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Sri Mangala Gauri Stotram – श्री मङ्गलगौरी स्तोत्रम्

Sri Mangala Gauri Stotram – श्री मङ्गलगौरी स्तोत्रम्
॥ श्री मङ्गलगौरी स्तोत्रम् ॥ देवि त्वदीयचरणाम्बुजरेणु गौरीं भालस्थलीं वहति यः प्रणतिप्रवीणः । जन्मान्तरेऽपि रजनीकरचारुलेखा तां गौरयत्यतितरां किल तस्य पुंसः ॥ १ ॥ श्रीमङ्गले सकलमङ्गलजन्मभूमे श्रीमङ्गले सकलकल्मषतूलवह्ने । श्रीमङ्गले सकलदानवदर्पहन्त्रि श्रीमङ्गलेऽखिलमिदं परिपाहि विश्वम् ॥ २ ॥ विश्वेश्वरि त्वमसि विश्वजनस्य कर्त्री त्वं पालयित्र्यसि तथा प्रलयेऽपि हन्त्री । त्वन्नामकीर्तनसमुल्लसदच्छपुण्या स्रोतस्विनी हरति पातककूलवृक्षान् ॥ ३ ॥ मातर्भवानि भवती भवतीव्रदुःख- सम्भारहारिणि शरण्यमिहास्ति नान्या । धन्यास्त एव भुवनेषु त एव मान्या येषु स्फुरेत्तवशुभः करुणाकटाक्षः ॥ ४ ॥ ये त्वा स्मरन्ति सततं सहजप्रकाशां काशीपुरीस्थितिमतीं नतमोक्षलक्ष्मीम् । तां संस्मरेत्स्मरहरो धृतशुद्धबुद्धी- न्निर्वाणरक्षणविचक्षणपात्रभूतान् ॥ ५ ॥ मातस्तवाङ्घ्रियुगलं विमलं हृदिस्थं यस्यास्ति तस्य भुवनं सकलं करस्थम् । यो नामतेज एति मङ्गलगौरि नित्यं सिद्ध्यष्टकं न परिमुञ्चति तस्य गेहम् ॥ ६ ॥ त्वं देवि वेदजननी प्रणवस्वरूपा गायत्र्यसि त्वमसि वै द्विजकामधेनुः । त्वं व्याहृतित्रयमिहाऽखिलकर्मसिद्ध्यै स्वाहास्वधासि सुमनः पितृतृप्तिहेतुः ॥ ७ ॥ गौरि त्वमेव शशिमौलिनि वेधसि त्वं सावित्र्यसि त्वमसि चक्रिणि चारुलक्ष्मीः । काश्यां त्वमस्यमलरूपिणि मोक्षलक्ष्मीः त्वं मे शरण्यमिह मङ्गलगौरि मातः ॥ ८ ॥ स्तुत्वेति तां स्मरहरार्धशरीरशोभां श्रीमङ्गलाष्टक महास्तवनेन भानुः । देवीं च देवमसकृत्परितः प्रणम्य तूष्णीं बभूव सविता शिवयोः पुरस्तात् ॥ ९ ॥ ॥ इति श्रीस्कान्दपुराणे काशीखण्डे रविकृत श्रीमङ्गलगौरी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री मङ्गलगौरी स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)

श्री मङ्गलगौरी स्तोत्रम् माँ आदिशक्ति पार्वती के उस मंगलकारी स्वरूप की स्तुति है, जो सुहाग और दांपत्य सुख की रक्षक हैं। भारतीय संस्कृति में 'मंगला गौरी व्रत' का अत्यधिक महत्व है, जो विशेष रूप से श्रावण मास (Shravan Month) के प्रत्येक मंगलवार को किया जाता है।

पौराणिक महत्व: शास्त्रों के अनुसार, विवाह के बाद पहले पांच वर्षों तक नवविवाहित वधुओं को श्रावण के मंगलवार का व्रत करना अनिवार्य माना जाता है। यह व्रत पति की लंबी आयु (Longevity) और स्वास्थ्य की कामना के लिए किया जाता है। जिस प्रकार सावन के सोमवार भगवान शिव को समर्पित हैं, उसी प्रकार सावन के मंगलवार उनकी शक्ति, माँ गौरी को समर्पित हैं। यह शिव-शक्ति के संतुलन और गृहस्थ जीवन में सामंजस्य का प्रतीक है।

