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Sri Ketu Ashtottara Satanama Stotram – श्री केतु अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्

Sri Ketu Ashtottara Satanama Stotram – श्री केतु अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम्
॥ श्री केतु अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ शृणु नामानि जप्यानि केतो रथ महामते । केतुः स्थूलशिराश्चैव शिरोमात्रो ध्वजाकृतिः ॥ १ ॥ नवग्रहयुतः सिंहिकासुरीगर्भसम्भवः । महाभीतिकरश्चित्रवर्णो वै पिङ्गलाक्षकः ॥ २ ॥ स फलोधूम्रसङ्काशः तीक्ष्णदंष्ट्रो महोरगः । रक्तनेत्रश्चित्रकारी तीव्रकोपो महासुरः ॥ ३ ॥ क्रूरकण्ठः क्रोधनिधिश्छायाग्रहविशेषकः । अन्त्यग्रहो महाशीर्षो सूर्यारिः पुष्पवद्ग्रही ॥ ४ ॥ वरहस्तो गदापाणिश्चित्रवस्त्रधरस्तथा । चित्रध्वजपताकश्च घोरश्चित्ररथः शिखी ॥ ५ ॥ कुलुत्थभक्षकश्चैव वैडूर्याभरणस्तथा । उत्पातजनकः शुक्रमित्रं मन्दसखस्तथा ॥ ६ ॥ गदाधरः नाकपतिः अन्तर्वेदीश्वरस्तथा । जैमिनीगोत्रजश्चित्रगुप्तात्मा दक्षिणामुखः ॥ ७ ॥ मुकुन्दवरपात्रं च महासुरकुलोद्भवः । घनवर्णो लम्बदेहो मृत्युपुत्रस्तथैव च ॥ ८ ॥ उत्पातरूपधारी चाऽदृश्यः कालाग्निसन्निभः । नृपीडो ग्रहकारी च सर्वोपद्रवकारकः ॥ ९ ॥ चित्रप्रसूतो ह्यनलः सर्वव्याधिविनाशकः । अपसव्यप्रचारी च नवमे पापदायकः ॥ १० ॥ पञ्चमे शोकदश्चोपरागखेचर एव च । अतिपुरुषकर्मा च तुरीये (तु) सुखप्रदः ॥ ११ ॥ तृतीये वैरदः पापग्रहश्च स्फोटकारकः । प्राणनाथः पञ्चमे तु श्रमकारक एव च ॥ १२ ॥ द्वितीयेऽस्फुटवाग्दाता विषाकुलितवक्त्रकः । कामरूपी सिंहदन्तः सत्येप्यनृतवानपि ॥ १३ ॥ चतुर्थे मातृनाशश्च नवमे पितृनाशकः । अन्त्ये वैरप्रदश्चैव सुतानन्दनबन्धकः ॥ १४ ॥ सर्पाक्षिजातोऽनङ्गश्च कर्मराश्युद्भवस्तथा । उपान्ते कीर्तिदश्चैव सप्तमे कलहप्रदः ॥ १५ ॥ अष्टमे व्याधिकर्ता च धने बहुसुखप्रदः । जनने रोगदश्चोर्ध्वमूर्धजो ग्रहनायकः ॥ १६ ॥ पापदृष्टिः खेचरश्च शाम्भवोऽशेषपूजितः । शाश्वतश्च नटश्चैव शुभाऽशुभफलप्रदः ॥ १७ ॥ धूम्रश्चैव सुधापायी ह्यजितो भक्तवत्सलः । सिंहासनः केतुमूर्ती रवीन्दुद्युतिनाशकः ॥ १८ ॥ अमरः पीडकोऽमर्त्यो विष्णुदृष्टोऽसुरेश्वरः । भक्तरक्षोऽथ वैचित्र्यकपटस्यन्दनस्तथा ॥ १९ ॥ विचित्रफलदायी च भक्ताभीष्टफलप्रदः । एतत्केतुग्रहस्योक्तं नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ २० ॥ ॥ फलश्रुति ॥ यो भक्त्येदं जपेत्केतुर्नाम्नामष्टोत्तरं शतम् । स तु केतोः प्रसादेन सर्वाभीष्टं समाप्नुयात् ॥ २१ ॥ ॥ इति श्री केतु अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

