त रखना चाहिए। तंत्र में गोपन (secrecy) ही सिद्धि की कुंजी है।
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)