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श्री मातङ्गी स्तोत्र पुष्पाञ्जलिः

Sri Matangi Stotra Pushpanjali

श्री मातङ्गी स्तोत्र पुष्पाञ्जलिः
॥ श्रीमातङ्गीस्तोत्रपुष्पाञ्जलिः ॥ अस्ति नानाविधंशस्तं वस्तुनावैणिकेन वः । अमृताम्बुनिधेर्मध्ये माणिक्य द्वीपमाश्रये ॥ १॥ सुधातरङ्ग सञ्चारिमारुतस्पर्श शीतलम् । कल्पद्रुमकदम्बालि पारिजातपटीरकैः ॥ २॥ निवडीकृतमुद्यानं निषेवेनिर्भरोत्सवम् । तदलसलतोन्मीलत्कुसुमामोद मेदुरम् ॥ ३॥ जागर्ति मानसे मत्केतरुणं नीपकाननम् । तस्यान्तरालतरलामुक्तमुक्तालताततेः ॥ ४॥ ज्योतिर्मयमहन्नौमिमहितं रत्नमण्डपम् । सरस्वत्या च लक्ष्म्या च पूर्वादिद्वारभूमिषु ॥ ५॥ शङ्खपद्मनिधिभ्यां च सतताध्युषि संस्तुवे । इन्द्रादीन्लोकपालान् च सायुधान् सपरिच्छदान् ॥ ६॥ मण्डपस्यबहिर्भागेऽप्यष्टदिक्षु क्रमस्थितान् । अथध्यायामि रत्नार्चिरयत्नाकॢप्तदीपिकाम् ॥ ७॥ हरिचन्दन संलिप्तां हारिणीं मणिदीपिकाम् । तत्रत्रिकोण पञ्चाराष्टारषोडशपत्रकैः ॥ ८॥ अष्टाष्टधारवेदास्त्रैश्चिन्मयं वक्त्र मीमहे । तस्यमध्ये कृतानासाम साधारण वैभवाम् ॥ ९॥ इन्दुरेखावतीमेणी लोचनां वेणिशालिनीम् । हासांशूल्लासनासीर नासाभरण मौक्तिकाम् ॥ १०॥ मदरक्तकपोलश्री मग्नमाणिक्य दर्पणाम् । आनन्दहारिणीं तालिदलताटङ्कधारिणीम् ॥ ११॥ उच्चपीनकुचामच्छहारां तुच्छवलग्नकाम् । सुकुमारभुजावल्ली वेल्लत्कङ्कणरिङ्खणाम् ॥ १२॥ वामस्तनमुखन्यस्त वीणावादविनोदिनीम् । वलिनाभिनभोभूत काञ्ची हारिप्रभां शुभाम् ॥ १३॥ न्यस्तैकचरणां पद्मे सलीलासालसाननाम् । अनर्ध्यलावण्यवतीं मादिनीं वर्ण मातृकाम् ॥ १४॥ अनङ्ग शक्तिजीवातु तद्विक्षेप हराङ्गनाम् । त्र्यस्रेरतिं प्रीतिमपि प्रणमामि मनोभवाम् ॥ १५॥ द्रावणंरोषणञ्चैव बन्धनं मोहनं तथा । अस्त्रमुन्मादनाख्यं च पञ्चमं पातु मे हृदि ॥ १६॥ कामराजं च कन्दर्पं मन्मथं मकरध्वजम् । मनोभवं च पञ्चार कोणाग्रावस्थितं स्तुमः ॥ १७॥ ब्राह्मीं माहेश्वरीं चैवकौमारीं वैष्णवीमपि । वाराहीमपि माहेन्द्रीं च चामुण्डां चण्डिकां नुमः ॥ १८॥ लक्ष्मीः सरस्वतीचैव रतिः प्रीतिस्तथैव च । कीर्तिश्शान्तिच पुष्टिश्चतुष्टिरित्यष्टकं भजे ॥ १९॥ वामाज्येष्ठा च रौद्री च शान्तिः श्रद्धासरस्वती । क्रियाशक्तिश्च लक्ष्मीश्च सृष्टिश्चैवतु मोहिनी ॥ २०॥ तथापुर्णादिने चाश्वासिनीवाली तथैव च । विद्युन्मालिन्यथसुरा नन्दाद्या नागवद्धिका ॥ २१॥ इतिषोडश शक्तीनां मण्डलं मानयामहे । असिताङ्गो रुरुश्चण्ड क्रोधनोन्मत्तभैरवाः ॥ २२॥ कपालीभीषणश्चैव संहारश्चेति पान्त्वमी । मातङ्गीं सिद्धलक्ष्मीं च महामातङ्गिकामपि ॥ २३॥ महतीं सिद्धलक्ष्मीं च तुर्यां च तदुपास्महे । गणनाथश्च दुर्गा च वटुकः क्षेत्रपोऽवतु ॥ २४॥ शक्तिरूपाणि चाङ्गानि मनसाङ्गी करोम्यहम् । हंसमूर्तिः स च परः प्रकाशानन्द देशिकः ॥ २५॥ पूर्णोनित्यश्चवरुणः पातु मां पञ्चदेशिकी । शिवेत्वांशेषकादेवि मातङ्गेश्वरि मानये ॥ २६॥ ईक्षे च मानसेमत्के क्षेत्रपालं कृपालयम् । शुकिनी शोकनिर्हन्त्री सवीणावेणि भासुरा ॥ २७॥ सुरार्चिता प्रसन्ना च संविद्भवति शाम्भवी ॥ २८॥ मदेनशोणा पदपाङ्गकोणा विभक्तवीणा निगमप्रवीणा । एणाङ्क चूडाकरुणाधुरीणा प्रीणातु वः पोषित पुष्पवाणा ॥ २९॥ संविन्मयंरुद्र वसन्नतोषिनः साधकीन्द्र भृङ्गकुलः । कमपुष्पाञ्जलि रेषमतां मातङ्गकन्यका याः ॥ ३०॥ ॥ इति श्रीमातङ्गीस्तोत्रपुष्पाञ्जलिः समाप्ता ॥

