Logoपवित्र ग्रंथ

Sri Gayatri Lahari Stotram – श्री गायत्री लहरी स्तोत्रम् (रुद्रदेव विरचितम्)

Sri Gayatri Lahari Stotram – श्री गायत्री लहरी स्तोत्रम् (रुद्रदेव विरचितम्)
॥ श्री गायत्री लहरी स्तोत्रम् (रुद्रदेव विरचितम्) ॥
अमन्दानन्देनामरवरगृहे वास निरतां- नरं गायन्तं या भुवि भवभयात्त्रायत इह । सुरेशैः सम्पूज्यां मुनिगणनुतां तां सुखकरीं नमामो गायत्रीं निखिलमनुजाघौघशमनीम् ॥ १॥ अवामा संयुक्तं सकलमनुजैर्जाप्यमभितो- ह्यपायात्पायाद्भूरथ भुवि भुवः स्वः पदमिति । पदं तन्मे पादाववतु सवितुश्चैव जघने- वरेण्यं श्रोणिं मे सततमवतान्नाभिमपि च ॥ २॥ पदं भर्गो देवस्य मम हृदयं धीमहि तथा- गलम्पायान्नित्यं धिय इह पदं चैव रसनाम् । तथा नेत्रे योऽव्यादलकमवतान्नः पदमिति- शिरोदेशं पायान्मम तु परितश्चान्तिमपदम् ॥ ३॥ अये दिव्ये देवि त्रिदशनिवहैर्वन्दितपदे न शेकुस्त्वां स्तोतुं भगवति महान्तोऽपि मुनयः । कथंकारं तर्हिस्तुतिततिरियं मे शुभतरा- तथा पूर्णा भूयात् त्रुटिपरियुता भावरहिता ॥ ४॥ भजन्तं निर्व्याजं तव सुखदमन्त्रं विजयिनं जनं यावज्जीवं जपति जननि त्वं सुखयसि । न वा कामं काचित् कलुषकणिकाऽपि स्पृशति तं संसारं संसारं सरति सहसा तस्य सततम् ॥ ५॥ दधानां ह्याधानं सितकुवलयास्फालनरुचां स्वयं विभ्राजन्तीं त्रिभुवनजनाह्लादनकरीम् । अलं चालं चालं मम चकितचित्तं सुचपलं चलच्चन्द्रास्ये त्वद्वदनरुचमाचामय चिरम् ॥ ६॥ ललामे भाले ते बहुतर विशालेऽति विमले कलाचञ्चच्चान्द्री रुचिरतिलकावेन्दुकलया । नितान्तं गोमाया निविड तमसो नाश व्यसना तमो मे गाढं हि हृदयसदनस्थं ग्लपयतु ॥ ७॥ अये मातः किन्ते चरण-शरणं संश्रयवतां- जनानामन्तस्थो वृजिन हुतभुक् प्रज्वलति यः । तदस्याशु सम्यक् प्रशमनहितायैव विधृतं- करे पात्रं पुण्यं सलिलभरितं काष्ठरचितम् ॥ ८॥ अथाहोस्विन्मातः सरिदधिपतेः सारमखिलं सुधारूपं कूपं लघुतरमनूपं कलयति । स्वभक्तेभ्यो नित्यं वितरसि जनोद्धारिणि शुभे विहीने दीने मय्यपि कृपय किंचित् करुणया ॥ ९॥ सदैव त्वत्पाणौ विधृतमरविन्दं द्युतिकरं त्विदं दर्शं दर्शं रविशशिसमं नेत्रयुगलम् । विचिन्त्य स्वां वृत्तिं भ्रमविषमजालेऽस्ति पतित- मिदं मन्ये नोचेत् कथमिति भवेदर्ध-विकचम् ॥ १०॥ स्वयं मातः किंवा त्वमसि जलजानामपि खनि- र्यतस्ते सर्वाङ्गं कमलमयमेवास्ति किमु नो । तथा भीत्या तस्माच्छरणमुपयातः कमलराट् - प्रयुञ्जानोऽश्रान्तं भवति तदिहैवासनविधौ ॥ ११॥ दिवौकोभिर्वन्द्ये विकसित सरोजाक्षि सुखदे कृपादृष्टेर्वृष्टिः सुनिपतति यस्योपरि तव । तदीया वाञ्छा किं द्रुतमनु विधेयास्ति सकला अतोमन्तोस्तन्तून् मम सपदि छित्वाऽम्ब सुखय ॥ १२॥ करेऽक्षाणां माला प्रविलसति या तेऽतिविमले किमर्थं सा कान् वा गणयसि जनान् भक्ति निरतान् । जपन्ती कं मन्त्रं प्रशमयसि दुःखं जनिजुषा मये का वा वाञ्छा तव वरिवृति त्वत्र वरदे ॥ १३॥ न मन्ये धन्येऽहं त्ववितथमिदं लोकगदितं ममात्रोक्तिर्मत्वा कमलमिव फुल्लं तव करम् । विजृम्भा संयुक्त द्युतिमयमिदं कोकनदमि- त्यरं जानानेयं मधुकरततिः संविलसति ॥ १४॥ महामोहाम्भोधौ मम निपतिता जीवनतरि- र्निरालम्बा दोला चलित दुरवस्थामधिगता । जलावर्त व्यालो ग्रसितुमभितो वाञ्छति च तां करालम्बं दत्वा भगवति द्रुतं तारय शिवे ॥ १५ । दधानासित्वं यत् स्ववपुषि पयोधारि-युगल- मिति श्रुत्वा लोकैर्मम मनसि चिन्ता समभवत् । कथं स्यात् सा तस्मादलक लतिका मस्तक भुवि शिरोद्यां हृद्येयं जलदपटली खेलति किल ॥ १६॥ तथा तत्रैवोपस्थितिमपि निशीथिन्यधिपतेः प्रपश्यामि श्यामे सह सहचरैस्तारक गणैः । अहोरात्रः क्रीडा परवशमितास्तेऽपि चकिता- श्चिरं चिक्रीडन्ते तदपि महदाश्चर्य-चरितम् ॥ १७॥ यदाहुस्तं मुक्ता पटल जटितं रत्न मुकुटं न धत्ते तेषां सा वचनरचना साधुपदवीम् । निशैषा केशास्तु नहि विगत वेशा ध्रुवमिति प्रसन्नाऽध्यासन्ना विधुपरिषदेषा विलसति ॥ १८॥ त्रिबीजे हे देवि त्रि प्रणवसहिते त्र्यक्षरयुते त्रिमात्रा राजन्ते भुवनविभवे ह्योमितिपदे । त्रिकालं संसेव्ये त्रिगुणवति च त्रिस्वरमयि त्रिलोकेशैः पूज्ये त्रिभुवनभयात्त्राहि सतततम् ॥ १९॥ न चन्द्रो नैवेमे नभसि वितता तारकगणाः त्विषां राशी रम्या तव चरणयोरम्बुनिचये । पतित्वा कल्लोलैः सह परिचयाद्विस्तृतिमिता प्रभा सैवाऽनन्ता गगनमुकुरे दीव्यति सदा ॥ २०॥ त्वमेव ब्रह्माणी त्वमसि कमला त्वं नगसुता त्रिसन्ध्यं सेवन्ते चरणयुगलं ये तव जनाः । जगज्जाले तेषां निपतित जनानामिह शुभे समुद्धारार्थं किं मतिमति मतिस्ते न भवति ॥ २१॥ अनेकैः पापौघैर्लुलित वपुषं शोक सहितं लुठन्तं दीनं मां विमल पदयो रेणुषु तव । गलद्बाष्पं शश्वद् जननि सहसाश्वासनवचो ब्रुवाणोत्तिष्ठ त्वं अमृतकणिकां पास्यसि कदा ॥ २२॥ न वा मादृक् पापी नहि तव समा पापहरणी न दुर्बुद्धिर्मादृक् न च तव समा धी वितरिणी । न मादृग् गर्विष्ठो नहि तव समा गर्वहरणी हृदि स्मृत्वा ह्येवं मामयि कुरु यथेच्छा तव यथा ॥ २३॥ दरीधर्ति स्वान्तेऽक्षर वर चतुर्विंशतिमितं त्वदन्तर्मन्त्रं यत्त्वयि निहित चेतो हि मनुजः । समन्ताद् भास्वन्तं भवति भुवि सञ्जीवनवनं भवाम्भोधेः पारं व्रजति स नितान्तं सुखयुतः ॥ २४॥ भगवति लहरीयं रुद्रदेव प्रणीता तव चरण सरोजे स्थाप्यते भक्तिभावैः । कुमतितिमिरपङ्कस्याङ्कमग्नं सशङ्कं अयि खलु कुरु दत्वा वीतशङ्कं स्वमङ्कम् ॥ २५॥
॥ इति श्री रुद्रदेव विरचित गायत्री लहरी समाप्ता ॥

