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Sri Kali Aparadha Kshamapana Stotram – श्री काली अपराधक्षमापण स्तोत्रम्

Sri Kali Aparadha Kshamapana Stotram – श्री काली अपराधक्षमापण स्तोत्रम्
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री काली अपराधक्षमापण स्तोत्रम् ॥ ॥ पूर्व जन्म अपराध (श्लोक १) ॥ प्राग्देहस्थोय दाहं तव चरण युगान्नाश्रितो नार्चितोऽहं तेनाद्या कीर्तिवर्गेर्जठरजदहनैर्बाद्ध्यमानो बलिष्ठैः । क्षिप्त्वा जन्मान्तरान्नः पुनरिहभविता क्वाश्रयः क्वापि सेवा क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ १ ॥ ॥ बाल्यकाल अपराध (श्लोक २) ॥ बाल्येवालाभिलायैर्जडित जडमतिर्बाललीला प्रसक्तो न त्वां जानामि मातः कलिकलुषहरा भोगमोक्ष प्रदात्रीम् । नाचारो नैव पूजा न च यजन कथा न स्मृतिर्नैव सेवा क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ २ ॥ ॥ यौवन अपराध (श्लोक ३) ॥ प्राप्तोऽहं यौवनं चेद्विषधर सदृशैरिन्द्रियैर्दृष्ट गात्रो नष्ट प्रज्ञः परस्त्री परधन हरणे सर्वदा साभिलाषः । त्वत्पादाम्भोजयुग्मं क्षणमपि मनसा न स्मृतोऽहं कदापि क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ ३ ॥ ॥ प्रौढ़ावस्था अपराध (श्लोक ४) ॥ प्रौढो भिक्षाभिलाषी सुत दुहितृ कलत्रार्थमन्नादि चेष्ट क्व प्राप्स्ये कुत्रयामी त्वनुदिनमनिशं चिन्तयामग्न देहः । नोतेध्यानन्त चास्था न च भजन विधिन्नाम सङ्कीर्तनं वा क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ ४ ॥ ॥ वृद्धावस्था अपराध (श्लोक ५) ॥ वृद्धत्वे बुद्धिहीनः कृश विवशतनुः श्वासकासातिसारैः कर्णनिहोऽक्षिहीनः प्रगलित दशनः क्षुत्पिपासाभिभूतः । पश्चात्तापेनदग्धो मरणमनुदिनं ध्येय मात्रन्नचान्यत् क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ ५ ॥ ॥ पूजा-भक्ति का अभाव (श्लोक ६-७) ॥ कृत्वास्नानं दिनादौ क्वचिदपि सलिलं नोकृतं नैव पुष्पं ते नैवेद्यादिकं च क्वचिदपि न कृतं नापिभावो न भक्तिः । न न्यासो नैव पूजां न च गुण कथनं नापि चार्चाकृता ते क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ ६ ॥ जानामि त्वां न चाहं भवभयहरणीं सर्वसिद्धिप्रदात्रीं नित्यानन्दोदयाढ्यां त्रितय गुणमयी नित्यशुद्धोदयाढ्याम् । मिथ्याकर्माभिलाषैरनुदिनमभितः पीडितो दुःख सङ्घैः क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ ७ ॥ ॥ देवी स्वरूप वर्णन (श्लोक ८) ॥ कालाभ्रां श्यामालाङ्गीं विगलित चिकुरा खड्गमुण्डाभिरामां त्रास त्राणेष्टदात्रीं कुणपगणशिरो मालिनीं दीर्घनेत्राम् । संसारस्यैकसारां भवजन न हराम्भावितोभावनाभिः क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ ८ ॥ ॥ भाग्यहीनता का विलाप (श्लोक ९-१२) ॥ ब्रह्मा विष्णुस्तथेशः परिणमति सदा त्वत्पदाम्भोज युक्तं भाग्याभावान्न चाहं भवजननि भवत्पादयुग्मं भजामि । नित्यं लोभ प्रलोभैः कृतविशमतिः कामुकस्त्वां प्रयाषे क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ ९ ॥ रागद्वेषैः प्रमत्तः कलुषयुततनुः कामनाभोगलुब्धः कार्याकार्या विचारी कुलमति रहितः कौलसङ्घैर्विहीनः । क्व ध्यानम् ते क्व चार्चा क्व मनुजपनन्नैव किञ्चित् कृतोऽहं क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ १० ॥ रोगी दुःखी दरिद्रः परवशकृपणः पांशुलः पाप चेता निद्रालस्य प्रसक्ताः सुजठरभरणे व्याकुलः कल्पितात्मा । किं ते पूजा विधानं त्वयि क्वचनुमतिः क्वानुरागः क्वचास्था क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ ११ ॥ मिथ्या व्यामोह रागैः परिवृतमनसः क्लेशसङ्घान्वितस्य क्षुन्निद्रौघान्वितस्य स्मरण विरहिणः पापकर्म प्रवृत्तेः । दारिद्र्यस्य क्व धर्मः क्व च जननिरुचिः क्व स्थितिः साधुसङ्घैः क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ १२ ॥ ॥ देवी तत्त्व ज्ञान (श्लोक १३-१५) ॥ मातस्तातस्यदेहाज्जननि जठरगः संस्थितस्त्वद्वशेहन् त्वं हर्ता कारयित्री करण गुणमयी कर्महेतु स्वरूपा । त्वं बुद्धिश्चित्त संस्थाप्यहमतिभवती सर्वमेतत् क्षमस्व क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ १३ ॥ त्वं भूमिस्त्वं जलं च त्वमसि हुतवहस्त्वं जगद्वायुरूपा त्वं चाकाशं मनश्च प्रकृतिरसि महत्पूर्विका पूर्वपूर्वा । आत्मा त्वं चाऽसि मातः परमसि भवती त्वत्परन्नैव किञ्चित् क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ १४ ॥ त्वं काली त्वं च तारा त्वमसि गिरिसुता सुन्दरी भैरवी त्वं त्वं दुर्गा छिन्नमस्ता त्वमसि च भुवना त्वं हि लक्ष्मीः शिवा त्वम् । धूमा मातङ्गिनी त्वं त्वमसि च बगला मङ्गलादिस्तवाख्या क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले ॥ १५ ॥ ॥ फलश्रुति (श्लोक १६-१७) ॥ स्तोत्रेणानेन देवीं परिणमति जनो यः सदाभक्तियुक्तो दुष्कृत्यादुर्ग सङ्घं परितरति शतं विघ्नतां नाशमेति । नाधिर्व्याधि कदाचिद्भवति यदि पुनः सर्वदा साऽपराधः सर्वं तत् कामरूपे त्रिभुवनजननि क्षामये पुत्र बुद्ध्या ॥ १६ ॥ ज्ञाता वक्ता कवीशो भवति धनपतिर्दानशीलो दयात्मा निष्पापी निष्कलङ्की कुलपति कुशलः सत्यवाग्धार्मिकश्च । नित्यानन्दो दयाढ्यः पशुगणविमुखः सत्पथा चारुशीलः संसाराब्धिं सुकेन प्रतरति गिरिजा पादयुग्मावलम्बात् ॥ १७ ॥ ॥ इति श्री काली अपराधक्षमापण स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

