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Sri Gayatri Stotram 2 (Devi Bhagavate) – श्री गायत्री स्तोत्रम् २ (देवीभागवते)

Sri Gayatri Stotram 2 (Devi Bhagavate) – श्री गायत्री स्तोत्रम् २ (देवीभागवते)
॥ श्री गायत्री स्तोत्रम् २ ॥
(श्रीमद्देवीभागवत महापुराणान्तर्गतम्)
॥ नारद उवाच ॥भक्तानुकम्पिन् सर्वज्ञ हृदयं पापनाशनम् । गायत्र्याः कथितं तस्माद्गायत्र्याः स्तोत्रमीरय ॥ १ ॥ ॥ श्रीनारायण उवाच ॥ आदिशक्ते जगन्मातर्भक्तानुग्रहकारिणि । सर्वत्र व्यापिकेऽनन्ते श्रीसन्ध्ये ते नामोऽस्तु ते ॥ २ ॥ त्वमेव सन्ध्या गायत्री सावित्री च सरस्वती । ब्राह्मी च वैष्णवी रौद्री रक्ता श्वेता सितेतरा ॥ ३ ॥ प्रातर्बाला च मध्याह्ने यौवनस्था भवेत्पुनः । वृद्धा सायं भगवती चिन्त्यते मुनिभिः सदा ॥ ४ ॥ हंसस्था गरुडारूढा तथा वृषभवाहनी । ऋग्वेदाध्यायिनी भूमौ दृश्यते या तपस्विभिः ॥ ५ ॥ यजुर्वेदं पठन्ती च अन्तरिक्षे विराजते । सा सामगापि सर्वेषु भ्राम्यमाणा तथा भुवि ॥ ६ ॥ रुद्रलोकं गता त्वं हि विष्णुलोकनिवासिनी । त्वमेव ब्रह्मणो लोकेऽमर्त्यानुग्रहकारिणी ॥ ७ ॥ सप्तर्षिप्रीतिजननी माया बहुवरप्रदा । शिवयोः करनेत्रोत्था ह्यश्रुस्वेदसमुद्भवा ॥ ८ ॥ आनन्दजननी दुर्गा दशधा परिपठ्यते । वरेण्या वरदा चैव वरिष्ठा वरवर्णिनी ॥ ९ ॥ गरिष्ठा च वरार्हा च वरारोहा च सप्तमी । नीलगङ्गा तथा सन्ध्या सर्वदा भोगमोक्षदा ॥ १० ॥ भागीरथी मर्त्यलोके पाताले भोगवत्यपि । त्रिलोकवाहिनी देवी स्थानत्रयनिवासिनी ॥ ११ ॥ भूर्लोकस्था त्वमेवाऽसि धरित्री लोकधारिणी । भुवो लोके वायुशक्तिः स्वर्लोके तेजसां निधिः ॥ १२ ॥ महर्लोके महासिद्धिर्जनलोके जनेत्यपि । तपस्विनी तपोलोके सत्यलोके तु सत्यवाक् ॥ १३ ॥ कमला विष्णुलोके च गायत्री ब्रह्मलोकदा । रुद्रलोके स्थिता गौरी हरार्धाङ्गनिवासिनी ॥ १४ ॥ अहमो महतश्चैव प्रकृतिस्त्वं हि गीयसे । साम्यवस्थात्मिका त्वं हि शबलब्रह्मरूपिणी ॥ १५ ॥ ततः पराऽपराशक्तिः परमा त्वं हि गीयसे । इच्छाशक्तिः क्रियाशक्तिर्ज्ञानशक्तिस्त्रिशक्तिदा ॥ १६ ॥ गङ्गा च यमुना चैव विपाशा च सरस्वती । सरयूर्देविका सिन्धुर्नर्मदैरावती तथा ॥ १७ ॥ गोदावरी शतद्रूश्च कावेरी देवलोकगा । कौशिकी चन्द्रभागा च वितस्ता च सरस्वती ॥ १८ ॥ गण्डकी तापिनी तोया गोमती वेत्रवत्यपि । इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्णा च तृतीयका ॥ १९ ॥ गान्धारी हस्तिजिह्वा च पूषापूषा तथैव च । अलम्बुसा कुहूश्चैव शङ्खिनी प्राणवाहिनी ॥ २० ॥ नाडी च त्वं शरीरस्था गीयसे प्राक्तनैर्बुधैः । हृत्पद्मस्था प्राणशक्तिः कण्ठस्था स्वप्ननायिका ॥ २१ ॥ तालुस्था त्वं सदाधारा बिन्दुस्था बिन्दुमालिनी । मूले तु कुण्डलीशक्तिर्व्यापिनी केशमूलगा ॥ २२ ॥ शिखामध्यासना त्वं हि शिखाग्रे तु मनोन्मनी । किमन्यद्बहुनोक्तेन यत्किञ्चिज्जगतीत्रये ॥ २३ ॥ तत्सर्वं त्वं महादेवि श्रिये सन्ध्ये नमोऽस्तु ते । इतीदं कीर्तितं स्तोत्रं सन्ध्यायां बहुपुण्यदम् ॥ २४ ॥ ॥ फलश्रुति ॥महापापप्रशमनं महासिद्धिविधायकम् । य इदं कीर्तयेत् स्तोत्रं सन्ध्याकाले समाहितः ॥ २५ ॥ अपुत्रः प्राप्नुयात् पुत्रं धनार्थी धनमाप्नुयात् । सर्वतीर्थतपोदानयज्ञयोगफलं लभेत् ॥ २६ ॥ भोगान् भुङ्क्त्वा चिरं कालमन्ते मोक्षमवाप्नुयात् । तपस्विभिः कृतं स्तोत्रं स्नानकाले तु यः पठेत् ॥ २७ ॥ यत्र कुत्र जले मग्नः सन्ध्यामज्जनजं फलम् । लभते नात्र सन्देहः सत्यं सत्यं च नारद ॥ २८ ॥ शृणुयाद्योऽपि तद्भक्त्या स तु पापात्प्रमुच्यते । पीयूषसदृशं वाक्यं सन्ध्योक्तं नारदेरितम् ॥ २९ ॥
॥ इति श्रीमद्देवीभागवते महापुराणे गायत्रीस्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री गायत्री स्तोत्रम् २ - विस्तृत आध्यात्मिक परिचय

