Sri Maha Kali Shatanama Stotram (Brihan Nila Tantram) – श्री महाकाली शतनाम स्तोत्रम्

॥ श्री गणेशाय नमः ॥
॥ श्री महाकाली शतनाम स्तोत्रम् ॥
॥ श्रीबृहन्नीलतन्त्रे त्रयोविंशः पटले ॥
॥ श्रीदेव्युवाच ॥
पुरा प्रतिश्रुतं देव क्रीडासक्तो यदा भवान् ।
नाम्नां शतं महाकाल्याः कथयस्व मयि प्रभो ॥ १ ॥
॥ श्रीभैरव उवाच ॥
साधु पृष्टं महादेवि अकथ्यं कथयामि ते ।
न प्रकाश्यं वरारोहे स्वयोनिरिव सुन्दरि ॥ २ ॥
प्राणाधिकप्रियतरा भवती मम मोहिनी ।
क्षणमात्रं न जीवामि त्वां विना परमेश्वरि ॥ ३ ॥
यथादर्शेऽमले बिम्बं घृतं दध्यादिसम्युतम् ।
तथाहं जगतामाद्ये त्वयि सर्वत्र गोचरः ॥ ४ ॥
॥ विनियोग ॥
शृणु देवि प्रवक्ष्यामि जपात् सार्वज्ञदायकम् ।
सदाशिव ऋषिः प्रोक्तोऽनुष्टुप् छन्दश्च ईरितः ॥ ५ ॥
देवता भैरवो देवि पुरुषार्थचतुष्टये ।
विनियोगः प्रयोक्तव्यः सर्वकर्मफलप्रदः ॥ ६ ॥
॥ अथ स्तोत्रम् ॥
महाकाली जगद्धात्री जगन्माता जगन्मयी ।
जगदम्बा जगत्सारा जगदानन्दकारिणी ॥ ७ ॥
जगद्विध्वंसिनी गौरी दुःखदारिद्र्यनाशिनी ।
भैरवभाविनी भावानन्ता सारस्वतप्रदा ॥ ८ ॥
चतुर्वर्गप्रदा साध्वी सर्वमङ्गलमङ्गला ।
भद्रकाली विशालाक्षी कामदात्री कलात्मिका ॥ ९ ॥
नीलवाणी महागौरसर्वाङ्गा सुन्दरी परा ।
सर्वसम्पत्प्रदा भीमनादिनी वरवर्णिनी ॥ १० ॥
वरारोहा शिवारोहा महिषासुरघातिनी ।
शिवपूज्या शिवप्रीता दानवेन्द्रप्रपूजिता ॥ ११ ॥
सर्वविद्यामयी शर्वसर्वाभीष्टफलप्रदा ।
कोमलाङ्गी विधात्री च विधातृवरदायिनी ॥ १२ ॥
पूर्णेन्दुवदना नीलमेघवर्णा कपालिनी ।
कुरुकुल्ला विप्रचित्ता कान्तचित्ता मदोन्मदा ॥ १३ ॥
मत्ताङ्गी मदनप्रीता मदाघूर्णितलोचना ।
मदोत्तीर्णा खर्पराऽसिनरमुण्डविलासिनी ॥ १४ ॥
नरमुण्डस्रजा देवी खड्गहस्ता भयानका ।
अट्टहासयुता पद्मा पद्मरागोपशोभिता ॥ १५ ॥
वराऽभयप्रदा काली कालरात्रिस्वरूपिणी ।
स्वधा स्वाहा वषट्कारा शरदिन्दुसमप्रभा ॥ १६ ॥
शरत्ज्योत्स्ना च संह्लादा विपरीतरतातुरा ।
मुक्तकेशी छिन्नजटा जटाजूटविलासिनी ॥ १७ ॥
सर्पराजयुता भीमा सर्पराजोपरिस्थिता ।
श्मशानस्था महानन्दिस्तुता सन्दीप्तलोचना ॥ १८ ॥
शवासनरता नन्दा सिद्धचारणसेविता ।
बलिदानप्रिया गर्भा भूर्भुवःस्वःस्वरूपिणी ॥ १९ ॥
गायत्री चैव सावित्री महानीलसरस्वती ।
लक्ष्मीर्लक्षणसम्युक्ता सर्वलक्षणलक्षिता ॥ २० ॥
व्याघ्रचर्मावृता मेध्या त्रिवलीवलयाञ्चिता ।
गन्धर्वैः संस्तुता सा हि तथा चेन्दा महापरा ॥ २१ ॥
पवित्रा परमा माया महामाया महोदया ।
इति ते कथितं दिव्यं शतं नाम्नां महेश्वरि ॥ २२ ॥
॥ फलश्रुति ॥
यः पठेत् प्रातरुत्थाय स तु विद्यानिधिर्भवेत् ।
इह लोके सुखं भुक्त्वा देवीसायुज्यमाप्नुयात् ॥ २३ ॥
तस्य वश्या भवन्त्येते सिद्धौघाः सचराचराः ।
खेचरा भूचराश्चैव तथा स्वर्गचराश्च ये ॥ २४ ॥
ते सर्वे वशमायान्ति साधकस्य हि नान्यथा ।
नाम्नां वरं महेशानि परित्यज्य सहस्रकम् ॥ २५ ॥
पठितव्यं शतं देवि चतुर्वर्गफलप्रदम् ।
अज्ञात्वा परमेशानि नाम्नां शतं महेश्वरि ॥ २६ ॥
भजते यो महकालीं सिद्धिर्नास्ति कलौ युगे ।
प्रपठेत् प्रयतो भक्त्या तस्य पुण्यफलं शृणु ॥ २७ ॥
लक्षवर्षसहस्रस्य कालीपूजाफलं भवेत् ।
बहुना किमिहोक्तेन वाञ्छितार्थी भविष्यति ॥ २८ ॥
॥ इति श्रीबृहन्नीलतन्त्रे त्रयोविंशः पटले भैरवपार्वतीसंवादे श्री महाकाली शतनाम स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
