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Sri Gayatri Ashtakam 1 – श्री गायत्री अष्टकम् १ (श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितम्)

Sri Gayatri Ashtakam 1 – श्री गायत्री अष्टकम् १ (श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितम्)
॥ श्री गायत्री अष्टकम् १ ॥
(आदि गुरु श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितम्)
विश्वामित्रतपःफलां प्रियतरां विप्रालिसंसेवितां नित्यानित्यविवेकदां स्मितमुखीं खण्डेन्दुभूषोज्ज्वलाम् । ताम्बूलारुणभासमानवदनां मार्ताण्डमध्यस्थितां गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिणयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ १ ॥ जातीपङ्कजकेतकीकुवलयैः सम्पूजिताङ्घ्रिद्वयां तत्त्वार्थात्मिकवर्णपङ्क्तिसहितां तत्त्वार्थबुद्धिप्रदाम् । प्राणायामपरायणैर्बुधजनैः संसेव्यमानां शिवां गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिणयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ २ ॥ मञ्जीरध्वनिभिः समस्तजगतां मञ्जुत्वसंवर्धनीं विप्रप्रेङ्खितवारिवारितमहारक्षोगणां मृण्मयीम् । जप्तुः पापहरां जपासुमनिभां हंसेन संशोभितां गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिणयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ ३ ॥ काञ्चीचेलविभूषितां शिवमयीं मालार्धमालादिका- -न्बिभ्राणां परमेश्वरीं शरणदां मोहान्धबुद्धिच्छिदाम् । भूरादित्रिपुरां त्रिलोकजननीमध्यात्मशाखानुतां गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिणयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ ४ ॥ ध्यातुर्गर्भकृशानुतापहरणां सामात्मिकां सामगां सायङ्कालसुसेवितां स्वरमयीं दूर्वादलश्यामलाम् । मातुर्दास्यविलोचनैकमतिमत्खेटीन्द्रसंराजितां गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिणयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ ५ ॥ सन्ध्यारागविचित्रवस्त्रविलसद्विप्रोत्तमैः सेवितां ताराहारसुमालिकां सुविलसद्रत्नेन्दुकुम्भान्तराम् । राकाचन्द्रमुखीं रमापतिनुतां शङ्खादिभास्वत्करां गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिणयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ ६ ॥ वेणीभूषितमालकध्वनिकरैर्भृङ्गैः सदा शोभितां तत्त्वज्ञानरसायनज्ञरसनासौधभ्रमद्भ्रामरीम् । नासालङ्कृतमौक्तिकेन्दुकिरणैः सायन्तमश्छेदिनीं गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिणयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ ७ ॥ पादाब्जान्तररेणुकुङ्कुमलसत्फालद्युरामावृतां रम्भानाट्यविलोकनैकरसिकां वेदान्तबुद्धिप्रदाम् । वीणावेणुमृदङ्गकाहलरवान् देवैः कृताञ्छृण्वतीं गायत्रीं हरिवल्लभां त्रिणयनां ध्यायामि पञ्चाननाम् ॥ ८ ॥
॥ फलश्रुति ॥
हत्यापानसुवर्णतस्करमहागुर्वङ्गनासङ्गमा- -न्दोषाञ्छैलसमान् पुरन्दरसमाः सञ्च्छिद्य सूर्योपमाः । गायत्रीं श्रुतिमातुरेकमनसा सन्ध्यासु ये भूसुरा जप्त्वा यान्ति परां गतिं मनुमिमं देव्याः परं वैदिकाः ॥ ९ ॥
॥ इति श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितं श्री गायत्र्यष्टकम् सम्पूर्णम् ॥

श्री गायत्री अष्टकम् १ - विस्तृत आध्यात्मिक परिचय

श्री गायत्री अष्टकम् १ (Sri Gayatri Ashtakam 1) अद्वैत वेदान्त के प्रणेता आदि गुरु श्रीमच्छङ्कराचार्य की एक अत्यंत गम्भीर और भक्तिपूर्ण रचना है। सनातन धर्म में माँ गायत्री को मात्र एक मन्त्र नहीं, बल्कि 'ब्रह्मविद्या' और 'वेदमाता' के रूप में पूजा जाता है। शङ्कराचार्य जी ने इस अष्टक (आठ श्लोकों का समूह) के माध्यम से गायत्री के उस विराट स्वरूप का दर्शन कराया है जो सूर्य मण्डल के भीतर स्थित होकर सम्पूर्ण चराचर जगत को चेतना प्रदान करता है।