परिचय - स्तोत्र का महत्व

श्री काली अपराध क्षमापण स्तोत्रम् भारतीय आध्यात्मिक साहित्य की एक अनमोल धरोहर है। यह केवल एक स्तोत्र नहीं, बल्कि आत्म-निरीक्षण और पश्चाताप का एक गहन मार्ग है।
इस स्तोत्र की विशेषता यह है कि यह मनुष्य के सम्पूर्ण जीवन-चक्र को समेटता है - जन्म से पूर्व से लेकर मृत्यु-शय्या तक। भक्त स्वीकार करता है कि जीवन के हर चरण में उसने माँ की उपेक्षा की है, और अब वह पश्चाताप के साथ क्षमा माँगता है।

मूल पंक्ति: "क्षन्तव्यो मेऽपराधः प्रकटित वदने कामरूपे कराले"
अर्थ: हे प्रकट वदनवाली! हे कामरूप की करालवदना! मेरा अपराध क्षमा करें।

यह पंक्ति हर श्लोक के अंत में आती है, जो भक्त की निरंतर क्षमा-याचना को दर्शाती है।

कामरूप और कामाख्या - ऐतिहासिक संदर्भ

कामरूप असम का प्राचीन नाम है, जो ५१ शक्तिपीठों में सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। यहाँ माँ सती की योनि गिरी थी, इसलिए यह "योनिपीठ" भी कहलाता है।
कामाख्या मंदिर नीलाचल पर्वत पर स्थित है, जहाँ माँ की पूजा तांत्रिक विधि से होती है। यह स्तोत्र इसी परंपरा से जुड़ा है।
"कराले" का अर्थ है भयंकर या उग्र मुखवाली। यह माँ काली के उस स्वरूप को संबोधित करता है जो अपराधियों के लिए भयंकर है, परंतु भक्तों के लिए करुणामयी।

