Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Lalita Chatushashtyupachara Sangraha – श्रीललिता चतुःषष्ट्युपचारसङ्ग्रहः

Sri Lalita Chatushashtyupachara Sangraha – श्रीललिता चतुःषष्ट्युपचारसङ्ग्रहः
॥ श्रीललिता चतुःषष्ट्युपचारसङ्ग्रहः ॥ ॐ हृन्मध्यनिलये देवि ललिते परदेवते । चतुष्षष्ट्युपचारांस्ते भक्त्या मातः समर्पये ॥ १॥ कामेशोत्सङ्गनिलये पाद्यं गृह्णीष्व सादरम् । भूषणानि समुत्तार्य गन्धतैलं च तेऽर्पये ॥ २॥ स्नानशालां प्रविश्याऽथ तत्रस्थ मणिपीठके । उपविश्य सुखेन त्वं देहोद्वर्तनमाचर ॥ ३॥ उष्णोदकेन ललिते स्नापयाम्यथ भक्तितः । अभिषिञ्चामि पश्चात्त्वां सौवर्णकलशोदकैः ॥ ४॥ धौतवस्त्रप्रोच्छनं चारक्तक्षौमाम्बरं तथा । कुचोत्तरीयमरुणमर्पयामि महेश्वरि ॥ ५॥ ततः प्रविश्य चालेपमण्टपं परमेश्वरि । उपविश्य च सौवर्णपीठे गन्धान्विलेपय ॥ ६॥ कालगरुजधूपैश्च धूपये केशपाशकम् । अर्पयामि च माल्यादि सर्वर्तुकुसुमस्रजः ॥ ७॥ भूषामण्टपमाविश्य स्थित्वा सौवर्णपीठके । माणिक्यमुकुटं मूर्ध्नि दयया स्थापयाम्बिके ॥ ८॥ शरत्पार्वणचन्द्रस्य शकलं तत्र शोभताम् । सिन्दूरेण च सीमन्तमलङ्कुरु दयानिधे ॥ ९॥ भाले च तिलकं न्यस्य नेत्रयोरञ्जनं शिवे । वालीयुगळमप्यम्ब भक्त्या ते विनिवेदये ॥ १०॥ मणिकुण्डलमप्यम्ब नासाभरणमेव च । ताटङ्कयुगळं देवि यावकञ्चाधरेऽर्पये ॥ ११॥ आद्यभूषणसौवर्णचिन्ताकपदकानि च । महापदकमुक्तावल्येकावल्यादिभूषणम् ॥ १२॥ छन्नवीरं गृहाणाम्ब केयूरयुगलं तथा । वलयावलिमङ्गुल्याभरणं ललिताम्बिके ॥ १३॥ ओड्याणमथ कट्यन्ते कटिसूत्रञ्च सुन्दरि । सौभाग्याभरणं पादकटकं नूपुरद्वयम् ॥ १४॥ अर्पयामि जगन्मातः पादयोश्चाङ्गुलीयकम् । पाशं वामोर्ध्वहस्ते ते दक्षहस्ते तथाङ्कुशम् ॥ १५॥ अन्यस्मिन्वामहस्ते च तथा पुण्ड्रेक्षुचापकम् । पुष्पबाणांश्च दक्षाधः पाणौ धारय सुन्दरि ॥ १६॥ अर्पयामि च माणिक्यपादुके पादयोः शिवे । आरोहावृतिदेवीभिः चक्रं परशिवे मुदा ॥ १७॥ समानवेषभूषाभिः साकं त्रिपुरसुन्दरि । तत्र कामेशवामाङ्कपर्यङ्कोपनिवेशिनीम् ॥ १८॥ अमृतासवपानेन मुदितां त्वां सदा भजे । शुद्धेन गाङ्गतोयेन पुनराचमनं कुरु ॥ १९॥ कर्पूरवीटिकामास्ये ततोऽम्ब विनिवेशय । आनन्दोल्लासहासेन विलसन्मुखपङ्कजाम् ॥ २०॥ भक्तिमत्कल्पलितिकां कृतीस्यां त्वां स्मरन् कदा । मङ्गलारार्तिकं छत्रं चामरं दर्पणं तथा । ताळवृन्तं गन्धपुष्पधूपदीपांश्च तेऽर्पये ॥ २१॥ श्रीकामेश्वरि तप्तहाटककृतैः स्थालीसहस्रैर्भृतम् दिव्यान्नं घृतसूपशाकभरितं चित्रान्नभेदैर्युतम् । दुग्धान्नं मधुशर्करादधियुतं माणिक्यपात्रार्पितम् माषापूपकपूरिकादिसहितं नैवेद्यमम्बाऽर्पये ॥ २२॥ साग्रविंशतिपद्योक्तचतुष्षष्ट्युपचारतः । हृन्मध्यनिलया माता ललिता परितुष्यतु ॥ २३॥ श्रीमुखाख्यस्य वर्षस्य तुलायां शुक्लपक्षके । चतुर्थ्यामपराह्णे च ललितार्पितमानसः ॥ २४॥ साग्रविंशतिपद्यैस्तु चतुष्षष्ट्युपचारकान् । समग्रहीत्पराम्बायाः प्रीत्यै नारायणो मुदा ॥ २५॥ नारायणः श्रीपुरुषोत्तमात्मजोऽलिखन्महीषूरपुरे वसन्कृती । देवीसपर्यामखिलाभिलाषदां कामेशवामाङ्कगता प्रसीदतु ॥ ॥ इति श्रीललिता चतुःषष्ट्युपचारसङ्ग्रहः सम्पूर्णः ॥