इस स्तोत्र का प्रारंभ ही 'विश्वामित्रतपःफलां' शब्द से होता है। यह हमें उस प्राचीन इतिहास की याद दिलाता है जहाँ राजर्षि विश्वामित्र ने अपनी घोर तपस्या के बल पर गायत्री महामन्त्र का साक्षात्कार किया था। आचार्य शङ्कर यहाँ माँ गायत्री को पंचमुखी (Panchamukhi) और त्रिनेत्र (Three-eyed) स्वरूप में देखते हैं, जो दसों दिशाओं से साधक की रक्षा करती हैं और उसके बुद्धि दोषों का निवारण करती हैं।

आध्यात्मिक यात्रा में, यह अष्टक साधक के मन से 'नित्य' (शाश्वत सत्य) और 'अनित्य' (नश्वर जगत) के बीच के भ्रम को मिटाता है। श्लोक १ में ही माँ को 'नित्यानित्यविवेकदां' कहा गया है, अर्थात् वह शक्ति जो हमें सही और गलत की पहचान कराती है। यह पाठ उन साधकों के लिए वरदान है जो मन्त्र जप के साथ-साथ देवी के दिव्य स्वरूप का मानसिक चिन्तन (Visualization) करना चाहते हैं।

वर्तमान काल में, जहाँ मानसिक अशांति और भ्रम बढ़ रहे हैं, शङ्कराचार्य कृत यह गायत्री अष्टकम् साधक को एक अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान करता है। इसके कम्पनों (Vibrations) में वह शक्ति है जो न केवल आंतरिक शत्रुओं—काम, क्रोध, लोभ—का शमन करती है, बल्कि साधक के चारों ओर एक सात्विक आभामण्डल (Aura) का निर्माण करती है।

विशिष्ट महत्व और दार्शनिक आधार

गायत्री अष्टकम् १ का महत्व इसके तात्विक और योगिक अर्थों में निहित है, जो साधक की चेतना को उन्नत बनाते हैं:

  • मार्ताण्ड मध्यस्थिति: माँ को 'मार्ताण्डमध्यस्थितां' (सूर्य के केंद्र में स्थित) कहा गया है। यह दर्शाता है कि जिस प्रकार सूर्य जगत को प्रकाश देता है, माँ गायत्री हमारी बुद्धि को आध्यात्मिक प्रकाश प्रदान करती हैं।

  • प्राणायाम और योग: श्लोक २ में 'प्राणायामपरायणैर्बुधजनैः' का उल्लेख है। यह सिद्ध करता है कि यह स्तोत्र उन योगियों के लिए है जो श्वास-प्रश्वास की शुद्धि के माध्यम से माँ की आराधना करते हैं।

  • मोहान्धबुद्धिच्छिदाम्: माँ गायत्री अज्ञान और मोह रूपी अंधकार को जड़ से काट देने वाली 'परमेश्वरी' हैं। यह साधक को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने वाला मार्ग है।

  • सर्वदेवमयी गायत्री: आचार्य ने माँ को 'हरिवल्लभा' (लक्ष्मी) और 'शिवमयी' (पार्वती) के रूप में भी पूजा है, जो यह सिद्ध करता है कि गायत्री ही वह एकमात्र पराशक्ति है जो विविध रूपों में जगत का कल्याण करती है।

फलश्रुति लाभ: महापाप निवारण और परम गति

आदि शङ्कराचार्य ने स्वयं इस स्तोत्र की फलश्रुति (श्लोक ९) में इसके चमत्कारी लाभों की घोषणा की है:
१. महापातकों का नाश
श्लोक ९ के अनुसार, चाहे वह हत्या (ब्रह्महत्या), मदिरापान, स्वर्ण की चोरी या गुरु-पत्नी गमन जैसे 'शैल-समान' (पर्वत जैसे बड़े) पाप हों, माँ गायत्री का एकचित्त होकर पाठ करने से वे पाप तत्काल भस्म हो जाते हैं।
२. बौद्धिक प्रखरता और प्रज्ञा
यह अष्टक 'वेदान्तबुद्धिप्रदाम्' है। जो साधक शास्त्रों का मर्म समझना चाहते हैं या अपनी स्मरण शक्ति बढ़ाना चाहते हैं, उनके लिए यह स्तोत्र साक्षात् माँ सरस्वती की कृपा के समान है।
३. मानसिक शान्ति और अभय
'मोहान्धबुद्धिच्छिदाम्' होने के कारण यह पाठ साधक के भीतर के भय, सन्देह और मानसिक द्वन्द्व को समाप्त कर उसे स्थिरता और आत्मविश्वास प्रदान करता है।
४. परम पद की प्राप्ति
फलश्रुति के अनुसार, सन्ध्या काल में एकचित्त होकर पाठ करने वाले 'भूसुर' (साधक) अन्ततः 'परां गतिं' अर्थात् साक्षात् मोक्ष या ब्रह्मपद को प्राप्त करते हैं।