श्री गायत्री स्तोत्रम् (Sri Gayatri Stotram) सनातन धर्म के प्राण और शक्ति उपासना के सर्वोच्च ग्रन्थ 'श्रीमद्देवीभागवत महापुराण' के १२वें स्कन्ध से उद्धृत है। यह स्तोत्र मात्र शब्दों का संकलन नहीं है, बल्कि यह वह आध्यात्मिक संवाद है जो भगवान नारायण ने स्वयं देवर्षि नारद को प्रदान किया था। जब नारद जी ने पापों के नाश और आत्म-साक्षात्कार के सर्वश्रेष्ठ उपाय के बारे में पूछा, तब नारायण ने माँ गायत्री के इस विराट् स्वरूप की महिमा गाई।

देवी भागवत के अनुसार, गायत्री कोई साधारण देवी नहीं हैं, वे समस्त ब्रह्माण्ड की आधारभूत ऊर्जा हैं। इस स्तोत्र की अद्वितीय विशेषता यह है कि यह माँ गायत्री को 'सन्ध्या' के रूप में प्रतिष्ठित करता है। सन्ध्या काल वह पवित्र समय है जब ब्रह्माण्डीय ऊर्जाएँ संतुलित होती हैं। स्तोत्र में माँ के त्रिकाल रूपों—प्रातःकाल की बालिका (ब्रह्माणी), मध्याह्न की युवती (रुद्राणी) और सायंकाल की वृद्धा (वैष्णवी)—का वर्णन साधक को समय की गति और चेतना के विकास का बोध कराता है।

