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Sri Kamakala Kali Sanjeevana Gadya Stotram – श्री कामकलाकाली सञ्जीवन गद्य स्तोत्रम्

Sri Kamakala Kali Sanjeevana Gadya Stotram – श्री कामकलाकाली सञ्जीवन गद्य स्तोत्रम्
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री कामकलाकाली सञ्जीवन गद्य स्तोत्रम् ॥ ॥ श्रीमहाकालसंहितायां द्वादशपटले ॥ ॥ महाकाल उवाच ॥ अथ वक्ष्ये महेशानि महापातकनाशनम् । गद्यं सहस्रनाम्नस्तु सञ्जीवनतया स्थितम् ॥ १ ॥ पठन् यत्सफलं कुर्यात् प्राक्तनं सकलं प्रिये । अपठन् विफलं तत्तत्तद्वस्तु कथयामि ते ॥ २ ॥ ॥ अथ गद्य स्तोत्रम् ॥ ओं फ्रें जय जय कामकलाकालि कपालिनि सिद्धिकरालि सिद्धिविकरालि महावलिनि त्रिशुलिनि नरमुण्डमालिनि शववाहिनि कात्यायनि महाट्‍टहासिनि सृष्टिस्थितिप्रलयकारिणि दितिदनुजमारिणि श्मशानचारिणि । महाघोररावे अध्यासितदावे अपरिमितबलप्रभावे । भैरवीयोगिनीडाकिनीसहवासिनि जगद्धासिनि स्वपदप्रकाशिनि । पापौघहारिणि आपदुद्धारिणि अपमृत्युवारिणि । बृहन्मद्यमानोदरि सकलसिद्धिकरि चतुर्दशभुवनेश्वरि । गुणातीतपरमसदाशिवमोहिनि अपवर्गरसदोहिनि रक्तार्णवलोहिनि । अष्टनागराजभूषितभुजदण्डे आकृष्टकोदण्डे परमप्रचण्डे । मनोवागगोचरे मखकोटिमन्त्रमयकलेवरे महाभीषणतरे प्रचलजटाभारभास्वरे सजलजलदमेदुरे जन्ममृत्युपाशभिदुरे सकलदैवतमयसिंहासनाधिरूढे गुह्यातिगुह्य परापरशक्तितत्त्वरूढे वाङ्मयीकृतमूढे । प्रकृत्यपरशिवनिर्वाणसाक्षिणि त्रिलोकीरक्षणि दैत्यदानवभक्षिणि । विकटदीर्घदंष्ट्र सञ्चूर्णितकोटिब्रह्मकपाले चन्द्रखण्डाङ्कितभाले देहप्रभाजितमेघजाले । नवपञ्चचक्रनयिनि महाभीमषोडशशयिनि सकलकुलाकुलचक्रप्रवर्तिनि निखिलरिपुदलकर्तिनि महामारीभयनिवर्तिनि लेलिहानरसनाकरालिनि त्रिलोकीपालिनि त्रयस्त्रिंशत्कोटिशस्त्रास्त्रशालिनि । प्रज्वलप्रज्वलनलोचने भवभयमोचने निखिलागमादेशितष्ठुसुरोचने । प्रपञ्चातीतनिष्कलतुरीयाकारे अखण्डानन्दाधारे निगमागमसारे । महाखेचरीसिद्धिविधायिनि निजपदप्रदायिनि महामायिनि घोराट्‍टहाससन्त्रासितत्रिभुवने चरणकमलद्वयविन्यासखर्वीकृतावने विहितभक्तावने । ओं क्लीं क्रों स्फ्रों हूं ह्रीं छ्रीं स्त्रीं फ्रें भगवति प्रसीद प्रसीद जय जय जीव जीव ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल हस हस नृत्य नृत्य क छ भगमालिनि भगप्रिये भगातुरे भगाङ्किते भगरूपिणि भगप्रदे भगलिङ्गद्राविणि । संहारभैरवसुरतरसलोलुपे व्योमकेशि पिङ्गकेशि महाशङ्खसमाकुले खर्परविहस्तहस्ते रक्तार्णवद्वीपप्रिये मदनोन्मादिनि । शुष्कनरकपालमालाभरणे विद्युत्कोटिसमप्रभे नरमांसखण्डकवलिनि । वमदग्निमुखि फेरुकोटिपरिवृते करतालिकात्रासितत्रिविष्टपे । नृत्य प्रसारितपादाघातपरिवर्तितभूवलये । पदभारावनम्रीकृतकमठशेषाभोगे । कुरुकुल्ले कुञ्चतुण्डि रक्तमुखि यमघण्टे चर्चिके । दैत्यासुर दैत्यराक्षस दानव कुष्माण्ड प्रेत भूत डाकिनी विनायक स्कन्द घोणक क्षेत्रपाल पिशाच ब्रह्मराक्षस वेताल गुह्यक सर्पनाग ग्रहनक्षत्रोत्पात चौराग्नि स्वापदयुद्धवज्रोपलाशनि वर्षविद्युन्मेघविषोपविष कपटकृत्याभिचार