पाठ विधि और अनुष्ठान नियम (Ritual Guide)

आदि शङ्कराचार्य कृत इस अष्टक का पूर्ण फल प्राप्त करने हेतु निम्नलिखित मर्यादाओं का पालन करें:
  • समय (Timing): 'सन्ध्यासु ये भूसुरा'—अर्थात् प्रातः काल, मध्याह्न और सायंकाल की सन्ध्याओं में इसका पाठ अनिवार्य है। सूर्योदय का समय तेज प्राप्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
  • शुद्धि: स्नान के उपरान्त शुद्ध होकर सफ़ेद या पीले वस्त्र धारण करें। गायत्री उपासना में सात्विकता और शुचिता का सर्वोच्च महत्व है।
  • आसन: ऊनी या कुश के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • ध्यान: पाठ करते समय माँ के 'पञ्चाननां' (पाँच मुख वाले) और 'त्रैलोक्यजननी' स्वरूप का हृदय-कमल में चिन्तन करें।
  • जप: अष्टक पाठ के बाद कम से कम १०८ बार गायत्री महामन्त्र का जप करना साधना को पूर्णता प्रदान करता है।
विशेष टिप: यदि आप किसी गंभीर पापबोध या मानसिक तनाव से मुक्त होना चाहते हैं, तो नित्य ९ बार इस अष्टक का पाठ २१ दिन तक करें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. श्री गायत्री अष्टकम् १ के वास्तविक रचयिता कौन हैं?

इस अष्टक की रचना ८वीं शताब्दी के महान दार्शनिक और हिन्दू धर्म के पुनरुद्धारक आदि गुरु श्रीमच्छङ्कराचार्य ने की है।

2. क्या इस अष्टक के पाठ से वास्तव में महापाप धुल जाते हैं?

हाँ, श्लोक ९ में आचार्य ने स्पष्ट किया है कि पर्वत के समान विशाल पाप भी 'पुरन्दरसमाः' (इन्द्र के समान वज्र प्रहार से) और 'सूर्योपमाः' (सूर्य की किरणों से ओस के समान) नष्ट हो जाते हैं।

3. 'पञ्चाननाम्' (Panchaananaam) स्वरूप का अर्थ क्या है?

पञ्चानना का अर्थ है पाँच मुखों वाली। ये पाँच मुख पञ्च-प्राणों, पञ्च-भूतों और चारों वेदों तथा एक सर्वोच्च आत्मज्ञान के प्रतीक हैं।

4. क्या स्त्रियाँ और बच्चे इस अष्टक का पाठ कर सकते हैं?

अवश्य, माँ गायत्री वेदों की माता और नारी शक्ति का साक्षात् विग्रह हैं। शुचिता और श्रद्धा के साथ कोई भी भक्त इसका पाठ कर सकता है।

5. 'हरिवल्लभा' का यहाँ क्या संदर्भ है?

हरिवल्लभा का अर्थ है भगवान विष्णु की प्रिय शक्ति (लक्ष्मी)। यह दर्शाता है कि गायत्री ही वह आदि शक्ति है जो पालनकर्ता विष्णु के साथ लक्ष्मी बनकर विद्यमान है।

6. क्या पाठ के लिए गायत्री मन्त्र की दीक्षा अनिवार्य है?

स्तोत्र पाठ के लिए दीक्षा अनिवार्य नहीं है, परन्तु मन्त्र की गोपनीय शक्तियों के जागरण और अनुष्ठानिक शुद्धि के लिए गुरु का सानिध्य उत्तम रहता है।

7. इसमें 'ताम्बूलारुणभासमान' का क्या अर्थ है?

इसका अर्थ है कि माँ का मुखमण्डल ताम्बूल (पान) के कारण लाल आभा से युक्त है, जो उनके सौभाग्यवती और आनंदमयी स्वरूप को दर्शाता है।

8. क्या यह अष्टक अन्य गायत्री अष्टकों से अलग है?

हाँ, गायत्री के कई अष्टक हैं, परन्तु शङ्कराचार्य कृत यह अष्टक अपनी दार्शनिक गहराई और 'मार्ताण्ड मध्यस्थिति' के वर्णन के कारण अत्यंत प्रसिद्ध और ऊर्जावान है।

9. क्या केवल १ बार पाठ करने से लाभ मिलता है?

जी हाँ, 'जप्त्वा यान्ति परां गतिं' अर्थात् श्रद्धा के साथ एक बार भी पाठ करने से साधक को आध्यात्मिक लाभ मिलना प्रारंभ हो जाता है।

10. 'अध्यात्मशाखानुतां' का क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है—वेदों की अध्यात्म शाखाओं (उपनिषदों) द्वारा जिनकी स्तुति की जाती है। माँ गायत्री समस्त वेदान्त का सार हैं।