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श्री मातङ्गी स्तोत्रम् (शंकराचार्य प्रणीत)

Sri Matangi Stotram (Shankaracharya Pranitam)

श्री मातङ्गी स्तोत्रम् (शंकराचार्य प्रणीत)
ॐकारपञ्जरशुकीमुपनिषदुद्यान केलिकल कण्ठीम् । आगमविपिनमयूरीमार्यामन्तर्विभावये गौरीम् ॥ १॥ दयमान दीर्घनयनां देशिकरूपेण दर्शिताभ्युदयाम् । वामकुचनिहितवीणां वरदां सङ्गीतमातृकां वन्दे ॥ २॥ श्यामालिमसौकुमार्यामानन्दानन्द सम्पदुन्मेषाम् । तरुणिम करुणापूरां मदजलकल्लोल लोचनां वन्दे ॥ ३॥ सरिगमपधनि सतां तां वीणा सङ्क्रान्त कान्तहस्तान्ताम् । क्षां तां मृदुलस्वान्तां कुचभरितान्तां नमामिशिवकान्ताम् ॥ ४॥ अवरतरघटित चूलीपाली ताली पलास ताटङ्काम् । वीणावादनवेला, कम्पतिशिरसं नमामि मातङ्गीम् ॥ ५॥ मातङ्गीं नौमि सिद्धमातङ्गीं यौवनवन- सारङ्गीं सङ्गीताम्भोरुहानुभवभृङ्गीम् ॥ ६॥ मेचकमासे चनकं मिष्टमादृष्टान्त मध्यभागान्ताम् । यः पठति लिखति वैनां सभवेद्भवेश्वरः साक्षात् ॥ ७॥ ॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्यप्रणीतं मातङ्गीस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

श्री मातङ्गी स्तोत्रम् (शंकराचार्य प्रणीत) — एक विस्तृत परिचय (Introduction)

दश महाविद्याओं में नवम स्वरूप भगवती मातङ्गी ज्ञान, संगीत, कला व वाक् (वाणी) की सर्वोच्च अधिष्ठात्री मानी जाती हैं। श्री मातङ्गी स्तोत्रम्, जिसकी रचना स्वयं आदि शंकराचार्य जी ने की है, माँ मातङ्गी का एक अत्यंत दुर्लभ, रसात्मक और शक्तिशाली स्तोत्र है। मात्र 7 श्लोकों में निबद्ध यह स्तोत्र अपनी संक्षिप्तता के बाद भी प्रभाव में अचूक और विशाल है।

शंकराचार्य जी ने इस स्तोत्र में देवी को प्रत्यक्षतः 'संगीत-मातृका' और वेदों-उपनिषदों की मूल चेतना के रूप में दर्शाया है। इसमें माँ के उस स्वरूप की स्तुति की गई है जिसमें वे वीणा-वादन में लीन हैं। यह स्तोत्र न केवल देवी की महिमा का बखान करता है, बल्कि यह सप्त-स्वरों (सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि) और समस्त काव्यात्मक अलंकारों को देवी के ही साक्षात् विग्रह के रूप में मान्यता देता है।

स्तोत्र में वर्णित माता का अद्भुत व काव्यात्मक स्वरूप (Divine Form in the Stotram)

आदि शंकराचार्य ने अपने इस स्तोत्र की शुरुआत अत्यंत गूढ़ रूपकों (Metaphors) से की है। वे कहते हैं: "ॐकारपञ्जरशुकीमुपनिषदुद्यान..." अर्थात् देवी उस 'ॐ' (प्रणव) रूपी पिंजरे में निवास करने वाली तोती (Shuki - Female Parrot) हैं, वे उपनिषदों रूपी उद्यान (बगीचे) में मधुर गान करने वाली कोयल हैं, और समस्त आगम-निगम (तंत्र और वेद) रूपी वन में विचरण करने वाली मयूरी (मोरनी) हैं। इस प्रकार वेदों, तंत्रों और आदि-नाद ॐ को ही देवी का निवास-स्थान और स्वरूप बताया गया है।

चतुर्थ श्लोक "सरिगमपधनि सतां तां वीणा..." में देवी को साक्षात 'सप्त-स्वर' मयी कहा गया है। उनके कोमल हाथों में सुशोभित वीणा से ही ब्रह्मांड का सकल नाद और संगीत निस्सृत होता है। जब माता वीणा बजाती हैं तो संगीत में निमग्न होकर उनका मस्तक आनंद से झूमने लगता है ("वीणावादनवेला, कम्पतिशिरसं")। यह वात्सल्य और कला का एक अत्यंत सजीव व सुंदर वर्णन है। सम्पूर्ण स्तोत्र में देवी को 'सङ्गीतमातृका' (संगीत की आदि-माता) कहकर पुकारा गया है।