श्री केतु अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (Sri Ketu Ashtottara Satanama Stotram) केतु ग्रह के 108 दिव्य नामों का एक अत्यंत विस्तृत और पवित्र संग्रह है। यह स्तोत्र अद्वितीय है क्योंकि इसमें केतु के स्वरूप के साथ-साथ विभिन्न भावों (Houses) में उनके फल का भी विस्तृत वर्णन है।



वैदिक ज्योतिष में केतु को छाया ग्रह (Shadow Planet) और मोक्ष कारक कहा जाता है। वे राहु के विपरीत भाग हैं - जहाँ राहु भौतिक इच्छाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं केतु आध्यात्मिक मुक्ति और वैराग्य का। इस स्तोत्र में उन्हें 'भक्तवत्सलः' (भक्तों पर कृपालु) और 'भक्ताभीष्टफलप्रदः' (भक्तों की इच्छा पूर्ण करने वाले) कहा गया है।

केतु का स्वरूप (Form of Ketu)

इस स्तोत्र में केतु के स्वरूप का विस्तृत वर्णन है:

  • शरीर: स्थूलशिरा (बड़े सिर वाले), शिरोमात्र (केवल शिर), ध्वजाकृति (ध्वज के आकार के)
  • वर्ण: धूम्रसंकाश (धुएं जैसे), चित्रवर्ण (विचित्र वर्ण), घनवर्ण (गहरे रंग के)
  • नेत्र: पिंगलाक्ष (भूरी आंखें), रक्तनेत्र (लाल आंखें)
  • दंत: तीक्ष्णदंष्ट्र (तेज दांत), सिंहदंत (सिंह जैसे दांत)
  • आयुध: गदापाणि (गदा धारण करने वाले), वरहस्त (वरदान देने वाले हाथ)
  • वस्त्र: चित्रवस्त्रधर (रंग-बिरंगे वस्त्र पहनने वाले)
  • आभूषण: वैडूर्याभरण (वैडूर्य रत्न के आभूषण)
  • जन्म: सिंहिकासुरीगर्भसम्भव (सिंहिका राक्षसी के गर्भ से उत्पन्न)
  • गोत्र: जैमिनीगोत्रज (जैमिनी गोत्र में जन्मे)

विभिन्न भावों में केतु का फल (Ketu in Different Houses)

इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें 12 भावों में केतु के फल का वर्णन है:

  • द्वितीय भाव: अस्फुटवाग्दाता - वाणी में अस्पष्टता, विषाकुलितवक्त्र
  • तृतीय भाव: वैरद - शत्रुता प्रदान करने वाले
  • चतुर्थ भाव: सुखप्रद (शुभ), मातृनाश (अशुभ)
  • पंचम भाव: शोकद - शोक देने वाले, श्रमकारक
  • सप्तम भाव: कलहप्रद - कलह देने वाले
  • अष्टम भाव: व्याधिकर्ता - रोग देने वाले
  • नवम भाव: पापदायक, पितृनाशक
  • एकादश भाव: कीर्तिद - कीर्ति देने वाले
  • द्वादश भाव: वैरप्रद - शत्रुता देने वाले
  • धन स्थान: बहुसुखप्रद - बहुत सुख देने वाले

स्तोत्र के प्रमुख लाभ (Benefits)

  • सर्वाभीष्ट प्राप्ति: "स तु केतोः प्रसादेन सर्वाभीष्टं समाप्नुयात्" - केतु की कृपा से सभी इच्छाएं पूर्ण होती हैं।

  • व्याधि नाश: "सर्वव्याधिविनाशकः" - केतु सभी रोगों को नष्ट करते हैं।

  • भक्त रक्षा: "भक्तरक्षो" और "भक्तवत्सलः" - भक्तों की रक्षा करते हैं और उन पर कृपालु हैं।

