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Sri Kalika Stotram – श्री कालिका स्तोत्रम्

Sri Kalika Stotram – श्री कालिका स्तोत्रम्
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री कालिका स्तोत्रम् ॥ ॥ श्रीदेव्युवाच ॥ स्वामिन् सर्वजगन्नाथ प्रणतार्तिविनाशन । कालिकायाः महास्तोत्रं ब्रूहि भक्तेष्टदायकम् ॥ १ ॥ (श्री देवी ने कहा: हे स्वामिन्! हे सर्वजगन्नाथ! हे शरणागतों के दुःख का नाश करने वाले! मुझे माँ कालिका का वह महास्तोत्र बताइए जो भक्तों की अभीष्ट कामनाओं को पूर्ण करने वाला हो।) ॥ श्रीदक्षिणामूर्तिरुवाच ॥ एवं कालीं महादेवीं सम्पूज्य नरपुङ्गवः । स्तोत्रं जपेदिदं नित्यं कालिकाया महेश्वरि ॥ २ ॥ (श्री दक्षिणामूर्ति ने कहा: हे महेश्वरि! श्रेष्ठ मनुष्य को चाहिए कि वह महादेवी काली की पूजा करके नित्य इस कालिका स्तोत्र का जप करे।) ॥ स्तोत्रम् ॥ ओं क्रीम् । जय त्वं कालिके देवि जय मातर्महेश्वरि । जय दिव्ये महालक्ष्मि महाकालि नमोऽस्तु ते ॥ ३ ॥ (ॐ क्रीं। हे देवि कालिके! तुम्हारी जय हो। हे माता महेश्वरी! तुम्हारी जय हो। हे दिव्य महालक्ष्मी! हे महाकाली! तुम्हें नमस्कार है।) मुक्तकेशि नमस्तेऽस्तु नमस्तुभ्यं चतुर्भुजे । वीरकालि नमस्तुभ्यं मृत्युकालि नमो नमः ॥ ४ ॥ (हे मुक्तकेशी (खुले बालों वाली)! तुम्हें नमस्कार है। हे चतुर्भुजे! तुम्हें नमस्कार है। हे वीरकाली! तुम्हें नमस्कार है। हे मृत्युकाली! तुम्हें बार-बार नमस्कार है।) नमः करालवदने नमस्ते घोररूपिणि । भद्रकालि नमस्तुभ्यं महाकालप्रिये नमः ॥ ५ ॥ (हे करालवदने (भयंकर मुख वाली)! तुम्हें नमस्कार है। हे घोररूपिणी! तुम्हें नमस्कार है। हे भद्रकाली! तुम्हें नमस्कार है। हे महाकालप्रिये (शिव की प्रिय)! तुम्हें नमस्कार है।) जय त्वं सर्वविद्यानामधीश्वरि शिवप्रिये । वागीश्वरि महादेवि नमस्तुभ्यं दिगम्बरे ॥ ६ ॥ (हे शिवप्रिये! तुम समस्त विद्याओं की अधीश्वरी हो, तुम्हारी जय हो। हे वागीश्वरी (वाणी की देवी)! हे महादेवि! हे दिगम्बरे! तुम्हें नमस्कार है।) नीलमेघप्रतीकाशे नीलाम्बरविराजिते । आदिमध्यान्तरहिते नमस्ते गणकालिके ॥ ७ ॥ (नीले मेघ के समान आभा वाली, नीले वस्त्रों से सुशोभित, और आदि-मध्य-अंत से रहित हे गणकालिके! तुम्हें नमस्कार है।) सर्वसम्पत्प्रदे नित्यं सर्वोपद्रवनाशिनि । महामाये महाकृष्णे भक्तशत्रुविनाशिनि ॥ ८ ॥ (तुम नित्य सम्पूर्ण सम्पदाओं को देने वाली और सभी उपद्रवों का नाश करने वाली हो। हे महामाये! हे महाकृष्णे! हे भक्तों के शत्रुओं का नाश करने वाली! तुम्हें नमस्कार है।) जगन्मातर्जगद्रूपे विरूपाक्षि नमोऽस्तु ते । सिंहारूढे नमस्तुभ्यं गजारूढे नमो नमः ॥ ९ ॥ (हे जगन्माता! हे जगद्रूपा! हे विरूपाक्षी (त्रिनेत्रा)! तुम्हें नमस्कार है। हे सिंहारूढा! तुम्हें नमस्कार है। हे गजारूढा! तुम्हें बार-बार नमस्कार है।) नमो भद्राङ्गि रक्ताक्षि महादेवस्वरूपिणि । निरीश्वरि निराधारे निरालम्बे नमो नमः ॥ १० ॥ (हे भद्रांगी! हे रक्ताक्षी (लाल नेत्र वाली)! हे महादेवस्वरूपिणी! तुम्हें नमस्कार है। हे निरीश्वरी (सर्वोच्च सत्ता)! हे निराधारे! हे निरालम्बे! तुम्हें बार-बार नमस्कार है।) निर्गुणे सगुणे तुभ्यं नमस्तेऽस्तु सरस्वति । नीलकेशि नमस्तुभ्यं व्योमकेशि नमोऽस्तु ते ॥ ११ ॥ (हे निर्गुणा! हे सगुणा! हे सरस्वती! तुम्हें नमस्कार है। हे नीलकेशी! तुम्हें नमस्कार है। हे व्योमकेशी (आकाश रूपी बालों वाली)! तुम्हें नमस्कार है।) नमस्ते पार्वतीरूपे नम उत्तरकालिके । नमस्ते चण्डयोगेशि चण्डास्ये चण्डनायिके ॥ १२ ॥ (हे पार्वतीस्वरूपा! तुम्हें नमस्कार है। हे उत्तरकालिके! तुम्हें नमस्कार है। हे चण्डयोगेश्वरी! हे चण्डमुखे! हे चण्डनायिके! तुम्हें नमस्कार है।) जय त्वं चण्डिके भद्रे चामुण्डे त्वां नमाम्यहम् । नमस्तुभ्यं महाकाये नमस्ते मातृसंस्तुते ॥ १३ ॥ (हे चण्डिके! हे भद्रे! तुम्हारी जय हो। हे चामुण्डे! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ। हे महाकाये! तुम्हें नमस्कार है। हे मातृगणों द्वारा स्तुत देवि! तुम्हें नमस्कार है।) नमस्ते सिद्धसंस्तुत्ये हरिरुद्रादिपूजिते । कालिके त्वां नमस्यामि तवोक्तं गिरिसम्भवे ॥ १४ ॥ (हे सिद्धों द्वारा स्तुत और विष्णु-रुद्रादि द्वारा पूजित देवि! तुम्हें नमस्कार है। हे गिरिसम्भवे (पर्वतराज पुत्री) कालिके! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ।) ॥ फलश्रुति ॥ य एतन्नित्यमेकाग्रः प्रजपेन्मानवोत्तमः । स मुच्यते महापापैर्जन्मकोटिसमुद्भवैः ॥ १५ ॥ (जो उत्तम मनुष्य एकाग्रचित्त होकर नित्य इस स्तोत्र का जप करता है, वह करोड़ों जन्मों के महापापों से मुक्त हो जाता है।) व्याचष्टे सर्वशास्त्राणि विवादे जयमाप्नुयात् । मूकोऽपि ब्रह्मसदृशो विद्यया भवति ध्रुवम् ॥ १६ ॥ (वह समस्त शास्त्रों की व्याख्या करने में समर्थ होता है और विवाद (शास्त्रार्थ/मुकदमे) में विजय प्राप्त करता है। गूंगा व्यक्ति भी विद्या में निश्चय ही ब्रह्म (बृहस्पति) के समान हो जाता है।) एकेन श्रवणेनैव ग्रहेद्वेदचतुष्टयम् । महाकविर्भवेन्मन्त्री लभते महतीं श्रियम् ॥ १७ ॥ (इसके एक बार श्रवण मात्र से चारों वेदों का ज्ञान ग्राह्य हो जाता है। वह साधक महाकवि बन जाता है और उसे महान ऐश्वर्य (श्री) की प्राप्ति होती है।) जगत्त्रयं वशीकुर्यात् महासौन्दर्यवान् भवेत् । अष्टैश्वर्याण्यवाप्नोति पुत्रान् पौत्राननुत्तमान् । देवीसामीप्यमाप्नोति अन्ते नात्र विचारणा ॥ १८ ॥ (वह तीनों लोकों को वश में कर लेता है और महासौन्दर्यवान हो जाता है। उसे अष्ट-सिद्धियाँ और उत्तम पुत्र-पौत्र प्राप्त होते हैं। अंत में वह देवी का सामीप्य (मोक्ष) प्राप्त करता है, इसमें कोई संदेह नहीं है।) ॥ इति श्रीत्रिपुरसुन्दरीतन्त्रे दक्षिणामूर्तिसंहितायां श्री कालिका स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र परिचय