श्री मातङ्गी स्तोत्र पुष्पाञ्जलिः — एक विस्तृत परिचय (Introduction)

दश महाविद्याओं के पावन स्वरूपों में नवम स्थान पर विराजमान माँ मातङ्गी ज्ञान, कला, संगीत और वाक्-सिद्धि की सर्वोच्च अधिष्ठात्री देवी हैं। साधारण शब्दों में इन्हें 'तांत्रिक सरस्वती' के नाम से भी जाना जाता है। श्री मातङ्गी स्तोत्र पुष्पाञ्जलिः (Sri Matangi Stotra Pushpanjali) 30 श्लोकों का एक अत्यंत अद्भुत, कवित्वपूर्ण और मार्मिक प्रार्थना-स्तोत्र है। इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह केवल देवी की सामान्य स्तुति नहीं है, अपितु यह श्लोकों के माध्यम से देवी के चरणों में एक भाव-पुष्पाञ्जलि अर्पित करने की दिव्य प्रक्रिया है।

शास्त्रों के अनुसार, देवी को भौतिक पुष्प अर्पित करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, उससे करोड़ों गुना अधिक पुण्य उन्हें 'वाक् रूपी पुष्प' (श्लोकों) से पूजने पर मिलता है। इस पुष्पाञ्जलि में साधक अपनी वाणी और भावों को सुगंधित पुष्प बनाकर माता के श्रीचरणों में समर्पित करता है। जो भी साधक इस स्तोत्र का गान करता है, वह स्वतः ही माँ मातङ्गी के परम धाम 'मणिद्वीप' की मानसिक यात्रा पर निकल पड़ता है, जहाँ देवी अपने आनंदमयी स्वरूप में वीणा वादन करती हुई विराजित हैं।

स्तोत्र में वर्णित मणिद्वीप और देवी का दिव्य स्वरूप (Mani Dweepa & Divine Form)