विद्यार्थियों और कलाकारों के लिए वरदान (A Boon for Students & Artists)

माँ मातङ्गी (श्यामला) मूलतः 'तांत्रिक सरस्वती' हैं। जहाँ माता सरस्वती का वर्ण श्वेत है, वहीं मातङ्गी श्याम वर्ण की हैं, परन्तु दोनों का मूल तत्त्व 'विद्या' और 'वाक्' ही है। आदि शंकराचार्य का यह स्तोत्र ज्ञान-पिपासुओं के लिए एक सिद्धि-कुंजी है।

  • संगीत साधकों के लिए: जो गायक, वादक या संगीतकार नित्य इस स्तोत्र का पाठ करते हैं, उनके कण्ठ (गले) और उंगलियों में स्वयं देवी मातङ्गी का अवतरण होता है। उनका संगीत अत्यंत मधुर और सम्मोहक हो जाता है।
  • वक्ताओं और लेखकों के लिए (वाक्-सिद्धि): इसके नित्य गान से वाणी में ओज और आकर्षण पैदा होता है। व्यक्ति की वाक्-शक्ति अचूक (जो कहे वह सत्य हो जाना) और प्रभावशाली हो जाती है।
  • विद्यार्थियों के लिए: स्मरण शक्ति की वृद्धि, पढ़ाई में एकाग्रता और जटिल से जटिल विषयों को सरलता से समझने की क्षमता इस स्तोत्र के प्रभाव से जागृत हो जाती है।

स्तोत्र पाठ के अद्भुत लाभ एवं फलश्रुति (Significance & Miraculous Benefits)

यह केवल एक भक्ति-प्रधान स्तुति नहीं, अपितु एक सिद्ध प्रार्थना है। इस 7 श्लोकी स्तोत्र के अंत में ही इसकी फलश्रुति (सातवें श्लोक में) स्पष्ट बता दी गई है। जो साधक श्रद्धा और अगाध विश्वास के साथ इसका नियमपूर्वक पाठ करता है, उसे जीवन में निम्न सिद्धियाँ प्राप्त होती हैं:

  • सर्वाभीष्ट की प्राप्ति (All desires fulfilled): सातवें श्लोक में स्वयं शंकराचार्य जी लिखते हैं— "यः पठति लिखति वैनां सभवेद्भवेश्वरः साक्षात्"। अर्थात् जो इस स्तोत्र को मन लगाकर पढ़ता है या लिखता है, वह साक्षात् भगवान शिव के समान ऐश्वर्यशाली और सामर्थ्यवान हो जाता है।
  • सम्मोहन शक्ति (Power of Attraction): देवी मातङ्गी सम्मोहन की भी देवी हैं। जो इस स्तोत्र को जपता है, उसका व्यक्तित्व (Aura) चुंबकीय हो जाता है। सभा में खड़े होने पर सभी लोग उसकी बातें सुनने को विवश हो जाते हैं।
  • मानसिक रोगों और वाणी दोषों का निवारण: तुतलाना, हकलाना या बोलते समय आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याएं इसके नियमित सस्वर वाचन से कुछ ही महीनों में नष्ट हो जाती हैं।
  • शांति और ब्रह्मानंद की प्राप्ति: देवी 'आनंद' स्वरूप हैं। जब साधक इस स्तोत्र द्वारा वीणा-वादिनी देवी का ध्यान करता है, तो उसके भीतर के समस्त क्लेश और अवसाद मिटकर अवर्णनीय शांति छा जाती है।

पाठ विधि और ध्यान नियम (Sadhana Method & Essential Rules)

आदि शंकराचार्य के स्तोत्र पूर्ण रूपेण सात्विक भाव वाले होते हैं, अतः इनका पाठ करने के लिए किसी जटिल तांत्रिक कर्मकांड की आवश्यकता नहीं है। सामान्य भक्त और साधक निम्नलिखित विधि से इसका पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकते हैं:

समय, दिशा और आसन

  • सर्वोत्तम समय: ब्राह्ममुहूर्त (सुबह 4 से 6 बजे के बीच) इस स्तोत्र को सिद्ध करने और वाक्-सिद्धि प्राप्त करने का सबसे शुभ समय है। शाम के समय सन्ध्या-वंदन के दौरान भी इसे पढ़ा जा सकता है।
  • दिशा: ज्ञान और वाक् सिद्धि के लिए पूर्व दिशा (East) की ओर मुख करना सर्वोत्तम है।
  • आसन: पूजा के लिए शुद्ध ऊनी या कुशा के आसन का प्रयोग करें। रंग के अनुसार सफेद या लाल आसन सबसे अनुकूल है।

