Sri Gayatri Ashtakam 1 – श्री गायत्री अष्टकम् १ (श्रीमच्छङ्कराचार्य विरचितम्)

श्री गायत्री अष्टकम् १ - विस्तृत आध्यात्मिक परिचय
श्री गायत्री अष्टकम् १ (Sri Gayatri Ashtakam 1) अद्वैत वेदान्त के प्रणेता आदि गुरु श्रीमच्छङ्कराचार्य की एक अत्यंत गम्भीर और भक्तिपूर्ण रचना है। सनातन धर्म में माँ गायत्री को मात्र एक मन्त्र नहीं, बल्कि 'ब्रह्मविद्या' और 'वेदमाता' के रूप में पूजा जाता है। शङ्कराचार्य जी ने इस अष्टक (आठ श्लोकों का समूह) के माध्यम से गायत्री के उस विराट स्वरूप का दर्शन कराया है जो सूर्य मण्डल के भीतर स्थित होकर सम्पूर्ण चराचर जगत को चेतना प्रदान करता है।
इस स्तोत्र का प्रारंभ ही 'विश्वामित्रतपःफलां' शब्द से होता है। यह हमें उस प्राचीन इतिहास की याद दिलाता है जहाँ राजर्षि विश्वामित्र ने अपनी घोर तपस्या के बल पर गायत्री महामन्त्र का साक्षात्कार किया था। आचार्य शङ्कर यहाँ माँ गायत्री को पंचमुखी (Panchamukhi) और त्रिनेत्र (Three-eyed) स्वरूप में देखते हैं, जो दसों दिशाओं से साधक की रक्षा करती हैं और उसके बुद्धि दोषों का निवारण करती हैं।
आध्यात्मिक यात्रा में, यह अष्टक साधक के मन से 'नित्य' (शाश्वत सत्य) और 'अनित्य' (नश्वर जगत) के बीच के भ्रम को मिटाता है। श्लोक १ में ही माँ को 'नित्यानित्यविवेकदां' कहा गया है, अर्थात् वह शक्ति जो हमें सही और गलत की पहचान कराती है। यह पाठ उन साधकों के लिए वरदान है जो मन्त्र जप के साथ-साथ देवी के दिव्य स्वरूप का मानसिक चिन्तन (Visualization) करना चाहते हैं।
वर्तमान काल में, जहाँ मानसिक अशांति और भ्रम बढ़ रहे हैं, शङ्कराचार्य कृत यह गायत्री अष्टकम् साधक को एक अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान करता है। इसके कम्पनों (Vibrations) में वह शक्ति है जो न केवल आंतरिक शत्रुओं—काम, क्रोध, लोभ—का शमन करती है, बल्कि साधक के चारों ओर एक सात्विक आभामण्डल (Aura) का निर्माण करती है।
विशिष्ट महत्व और दार्शनिक आधार
गायत्री अष्टकम् १ का महत्व इसके तात्विक और योगिक अर्थों में निहित है, जो साधक की चेतना को उन्नत बनाते हैं:
मार्ताण्ड मध्यस्थिति: माँ को 'मार्ताण्डमध्यस्थितां' (सूर्य के केंद्र में स्थित) कहा गया है। यह दर्शाता है कि जिस प्रकार सूर्य जगत को प्रकाश देता है, माँ गायत्री हमारी बुद्धि को आध्यात्मिक प्रकाश प्रदान करती हैं।
प्राणायाम और योग: श्लोक २ में 'प्राणायामपरायणैर्बुधजनैः' का उल्लेख है। यह सिद्ध करता है कि यह स्तोत्र उन योगियों के लिए है जो श्वास-प्रश्वास की शुद्धि के माध्यम से माँ की आराधना करते हैं।
मोहान्धबुद्धिच्छिदाम्: माँ गायत्री अज्ञान और मोह रूपी अंधकार को जड़ से काट देने वाली 'परमेश्वरी' हैं। यह साधक को आत्म-साक्षात्कार की ओर ले जाने वाला मार्ग है।
सर्वदेवमयी गायत्री: आचार्य ने माँ को 'हरिवल्लभा' (लक्ष्मी) और 'शिवमयी' (पार्वती) के रूप में भी पूजा है, जो यह सिद्ध करता है कि गायत्री ही वह एकमात्र पराशक्ति है जो विविध रूपों में जगत का कल्याण करती है।
फलश्रुति लाभ: महापाप निवारण और परम गति
पाठ विधि और अनुष्ठान नियम (Ritual Guide)
- समय (Timing): 'सन्ध्यासु ये भूसुरा'—अर्थात् प्रातः काल, मध्याह्न और सायंकाल की सन्ध्याओं में इसका पाठ अनिवार्य है। सूर्योदय का समय तेज प्राप्ति के लिए सर्वश्रेष्ठ है।
- शुद्धि: स्नान के उपरान्त शुद्ध होकर सफ़ेद या पीले वस्त्र धारण करें। गायत्री उपासना में सात्विकता और शुचिता का सर्वोच्च महत्व है।
- आसन: ऊनी या कुश के आसन पर पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
- ध्यान: पाठ करते समय माँ के 'पञ्चाननां' (पाँच मुख वाले) और 'त्रैलोक्यजननी' स्वरूप का हृदय-कमल में चिन्तन करें।
- जप: अष्टक पाठ के बाद कम से कम १०८ बार गायत्री महामन्त्र का जप करना साधना को पूर्णता प्रदान करता है।