श्री गायत्री लहरी स्तोत्रम् - परिचय एवं भावार्थ

श्री गायत्री लहरी (Sri Gayatri Lahari), भक्त कवि रुद्रदेव द्वारा रचित एक अत्यंत भावप्रवण स्तुति है। संस्कृत साहित्य में 'लहरी' काव्यों की एक विशिष्ट परंपरा है (जैसे सौंदर्य लहरी, गंगा लहरी), जो भक्ति और आनंद की 'तरंगों' (Waves) को व्यक्त करते हैं।

इस स्तोत्र में 25 श्लोक हैं। रचयिता रुद्रदेव माँ गायत्री से एक अबोध बालक की भांति प्रार्थना करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि "हे माँ! मेरे जैसा पापी कोई नहीं और तेरे जैसा पाप-हारिणी (पापनाशिनी) कोई नहीं" (न वा मादृक् पापी नहि तव समा पापहरणी - श्लोक 23)

यह स्तोत्र केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्म-समर्पण (Self-Surrender) का श्रेष्ठ उदाहरण है। इसमें साधक अपनी दीनता, अज्ञान और सांसारिक कष्टों को माँ के चरणों में रखकर निर्भय (वीतशङ्कं) होने की प्रार्थना करता है।

पाठ के लाभ (Benefits)

इस स्तोत्र के श्रद्धापूर्वक पाठ से साधक को निम्न लाभ प्राप्त होते हैं:

१. पापों का नाश (Sin Destruction)

जैसा कि श्लोक 1 में कहा गया है - 'निखिलमनुजाघौघशमनीम्', यह स्तोत्र मनुष्यों के समस्त पाप समूहों का शमन करने वाला है।

२. भय से मुक्ति (Freedom from Fear)

संसार सागर में डूबते हुए व्यक्ति को यह स्तोत्र सहारा देता है। यह 'भव-भय' (सांसारिक डर) और मृत्यु के भय को दूर करता है।

३. बुद्धि की निर्मलता (Clarity of Mind)

माँ गायत्री 'धी' (बुद्धि) की देवी हैं। यह स्तोत्र कुमति रूपी अंधकार (कुमतितिमिर) को मिटाकर सद्बुद्धि प्रदान करता है।

४. दैवीय सुरक्षा (Divine Protection)

श्लोक 2 और 3 में शरीर के विभिन्न अंगों (पैर, हृदय, नेत्र, शिर) की रक्षा के लिए प्रार्थना की गई है, जो इसे एक 'कवच' का रूप भी देता है।

पाठ विधि (Recitation Method)

  • समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या वंदन के समय इसका पाठ सर्वोत्तम है।
  • शुद्धि: स्नान आदि से निवृत्त होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • दिशा: पूर्व दिशा (East) की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें।
  • ध्यान: माँ गायत्री के सौम्य स्वरूप का ध्यान करें और मन में अपने पापों के प्रायश्चित का भाव रखें।
  • समर्पण: अंत में 'अनेन पाठेन श्री गायत्री प्रीताम्' कहकर जल छोड़ें।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'गायत्री लहरी' के रचयिता कौन हैं?

इसके रचयिता 'रुद्रदेव' हैं, जो एक परम गायत्री भक्त थे। उन्होंने माँ के चरणों में अपना सर्वस्व समर्पित करते हुए इसकी रचना की।

2. क्या इस स्तोत्र का पाठ बिना गुरु दीक्षा के किया जा सकता है?

जी हाँ, यह एक स्तुति परक स्तोत्र है, न कि बीज मंत्र। इसे कोई भी श्रद्धावान व्यक्ति भक्ति भाव से पढ़ सकता है।

3. 'लहरी' का क्या अर्थ है?

'लहरी' का शाब्दिक अर्थ है 'लहर' (Wave)। भक्ति साहित्य में इसका प्रयोग ईश्वरीय प्रेम और आनंद के निरंतर प्रवाह को दर्शाने के लिए किया जाता है।

4. क्या यह स्तोत्र पापों का नाश करता है?

हाँ, यह विशेष रूप से 'पाप-मोचन' स्तोत्र है। जो व्यक्ति पश्चाताप की अग्नि में जल रहा हो, उसे इसका पाठ अवश्य करना चाहिए।