जीवन-चक्र के अपराध - विस्तृत विवेचन

अवस्थाश्लोकअपराधमूल कारण
पूर्व जन्म1चरण-सेवा नहीं कीसंचित कर्म, अज्ञान
बाल्यकाल2खेल में लगा रहाजड़मति, बाललीला
यौवन3परस्त्री-परधन लोलुपताविषधर-समान इन्द्रियाँ
प्रौढ़ावस्था4परिवार-चिंता में डूबागृहस्थ धर्म का बोझ
वृद्धावस्था5रोगग्रस्त, पश्चातापशरीर की दुर्बलता

गहन अर्थ: यह स्तोत्र सिखाता है कि जीवन के हर चरण में कोई न कोई माया हमें ईश्वर से दूर करती है। बचपन में खेल, यौवन में काम, प्रौढ़ता में परिवार, और वृद्धावस्था में रोग। केवल पश्चाताप से ही इन सबसे मुक्ति संभव है।

महत्वपूर्ण श्लोकों का अर्थ

श्लोक ३ (यौवन):
"विषधर सदृशैरिन्द्रियैर्दृष्ट गात्रो"
अर्थ: यौवन में इन्द्रियाँ सर्प के समान विषैली हो जाती हैं और मनुष्य को परस्त्री और परधन की ओर खींचती हैं।
श्लोक ९ (भाग्यहीनता):
"ब्रह्मा विष्णुस्तथेशः परिणमति सदा त्वत्पदाम्भोज युक्तं"
अर्थ: ब्रह्मा, विष्णु और शिव भी माँ के चरणों में लीन रहते हैं, परंतु मैं भाग्यहीन होने के कारण उनकी भक्ति नहीं कर पाया।
श्लोक १३ (आत्म-समर्पण):
"त्वं हर्ता कारयित्री करण गुणमयी कर्महेतु स्वरूपा"
अर्थ: हे माँ! तुम्हीं कर्ता हो, तुम्हीं करानेवाली हो। इन्द्रियाँ, गुण और कर्म - सब तुम्हारे स्वरूप हैं। अतः मेरे अपराध भी तुम्हारी इच्छा से हुए - कृपया क्षमा करो।
श्लोक १६ (पुत्र-बुद्धि):
"सर्वं तत् कामरूपे त्रिभुवनजननि क्षामये पुत्र बुद्ध्या"
अर्थ: हे त्रिभुवन की माता! मुझे पुत्र समझकर मेरे सभी अपराध क्षमा करो। यही स्तोत्र का सार है।

दशमहाविद्या उल्लेख (श्लोक १५)

श्लोक १५ में सभी दशमहाविद्याओं का उल्लेख है, जो बताता है कि माँ काली ही सभी देवियों का मूल स्वरूप हैं:
1. काली
2. तारा
3. षोडशी
4. भुवनेश्वरी
5. भैरवी
6. छिन्नमस्ता
7. धूमावती
8. बगला
9. मातंगी
10. कमला
इसके अतिरिक्त दुर्गा, लक्ष्मी, शिवा का भी उल्लेख है - यह दर्शाता है कि समस्त शक्तियाँ एक ही माँ काली हैं।

पाठ फल (फलश्रुति)

फलश्रुति (श्लोक 16-17) के अनुसार इस स्तोत्र के पाठ से:
  • दुष्कर्म नाश: सभी पाप कर्म नष्ट होते हैं
  • विघ्न निवारण: सौ प्रकार के विघ्न दूर होते हैं
  • आधि-व्याधि मुक्ति: मानसिक और शारीरिक रोग दूर होते हैं
  • ज्ञान प्राप्ति: ज्ञाता और वक्ता बनता है
  • कवित्व: कवीश्वर बनता है
  • धन सम्पत्ति: धनपति बनता है
  • दान-दया: दानशील और दयावान बनता है
  • निष्कलंक जीवन: निष्पाप और निष्कलंक होता है
  • सत्यवादिता: सत्यवादी और धार्मिक बनता है
  • मोक्ष: संसार-सागर से मुक्ति मिलती है

पाठ विधि

उत्तम समय:
  • अमावस्या की रात्रि
  • काली चतुर्दशी (दीपावली से एक दिन पहले)
  • मंगलवार और शनिवार की रात्रि
  • जब भी पश्चाताप का भाव हो
विधि:
  1. स्नान करके काले या लाल वस्त्र धारण करें
  2. माँ काली का चित्र या मूर्ति के समक्ष बैठें
  3. दीपक और धूप जलाएं
  4. मन को शांत करके, पश्चाताप का भाव लाएं
  5. धीरे-धीरे, प्रत्येक शब्द को समझते हुए पाठ करें
  6. यदि आँखों में आँसू आएं, तो रोकें नहीं - यह सच्चे पश्चाताप का चिह्न है
  7. पाठ के बाद माँ के चरणों में साष्टांग प्रणाम करें

FAQ

1. "कामरूपे कराले" का क्या अर्थ है?

