Sri Manasa Devi Stotram (Dhanvantari Krutam) – श्री मनसा देवी स्तोत्रम्

श्री मनसा देवि स्तोत्रम् - परिचय (Introduction)
श्री मनसा देवी नागों और सर्पों की अधिष्ठात्री देवी हैं। वे भगवान शिव की मानस पुत्री (तपस्या के दौरान उनके मन से उत्पन्न) मानी जाती हैं, और ऋषि कश्यप उनके पिता हैं। उन्हें 'विषहरी' (विष का नाश करने वाली) और 'नित्या' (सनातन) भी कहा जाता है।
धन्वन्तरि और मनसा देवी: यह स्तोत्र ब्रह्मवैवर्त पुराण (श्रीकृष्णजन्मखंड, अध्याय 51) से लिया गया है। देवताओं के वैद्य भगवान धन्वन्तरि ने चिकित्सा विज्ञान में विष-निवारण (Toxicology) के लिए मनसा देवी की आराधना की थी। वे जानते थे कि केवल औषधियों से कालकूट जैसे हलाहल विष का उपचार संभव नहीं है, इसके लिए दैवीय शक्ति (मंत्र शक्ति) की आवश्यकता होती है। इसलिए उन्होंने देवी को "सिद्धिस्वरूपायै" (सिद्धि की साक्षात मूर्ति) कहकर नमन किया।
पौराणिक कथा: जब जनमेजय ने अपने पिता परीक्षित की तक्षक नाग द्वारा मृत्यु का बदला लेने के लिए 'सर्प-सत्र' यज्ञ किया, तो समस्त नाग जाति नष्ट होने लगी। तब मनसा देवी के पुत्र 'आस्तीक' (Astika) ने अपनी बुद्धिमत्ता से उस यज्ञ को रुकवाया और नागों के प्राण बचाए। इसलिए मनसा देवी को 'आस्तीक-जननी' (आस्तीक की माता) और 'नाग-भगिनी' (नागराज वासुकी की बहन) कहा जाता है। बंगाल, असम और झारखंड में मनसा पूजा एक विशाल उत्सव के रूप में मनाई जाती है।
इस स्तोत्र में देवी को "कश्यप-कन्या", "शंकर-कन्या", "जरत्कारु-प्रिया" और "नागेश्वरी" जैसे नामों से संबोधित किया गया है। यह स्तोत्र भय और विष के विरुद्ध एक अचूक रक्षा कवच है।
विशिष्ट महत्व (Significance)
सर्प भय मुक्ति: यह इस स्तोत्र का मुख्य उद्देश्य है। जिन लोगों की कुंडली में कालसर्प दोष है या जिन्हें अक्सर सांपों के बुरे सपने आते हैं, उनके लिए यह पाठ परम शांतिदायक है।
आरोग्य और विष-मुक्ति: यह केवल सांप के जहर के लिए नहीं, बल्कि शरीर में जमा विषाक्त पदार्थों (Toxins), फूड पॉइजनिंग, और जीर्ण चर्म रोगों (Chronic Skin Diseases) के निवारण के लिए भी प्रभावी है।
सिद्धि प्राप्ति: मनसा देवी योग और तंत्र की भी देवी हैं। उन्होंने भगवान शंकर से 'मृतसंजीवनी' विद्या सीखी थी। साधक उन्हें सिद्धि और मोक्ष के लिए भी पूजते हैं।
पाठ के लाभ (Benefits)
इस महापुण्य स्तोत्र के पाठ से निम्नलिखित फल प्राप्त होते हैं:
नाग भय का नाश: श्लोक 9 में धन्वन्तरि जी ने कहा है—"वंशजानां नागभयं नास्ति तस्य न संशयः"। इसका पाठ करने वाले के कुल में भी किसी की सर्पदंश से मृत्यु नहीं होती।
संतान रक्षा: चूंकि उन्होंने आस्तीक जैसे पुत्र को जन्म दिया और नागों की रक्षा की, वे बच्चों की रक्षक मानी जाती हैं। माताएं अपने बच्चों के स्वास्थ्य के लिए मनसा व्रत रखती हैं।
वरदान प्राप्ति: श्लोक 4 में उन्हें "वरदायै" (वरदान देने वाली) कहा गया है। वे भक्तों की मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण करती हैं और "सुखदा" (सुख देने वाली) हैं।
शत्रु दमन: विषहरी होने के कारण, वे शत्रुओं के 'विष' (ईर्ष्या और षड्यंत्र) को भी निष्प्रभावी कर देती हैं।
पूजा विधि (Ritual Method)
मनसा देवी की पूजा सात्विक और तांत्रिक दोनों विधियों से होती है। सामान्य गृहस्थ के लिए विधि इस प्रकार है:
दिन: नाग पंचमी (Naga Panchami), गुरुवार, और आषाढ़ माह की संक्रांति पूजा के लिए सर्वश्रेष्ठ हैं।
सामग्री: दूध (कच्चा), लावा (खेई/पॉपकॉर्न जैसा), केला, और सिंदूर।
विशेष अर्पण: मनसा पूजा में 'सिज' (Sij) या कैक्टस (Manasa Gach) के पौधे की पूजा का विधान है, जिसे देवी का प्रतीक माना जाता है। यदि यह उपलब्ध न हो, तो नागफनी या नीम की पत्तियों का प्रयोग करें।
बलिदान त्याग: मनसा देवी को "वैष्णवी" रूप में पूजते समय किसी भी जीव की बलि नहीं दी जाती, वे दूध और फलों से प्रसन्न होती हैं।