इस स्तुति में गायत्री को समस्त नदियों (गंगा, यमुना, सरस्वती आदि), समस्त लोकों (भूर्लोक से सत्यलोक तक) और समस्त सूक्ष्म प्राण-प्रणालियों (इड़ा, पिङ्गला, सुषुम्णा) के रूप में पूजा गया है। यह अद्वैत दर्शन का साक्षात् प्रमाण है, जहाँ एक ही आदि-शक्ति विविध रूपों में चराचर जगत का संचालन कर रही है।

विशिष्ट महत्व और वैज्ञानिक-योगिक रहस्य

श्रीमद्देवीभागवत में वर्णित इस स्तोत्र का महत्व इसके बहुआयामी प्रभावों में निहित है, जो साधक के स्थूल और सूक्ष्म शरीर दोनों पर कार्य करते हैं:

  • सप्त लोक और ब्रह्माण्डीय व्यापकता: श्लोक १२-१३ में माँ को सातों लोकों की शक्ति बताया गया है। वे केवल मन्त्र में नहीं, बल्कि 'धरित्री' (पृथ्वी), 'वायुशक्ति' और 'सत्यवाक्' के रूप में अस्तित्व के हर तल पर विराजमान हैं।

  • योगिक नाड़ी विज्ञान: श्लोक १९-२२ में माँ गायत्री को इड़ा, पिङ्गला और सुषुम्णा नाड़ियों के रूप में पूजा गया है। यह दर्शाता है कि गायत्री साधना सीधे साधक के प्राण-ऊर्जा (Prana) को संतुलित करती है और कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत करने में सहायक है।

  • त्रिशक्ति संगम: माँ को इच्छाशक्ति, क्रियाशक्ति और ज्ञानशक्ति का स्रोत कहा गया है। यह त्रिशक्ति ही मनुष्य के संकल्प, कर्म और बोध को ऊँचा उठाती है, जिससे वह जीवन के हर क्षेत्र में सफल होता है।

  • शबल ब्रह्म स्वरूप: श्लोक १५ में माँ को 'शबल ब्रह्म' (शक्ति युक्त ब्रह्म) कहा गया है। यह दर्शन समझाता है कि निराकार ईश्वर जब साकार रूप लेकर सृष्टि रचता है, तब वह शक्ति ही 'गायत्री' कहलाती है।

फलश्रुति लाभ (Divine Benefits)

स्तोत्र के अंतिम श्लोक (२४-२९) इसके पाठ से प्राप्त होने वाले अमोघ लाभों का वर्णन करते हैं:
१. महापाप प्रक्षालन
'महापापप्रशमनं'—अर्थात् यह स्तोत्र जाने-अनजाने में हुए उन घनघोर पापों का नाश करता है जिनका प्रायश्चित कठिन है। यह अंतःकरण को पूर्णतः शुद्ध कर देता है।
२. सांसारिक सुख और वंश वृद्धि
नारायण कहते हैं कि जो पुत्र की कामना रखता है उसे सुयोग्य संतान प्राप्त होती है और जो धन का अभिलाषी है उसे स्थिर लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
३. समस्त तीर्थों का पुण्य
स्नान के समय इस स्तोत्र का पाठ करने से साधक को समस्त तीर्थों में स्नान करने, कठिन तपस्या करने और महान यज्ञों के अनुष्ठान के समान फल प्राप्त होता है।
४. भोग और मोक्ष का समन्वय
यह स्तोत्र 'भोगमोक्षदा' है। यह साधक को जीवन भर सुख-सुविधाओं और आरोग्य का आनन्द दिलाता है और अंत समय में परम पद (मोक्ष) की प्राप्ति कराता है।

पाठ विधि और अनुष्ठान नियम (Ritual Guide)