"कामरूप" असम का प्राचीन नाम है जहाँ कामाख्या पीठ स्थित है। "कराल" का अर्थ है भयंकर, उग्र या विकराल मुखवाली। यह माँ काली के उस स्वरूप को संबोधित करता है जो पापियों के लिए भयंकर परंतु भक्तों के लिए करुणामयी है।

2. यह स्तोत्र कब पढ़ना चाहिए?

जब भी मन में पश्चाताप हो, गलती का अहसास हो, या माँ की कृपा चाहिए हो। विशेषतः अमावस्या, काली चतुर्दशी, और मंगलवार को पढ़ना अत्यंत शुभ है। किसी बड़ी गलती के बाद भी इसे पढ़ना चाहिए।

3. क्या सभी पाप क्षमा हो जाते हैं?

माँ अपने भक्तों को पुत्र-बुद्धि से क्षमा करती हैं। सच्चे पश्चाताप, दोबारा न करने का संकल्प और भक्तिभाव से पाठ करने पर माँ अवश्य कृपा करती हैं। परंतु केवल पाठ से पाप नहीं कटते - सच्चा परिवर्तन भी आवश्यक है।

4. "पुत्र बुद्ध्या" का क्या महत्व है?

यह स्तोत्र का सबसे महत्वपूर्ण तत्त्व है। माँ से प्रार्थना है कि वे हमें पुत्र की तरह देखें और क्षमा करें। जैसे एक माँ अपने पुत्र की सभी गलतियाँ क्षमा कर देती है, वैसे ही जगन्माता से क्षमा-याचना है। माँ का स्नेह पुत्र के अपराधों से सदैव बड़ा होता है।

5. पंचभूत और देवी का क्या संबंध है?

श्लोक 14 में कहा है - "त्वं भूमिस्त्वं जलं च त्वमसि हुतवहः" - भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, प्रकृति और आत्मा - सब माँ ही हैं। "त्वत्परन्नैव किञ्चित्" - उनसे परे कुछ भी नहीं है।

6. इस स्तोत्र की रचना किसने की?

इस स्तोत्र के रचयिता अज्ञात हैं, परंतु यह कामाख्या परंपरा से जुड़ा है। शैव-शाक्त तांत्रिक परंपरा में इसका विशेष स्थान है। यह असम के प्राचीन ग्रंथों में पाया जाता है।

7. क्या महिलाएं इसे पढ़ सकती हैं?

हाँ, बिल्कुल। यह स्तोत्र सभी के लिए है। माँ काली सभी जीवों की माता हैं - लिंग-भेद उनके प्रेम में बाधा नहीं है। महिलाएं विशेषकर नवरात्रि में इसका पाठ करती हैं।

8. रोते हुए पाठ करना शुभ है या अशुभ?

अत्यंत शुभ है! आँसू सच्चे पश्चाताप का प्रतीक हैं। जब भक्त अपने अपराधों को याद करते हुए रोता है, तो माँ की कृपा अवश्य होती है। "भाव" सबसे महत्वपूर्ण है - शुष्क पाठ से भावपूर्ण पाठ श्रेष्ठ है।

9. क्या यह स्तोत्र मृत्यु-शय्या पर पढ़ना चाहिए?

हाँ, यह मृत्यु के समय पढ़ने के लिए अत्यंत उपयुक्त है। जब व्यक्ति जीवन के अंतिम क्षणों में होता है, यह स्तोत्र उसे माँ से क्षमा माँगने और शांतिपूर्ण प्रस्थान का अवसर देता है।

10. इस स्तोत्र और देवी अपराध क्षमापण में क्या अंतर है?

देवी अपराध क्षमापण स्तोत्र (शंकराचार्य कृत) दुर्गा-पार्वती को संबोधित है, जबकि यह स्तोत्र विशेष रूप से माँ काली के कामाख्या स्वरूप को। दोनों का उद्देश्य एक है - माँ से क्षमा-याचना - परंतु परंपरा और भाव भिन्न हैं।