श्री कालिका स्तोत्रम् का वर्णन त्रिपुरसुन्दरी तन्त्र में मिलता है। यह स्तोत्र भगवान दक्षिणामूर्ति (शिव के जगतगुरु स्वरूप) द्वारा उपदिष्ट है। जब देवी ने भक्तों के कल्याण और अभीष्ट सिद्धि के लिए मार्ग पूछा, तब शिव ने इस परम गोपनीय स्तोत्र का रहस्योद्घाटन किया। यह स्तोत्र छोटा होते हुए भी अत्यंत सारगर्भित और शक्तिशाली है।

तन्त्र: त्रिपुरसुन्दरी तन्त्र
वक्ता: श्री दक्षिणामूर्ति
श्रोता: देवी (गिरिसम्भवा)
देवता: श्री कालिका
विशेषता: वाक सिद्धि (Eloquence) और विद्या प्राप्ति

महत्व और लाभ

इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक 15-18) में इसके अद्भुत लाभ बताए गए हैं:
  • वाक सिद्धि (Speech): श्लोक 6 में माँ को 'वागीश्वरी' और 'सरस्वती' (श्लोक 11) कहा गया है। इसके पाठ से मूक (गूंगा) व्यक्ति भी ब्रह्म के समान ज्ञानी और वाचाल हो जाता है।
  • शास्त्र ज्ञान: साधक सभी शास्त्रों की व्याख्या करने में समर्थ हो जाता है (व्याचष्टे सर्वशास्त्राणि)।
  • वाद-विवाद में विजय: किसी भी शास्त्रार्थ या मुकदमे (विवादे) में निश्चित विजय प्राप्त होती है।
  • महाकवि: साधक एक महान कवि और विद्वान बनता है।
  • अष्ट ऐश्वर्य: आठ प्रकार की सिद्धियाँ और अपार धन-संपदा (महतीं श्रियम्) प्राप्त होती है।
  • मोक्ष: अंत में साधक देवी का सामीप्य (मोक्ष) प्राप्त करता है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. यह कालिका स्तोत्र अन्य स्तोत्रों से कैसे भिन्न है?

यह स्तोत्र विशेष रूप से 'विद्या' और 'वाणी' (Knowledge and Speech) की प्राप्ति के लिए है। इसमें माँ काली को सरस्वती, वागीश्वरी और सर्वविद्यानामधीश्वरी के रूप में पूजा गया है।

2. इसके वक्ता कौन हैं?

इसके वक्ता भगवान दक्षिणामूर्ति हैं, जो भगवान शिव का ज्ञानदाता और गुरु स्वरूप हैं।

3. क्या यह स्तोत्र विद्यार्थियों के लिए लाभदायक है?

हाँ, यह विद्यार्थियों (Students) के लिए अत्यंत लाभकारी है। श्लोक 17 में कहा गया है कि जिसे एक बार सुनने से ही चारों वेदों का ज्ञान हो जाए, ऐसी बुद्धि इससे प्राप्त होती है।

4. 'क्रीम्' (क्रीं) बीज का क्या महत्व है?

स्तोत्र के प्रारम्भ में 'पों क्रीम्' (ॐ क्रीं) बीजमंत्र का प्रयोग हुआ है, जो माँ काली का एकाक्षरी बीज मंत्र है। यह चैतन्य और शक्ति का प्रतीक है।

5. 'निरीश्वरी' शब्द का क्या अर्थ है?

श्लोक 10 में माँ को 'निरीश्वरी' कहा गया है, जिसका अर्थ है 'जिसका कोई अन्य ईश्वर (स्वामी) न हो'। वे स्वयं सर्वोच्च सत्ता हैं।

6. क्या इसका पाठ प्रतिदिन करना चाहिए?

हाँ, श्लोक 2 में 'जपेदिदं नित्यं' (इसे नित्य जपना चाहिए) का स्पष्ट निर्देश है।

7. क्या इससे धन की प्राप्ति होती है?

हाँ, यह 'सर्वसम्पत्प्रदे' (श्लोक 8) और 'महतीं श्रियम्' (महान लक्ष्मी) प्रदान करने वाला है।

8. 'दिगम्बरा' का अर्थ क्या है?

'दिगम्बरा' का अर्थ है 'दिशाएं ही जिसका वस्त्र हैं'। यह माँ के असीम और निर्गुण स्वरूप को दर्शाता है जो किसी भी भौतिक सीमा में नहीं बंधा है।

9. क्या इसके लिए किसी विशेष नियम की आवश्यकता है?

सामान्य पवित्रता और एकाग्रता (एकाग्रः - श्लोक 15) ही मुख्य नियम है। इसे भक्ति भाव से कभी भी पढ़ा जा सकता है।

10. इस स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?

इसमें कुल 18 श्लोक हैं (14 स्तुति के और 4 फलश्रुति के)। यह एक लघु परन्तु सिद्ध स्तोत्र है।