द्वेषवशीकरणोच्चाटनोन्मादापस्मार भूतप्रेतपिशाचावेश नदनदी समुद्रावर्तकान्तार घोरान्धकार महामारी बालग्रह हिंस्र सर्वस्वापहारि मायाविद्युद्दस्युवञ्चक दिवाचर रात्रिञ्चर सन्ध्याचर शृङ्गिनखि दंष्ट्रि विद्युदुल्कारण्यदरप्रान्तरादि नानाविधमहोपद्रवभञ्जनि । सर्वमन्त्रतन्त्रयन्त्र कुप्रयोगप्रमर्दिनि । षडाम्नाय समय विद्याप्रकाशिनि श्मशानाध्यासिनि । निजबल प्रभाव पराक्रम गुणवशीकृत कोटिब्रह्माण्डवर्ति भूतसङ्घे । विराड्रूपिणि सर्वदेवमहेश्वरि सर्वजनमनोरञ्जनि सर्वपापप्रणाशिनि अध्यात्मिकाधिदैविकाधिभौतिकादि विविधहृदयाधिनिर्दलिनि कैवल्यनिर्वाणवलिनि दक्षिणकालि भद्रकालि चण्डकालि कामकलाकालि कौलाचारव्रतिनि कौलाचारकूजिनि कुलधर्मसाधनि जगत्कारणकारिणि महारौद्रि रौद्रावतारे अबीजे नानाबीजे जगद्बीजे कालेश्वरि कालातीते त्रिकालस्थायिनि महाभैरवे भैरवगृहिणि जननि जनजनननिवर्तिनि प्रलयानलज्वालाजालजिह्वे विखर्वोरु फेरुपोतलालिनि मृत्युञ्जयहृदयानन्दकरि विलोलव्यालकुण्डल उलूकपक्षच्छत्रमहाडामरि नियुतवक्त्रबाहुचरणे सर्वभूतदमनि नीलाञ्जनसमप्रभे योगीन्द्र हृदयाम्बुजासनस्थित नीलकण्ठ देहार्धहारिणि षोडश कलान्तवासिनि हकारार्धचारिणि कालसङ्कर्षिणि कपालहस्ते मदघूर्णितलोचने निर्वाणदीक्षाप्रसादप्रदे निन्दानन्दाधिकारिणि मातृगणमध्यचारिणि त्रयस्त्रिंशत्कोटित्रिदश तेजोमयविग्रहे प्रलयाग्निरोचिनि विश्वकर्त्रि विश्वाराध्ये विश्वजननि विश्वसंहारिणि विश्वव्यापिके विश्वेश्वरि निरुपमे निर्विकारे निरञ्जने निरीहे निस्तरङ्गे निराकारे परमेश्वरि परमानन्दे परापरे प्रकृतिपुरुषात्मिके प्रत्ययगोचरे प्रमाणभूते प्रणवस्वरूपे संसारसारे सच्चिदानन्दे सनातनि सकले सकलकलातीते सामरस्यसमयिनि केवले कैवल्यरूपे कल्पनातिगे काललोपिनि कामरहिते कामकलाकालि भगवति ॥ ओं ख्फ्रें ह्सौः सौः श्रीं ऐं ह्रौं क्रों स्फ्रों सर्वसिद्धिं देहि देहि मनोरथान् पूरय पूरय मुक्तिं नियोजय नियोजय भवपाशं समुन्मूलय समुन्मूलय जन्ममृत्यू तारय तारय परविद्यां प्रकाशय प्रकाशय अपवर्गं निर्माहि निर्माहि संसारदुःखं यातनां विच्छेदय विच्छेदय पापानि संशमय संशमय चतुर्वर्गं साधय साधय ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रैं ह्रौं यान् वयं द्विष्मो ये चास्मान् विद्विषन्ति तान् सर्वान् विनाशय विनाशय मारय मारय शोषय शोषय क्षोभय क्षोभय मयि कृपां निवेशय निवेशय फ्रें ख्फ्रें हस्फ्रें ह्स्ख्फ्रें हूं स्फ्रों क्लीं ह्रीं जय जय चराचरात्मक ब्रह्माण्डोदरवर्ति भूतसङ्घाराधिते प्रसीद प्रसीद तुभ्यं देवि नमस्ते नमस्ते नमस्ते ॥ ॥ फलश्रुति ॥ इतीदं गद्यमुदितं मन्त्ररूपं वरानने । सहस्रनामस्तोत्रस्य आदावन्ते च योजयेत् ॥ ३ ॥ अशक्नुवानौ द्वौ वारौ पठेच्छेष इमं स्तवम् । सहस्रनामस्तोत्रस्य तदैव प्राप्यते फलम् ॥ ४ ॥ अपठन् गद्यमेतत्तु तत्फलं न समाप्नुयात् । यत्फलं स्तोत्रराजस्य पाठेनाप्नोति साधकः । तत्फलं गद्यपाठेन लभते नात्र संशयः ॥ ५ ॥ ॥ इति महाकालसंहितायां द्वादशतमः पटले श्री कामकलाकाली सञ्जीवन गद्य स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