पाठ का विधान (Procedure)

  • स्नान आदि से निवृत्त होकर, स्वच्छ वस्त्र (सफेद रंग अति उत्तम है) धारण करें।
  • माँ मातङ्गी (या माँ सरस्वती) के चित्र के सम्मुख एक शुद्ध घी का दीपक प्रज्वलित करें।
  • माता को कोई भी सात्विक भोग (जैसे मिश्री, पताशे, या पंचामृत) और लाल रंग के पुष्प अर्पित करें। माता को लाल गुंजा के फूल अत्यंत प्रिय हैं।
  • इसके बाद सम्पूर्ण एकाग्रता और स्पष्ट उच्चारण के साथ इन 7 श्लोकों का कम से कम एक पाठ (क्षमतानुसार 3, 11 या 21 पाठ) करें। पाठ सस्वर (अर्थात थोड़ा गाते हुए) करें, क्योंकि देवी मातङ्गी संगीत-प्रेमी हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. आदि शंकराचार्य प्रणीत श्री मातङ्गी स्तोत्रम् क्या है?

यह आदि शंकराचार्य द्वारा रचित माँ मातङ्गी (नवम महाविद्या) की एक प्रसिद्ध और सिद्ध स्तुति है। इसमें केवल 7 श्लोकों में देवी के संगीत-प्रेमी और मंगलकारी स्वरूप का वंदन किया गया है।

2. इस स्तोत्र के पाठ से क्या मुख्य लाभ होते हैं?

इस स्तोत्र के पाठ से साधक को मुख्य रूप से वाक्-सिद्धि, ज्ञान, और कलाओं (विशेषकर संगीत) में अप्रतिम निपुणता प्राप्त होती है। यह वाणी दोष दूर करने और सभा-सम्मोहन में अचूक है।

3. इस स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?

इस स्तोत्र में मात्र 7 श्लोक हैं, जो इसे अत्यंत संक्षिप्त और प्रतिदिन पाठ करने के लिए अत्यंत सुलभ बनाते हैं। सातवाँ श्लोक इसका फलश्रुति (महिमा) है।

4. माँ मातङ्गी कौन हैं?

माँ मातङ्गी दश महाविद्याओं में 9वें स्थान पर प्रतिष्ठित हैं। इन्हें तांत्रिक सरस्वती भी कहा जाता है और ये सम्मोहन, राजसत्ता, कला, संगीत और बुद्धि की आदि-अधिष्ठात्री हैं।

5. स्तोत्र में 'स-रि-ग-म-प-ध-नि' का उल्लेख क्यों है?

श्लोक 4 में सप्त-स्वरों (सरिगमपधनि) का उल्लेख है क्योंकि माँ मातङ्गी संगीत और नाद की मूल देवी हैं। उनकी वीणा से ही ब्रह्मांड के समस्त स्वर और संगीत प्रस्फुटित होते हैं।

6. यह पाठ विद्यार्थियों के लिए कैसे लाभकारी है?

यह विद्या और वाक् (वाणी) की देवी का स्तोत्र है। अतः इसके जपने से विद्यार्थियों की स्मरण शक्ति बढ़ती है, वाणी में ओज आता है, एकाग्रता बढ़ती है और ज्ञान अर्जन में आने वाली हर बाधा दूर होती है।

7. इस स्तोत्र का पाठ किस समय करना चाहिए?

इस स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त) उठने के बाद या सन्ध्या वेला (गोधूलि) में करना सर्वोत्तम है। इसे दैनिक पूजा-अर्चना के समय आसानी से पढ़ा जा सकता है।

8. क्या इसके पाठ के लिए किसी विशेष दीक्षा लेना आवश्यक है?

चूँकि यह आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित एक विशुद्ध सात्विक और भक्ति-प्रधान स्तोत्र है, अतः इसके सामान्य गान/पाठ के लिए किसी विशेष तांत्रिक दीक्षा की आवश्यकता नहीं है। इसे कोई भी भक्त पढ़ सकता है।

9. स्तोत्र पाठ के समय किस दिशा की ओर मुख करें?

ज्ञान और विद्या प्राप्ति की साधना के लिए पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर मुख करके पाठ करना शास्त्र-सम्मत और अत्यंत शुभ माना गया है।

10. क्या हम इस स्तोत्र का पाठ देवी सरस्वती के सामने कर सकते हैं?

जी हाँ, बिल्कुल। मातङ्गी माता सरस्वती का ही तांत्रिक स्वरूप हैं। अतः यदि आपके पास मातङ्गी देवी का चित्र न हो, तो आप माँ सरस्वती का ध्यान करके भी यह पाठ कर सकते हैं, फल सामान ही मिलेगा।