Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Guhya Kali Sudha Dhara Stava – श्री गुह्यकाली सुधाधारा स्तवः

Sri Guhya Kali Sudha Dhara Stava – श्री गुह्यकाली सुधाधारा स्तवः
॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ॥ श्री गुह्यकाली सुधाधारा स्तवः ॥ (श्री महाकाल संहिता) ॥ महाकाल रुद्र उवाच ॥ अचिन्त्यामिताकारशक्तिस्वरूपा प्रतिव्यक्त्यधिष्ठानसत्त्वैकमूर्तिः । गुणातीतनिर्द्वन्द्वबोधैकगम्या त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ १ ॥ अगोत्राकृतित्वादनैकान्तिकत्वा- दलक्ष्यागमत्वादशेषाकरत्वात् । प्रपञ्चालसत्वादनारम्भकत्वात् त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ २ ॥ असाधारणत्वादसम्बन्धकत्वा- दभिन्नाश्रयत्वादनाकारकत्वात् । अविद्यात्मकत्वादनाद्यन्तकत्वात् त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ३ ॥ यदा नैव धाता न विष्णुर्न रुद्रो न कालो न वा पञ्चभूतानि नाशा । तदा कारणीभूत सत्त्वैकमूर्ति- स्त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ४ ॥ न मीमांसका नैव कालादितर्का न साङ्ख्या न योगा न वेदान्तवेदाः । न देवा विदुस्ते निराकारभावं त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ५ ॥ न ते नामगोत्रे न ते जन्ममृत्यू न ते धामचेष्टे न ते दुःखसौख्ये । न ते मित्रशत्रू न ते बन्धमोक्षौ त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ६ ॥ न बाला न च त्वं वयस्का न वृद्धा न च स्त्री न षण्ढः पुमान्नैव च त्वम् । न च त्वं सुरो नासुरो नो नरो वा त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ७ ॥ जले शीतलत्वं शुचौ दाहकत्वं विधौ निर्मलत्वं रवौ तापकत्वम् । तवैवाम्बिके यस्य कस्यापि शक्ति- स्त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ८ ॥ पपौ क्ष्वेडमुग्रं पुरा यन्महेशः पुनः संहरत्यन्तकाले जगच्च । तवैव प्रसादान्न च स्वस्य शक्त्या त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ९ ॥ करालाकृतीन्याननानि श्रयन्ती भजन्ती करास्त्रादि बाहुल्यमित्थम् । जगत्पालनायाऽसुराणां वधाय त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ १० ॥ रुवन्ती शिवाभिर्वहन्ती कपालं जयन्ती सुरारीन् वधन्ती प्रसन्ना । नटन्ती पतन्ती चलन्ती हसन्ती त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ ११ ॥ अपादाऽपि वाताधिकं धावसि त्वं श्रुतिभ्यां विहीनाऽपि शब्दं शृणोषि । अनासाऽपि जिघ्रस्य नेत्राऽपि पश्य- स्वजिह्वाऽपि नानारसास्वाद विज्ञा ॥ १२ ॥ यथा बिम्बमेकं रवेरम्बरस्थं प्रतिच्छायया यावदेकोदकेषु । समुद्भासतेऽनेकरूपं यथावत् त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा ॥ १३ ॥ यथा भ्रामयित्वा मृदं चक्रमध्ये कुलालो विधत्ते शरावं घटं च । महामोहयन्त्रेषु भूतान्यशेषान् तथा मानुषांस्त्वं सृजस्यादिसर्गे ॥ १४ ॥ यथा रङ्गरज्ज्वर्कदृष्टिष्वकस्मा- नृणां रूपदर्वीकराम्बुभ्रमः स्यात् । जगत्यत्र तत्तन्मये तद्वदेव त्वमेकैव तत्तन्निवृतौ समस्तम् ॥ १५ ॥ महाज्योति एकार सिंहासनं यत्- स्वकीयान् सुरान् वाहयस्युग्रमूर्ते । अवष्टभ्य पद्भ्यां शिवं भैरवं च स्थिता तेन मध्ये भवत्येव मुख्या ॥ १६ ॥ क्व योगासने योगमुद्रादिनीतिः क्व गोमायुपोतस्य बालाननं च । जगन्मातरादृक् तवाऽपूर्वलीला कथं कारमस्मद्विधैर्देवि गम्या ॥ १७ ॥ विशुद्धा परा चिन्मयी स्वप्रकाशा- मृतानन्दरूपा जगद्व्यापिका च । तवेदृग्विधाया निजाकारमूर्तिः किमस्माभिरन्तर्हृदि ध्यायितव्या ॥ १८ ॥ ॥ ध्यानम् ॥ महाघोरकालानल ज्वालज्वाला हिता त्यक्तवासा महाट्‍टाट्‍टहासा । जटाभारकाला महामुण्डमाला विशाला त्वमीदृङ्मया ध्यायसेऽम्ब ॥ १९ ॥ ॥ शरणागति ॥ तपो नैव कुर्वन् वपुः खेदयामि व्रजन्नापि तीर्थं पदे खञ्जयामि । पठन्नापि वेदं जनिं पावयामि त्वदङ्घ्रिद्वये मङ्गलं साधयामि ॥ २० ॥ तिरस्कुर्वतोऽन्यामरोपासनार्चे परित्यक्तधर्माध्वरस्यास्य जन्तोः । त्वदाराधनान्यस्त चित्तस्य किं मे करिष्यन्त्यमी धर्मराजस्य दूताः ॥ २१ ॥ न मन्ये हरिं नो विधातारमीशं न वह्निं न ह्यर्कं न चेन्द्रादि देवान् । शिवोदीरितानेक वाक्यप्रबन्धै- स्त्वदर्चाविधानं विशत्वम्ब मत्याम् ॥ २२ ॥ न वा मां विनिन्दन्तु नाम त्यजेन्मां त्यजेद्बान्धवा ज्ञातयः सन्त्यजन्तु । यमीया भटा नारके पातयन्तु त्वमेका गतिर्मे त्वमेका गतिर्मे ॥ २३ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ महाकालरुद्रोदितस्तोत्रमेतत् सदा भक्तिभावेन योऽध्येति भक्तः । न चापन्न शोको न रोगो न मृत्यु- र्भवेत् सिद्धिरन्ते च कैवल्यलाभः ॥ २४ ॥ इदं शिवायाः कथितं सुधाधाराख्यं स्तवम् । एतस्य सतताभ्यासात् सिद्धिः करतलेस्थिता ॥ २५ ॥ एतत् स्तोत्रं च कवचं पद्यं त्रितयमप्यदः । पठनीयं प्रयत्नेन नैमित्तिकसमर्पणे ॥ २६ ॥ ॥ स्तुति पद्य ॥ सौम्येन्दीवरनीलनीरदघटाप्रोद्दामदेहच्छटा लास्योन्मादनिनादमङ्गलचयैः श्रोण्यन्तदोलज्जटाः । सा काली करवालकालकलना हन्त्वश्रियं चण्डिका ॥ २७ ॥ काली क्रोधकरालकालभयदोन्मादप्रमोदालया नेत्रोपान्तकृतान्तदैत्यनिवहाप्रोद्दाम देहाभया । पायाद्वो जयकालिका प्रवलिका हूङ्कारघोरानना भक्तानामभयप्रदा विजयदा विश्वेशसिद्धासना ॥ २८ ॥ करालोन्मुखी कालिका भीमकान्ता कटिव्याघ्रचर्मावृता दानवान्ता । हूं हूं कड्मडीनादिनी कालिका तु प्रसन्ना सदा नः प्रसन्नान् पुनातु ॥ २९ ॥ ॥ इति आदिनाथविरचित महाकालसंहितायां श्री गुह्यकाली सुधाधारा स्तवः सम्पूर्णम् ॥