संलिखित ग्रंथ
शतनाम स्तोत्र परिचय
श्री महाकाली शतनाम स्तोत्रम् तंत्र साहित्य के प्रसिद्ध ग्रंथ बृहन्नीलतन्त्र के त्रयोविंश (23वें) पटल से है। यह स्तोत्र भगवान भैरव और देवी पार्वती के संवाद रूप में है।
देवी पार्वती भैरव से कहती हैं - "हे प्रभो! पूर्व में जब आप क्रीड़ा में आसक्त थे, तब आपने महाकाली के शत नाम बताने का वचन दिया था। अब वह बताइए।"
भैरव कहते हैं - "हे सुन्दरी! तुमने अच्छा पूछा। जो अकथ्य (न कहने योग्य) है वह कहता हूँ। यह स्वयोनि (अपने गुप्त अंग) की भाँति गोपनीय है।"
इस स्तोत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भैरव स्वयं कहते हैं - "नाम्नां वरं महेशानि परित्यज्य सहस्रकम् । पठितव्यं शतं देवि" - सहस्रनाम छोड़कर यह शतनाम पढ़ना उत्तम है!
स्तोत्र विवरण
| ग्रंथ | बृहन्नीलतन्त्र - त्रयोविंश (23वाँ) पटल |
| ऋषि | सदाशिव |
| छंद | अनुष्टुप् |
| देवता | भैरव (महाकाली के पति रूप में) |
| विनियोग | पुरुषार्थ चतुष्टय (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) |
| श्लोक संख्या | 28 (100 नाम) |
| संवाद | भैरव-पार्वती |
बृहन्नीलतन्त्र क्या है?
बृहन्नीलतन्त्र (बृहत् + नील + तंत्र) तंत्र साहित्य का अत्यंत महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसका नाम नील (नीलकण्ठ शिव या नीलसरस्वती/तारा) से है।
इस ग्रंथ में मुख्यतः:
- महाकाली, तारा और नीलसरस्वती की साधना
- विभिन्न मंत्र, यंत्र और तंत्र प्रयोग
- भैरव-पार्वती के गोपनीय संवाद
- वामाचार और दक्षिणाचार दोनों मार्गों का वर्णन
यह ग्रंथ 23+ पटलों में विभाजित है और प्रत्येक पटल में विशेष विद्या का रहस्य है।
प्रमुख नाम और अर्थ
| नाम | अर्थ |
|---|---|
| जगद्धात्री | जगत को धारण करने वाली |
| जगदानन्दकारिणी | जगत को आनंद देने वाली |
| भैरवभाविनी | भैरव के भाव में स्थित |
| सर्वमङ्गलमङ्गला | सभी मंगलों में मंगलस्वरूप |
| कुरुकुल्ला | वशीकरण की देवी |
| विपरीतरतातुरा | विपरीत रति में आतुर (तांत्रिक रहस्य) |
| शवासनरता | शव पर आसीन |
| महानीलसरस्वती | नीलसरस्वती/तारा स्वरूप |
फलश्रुति (लाभ)
- विद्यानिधि: प्रातःकाल पाठ से विद्या का भण्डार बनता है
- देवी सायुज्य: इहलोक में सुख भोगकर देवी के साथ एकत्व प्राप्त
- सर्व वशीकरण: सिद्ध, खेचर, भूचर, स्वर्गचर सभी वश में आते हैं
- चतुर्वर्ग: धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष की प्राप्ति
- लक्ष वर्ष सहस्र: एक बार पाठ से लाख वर्ष तक काली पूजा का फल
- वाञ्छित सिद्धि: जो चाहो वह प्राप्त होता है
विशेष: भैरव कहते हैं - "कलियुग में इस शतनाम को जाने बिना जो महाकाली की भक्ति करता है, उसे सिद्धि नहीं मिलती।" - "अज्ञात्वा परमेशानि नाम्नां शतं महेश्वरि । भजते यो महकालीं सिद्धिर्नास्ति कलौ युगे"
पाठ विधि
- उत्तम समय: प्रातःकाल (यः पठेत् प्रातरुत्थाय)
- भाव: प्रयत्नपूर्वक और भक्तिपूर्वक (प्रपठेत् प्रयतो भक्त्या)
- विशेष तिथियाँ: अमावस्या, काली चतुर्दशी, नवरात्रि
- गोपनीयता: यह गोपनीय स्तोत्र है, अपात्र को न बताएं
FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
1. शतनाम को सहस्रनाम से श्रेष्ठ क्यों कहा?