इस स्तोत्र के आरम्भिक श्लोकों में (विशेषतः श्लोक 1 से 6 तक) अत्यंत मनमोहक शब्दों में मणिद्वीप (माणिक्य द्वीप) का जीवंत एकांगी चित्रण किया गया है। स्तोत्र बताता है कि सुधा (अमृत) के असीम सागर (अमृताम्बुनिधि) के ठीक मध्य में एक रत्नों का प्रकाशमान द्वीप है। उस माणिक्य द्वीप पर शीतल पवन मन्द-मन्द बहती है। वहाँ कल्पवृक्ष (मनोकामना पूर्ण करने वाले कल्पतरु), कदम्ब और पारिजात के वृक्षों का सघन वन (उद्यान) है, जहाँ खिले हुए दिव्य पुष्पों की अलौकिक सुगन्ध (कुसुमामोद) चारों ओर फैली रहती है।

उसी नीप-कानन (कदम्ब वन) में एक ज्योतिर्मय और महित रत्न-मण्डप (रत्नों का मंडप) है, जिसके भीतर देवी मातङ्गी विराजमान हैं। देवी का स्वरूप अत्यंत मनोहारी और मुग्धकारी है। उनके मस्तक पर अर्ध-चन्द्र (इन्दुरेखा) सुशोभित है, उनके नेत्र हिरणी के समान विशाल और भोले हैं (एणी लोचनां), और मुख मण्डल पर सदैव एक मधुर मुस्कान (हासांशूल्लास) विद्यमान रहती है। उनके वाम भाग (बाएं वक्षस्थल) पर वीणा रखी है जिसे वे अपने कोमल हाथों से बजा रही हैं और उसकी धुन में स्वयं भी आनंदित हैं («वामस्तनमुखन्यस्त वीणावादविनोदिनीम्»)।

आवरण देवताओं का मण्डल (The Complete Tantric Mandala)

इस स्तोत्र की यह भी एक विशिष्टता है कि यह अपने-आप में एक पूर्ण तांत्रिक मण्डल को प्रस्तुत करता है। स्तोत्र के भीतर ही देवी के रक्षक और आवरण देवताओं (द्वारपालों) का वर्णन है:

  • द्वार और दिशाओं के अधिपति: द्वार पर साक्षात सरस्वती और लक्ष्मी (शंख-पद्म निधियों के साथ) विराजमान हैं। इन्द्रादि अष्ट लोकपाल अपने अस्त्र-शस्त्र लेकर देवी की सुरक्षा में तत्पर हैं।
  • शक्तियाँ: अष्टमातृकाएँ (ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी आदि) और कीर्ति, शांति, पुष्टि जैसी शक्तियों का सुंदर उल्लेख है।
  • भैरव: असितांग, रुरु, चंड, क्रोधन, उन्मत्त, कपाली आदि अष्ट-भैरव जो क्षेत्र की रक्षा करते हैं।
यह स्तोत्र मात्र एक कविता या स्तुति नहीं है, बल्कि 'श्रीविद्या' और मातङ्गी साधना का एक सूक्ष्म सांगीतिक और मानसिक आवरण-पूजन है।

स्तोत्र पाठ के अद्भुत लाभ (Significance & Miraculous Benefits)

माँ मातङ्गी वाक्-सिद्धि (Power of Speech), सम्मोहन (Attraction), और समस्त कलाओं की देवी हैं। इस श्लोकात्मक पुष्पाञ्जलि के नित्य पाठ से साधक के जीवन में चमत्कारी और स्थायी परिवर्तन आते हैं:

  • वाक्-सिद्धि की त्वरित प्राप्ति: जो व्यक्ति इस स्तोत्र का स्पष्ट, शुद्ध उच्चारण के साथ सस्वर वाचन करता है, उसकी नाद-ग्रंथियां जाग्रत हो जाती हैं। उसकी वाणी में एक विशेष ओज, मिठास और आकर्षण आ जाता है। वह जो भी बोलता है, वह सत्य होने लगता है (वाक्-सिद्धि) और श्रोता उसकी बातों से मंत्रमुग्ध हो जाते हैं।
  • कला और संगीत में अप्रतिम निपुणता: देवी नित्य वीणा वादन करती हैं। अतः विद्यार्थियों, कलाकारों, गायकों, संगीतकारों और लेखकों के लिए यह पुष्पाञ्जलि साधना एक वरदान के समान है। इसके पाठ से सर्जनात्मकता (Creativity) और स्मरण शक्ति में भारी वृद्धि होती है।
  • शत्रु और बाधाओं का शमन: श्लोकों में कामदेव के पञ्च बाणों (द्रावण, शोषण, बन्धन, मोहन, और उन्मादन) का उल्लेख है। इसके प्रभाव से बाह्य और आंतरिक (क्रोध, मोह, ईर्ष्या आदि) शत्रुओं का स्तम्भन होता है और व्यक्ति बुरी नज़र या तांत्रिक नकारात्मकताओं से पूर्णतः सुरक्षित रहता है।
  • सुख-समृद्धि, भौतिक ऐश्वर्य और राजसम्मान: जहाँ विद्या (सरस्वती) और लक्ष्मी स्वयं देवी के द्वार पर खड़ी हों (वर्णित श्लोक 5), वहाँ किसी भी प्रकार की दरिद्रता का वास हो ही नहीं सकता। इस स्तोत्र के नियमित गान से भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार के धन की अनवरत प्राप्ति होती है।
  • मानसिक शांति और शोकों का नाश: इसमें वर्णित मणिद्वीप और वीणा-वादिनी माँ का ध्यान करने मात्र से मन के सारे तनाव, चिंताएं और क्लेश मिट जाते हैं। (श्लोक 27- «शुकिनी शोकनिर्हन्त्री» सिद्ध करता है कि देवी शोक का हनन करती हैं)।

पाठ विधि और ध्यान नियम (Sadhana Method & Essential Rules)

यद्यपि यह एक स्तोत्र है और इसका पाठ कोई भी व्यक्ति विशुद्ध भक्ति-भाव से कर सकता है, फिर भी शास्त्रोक्त तांत्रिक नियमों और 'पुष्पाञ्जलि' अर्पण के विशेष विधान का पालन करने से इसके फलों में कई गुना तीव्रता आ जाती है। पाठ करते समय निम्नलिखित बिंदुओं का ध्यान रखें:

समय, दिन और दिशा विचार

  • सर्वोत्तम समय: इस स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त) या सन्ध्याकाल (गोधूलि वेला) में करना सबसे अनुकूल माना जाता है, क्योंकि ये शांति के प्रहर हैं।
  • विशेष दिन: देवी साधना के लिए शुक्रवार का दिन सर्वश्रेष्ठ है। इसके अतिरिक्त शुक्ल पक्ष की तृतीया, अष्टमी, और नवमी तिथियों तथा गुप्त नवरात्रियों पर मातङ्गी वंदना और पुष्पाञ्जलि अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
  • दिशा: पाठ करते समय अपना मुख देव-स्थान या सदैव उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर रखें। यह ज्ञान, समृद्धि और आध्यात्मिक जाग्रति की दिशा है।

आसन, वस्त्र, माला और नैवेद्य

  • आसन और स्वच्छ वस्त्र: साधना के समय स्वच्छ श्वेत (सफेद) या लाल रंग के वस्त्र धारण करें। बैठने के लिए कुशा का आसन, या ऊनी कंबल (विशेषकर लाल रंग का) प्रयोग में लाएं।
  • पुष्प और नैवेद्य (भोग): देवी मातङ्गी को 30 श्लोकों के साथ 30 साक्षात् पुष्प (लाल या सफेद रंग के, विशेषकर चमेली या गुलाब) अर्पण यदि किया जाए, तो वह महा-पुष्पाञ्जलि बन जाता है। भोग के रूप में मीठा मिष्ठान, मिश्री, फलों का रस, या केले का भोग लगाना अत्यंत शुभ और सिद्धप्रद होता है।
  • हृदय की भावना (संकल्प): पाठ करने से पूर्व अपने मन में और जल हाथ में लेकर यह संकल्प लें कि "हे माँ मातङ्गी, मैं इन 30 श्लोकों के रूप में अपने भावों की पुष्पाञ्जलि आपके श्रीचरणों में अर्पित कर रहा हूँ, कृपया मुझ पर कृपा कर मुझे वाक्-सिद्धि, अक्षुण्ण शांति और कलाओं में निपुणता प्रदान करें।"

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. श्री मातङ्गी स्तोत्र पुष्पाञ्जलिः क्या है?