परिचय

श्री गुह्यकाली सुधाधारा स्तवः महाकाल संहिता से उद्धृत एक अति गोपनीय एवं दार्शनिक स्तोत्र है। इसके रचयिता स्वयं महाकाल रुद्र (शिव) हैं, जिन्होंने शिवा (पार्वती) को यह स्तोत्र सुनाया।
"सुधाधारा" का अर्थ है "अमृत की धारा"। यह स्तोत्र पढ़ने मात्र से साधक को अमृत-तुल्य आध्यात्मिक अनुभूति होती है।
गुह्यकाली माँ काली का सबसे गोपनीय स्वरूप है। यह दशमहाविद्या की प्रथम विद्या काली का वह रूप है जो केवल उच्च कोटि के साधकों को ही प्राप्त होता है।
विशेष तत्त्व:
  • स्रोत: महाकाल संहिता (आदिनाथ विरचित)
  • वक्ता: महाकाल रुद्र (शिव)
  • श्रोता: शिवा (पार्वती)
  • श्लोक संख्या: २९
  • मूल मंत्र: "त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा"

स्तोत्र की संरचना

खण्डश्लोकविषय
परब्रह्म स्तुति1-11देवी के निर्गुण परब्रह्म स्वरूप की स्तुति
शक्ति वर्णन12-18देवी की अपार शक्तियों का वर्णन
ध्यान19गुह्यकाली का ध्यान श्लोक
शरणागति20-23पूर्ण समर्पण और एकनिष्ठ भक्ति
फलश्रुति24-26पाठ का फल
स्तुति पद्य27-29अंतिम स्तुति श्लोक

मूल मंत्र का अर्थ

"त्वमेका परब्रह्मरूपेण सिद्धा"
अर्थ: तुम एकमात्र परब्रह्म के रूप में सिद्ध हो।
यह पंक्ति लगभग हर श्लोक के अंत में आती है, जो स्तोत्र का मूल सिद्धांत है। इसके अनुसार:
  • गुह्यकाली ब्रह्मा, विष्णु, महेश से परे हैं
  • वे निर्गुण, निराकार परब्रह्म हैं
  • सांख्य, योग, वेदांत - कोई भी उन्हें पूर्णतः नहीं जान सकता
  • वे जन्म-मृत्यु, सुख-दुःख, बंध-मोक्ष से परे हैं

पाठ फल

फलश्रुति (श्लोक 24-26) के अनुसार:
  • आपत्ति निवारण: कोई भी विपत्ति नहीं आती
  • शोक मुक्ति: मन से शोक दूर होता है
  • रोग नाश: सभी रोगों से मुक्ति
  • मृत्यु भय नाश: अकाल मृत्यु नहीं होती
  • सिद्धि प्राप्ति: इच्छित सिद्धियाँ प्राप्त
  • कैवल्य लाभ: अंत में मोक्ष प्राप्ति
"एतस्य सतताभ्यासात् सिद्धिः करतलेस्थिता"
इस स्तोत्र के निरंतर अभ्यास से सिद्धि हथेली में आ जाती है।

FAQ

1. गुह्यकाली कौन हैं?

गुह्यकाली माँ काली का सबसे गोपनीय स्वरूप है। "गुह्य" का अर्थ है "गुप्त" या "रहस्यमय"। यह वह स्वरूप है जो निर्गुण परब्रह्म के समान है और केवल उच्च साधकों को ही प्राप्त होता है।

2. महाकाल संहिता क्या है?

महाकाल संहिता आदिनाथ (शिव) द्वारा रचित एक तांत्रिक ग्रंथ है जिसमें काली उपासना के गोपनीय मंत्र और स्तोत्र हैं। इसमें शिव-पार्वती संवाद के रूप में ज्ञान दिया गया है।

3. "सुधाधारा" नाम क्यों है?

"सुधा" का अर्थ है अमृत और "धारा" का अर्थ है प्रवाह। यह स्तोत्र पढ़ने से साधक को अमृत की धारा के समान आध्यात्मिक आनंद मिलता है।

4. क्या बिना दीक्षा के पढ़ सकते हैं?

हाँ, यह स्तोत्र सभी पढ़ सकते हैं। यह स्तुति है, मंत्र नहीं। भक्तिभाव से पढ़ने पर देवी प्रसन्न होती हैं। गहन साधना के लिए गुरु मार्गदर्शन उचित है।

5. श्लोक 23 का क्या विशेष महत्व है?

"त्वमेका गतिर्मे त्वमेका गतिर्मे" - यह पूर्ण शरणागति का श्लोक है। इसमें भक्त कहता है कि चाहे संसार निंदा करे, बंधु त्याग दें, यमदूत नरक ले जाएं - फिर भी तुम्हीं एकमात्र गति हो।

6. पाठ का उत्तम समय क्या है?

रात्रि 10 बजे के बाद, विशेषतः अमावस्या और काली चतुर्दशी। नित्य पाठ के लिए कोई भी समय उपयुक्त है।