परिचय: मानस पूजा और चतुःषष्ट्युपचार का विधान

सनातन धर्म में ईश्वर की उपासना के कई तरीके हैं, जिनमें 'उपचार' (Offerings/Services) अर्पित करना एक प्रमुख विधान है। सामान्यतः पूजा में ५ उपचार (पंचोपचार) या १६ उपचार (षोडशोपचार) अर्पित किए जाते हैं। किंतु, जब भक्त का प्रेम और भावना अपने चरम पर होती है, तो वह अपने आराध्य को राजाओं के राजा (राजराजेश्वरी) के रूप में पूजता है। इसी राजसी उपासना का सर्वोच्च रूप है चतुःषष्ट्युपचार पूजा (६४ प्रकार की सेवाएं अर्पित करना)। "श्रीललिता चतुःषष्ट्युपचारसङ्ग्रहः" इसी भावना का एक काव्यात्मक और शास्त्रोक्त संकलन है।

इस स्तोत्र की रचना श्री पुरुषोत्तम के पुत्र, श्री नारायण ने महीषूरपुरे (वर्तमान मैसूर शहर, कर्नाटक) में की थी। स्तोत्र के अंत (श्लोक २४-२५) में रचना के समय का भी स्पष्ट उल्लेख है - 'श्रीमुख' नामक संवत्सर, 'तुला' मास (अक्टूबर-नवंबर), शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि की दोपहर को। यह ऐतिहासिक संदर्भ इस स्तोत्र की प्रामाणिकता और इसके रचयिता की गहरी भक्ति को प्रमाणित करता है।

यह पाठ मुख्य रूप से 'मानस पूजा' (Mental Worship) के लिए है। मानस पूजा को तंत्र और वेदान्त में सबसे उच्च कोटि की पूजा माना गया है। भौतिक सामग्री की अपनी सीमाएं होती हैं, किंतु मन की कोई सीमा नहीं होती। इस स्तोत्र के माध्यम से साधक अपनी आँखें बंद करके, अपनी कल्पना और भाव-जगत में माँ ललिता को आमंत्रित करता है। श्लोक १ में ही कहा गया है: "ॐ हृन्मध्यनिलये देवि" (हे मेरे हृदय के मध्य में निवास करने वाली देवी)। साधक उन्हें हृदय में बैठाकर सुगंधित तेल से मालिश, उष्ण जल से स्नान, दिव्य आभूषण, अस्त्र-शस्त्र, और अंत में ५६ भोग (दिव्यान्नं) अर्पित करता है।

विशिष्ट महत्व: भाव और भक्ति का शृंगार

इस स्तोत्र का तांत्रिक और भक्ति परक महत्व अत्यंत गहरा है। यह केवल वस्तुओं की सूची नहीं है, बल्कि यह श्रीविद्या की साधना का एक मानसिक ब्लूप्रिंट (blueprint) है:

  • क्रमबद्ध शृंगार: स्तोत्र का क्रम अत्यंत वैज्ञानिक और प्रेमपूर्ण है। यह आभूषण उतारने (श्लोक २), तेल लगाने, स्नान कराने, वस्त्र पहनाने, और फिर एक-एक करके सिर से लेकर पैरों तक आभूषण पहनाने (मुकुट, सिंदूर, कुंडल, हार, चूड़ियाँ, कटिसूत्र, नूपुर) का जीवंत दृश्य प्रस्तुत करता है। यह साधक के ध्यान (Focus) को देवी के प्रत्येक अंग पर केंद्रित करता है।
  • अस्त्रों का समर्पण (श्लोक १५-१६): आभूषणों के बाद, देवी को उनके चार मुख्य आयुध - पाश (वाम ऊर्ध्व हस्त), अंकुश (दक्ष हस्त), गन्ने का धनुष (वाम हस्त), और पुष्प बाण (दक्ष अधः हस्त) अर्पित किए जाते हैं। यह दर्शाता है कि देवी केवल सौम्य ही नहीं, बल्कि ब्रह्मांड की शासिका भी हैं।
  • कामेश्वर-वामांक स्थिति (श्लोक १८): श्रीविद्या का सबसे रहस्यमयी पहलू देवी का शिव (कामेश्वर) के साथ पूर्ण मिलन है। इस स्तोत्र में साधक देवी को 'कामेशवामाङ्कपर्यङ्कोपनिवेशिनीम्' (भगवान कामेश्वर की बायीं जंघा रूपी पर्यंक पर बैठी हुई) के रूप में ध्यान करता है। यह शिव और शक्ति के अद्वैत (Non-duality) का प्रतीक है।
  • राजसी नैवेद्य (श्लोक २२): नैवेद्य का वर्णन किसी चक्रवर्ती सम्राट के भोजन जैसा है। सोने की हजारों थालियों में घी, सूप, दूध, शहद, शक्कर, दही, अपूप (मालपुआ) आदि से भरे नाना प्रकार के चित्रान्न (चावल के व्यंजन) अर्पित किए जाते हैं।

फलश्रुति और स्तोत्र के लाभ

इस स्तोत्र के अंत में रचयिता नारायण ने स्पष्ट किया है कि इस पाठ का उद्देश्य क्या है और इससे क्या प्राप्त होता है:

  • देवी की पूर्ण प्रसन्नता: "हृन्मध्यनिलया माता ललिता परितुष्यतु" (श्लोक २३) - इन २३ श्लोकों (साग्रविंशति पद्य) के माध्यम से अर्पित ६४ उपचारों से हृदय में निवास करने वाली माता ललिता पूर्णतः संतुष्ट और प्रसन्न होती हैं।
  • सभी इच्छाओं की पूर्ति: अंतिम श्लोक में देवी को "अखिलाभिलाषदां" (सभी अभिलाषाओं/इच्छाओं को पूर्ण करने वाली) कहा गया है। मानस पूजा से प्रसन्न होकर देवी साधक की भौतिक और आध्यात्मिक, दोनों प्रकार की कामनाएं पूरी करती हैं।
  • एकाग्रता और ध्यान में वृद्धि: चूँकि यह एक विज़ुअलाइज़ेशन (visualization) तकनीक है, इसका नियमित पाठ करने से मन की भटकन दूर होती है और साधक की एकाग्रता (Concentration) अद्भुत रूप से बढ़ती है।
  • आंतरिक शुद्धि: जब मन निरंतर देवी के दिव्य रूप, उनके स्नान, चंदन और पुष्पों के ध्यान में लगा रहता है, तो मन के भीतर छिपे काम, क्रोध और मलिन विचार स्वतः ही धुलने लगते हैं।
  • श्री चक्र पूजा का फल: जो लोग जटिल श्री चक्र नव-आवरण पूजा भौतिक रूप से करने में असमर्थ हैं, वे केवल इस स्तोत्र के पाठ से मानसिक रूप से वह पूरी पूजा संपन्न कर सकते हैं और समान पुण्य प्राप्त कर सकते हैं।

पाठ और मानस पूजा की विधि (Method)

यह स्तोत्र पढ़ने के लिए कम, 'अनुभव' करने के लिए अधिक है। इसका पाठ निम्नलिखित विधि से करना सबसे उत्तम है:

  • शांत वातावरण: प्रातःकाल स्नान के बाद, या गोधूलि बेला में एक शांत स्थान पर बैठें। अपनी आँखें बंद करें और कुछ गहरी साँसें लें।
  • हृदय कमल का ध्यान: श्लोक १ का पाठ करते हुए कल्पना करें कि आपके हृदय में एक सुंदर खिला हुआ कमल है और उस पर साक्षात माँ ललिता विराजमान हैं।
  • जीवंत कल्पना (Vivid Visualization): जैसे-जैसे आप श्लोक पढ़ते जाएं, मानसिक रूप से वह क्रिया करें। जब 'गन्धतैलं च तेऽर्पये' पढ़ें, तो भाव करें कि आप देवी के बालों में सुगंधित तेल लगा रहे हैं। जब मुकुट पहनाने का श्लोक आए, तो स्वर्ण मुकुट की चमक को मन की आँखों से देखें।
  • समर्पण का भाव: नैवेद्य (श्लोक २२) और आरती (श्लोक २१) के समय पूर्ण समर्पण का भाव लाएं। महसूस करें कि देवी आपके द्वारा अर्पित की गई हर वस्तु को मुस्कुराते हुए स्वीकार कर रही हैं।
  • नियमितता: इसका पाठ प्रतिदिन किया जा सकता है। विशेष रूप से शुक्रवार, अष्टमी, नवमी, पूर्णिमा या नवरात्रि के दिनों में यह मानस पूजा अत्यंत तीव्र फलदायी होती है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. 'चतुःषष्ट्युपचार' का क्या अर्थ है?