यह माँ मातङ्गी (दश महाविद्या में नवम शक्ति) को समर्पित एक अत्यंत सुंदर और दुर्लभ स्तोत्र है, जिसमें देवी को भौतिक पुष्पों के स्थान पर 30 श्लोक-रूपी पुष्पों की अंजलि (पुष्पाञ्जलि) अर्पित की गई है।

2. इस स्तोत्र में कुल कितने श्लोक हैं?

इस सम्पूर्ण स्तोत्र में कुल 30 श्लोक हैं। इनमें देवी के ध्यान, उनके मणिद्वीप निवास, अष्टमातृकाओं, अष्टभैरवों और देवी के संगीत-प्रेमी स्वरूप का विस्तृत गान किया गया है।

3. माँ मातङ्गी कौन हैं और महाविद्याओं में उनका क्या स्थान है?

माँ मातङ्गी दश महाविद्याओं में नवम (9वीं) महाविद्या हैं। उन्हें तांत्रिक परंपरा में 'तांत्रिक सरस्वती' भी कहा जाता है और वे वाक्, कला, संगीत और सर्वोच्च ज्ञान की आदि-देवी हैं।

4. इस पुष्पाञ्जलि स्तोत्र के पाठ का मुख्य लाभ क्या है?

माँ मातङ्गी वाक्-सिद्धि (Power of spoken words), संगीत, कला और ऐश्वर्य की अधिष्ठात्री हैं। इस नित्य पाठ से साधक को विद्या, कलाओं में अद्भुत निपुणता, सम्मोहन शक्ति और मानसिक शांति की प्राप्ति होती है।

5. स्तोत्र में वर्णित 'मणिद्वीप' या 'माणिक्य द्वीप' क्या है?

मणिद्वीप या माणिक्य द्वीप देवी भगवती का सर्वोच्च रहस्यमयी निवास स्थान है जो अमृत (सुधा) सागर के मध्य स्थित है। स्तोत्र के अनुसार, यहाँ कल्पवृक्ष, पारिजात और कदम्ब के वन हैं जहाँ माता विराजमान हैं।

6. क्या गृहस्थ (सामान्य लोग) इस स्तोत्र का पाठ कर सकते हैं?

जी हाँ, बिल्कुल। गृहस्थ साधक सुख, शांति, विद्या और ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए पूर्ण भक्तिभाव से यह पाठ कर सकते हैं। यह माता की एक अत्यंत सात्विक और काव्यात्मक प्रार्थना है जो हर प्रकार से शुभ फलदायी है।

7. पाठ के दौरान किस दिशा की ओर मुख करना चाहिए?

माँ मातङ्गी की साधना और पुष्पाञ्जलि पाठ के लिए उत्तर (North) या पूर्व (East) दिशा की ओर मुख करना सर्वोत्तम माना जाता है, क्योंकि यह दिशाएँ ज्ञान, आध्यात्मिक उन्नति और सिद्धि की मानी गई हैं।

8. यह पाठ दिन के किस समय करना अधिक फलदायी है?

इस स्तोत्र का पाठ प्रातःकाल (ब्रह्ममुहूर्त) अथवा सन्ध्याकाल में एकाग्र मन से करना उत्तम होता है। यदि समय न मिले तो दिन के किसी भी पवित्र समय इसे पढ़ा जा सकता है।

9. माता को पाठ के समय क्या भोग (प्रसाद) अर्पित करना चाहिए?

माँ मातङ्गी को मधुर और सात्विक भोग अत्यंत प्रिय है। आप पाठ के समय माता को बताशे, मिश्री, फलों का रस, केले या कोई भी स्वच्छ मिष्ठान (मिठाई) अर्पित कर सकते हैं।

10. क्या इसके पाठ के लिए किसी विशेष माला की आवश्यकता है?

स्तोत्र पाठ के लिए माला की अनिवार्यता नहीं होती, आप सीधे पुस्तक या स्तोत्र-पाठ से इसे पढ़ सकते हैं। यदि आप इसके साथ मातङ्गी के मंत्रों का भी जप करते हैं, तो स्फटिक या रुद्राक्ष की माला का उपयोग सर्वोत्तम है।