भैरव स्वयं कहते हैं - "नाम्नां वरं महेशानि परित्यज्य सहस्रकम् । पठितव्यं शतं देवि चतुर्वर्गफलप्रदम्।" इसका तात्पर्य है कि यह शतनाम सार रूप में है - कम समय में अधिक फल देता है। यह सहस्रनाम का विकल्प नहीं, बल्कि संक्षिप्त और शक्तिशाली रूप है।
2. "स्वयोनिरिव गोपनीय" का क्या अर्थ है?
भैरव कहते हैं यह स्तोत्र स्वयोनि (अपने गुप्त अंग) की भाँति गोपनीय है। तंत्र में गोपनीयता का बहुत महत्व है। अपात्र को यह ज्ञान देने से साधक की सिद्धि नष्ट होती है और अपात्र का भी अहित होता है।
3. देवता "भैरव" क्यों कहा, महाकाली नहीं?
यह सूक्ष्म तांत्रिक रहस्य है। महाकाली और भैरव एक ही तत्व के दो पक्ष हैं - शक्ति और शक्तिमान। भैरव को देवता कहने से यह स्पष्ट होता है कि यह स्तोत्र भैरव-काली युगल की उपासना है, केवल काली की नहीं।
4. "विपरीतरतातुरा" का क्या अर्थ है?
यह तांत्रिक पारिभाषिक शब्द है। विपरीत रति में देवी ऊपर और शिव नीचे होते हैं। यह शक्ति की प्रधानता का प्रतीक है। तंत्र में यह आसन साधना की उच्च अवस्था का संकेत है।
5. लक्ष वर्ष सहस्र का क्या अर्थ है?
"लक्षवर्षसहस्रस्य कालीपूजाफलं भवेत्" - एक लाख वर्ष तक सहस्र (हजार) बार काली पूजा का जो फल होगा, वह एक बार इस शतनाम के पाठ से मिलता है। यह स्तोत्र की असीम शक्ति का वर्णन है।
6. क्या यह सभी के लिए उपयुक्त है?
हाँ। यद्यपि यह तांत्रिक ग्रंथ से है, किन्तु भक्तिपूर्वक पाठ सभी के लिए शुभ है। विशेष तांत्रिक प्रयोग के लिए गुरु मार्गदर्शन आवश्यक है, लेकिन सामान्य पाठ के लिए कोई प्रतिबंध नहीं।
7. "कुरुकुल्ला" नाम क्या है?
कुरुकुल्ला एक स्वतंत्र तांत्रिक देवी हैं जो वशीकरण और आकर्षण की अधिष्ठात्री हैं। महाकाली के इस नाम से पता चलता है कि वशीकरण शक्ति भी उन्हीं का अंश है। कुरुकुल्ला को लाल रंग की देवी के रूप में पूजा जाता है।
8. "सिद्धचारणसेविता" का क्या महत्व है?
इसका अर्थ है - सिद्ध और चारण जिनकी सेवा करते हैं। सिद्ध = योग सिद्धि प्राप्त महात्मा, चारण = देवलोक के गायक। यह दर्शाता है कि देवी न केवल मनुष्यों द्वारा, बल्कि दिव्य योगियों द्वारा भी पूजित हैं।
9. इस शतनाम और आद्या कालिका शतनाम में क्या अंतर है?
दोनों अलग-अलग ग्रंथों से हैं। यह शतनाम बृहन्नीलतन्त्र से है जबकि आद्या कालिका शतनाम महानिर्वाण तंत्र से है। दोनों के नाम, ऋषि और प्रयोजन भिन्न हैं। दोनों का पाठ शुभ है।
10. "भैरवभाविनी" और "शिवारोहा" में क्या अंतर है?
भैरवभाविनी = भैरव के भाव में स्थित, भैरव की शक्ति। शिवारोहा = शिव पर आरूढ़ (विपरीत रति मुद्रा)। दोनों नाम शिव-शक्ति के अभिन्न संबंध को दर्शाते हैं।