Sri Gayatri Sahasranama Stotram 1 – श्री गायत्री सहस्रनाम स्तोत्रम् (श्रीमद्देवीभागवतम्)

श्री गायत्री सहस्रनाम स्तोत्रम् - परिचय एवं महात्म्य
श्री गायत्री सहस्रनाम स्तोत्रम् (Sri Gayatri Sahasranama Stotram) शक्ति उपासना के सर्वोच्च ग्रंथों में से एक 'श्रीमद्देवीभागवत महापुराण' के 12वें स्कंध में निहित एक अत्यंत दुर्लभ और पवित्र स्तुति है। यह स्तोत्र एक दिव्य संवाद के रूप में है, जहाँ देवर्षि नारद भगवान नारायण से पूछते हैं—"हे भगवन्! वह कौन सा साधन है जिससे सभी पापों का नाश हो, ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति हो और जो भोग तथा मोक्ष दोनों प्रदान करे?" इसके उत्तर में भगवान नारायण ने माँ गायत्री के इन १००८ दिव्य नामों का उपदेश दिया।
गायत्री को 'वेदमाता' कहा जाता है। यह केवल एक देवी नहीं, बल्कि वह सर्वोच्च चेतना है जो सूर्य (सविता) को भी प्रकाशित करती है। सहस्रनामों की परंपरा में गायत्री सहस्रनाम का स्थान अद्वितीय है क्योंकि यह 'मातृका-न्यास' पर आधारित है। इसके नाम अकारादि क्रम (अ, आ, इ, ई... से लेकर क्ष तक) में व्यवस्थित हैं। प्रत्येक अक्षर एक विशिष्ट शक्ति का केंद्र है। उदाहरण के लिए, 'अ' से 'अचिन्त्यलक्षणा' और 'क' से 'कात्यायनी'।
इस स्तोत्र की गोपनीयता पर विशेष बल दिया गया है। भगवान नारायण स्वयं कहते हैं कि यह गोपनीय से भी गोपनीय रहस्य है। कलयुग में जब मन निरंतर अस्थिर रहता है, तब गायत्री सहस्रनाम का पाठ चित्त को एकाग्र करने और "वाक सिद्धि" प्राप्त करने का सबसे सशक्त माध्यम है। जो व्यक्ति इस स्तोत्र की शरण लेता है, उसके जीवन से अज्ञान का अंधकार मिट जाता है।
विशिष्ट महत्व और दार्शनिक विश्लेषण
गायत्री सहस्रनाम का पाठ केवल पुण्य अर्जन के लिए नहीं, बल्कि जीवन के पूर्ण रूपांतरण के लिए किया जाता है। इसके कुछ प्रमुख दार्शनिक पहलू इस प्रकार हैं:
दरिद्रता नाश और स्थिर लक्ष्मी: शास्त्रों में लक्ष्मी को 'चंचला' कहा गया है। परंतु इस स्तोत्र की फलश्रुति में एक अद्भुत प्रतिज्ञा है—"चञ्चलापि स्थिरा भूत्वा कमला तत्र तिष्ठति"। अर्थात, जहाँ इस स्तोत्र का पाठ होता है, वहां लक्ष्मी स्थिर हो जाती हैं।
पाप और बंधन से मुक्ति: चाहे वह शारीरिक रोग का बंधन हो या कर्मों का बंधन—यह स्तोत्र 'मुक्ति' प्रदाता है। ब्रह्महत्या जैसे घोर पापों का प्रायश्चित भी इसके अनुष्ठान से संभव बताया गया है।
सर्वरूपमयी पराशक्ति: इन नामों में देवी को कहीं 'सावित्री', कहीं 'सरस्वती', कहीं 'वैष्णवी' तो कहीं 'रौद्री' कहा गया है। यह दर्शाता है कि गायत्री ही वह एकमात्र पराशक्ति है जो सृष्टि के विभिन्न कार्यों हेतु विविध रूप धारण करती है।
नाद ब्रह्म की साधना: चूंकि नाम वर्णमाला के अक्षरों पर आधारित हैं, इसका पाठ साधक के मूलाधार से सहस्रार तक के सभी चक्रों को जागृत करता है।
फलश्रुति: पाठ से प्राप्त होने वाले दिव्य लाभ
पाठ विधि और अनुष्ठान नियम
- श्रेष्ठ समय: वैसे तो नित्य पाठ किया जा सकता है, किंतु 'अष्टमी' तिथि को इसका पाठ अनंत गुना फलदायी होता है। प्रातः काल या संध्या काल सर्वोत्तम है।
- आसन और दिशा: पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुशा या ऊनी आसन पर बैठें।
- न्यास और ध्यान: पाठ शुरू करने से पूर्व 'रक्तश्वेत...' ध्यान श्लोक पढ़कर माँ गायत्री के स्वरूप का मानसिक दर्शन करें।
- शुचिता: पाठ के दौरान मन में श्रद्धा और शरीर में शुद्धि का होना अनिवार्य है।
- जप: स्तोत्र पाठ के उपरांत गायत्री मन्त्र की कम से कम १०८ बार माला जपना मन्त्र की शक्ति को और अधिक जागृत कर देता है।