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Sri Ketu Panchavimshati Nama Stotram – श्री केतु पञ्चविंशतिनाम स्तोत्रम्

Sri Ketu Panchavimshati Nama Stotram – श्री केतु पञ्चविंशतिनाम स्तोत्रम्
॥ श्री केतु पञ्चविंशतिनाम स्तोत्रम् ॥ (स्कन्दपुराणान्तर्गतम्) केतुः कालः कलयिता धूम्रकेतुर्विवर्णकः । लोककेतुर्महाकेतुः सर्वकेतुर्भयप्रदः ॥ १ ॥ रौद्रो रुद्रप्रियो रुद्रः क्रूरकर्मा सुगन्धधृक् । पलाशधूमसङ्काशश्चित्रयज्ञोपवीतधृक् ॥ २ ॥ तारागणविमर्दी च जैमिनेयो ग्रहाधिपः । गणेशदेवो विघ्नेशो विषरोगार्तिनाशनः ॥ ३ ॥ प्रव्रज्यादो ज्ञानदश्च तीर्थयात्राप्रवर्तकः । पञ्चविंशतिनामानि केतोर्यः सततं पठेत् ॥ ४ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ तस्य नश्यति बाधा च सर्वाः केतुप्रसादतः । धनधान्यपशूनां च भवेद्वृद्धिर्न संशयः ॥ ५ ॥ ॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे श्री केतु पञ्चविंशतिनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

इस स्तोत्र का विशिष्ट महत्व

श्री केतु पञ्चविंशतिनाम स्तोत्रम् (Sri Ketu Panchavimshati Nama Stotram) स्कन्दपुराण में वर्णित केतु ग्रह के 25 दिव्य नामों का एक संक्षिप्त किन्तु अत्यंत शक्तिशाली स्तोत्र है।



इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि इसमें केतु को गणेशदेव और विघ्नेश कहा गया है, जो दर्शाता है कि केतु विघ्नों को नष्ट करने में गणेश जी के समान शक्तिशाली हैं। इसके अतिरिक्त, केतु को 'प्रव्रज्याद' (सन्न्यास देने वाले), 'ज्ञानद' (ज्ञान देने वाले) और 'तीर्थयात्राप्रवर्तक' (तीर्थयात्रा कराने वाले) कहा गया है - जो उनके आध्यात्मिक स्वरूप को दर्शाता है।

केतु के 25 दिव्य नाम (25 Names of Ketu)

इस स्तोत्र में वर्णित केतु के 25 नाम और उनके अर्थ:

  1. केतु - ध्वज, पताका वाले
  2. काल - समय स्वरूप
  3. कलयिता - गणना करने वाले
  4. धूम्रकेतु - धुएं के रंग की पताका वाले
  5. विवर्णक - वर्ण रहित, बेरंग
  6. लोककेतु - लोकों की पताका
  7. महाकेतु - महान पताका वाले
  8. सर्वकेतु - सभी की पताका
  9. भयप्रद - भय देने वाले
  10. रौद्र - रौद्र स्वरूप
  11. रुद्रप्रिय - रुद्र (शिव) को प्रिय
  12. रुद्र - रुद्र स्वरूप
  13. क्रूरकर्मा - क्रूर कर्म करने वाले
  14. सुगन्धधृक् - सुगंध धारण करने वाले
  15. पलाशधूमसंकाश - पलाश वृक्ष के धुएं जैसे
  16. चित्रयज्ञोपवीतधृक् - विचित्र जनेऊ धारण करने वाले
  17. तारागणविमर्दी - तारों के समूह को मर्दित करने वाले
  18. जैमिनेय - जैमिनि गोत्र वाले
  19. ग्रहाधिप - ग्रहों के अधिपति
  20. गणेशदेव - गणेश देवता स्वरूप
  21. विघ्नेश - विघ्नों के स्वामी (नाशक)
  22. विषरोगार्तिनाशन - विष, रोग और आर्ति को नष्ट करने वाले
  23. प्रव्रज्याद - सन्न्यास देने वाले
  24. ज्ञानद - ज्ञान देने वाले
  25. तीर्थयात्राप्रवर्तक - तीर्थयात्रा कराने वाले

स्तोत्र के प्रमुख लाभ (Benefits)