सञ्जीवन गद्य स्तोत्र परिचय

श्री कामकलाकाली सञ्जीवन गद्य स्तोत्रम् महाकाल संहिता के द्वादश पटल से एक अत्यंत विशिष्ट और शक्तिशाली स्तोत्र है। यह गद्य रूप में है, अर्थात् छंद में नहीं बल्कि मंत्रात्मक गद्य में रचित है।
इस स्तोत्र का नाम "सञ्जीवन" (जीवन देने वाला) इसलिए है क्योंकि यह सहस्रनाम को सजीव करता है। महाकाल कहते हैं - "गद्यं सहस्रनाम्नस्तु सञ्जीवनतया स्थितम्" - यह गद्य सहस्रनाम का प्राण है।
इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि जो व्यक्ति पूर्ण सहस्रनाम (157 श्लोक) पढ़ने में असमर्थ है, वह केवल दो बार इस गद्य का पाठ करने से सहस्रनाम के समान फल प्राप्त करता है।

स्तोत्र विवरण

ग्रंथश्रीमहाकाल संहिता - द्वादश पटल
रूपगद्य (मंत्रात्मक गद्य, छंदबद्ध नहीं)
देवताश्रीकामकलाकाली
मुख्य बीज मंत्रफ्रें, क्लीं, क्रों, स्फ्रों, हूं, ह्रीं
प्रयोजनसहस्रनाम का सार - सञ्जीवन (प्राणवान करना)
पाठ संख्या2 बार (सहस्रनाम के समान फल)
विशेष प्रयोगसहस्रनाम के आदि और अंत में

गद्य स्तोत्र की संरचना

यह स्तोत्र तीन मुख्य भागों में विभाजित है:
भागआरंभविषय
प्रथम भागओं फ्रें जय जय...माँ के विविध नाम और गुण - कपालिनी, सिद्धिकरालि, श्मशानचारिणि आदि
द्वितीय भागओं क्लीं क्रों स्फ्रों...विविध बीज मंत्र, भग नाम, रक्षा मंत्र, उपद्रव नाश
तृतीय भागओं ख्फ्रें ह्सौः...याचना मंत्र - सिद्धि, मोक्ष, पापनाश, शत्रुनाश की प्रार्थना

प्रमुख बीज मंत्र

बीजनामशक्ति
फ्रेंफ्रेंकार बीजकामकला काली का मूल बीज
क्लींकामबीजआकर्षण शक्ति
क्रोंक्रोधबीजशत्रुनाश
स्फ्रोंस्फोट बीजविस्तार, प्रसार शक्ति
हूंकीलक बीजरक्षा, भैरव शक्ति
ह्रींमायाबीजभुवनेश्वरी शक्ति
ख्फ्रेंविशेष बीजयाचना शक्ति

याचना मंत्र (तृतीय भाग)

तृतीय भाग में माँ से विविध प्रार्थनाएं हैं:
  • सर्वसिद्धिं देहि देहि - सभी सिद्धियाँ प्रदान करो
  • मनोरथान् पूरय पूरय - मनोकामनाएं पूर्ण करो
  • मुक्तिं नियोजय नियोजय - मोक्ष में नियुक्त करो
  • भवपाशं समुन्मूलय - संसार बंधन उखाड़ दो
  • जन्ममृत्यू तारय तारय - जन्म-मृत्यु से तारो
  • परविद्यां प्रकाशय - परम विद्या प्रकाशित करो
  • पापानि संशमय - पाप शांत करो
  • चतुर्वर्गं साधय - धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष साधो

पाठ विधि

दो प्रकार से पाठ किया जाता है:
  • सहस्रनाम के साथ: सहस्रनाम के आरंभ में और अंत में इस गद्य का पाठ करें - "सहस्रनामस्तोत्रस्य आदावन्ते च योजयेत्"
  • स्वतंत्र पाठ: जो सहस्रनाम पढ़ने में असमर्थ है, वह केवल 2 बार इस गद्य का पाठ करे - "अशक्नुवानौ द्वौ वारौ पठेच्छेष इमं स्तवम्"
समय: रात्रि (निशीथ), अमावस्या, काली चतुर्दशी
आसन: काला या लाल आसन

गद्य स्तोत्र क्यों महत्वपूर्ण?

