Sri Gayatri Lahari Stotram – श्री गायत्री लहरी स्तोत्रम् (रुद्रदेव विरचितम्)

श्री गायत्री लहरी स्तोत्रम् - परिचय एवं भावार्थ
श्री गायत्री लहरी (Sri Gayatri Lahari), भक्त कवि रुद्रदेव द्वारा रचित एक अत्यंत भावप्रवण स्तुति है। संस्कृत साहित्य में 'लहरी' काव्यों की एक विशिष्ट परंपरा है (जैसे सौंदर्य लहरी, गंगा लहरी), जो भक्ति और आनंद की 'तरंगों' (Waves) को व्यक्त करते हैं।
इस स्तोत्र में 25 श्लोक हैं। रचयिता रुद्रदेव माँ गायत्री से एक अबोध बालक की भांति प्रार्थना करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि "हे माँ! मेरे जैसा पापी कोई नहीं और तेरे जैसा पाप-हारिणी (पापनाशिनी) कोई नहीं" (न वा मादृक् पापी नहि तव समा पापहरणी - श्लोक 23)।
यह स्तोत्र केवल पूजा नहीं, बल्कि आत्म-समर्पण (Self-Surrender) का श्रेष्ठ उदाहरण है। इसमें साधक अपनी दीनता, अज्ञान और सांसारिक कष्टों को माँ के चरणों में रखकर निर्भय (वीतशङ्कं) होने की प्रार्थना करता है।
पाठ के लाभ (Benefits)
इस स्तोत्र के श्रद्धापूर्वक पाठ से साधक को निम्न लाभ प्राप्त होते हैं:
१. पापों का नाश (Sin Destruction)
जैसा कि श्लोक 1 में कहा गया है - 'निखिलमनुजाघौघशमनीम्', यह स्तोत्र मनुष्यों के समस्त पाप समूहों का शमन करने वाला है।
२. भय से मुक्ति (Freedom from Fear)
संसार सागर में डूबते हुए व्यक्ति को यह स्तोत्र सहारा देता है। यह 'भव-भय' (सांसारिक डर) और मृत्यु के भय को दूर करता है।
३. बुद्धि की निर्मलता (Clarity of Mind)
माँ गायत्री 'धी' (बुद्धि) की देवी हैं। यह स्तोत्र कुमति रूपी अंधकार (कुमतितिमिर) को मिटाकर सद्बुद्धि प्रदान करता है।
४. दैवीय सुरक्षा (Divine Protection)
श्लोक 2 और 3 में शरीर के विभिन्न अंगों (पैर, हृदय, नेत्र, शिर) की रक्षा के लिए प्रार्थना की गई है, जो इसे एक 'कवच' का रूप भी देता है।
पाठ विधि (Recitation Method)
- समय: प्रातःकाल (ब्रह्म मुहूर्त) या संध्या वंदन के समय इसका पाठ सर्वोत्तम है।
- शुद्धि: स्नान आदि से निवृत्त होकर, स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- दिशा: पूर्व दिशा (East) की ओर मुख करके कुशा या ऊन के आसन पर बैठें।
- ध्यान: माँ गायत्री के सौम्य स्वरूप का ध्यान करें और मन में अपने पापों के प्रायश्चित का भाव रखें।
- समर्पण: अंत में 'अनेन पाठेन श्री गायत्री प्रीताम्' कहकर जल छोड़ें।