  • बाधा निवारण: "तस्य नश्यति बाधा च सर्वाः" - नियमित पाठ से सभी प्रकार की बाधाएं नष्ट हो जाती हैं।

  • धन वृद्धि: "धनधान्यपशूनां च भवेद्वृद्धिः" - धन, धान्य (अनाज) और पशुओं की वृद्धि होती है।

  • विघ्न नाश: केतु को 'गणेशदेव' और 'विघ्नेश' कहा गया है - वे सभी विघ्नों को नष्ट करते हैं।

  • रोग निवारण: "विषरोगार्तिनाशनः" - विष, रोग और पीड़ा का नाश होता है।

  • आध्यात्मिक उन्नति: 'प्रव्रज्याद', 'ज्ञानद' और 'तीर्थयात्राप्रवर्तक' - वैराग्य, ज्ञान और तीर्थयात्रा की प्राप्ति।

पाठ करने की विधि (Method of Chanting)

  • दिन: मंगलवार और शनिवार को विशेष फलदायी। केतु दशा/अंतर्दशा में प्रतिदिन पाठ करें।

  • समय: सांयकाल या रात्रि में पाठ करें।

  • नियमितता: फलश्रुति में कहा है "सततं पठेत्" - निरंतर (प्रतिदिन) पाठ करें।

  • दीप: सरसों के तेल का दीप जलाएं।

  • अर्पण: कुलथी दाल और चित्र-विचित्र वस्त्र अर्पित करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. केतु पञ्चविंशतिनाम स्तोत्र में कितने नाम हैं?

इस स्तोत्र में केतु ग्रह के 25 (पञ्चविंशति) दिव्य नाम हैं।

2. इस स्तोत्र का स्रोत क्या है?

यह स्तोत्र स्कन्दपुराण से लिया गया है, जो अठारह महापुराणों में सबसे बड़ा है।

3. केतु को 'गणेशदेव' और 'विघ्नेश' क्यों कहा गया है?

केतु विघ्नों को नष्ट करने में गणेश जी के समान शक्तिशाली हैं। दोनों ही विघ्नहर्ता हैं - गणेश जी शुभ कार्यों में और केतु ज्योतिषीय बाधाओं में।

4. 'धूम्रकेतु' का क्या अर्थ है?

धूम्र = धुआं, केतु = पताका। धुएं के रंग की पताका वाले। यह केतु के रंग और स्वरूप को दर्शाता है। धूम्रकेतु अग्नि का भी एक नाम है।

5. 'तारागणविमर्दी' का क्या तात्पर्य है?

केतु तारों के समूह को मर्दित (ढक देते/प्रभावित करते) हैं। खगोलशास्त्र में केतु जब किसी तारा मंडल से गुजरते हैं तो उसका प्रभाव परिवर्तित होता है।

6. केतु को 'रुद्रप्रिय' क्यों कहा गया है?

केतु भगवान शिव (रुद्र) को प्रिय हैं। शिव भक्तों पर केतु का प्रभाव सकारात्मक होता है। केतु स्वयं भी रुद्र स्वरूप हैं।

7. 'प्रव्रज्याद' का क्या अर्थ है?

प्रव्रज्या = संन्यास, सांसारिक त्याग। केतु संन्यास और वैराग्य प्रदान करते हैं। मोक्ष के कारक होने के कारण वे भौतिक बंधनों से मुक्ति दिलाते हैं।

8. 'चित्रयज्ञोपवीतधृक्' का क्या अर्थ है?

चित्र = विचित्र, यज्ञोपवीत = जनेऊ। केतु विचित्र (अनोखा, बहुरंगी) जनेऊ धारण करते हैं। यह उनके विलक्षण स्वरूप को दर्शाता है।

9. क्या यह स्तोत्र धन-धान्य वृद्धि में सहायक है?

हाँ, फलश्रुति में स्पष्ट है: "धनधान्यपशूनां च भवेद्वृद्धिर्न संशयः" - धन, अनाज और पशुओं की निश्चित वृद्धि होती है।

10. केतु को 'तीर्थयात्राप्रवर्तक' क्यों कहा गया है?

केतु मोक्ष के कारक हैं और आध्यात्मिक यात्राओं को प्रेरित करते हैं। कुंडली में केतु का शुभ प्रभाव तीर्थयात्राओं का योग देता है।