धर्मपाल की कथा: प्राचीन काल में धर्मपाल नामक एक धनी व्यापारी था, जिसकी पत्नी सुंदर और गुणवान थी, परंतु उन्हें कोई संतान नहीं थी। बहुत पुण्य कार्यों के बाद उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई, लेकिन ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि वह 'अल्पायु' (Short-lived) होगा और 16वें वर्ष में सर्पदंश से उसकी मृत्यु हो जाएगी। संयोगवश, उसका विवाह एक ऐसी कन्या से हुआ, जिसकी माता ने मंगला गौरी का व्रत किया था और उसे आशीर्वाद मिला था कि उसकी पुत्री कभी विधवा नहीं होगी। उस कन्या के अखंड सौभाग्य के पुण्य प्रताप से धर्मपाल के पुत्र का 'मृत्यु योग' टल गया।

यह स्तोत्र स्कन्द पुराण के काशी खंड (Kashi Khanda) से लिया गया है और इसे स्वयं भगवान सूर्य (Ravi/Sun God) ने गाया है (श्लोक 9)। इसमें देवी को "सकलमङ्गलजन्मभूमे" (समस्त मंगलों की जन्मभूमि) और "सकलदानवदर्पहन्त्रि" (दानवों के अहंकार का नाश करने वाली) कहा गया है।

विशिष्ट महत्व (Significance)

  • अखंड सौभाग्य: यह स्तोत्र विशेष रूप से 'वैधव्य दोष' (Widowhood curse) को काटने वाला है। श्लोक 1 में कहा गया है कि जो देवी के चरणों की धूल को माथे पर लगाता है, उसका भाग्य चंद्रमा की तरह चमक उठता है।

  • क्लेश निवारण: जिन घरों में पति-पत्नी के बीच झगड़े (Conflicts) होते हैं, वहाँ इस स्तोत्र का पाठ शांति लाता है। देवी को "सकलकल्मषतूलवह्ने" (सारे पापों और कलह को रुई की तरह जलाने वाली अग्नि) कहा गया है।

  • संतान सुख: मंगला गौरी वात्सल्य की भी देवी हैं। निःसंतान दंपत्ति यदि व्रत के साथ इस स्तोत्र का पाठ करें, तो उन्हें गुणवान संतान प्राप्त होती है।

पाठ के लाभ (Benefits)

श्री मङ्गलगौरी स्तोत्र के पाठ से जीवन में मंगल ही मंगल होता है:

  • शीघ्र विवाह (Early Marriage): कुंवारी कन्याएं यदि श्रावण में यह व्रत रखें और स्तोत्र पढ़ें, तो उन्हें शिव जैसा योग्य वर मिलता है और विवाह में आ रही बाधाएं दूर होती हैं।

  • पति की रक्षा: यह कवच की तरह पति के प्राणों की रक्षा करता है। दुर्घटनाओं और अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है।

  • अष्ट सिद्धि: श्लोक 6 में कहा गया है—"सिद्ध्यष्टकं न परिमुञ्चति तस्य गेहम्" (आठों सिद्धियाँ उस घर को कभी नहीं छोड़तीं, जहाँ यह पाठ होता है)। अर्थात्, भौतिक सुख-सुविधाओं की कभी कमी नहीं रहती।

  • मोक्ष प्राप्ति: श्लोक 8 में देवी को "मोक्षलक्ष्मी" कहा गया है। यह पूजा केवल संसार के सुख ही नहीं, बल्कि अंत में मोक्ष भी प्रदान करती है।

व्रत एवं पाठ विधि (Ritual Method)

मंगला गौरी व्रत में '16' की संख्या का विशेष महत्व है:

  • संकल्प: श्रावण के पहले मंगलवार को व्रत का संकल्प लें। एक चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर माँ मंगला गौरी (मिट्टी की मूर्ति या चित्र) स्थापित करें।

