उमासहाचार्य विरचितं श्री मातङ्गी स्तोत्रम्
Uma Sahacharya Virachitam Sri Matangi Stotram

स्तोत्र का महत्त्व और पृष्ठभूमि (Significance & Background)
शुक-श्यामला (Shuka Shyamala):
देवी का ध्यान श्लोक 1 में ही बता दिया गया है — "शुक-श्यामलाम्"। देवी श्यामवर्ण (हरे-नीले आभा युक्त) हैं और उनके पास सदैव एक शुक (तोता) रहता है। 'शुक' रटन्त (निरंतर जप) और स्पष्ट वाणी का प्रतीक है। इसलिए मातङ्गी को 'वाक्-सिद्धि' (Speech Perfection) की अधिष्ठात्री माना गया है।
महाविभूति (Supreme Miracles):
श्लोक 90 (गेहं नाकति गर्वितः...) इस स्तोत्र का सबसे आश्चर्यजनक वचन है। जो भक्त मातङ्गी का नित्य स्मरण करता है, उसका घर 'नाक' (स्वर्ग) बन जाता है, मृत्यु उसके लिए केवल एक वैद्य (उपचारक) के समान होती है, वज्र पुष्प बन जाता है, सर्प कमलनाल हो जाता है, विष (हालाहल) भोजन बन जाता है और शत्रु भी मित्र के समान हो जाते हैं।
असंभव को संभव:
श्लोक 43 कहता है: "मूक (गूंगा) व्यक्ति श्रेष्ठ वक्ता बन जाता है, जड (मूर्ख) भी सर्वज्ञ हो जाता है।" यह माँ मातङ्गी की बौद्धिक और सांगीतिक कृपा का चरम वाक्य है।
यन्त्र एवं पूजन निर्देश (Mandala & Yantra Worship)
श्लोक 22 से 25 तक रत्नद्वीप (Manidweepa) और देवी के यन्त्र (Yantra) का वर्णन है:
"अमृतोदधिमध्येऽत्र रत्नद्वीपे मनोरमे... त्रिकोणकर्णिकामध्ये तद्बहिः पञ्चपत्रकम्... अष्टपत्रं... चतुःपत्रं..."
साधक को यह भावना करनी चाहिए कि अमृत के सागर में एक रत्नद्वीप है जहाँ कल्पवृक्षों का वन है। उसके मध्य में एक रत्नजटित सिंहासन है। उस सिंहासन पर देवी का यन्त्र स्थापित है — जो भीतर से बाहर की ओर त्रिकोण (Triangle), पञ्चदल (5 Petals), अष्टदल (8 Petals), चतुर्दल (4 petals) और अंत में भूपुर (चतुरस्र / 4 corners) से घिरा है।
श्लोक 91-94 में देवी से प्रार्थना की गई है कि वे साधक के द्वारा रचित यन्त्र में, उसके नेत्रों में, उसके मुख में और उसके चित्त (हृदय) में निवास करें। जब देवी साधक के मुख (वक्त्र) में आ जाती हैं, तब वह 'वागीश्वर' (ब्रह्म के समान ज्ञानी वक्ता) बन जाता है।
पाठ के नियम (Rules for Chanting)
- समय: इस 95 श्लोकों के बृहद् स्तोत्र का पाठ महानिशा काल (रात 10 बजे से 2 बजे के मध्य) तंत्र साधना की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ माना गया है। सामान्य जन सूर्यास्त के बाद या ब्रह्म मुहूर्त में इसे पढ़ सकते हैं।
- आसन और संकल्प: स्तोत्र के पाठ से पूर्व लाल या हरे रंग का आसन लें। मन में स्पष्ट कामना (यथा विद्या प्राप्ति, वाक् सिद्धि या शत्रु शमन) का संकल्प करें।
- भाव-शुद्धि: यद्यपि इसमें वामाचार के संकेत हैं, किन्तु गृहस्थ को सात्विक भाव (भक्त-माता संबंध) से ही देवी आराधन करना चाहिए। श्लोक 44 में देवी को 'जगन्मयी निरञ्जना नित्यशुद्धपद' कहा गया है।
- दीक्षा: 'उमासहाचार्य' जैसे तांत्रिकों की रचना को सकाम सिद्धि के लिए पढ़ने हेतु गुरु-परंपरा से प्राप्त दीक्षा का होना अत्यधिक अनुकूल रहता है।