देवी भागवत के इस सिद्ध स्तोत्र का पाठ निम्नलिखित विधि से करना अत्यंत कल्याणकारी है:
  • समय (Time): सन्ध्या काल (सूर्योदय या सूर्यास्त) सबसे उत्तम है। नारायण ने इसे 'सन्ध्याकाले' पाठ करने पर विशेष बल दिया है।
  • स्नान विधि: यदि आप तीर्थ या नदी में स्नान कर रहे हैं, तो जल में खड़े होकर इसका पाठ करना करोड़ों गुना पुण्यदायी बताया गया है।
  • आसन: शांत स्थान पर कुशा या ऊनी आसन पर पूर्व की ओर मुख करके बैठें।
  • ध्यान: पाठ से पूर्व माँ गायत्री के पंचमुखी स्वरूप का हृदय में ध्यान करें, जो श्वेत, रक्त, स्वर्ण, नील और धवल आभा से युक्त हैं।
  • भाव: पाठ करते समय यह भाव रखें कि माँ गायत्री ही आपके शरीर के भीतर प्राण-शक्ति और नाड़ियों के रूप में प्रवाहित हो रही हैं।
विशेष टिप: यदि पूर्ण पाठ का समय न हो, तो इसे केवल श्रद्धापूर्वक सुनने मात्र से भी पापों का क्षय होता है (श्लोक २९)।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री गायत्री स्तोत्रम् का स्रोत क्या है?

यह स्तोत्र 'श्रीमद्देवीभागवत महापुराण' के १२वें स्कन्ध के ५वें अध्याय से लिया गया है। इसे स्वयं साक्षात् नारायण ने नारद मुनि को सुनाया था।

2. माँ गायत्री को 'सन्ध्या' क्यों कहा जाता है?

सन्ध्या का अर्थ है 'जोड़ने वाली'। वे दिन और रात के मिलन काल की अधिष्ठात्री हैं और जीव को ब्रह्म से जोड़ने वाली आदि-शक्ति हैं।

3. इस स्तोत्र में नदियों का क्या रहस्य है?

माँ गायत्री को गंगा, यमुना, सरस्वती आदि पवित्र नदियों का स्वरूप बताया गया है क्योंकि जल ही जीवन है और वे ही इस सृष्टि की जीवनदायिनी ऊर्जा हैं।

4. क्या यह स्तोत्र मन्त्र सिद्धि में सहायक है?

बिल्कुल, यह 'महासिद्धिविधायकम्' है। गायत्री मन्त्र के जप से पहले इस स्तोत्र का पाठ मन्त्र की ऊर्जा को जाग्रत कर देता है।

5. 'इच्छा, क्रिया और ज्ञान' शक्तियों का क्या अर्थ है?

यह माँ गायत्री के तीन मुख्य पहलू हैं। इच्छाशक्ति संकल्प देती है, क्रियाशक्ति कार्य करने की क्षमता, और ज्ञानशक्ति विवेक प्रदान करती है।

6. क्या गृहस्थ व्यक्ति इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, गृहस्थों के लिए यह विशेष रूप से फलदायी है क्योंकि यह धन, धान्य और पुत्र (वंश वृद्धि) प्रदान करने वाला बताया गया है।

7. 'शबल ब्रह्म' का अर्थ क्या है?

शबल ब्रह्म का अर्थ है गुणों से युक्त ईश्वर। जब परब्रह्म सृष्टि रचने के लिए सगुण रूप धारण करते हैं, तो वे ही गायत्री माँ कहलाते हैं।

8. पाठ के लिए सबसे अच्छा दिन कौन सा है?

प्रतिदिन पाठ करना सर्वोत्तम है, लेकिन रविवार, गायत्री जयंती, और प्रत्येक माह की पूर्णिमा पर पाठ का फल अनन्त गुना होता है।

9. क्या इस स्तोत्र से कुण्डलिनी जागृत होती है?

हाँ, श्लोक २२ में उन्हें 'मूलाधार की कुण्डली शक्ति' कहा गया है। उनके नामों का कंपन चक्रों को जाग्रत करने में सहायता करता है।

10. माँ को 'दशधा परिपठ्यते' क्यों कहा गया है?

इसका अर्थ है कि माँ गायत्री के १० प्रमुख नाम (वरेण्या, वरदा, वरिष्ठा आदि) का विशेष महत्व है, जो दश दिशाओं में उनकी व्याप्तता को दर्शाते हैं।