महाकाल स्पष्ट कहते हैं:
  • "अपठन् गद्यमेतत्तु तत्फलं न समाप्नुयात्" - इस गद्य को पढ़े बिना सहस्रनाम का पूर्ण फल नहीं मिलता
  • "पठन् यत्सफलं कुर्यात् प्राक्तनं सकलं" - इसे पढ़ने से पूर्व कर्मों का फल मिलता है
  • "महापातकनाशनम्" - यह महापातकों का नाश करता है

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. सञ्जीवन का क्या अर्थ है?

सञ्जीवन का अर्थ है "जीवन देने वाला" या "प्राण देने वाला"। यह गद्य स्तोत्र सहस्रनाम को सजीव करता है, इसलिए इसे सञ्जीवन कहा गया। जैसे प्राण के बिना शरीर मृत है, वैसे ही इस गद्य के बिना सहस्रनाम का पूर्ण फल नहीं मिलता।

2. गद्य और पद्य में क्या अंतर है?

पद्य छंदबद्ध होता है (जैसे श्लोक) जिसमें निश्चित मात्रा और तुक होती है। गद्य छंद से मुक्त होता है। यह स्तोत्र गद्य में है लेकिन मंत्रात्मक है - इसमें बीज मंत्रों की पुनरावृत्ति और विशेष शब्द संयोजन है जो इसे शक्तिशाली बनाता है।

3. क्या यह सहस्रनाम का विकल्प है?

हाँ और नहीं दोनों। जो व्यक्ति सहस्रनाम पढ़ने में असमर्थ है (अशक्नुवान्), उसके लिए यह 2 बार पाठ से सहस्रनाम के समान फल देता है। लेकिन जो सक्षम है उसे सहस्रनाम के आदि और अंत में इसे अवश्य पढ़ना चाहिए।

4. "फ्रें" बीज का क्या महत्व है?

फ्रें (फ्रेंकार) कामकला काली का विशेष बीज मंत्र है। यह अन्य काली मंत्रों में कम प्रयुक्त होता है। इसका उच्चारण "फ्" + "र" + "ें" (अनुस्वार सहित) है। यह शक्तिशाली तांत्रिक बीज है जो इस गद्य की शुरुआत में आता है।

5. इसमें शत्रुनाश मंत्र क्यों है?

तृतीय भाग में "यान् वयं द्विष्मो ये चास्मान् विद्विषन्ति तान् सर्वान् विनाशय" आता है जिसका अर्थ है - जिनसे हम द्वेष करते हैं और जो हमसे द्वेष करते हैं, उन सबका नाश करो। यह आत्मरक्षा के लिए है और तांत्रिक साधना में शत्रु भाव से मुक्ति के लिए आवश्यक है।

6. क्या गृहस्थ इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ। यह सार्वभौमिक स्तोत्र है। भक्तिपूर्वक पाठ से सभी को लाभ मिलता है। विशेष तांत्रिक प्रयोग के लिए गुरु मार्गदर्शन उचित है, लेकिन सामान्य पाठ के लिए कोई प्रतिबंध नहीं है।

7. "नानाविधमहोपद्रवभञ्जनि" का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है "अनेक प्रकार के महान उपद्रवों को तोड़ने वाली"। इससे पहले विभिन्न उपद्रवों की सूची है - दैत्य, राक्षस, भूत-प्रेत, चोर, अग्नि, विष, अभिचार, महामारी आदि। माँ इन सभी से रक्षा करती हैं।

8. "हस हस नृत्य नृत्य" क्यों कहा?

यह माँ काली की आनंदमयी प्रकृति का वर्णन है। "हस" = हंसो/हंसती रहो, "नृत्य" = नृत्य करो। काली का अट्टहास और तांडव उनके संहारक और आनंदमय स्वरूप का प्रतीक है। भक्त माँ से उनके इस स्वरूप को प्रकट करने की प्रार्थना करता है।

9. इस स्तोत्र में कितने काली रूप हैं?

इसमें चार मुख्य काली रूप उल्लिखित हैं - दक्षिणकालि (सौम्य काली), भद्रकालि (शुभ काली), चण्डकालि (उग्र काली), और कामकलाकालि (मुख्य देवता)। ये सभी काली की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।

10. "प्रसीद प्रसीद तुभ्यं देवि नमस्ते" अंत में क्यों?

यह शरणागति और नम्रता की अभिव्यक्ति है। पूरे स्तोत्र में मंत्र, याचना और प्रार्थना के बाद भक्त अंत में कहता है - "हे देवि! प्रसन्न होइए, प्रसन्न होइए। आपको नमस्कार है, नमस्कार है, नमस्कार है।" तीन बार नमस्कार तन-मन-वचन से समर्पण का प्रतीक है।