संस्कृत में 'चतुःषष्टि' का अर्थ है ६४ (Sixty-four) और 'उपचार' का अर्थ है सेवा या अर्पण। अतः इसका अर्थ है देवी को पूजा के दौरान ६४ प्रकार की राजसी वस्तुएं और सेवाएं (जैसे स्नान, वस्त्र, आभूषण, अस्त्र, नैवेद्य आदि) अर्पित करना।

2. इस स्तोत्र के रचयिता कौन हैं और उन्होंने इसे कहाँ लिखा?

इस स्तोत्र की रचना श्री पुरुषोत्तम के पुत्र, श्री नारायण ने की थी। उन्होंने इसे 'महीषूरपुरे' अर्थात वर्तमान मैसूर (कर्नाटक) शहर में रहते हुए लिखा था।

3. 'मानस पूजा' भौतिक पूजा से कैसे भिन्न है?

भौतिक पूजा में हम असली फूल, जल और नैवेद्य का उपयोग करते हैं, जो हमारी आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है। मानस पूजा (Mental Worship) में सब कुछ ध्यान और कल्पना के माध्यम से अर्पित किया जाता है। तंत्र शास्त्र में मानस पूजा को भौतिक पूजा से अधिक श्रेष्ठ और फलदायी माना गया है क्योंकि इसमें मन पूरी तरह एकाग्र होता है।

4. श्लोक 18 में 'कामेशवामाङ्कपर्यङ्कोपनिवेशिनीम्' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "जो भगवान कामेश्वर (शिव) की बायीं जंघा (वामांक) रूपी शय्या पर विराजमान हैं।" श्रीविद्या परंपरा में ललिता और कामेश्वर को अभिन्न (एक) माना जाता है, जो शिव और शक्ति के शाश्वत मिलन का प्रतीक है।

5. देवी के चार अस्त्र कौन से हैं जो उन्हें अर्पित किए गए हैं?

श्लोक १५-१६ के अनुसार देवी को चार अस्त्र अर्पित किए गए हैं: १. पाश (रस्सी/इच्छा शक्ति), २. अंकुश (भाला/ज्ञान शक्ति), ३. पुण्ड्रेक्षु चाप (गन्ने का धनुष/मन), और ४. पुष्प बाण (पाँच फूल के तीर/पाँच ज्ञानेन्द्रियां)।

6. क्या मैं इस पाठ को बिना किसी मूर्ति या चित्र के कर सकता हूँ?

जी हाँ, बिल्कुल। यह स्तोत्र विशेष रूप से उसी के लिए बना है। इसका पहला श्लोक ही "हृन्मध्यनिलये" (हृदय में निवास करने वाली) कहता है। आपको अपनी आँखें बंद करके अपने हृदय में ही देवी की मूर्ति का निर्माण करना है।

7. 'कर्पूरवीटिका' क्या है?

कर्पूर वीटिका (Karpura Veetika) पान के पत्ते (Betel leaf) का एक बीड़ा होता है जिसमें सुगंधित कपूर, इलायची, लौंग आदि डाले जाते हैं। ललिता सहस्रनाम में भी देवी को "कर्पूरवीटिकामोदसमाकर्षिदिगन्तरा" कहा गया है, क्योंकि उन्हें इसका सुगंधित पान बहुत प्रिय है।

8. नैवेद्य (भोग) में देवी को क्या अर्पित किया गया है?

श्लोक २२ के अनुसार, उन्हें सोने के बर्तनों में घी, सूप, दाल, चित्रान्न (नींबू चावल, इमली चावल आदि), दूध, शहद, दही, शक्कर, माषापूप (उड़द के वड़े), और कपूरिका (मिठाइयां) अर्पित की गई हैं।

9. क्या इस पाठ को केवल महिलाएं कर सकती हैं?

नहीं, माँ ललिता की उपासना और उनकी मानस पूजा पुरुष और महिला कोई भी कर सकता है। भक्ति और श्रद्धा में कोई लिंग भेद नहीं होता। इसके रचयिता श्री नारायण भी एक पुरुष ही थे।

10. इस स्तोत्र का पाठ करने का सबसे अच्छा दिन कौन सा है?

वैसे तो इसका नित्य पाठ किया जा सकता है, परंतु शुक्रवार (देवी का दिन), पूर्णिमा (श्री चक्र पूजा का दिन), और चतुर्थी (चूँकि लेखक ने इसे चतुर्थी को पूर्ण किया था) के दिन इसका पाठ करना अत्यंत शुभ माना जाता है।