  • षोडशोपचार पूजा: देवी को 16 वस्तुएं अर्पित करें—16 मालाएं, 16 लौंग, 16 इलायची, 16 चूड़ियां, 16 बिंदी आदि।

  • दीपक: आटे का चौमुखी दीपक बनाएं जिसमें 16 बत्तियां (Wicks) हों और घी भरकर जलाएं। यह अखंड सुहाग का प्रतीक है।

  • भोग: 16 लड्डूओं का भोग लगाएं और पूजा के बाद सुहागिन महिलाओं को प्रसाद व शृंगार सामग्री (Baina) दान करें।

  • कथा श्रवण: पूजा के बाद हाथ में चावल और फूल लेकर मंगला गौरी व्रत कथा सुनें और फिर इस स्तोत्र का पाठ करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. मंगला गौरी व्रत कब किया जाता है?

यह व्रत श्रावण मास (Sawan) के प्रत्येक मंगलवार (Tuesday) को किया जाता है। सुहागिन महिलाएं इसे अपने पति की लंबी उम्र और स्वास्थ्य के लिए करती हैं।

2. इस व्रत में '16' अंक का क्या महत्व है?

इस पूजा में 16 की संख्या अत्यंत शुभ मानी जाती है। इसमें 16 शृंगार की वस्तुएं, 16 प्रकार के फूल-फल, 16 आटे के लड्डू, और 16 बत्तियों वाला दीपक (16-wick lamp) जलाया जाता है, जो पूर्णता का प्रतीक है।

3. क्या कुंवारी कन्याएं भी यह व्रत कर सकती हैं?

हाँ, जिन कन्याओं के विवाह में बाधा आ रही हो या जो मनचाहा वर चाहती हैं, वे भी इस व्रत को कर सकती हैं। इससे 'शीघ्र विवाह' (Early Marriage) का प्रबल योग बनता है।

4. धर्मपाल की कथा क्या है?

धर्मपाल सेठ के अल्पायु पुत्र का विवाह मंगला गौरी व्रत करने वाली कन्या से हुआ था। उस कन्या के अखंड सौभाग्य के आशीर्वाद से यमराज को भी खाली हाथ लौटना पड़ा और उसके पति को जीवनदान मिला।

5. व्रत का उद्यापन (Udyapan) कब करना चाहिए?

विवाह के बाद पहले 5 वर्षों तक श्रावण के मंगलवार को यह व्रत करना चाहिए। 5वें वर्ष के सावन के अंतिम मंगलवार को विधि-विधान से उद्यापन करना चाहिए।

6. मंगला गौरी कौन हैं?

मंगला गौरी माँ पार्वती का ही एक सौम्य और मंगलकारी स्वरूप हैं। श्रावण मास भगवान शिव का प्रिय माह है, इसलिए सोमवार शिव का और मंगलवार गौरी का होता है।

7. क्या विधवा महिलाएं यह व्रत कर सकती हैं?

सुहाग की कामना के लिए यह व्रत वर्जित हो सकता है, परंतु भक्ति भाव से 'गौरी' रूप में आत्म-शक्ति, शांति और मोक्ष के लिए वे पूजन कर सकती हैं। शृंगार सामग्री का दान दूसरों को करें।

8. पूजा में क्या विशेष सामग्री चाहिए?

सुहाग पिटारी (सिंदूर, बिंदी, चूड़ी, मेहंदी, दर्पण, कंघी आदि), 16 लड्डू, 16 बत्तियों वाला दीपक, पंचामृत, पान, सुपारी और ऋतु फल।

9. क्या मासिक धर्म (Periods) में यह व्रत कर सकते हैं?

मासिक धर्म के दौरान शारीरिक शुद्धता न होने के कारण पूजा, मूर्ति स्पर्श या मंदिर जाना वर्जित है। आप व्रत (उपवास) रख सकती हैं और मन में मंत्र जाप कर सकती हैं, लेकिन पूजा किसी और से करवाएं।

10. 'मंगला गौरी' का अर्थ क्या है?

'मंगला' का अर्थ है शुभ/कल्याण और 'गौरी' पार्वती का नाम है। अर्थात् वह देवी जो अपने भक्तों के जीवन में केवल शुभ और मंगल ही करती हैं।