  • केतु दोष निवारण: नियमित पाठ से कुंडली में केतु के अशुभ प्रभाव कम होते हैं।

  • आध्यात्मिक उन्नति: केतु मोक्ष कारक हैं, इनकी आराधना से आध्यात्मिक प्रगति होती है।

पाठ करने की विधि (Method of Chanting)

  • दिन: मंगलवार और शनिवार को विशेष फलदायी। केतु दशा/अंतर्दशा में प्रतिदिन पाठ करें।

  • समय: सांयकाल या रात्रि में पाठ करें।

  • आसन और दिशा: दक्षिण दिशा की ओर मुख करके बैठें (केतु दक्षिणामुख हैं)।

  • दीप: सरसों के तेल का दीप जलाएं।

  • अर्पण: कुलुत्थ (कुलथी दाल) अर्पित करें (केतु कुलुत्थभक्षक हैं)। धूमित धूप भी अर्पित करें।

  • रत्न: वैडूर्य (Cat's Eye) रत्न धारण करें या पूजा में रखें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. केतु अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र में कितने नाम हैं?

इस स्तोत्र में केतु ग्रह के 108 (अष्टोत्तरशत) दिव्य नाम हैं, जो 20 श्लोकों में वर्णित हैं। 21वां श्लोक फलश्रुति है।

2. केतु को 'सिंहिकासुरीगर्भसम्भव' क्यों कहा गया है?

पौराणिक कथा के अनुसार, सिंहिका नामक राक्षसी के पुत्र स्वरभानु थे। समुद्र मंथन के समय स्वरभानु ने छलपूर्वक अमृत पीया। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनका सिर काट दिया। धड़ केतु बना और सिर राहु।

3. 'शिरोमात्र' और 'ध्वजाकृति' का क्या अर्थ है?

केतु केवल धड़ हैं (सिर राहु है)। वे ध्वज (पताका) के आकार के दिखते हैं - नीचे से ऊपर की ओर फैले हुए। इसीलिए उन्हें 'शिरोमात्र' (केवल शिर) और 'ध्वजाकृति' कहा जाता है।

4. केतु का मित्र ग्रह कौन है?

स्तोत्र में कहा गया है: "शुक्रमित्रं मन्दसखः" - शुक्र (Venus) केतु के मित्र हैं और शनि (Saturn) उनके सखा (मित्र) हैं।

5. केतु को कौन सा अन्न प्रिय है?

"कुलुत्थभक्षकः" - केतु को कुलुत्थ (कुलथी दाल/Horse Gram) प्रिय है। पूजा में इसे अर्पित करें और शनिवार को दान करें।

6. केतु का रत्न कौन सा है?

"वैडूर्याभरणः" - वैडूर्य (Cat's Eye/Lehsunia) केतु का रत्न है। केतु दोष निवारण के लिए इसे धारण करें।

7. 'रवीन्दुद्युतिनाशकः' का क्या अर्थ है?

केतु सूर्य (रवि) और चंद्र (इंदु) की द्युति (चमक) को नष्ट करते हैं। यह ग्रहण की ओर संकेत है - जब केतु सूर्य या चंद्र को ग्रसित करते हैं तो ग्रहण होता है।

8. 'मुकुन्दवरपात्रम्' का क्या अर्थ है?

मुकुन्द विष्णु का नाम है। केतु भगवान विष्णु के वरदान के पात्र हैं। जब स्वरभानु ने अमृत पीया, तब से वे अमर हो गए।

9. केतु किस दिशा के स्वामी हैं?

"दक्षिणामुखः" - केतु दक्षिण दिशा में मुख करके बैठते हैं। पूजा करते समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करें।

10. क्या यह स्तोत्र मोक्ष प्राप्ति में सहायक है?

हाँ, केतु मोक्ष के कारक हैं। "शाम्भवोऽशेषपूजितः" - वे शिव स्वरूप हैं और सभी देवों द्वारा पूजित हैं। इनकी आराधना से वैराग्य और आध्यात्मिक उन्नति होती है।