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Sri Gayatri Bhujanga Stotram – श्री गायत्री भुजङ्ग स्तोत्रम्

Sri Gayatri Bhujanga Stotram – श्री गायत्री भुजङ्ग स्तोत्रम्
॥ श्री गायत्री भुजङ्ग स्तोत्रम् ॥
(भुजङ्गप्रयात छन्दसा निबद्धम्)
उषःकालगम्यामुदात्त स्वरूपां अकारप्रविष्टामुदाराङ्गभूषाम् । अजेशादि वन्द्यामजार्चाङ्गभाजां अनौपम्यरूपां भजाम्यादिसन्ध्याम् ॥ १ ॥ सदा हंसयानां स्फुरद्रत्नवस्त्रां वराभीतिहस्तां खगाम्नायरूपाम् । स्फुरत्स्वाधिकामक्षमालां च कुम्भं दधनामहं भावये पूर्वसन्ध्याम् ॥ २ ॥ प्रवाल प्रकृष्टाङ्ग भूषोज्ज्वलन्तीं किरीटोल्लसद्रत्नराजप्रभाताम् । विशालोरुभासां कुचाश्लेषहारां भजे बालकां ब्रह्मविद्यां विनोदाम् ॥ ३ ॥ स्फुरच्चन्द्रकान्तां शरच्चन्द्रवक्त्रां महाचंद्रकान्ताद्रि पीनस्तनाढ्याम् । त्रिशूलाक्षहस्तां त्रिनेत्रस्य पत्नीं वृषारूढपादां भजे मध्यसन्ध्याम् ॥ ४ ॥ षडाधाररूपां षडाधारगम्यां षडध्वातिशुद्धां यजुर्वेदरूपाम् । हिमाद्रेः सुतां कुन्ददन्तावभासां महेशार्धदेहां भजे मध्यसन्ध्याम् ॥ ५ ॥ सुषुम्नान्तरस्थां सुधासेव्यमाना- -मुकारान्तरस्थां द्वितीयस्वरूपाम् । सहस्रार्करश्मि प्रभासत्रिनेत्रां सदा यौवनाढ्यां भजे मध्यसन्ध्याम् ॥ ६ ॥ सदासामगानां प्रियां श्यामलाङ्गीं अकारान्तरस्थां करोल्लासिचक्राम् । गदापद्महस्तां ध्वनत्पाञ्चजन्यां खगेशोपविष्टां भजेमास्तसन्ध्याम् ॥ ७ ॥ प्रगल्भस्वरूपां स्फुरत्कङ्कणाढ्यां अहंलम्बमानस्तनप्रान्तहारम् । महानीलरत्नप्रभाकुण्डलाभ्यां स्फुरत्स्मेरवक्त्रां भजे तुर्यसन्ध्याम् ॥ ८ ॥ सदातत्त्वमस्यादि वाक्यैकगम्यां महामोक्षमार्गैक पाथेयरूपाम् । महासिद्धविद्याधरैः सेव्यमानां भजेऽहं भवोत्तारणीं तुर्यसन्ध्याम् ॥ ९ ॥ हृदम्भोजमध्ये पराम्नायमीडे सुखासीनसद्राजहंसां मनोज्ञाम् । सदा हेमभासां त्रयीविद्यमध्यां भजाम स्तुवामो वदाम स्मरामः ॥ १० ॥ सदा तत्पदैस्तूयमानां सवित्रीं वरेण्यां महाभर्गरूपां त्रिनेत्राम् । सदा देवदेवादि देवस्य पत्नीं अहं धीमहीत्यादि पादैक जुष्टाम् ॥ ११ ॥ अनाथं दरिद्रं दुराचारयुक्तं शठं स्थूलबुद्धिं परं धर्महीनम् । त्रिसन्ध्यां जपध्यानहीनं महेशीं परं चिन्तयामि प्रसीद त्वमेव ॥ १२ ॥ इतीदं भुजङ्गं पठेद्यस्तु भक्त्या समाधाय चित्ते सदा श्रीभवानीम् । त्रिसन्ध्यस्वरूपां त्रिलोकैकवन्द्यां स मुक्तो भवेत्सर्वपापैरजस्रम् ॥ १३ ॥
॥ इति श्री गायत्री भुजङ्ग स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

श्री गायत्री भुजङ्ग स्तोत्रम् - एक आध्यात्मिक परिचय

श्री गायत्री भुजङ्ग स्तोत्रम् (Sri Gayatri Bhujanga Stotram) वैदिक और तान्त्रिक साधना का एक अनूठा संगम है। 'भुजङ्ग' शब्द का अर्थ है सर्प, और यह स्तोत्र 'भुजङ्गप्रयात' छन्द में रचा गया है। इस छन्द की विशेषता इसकी गति है, जो सर्प के रेंगने के समान लयबद्ध, तीव्र और कर्णप्रिय होती है। योग शास्त्र में सर्प को 'कुण्डलिनी शक्ति' का प्रतीक माना गया है, और माँ गायत्री उसी कुण्डलिनी चेतना की परम अधिष्ठात्री हैं।

यह स्तोत्र मात्र शब्दों का संकलन नहीं है, बल्कि यह त्रिकाल सन्ध्या का काव्यमय सार है। सनातन धर्म में दिन के तीन महत्वपूर्ण संधिकालों—सूर्योदय (प्रातः), मध्याह्न (दोपहर) और सूर्यास्त (सायं)—को साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। गायत्री भुजङ्ग स्तोत्र में इन तीनों समयों की अधिष्ठात्री देवियों के स्वरूप का बड़ा ही सूक्ष्म और तात्विक वर्णन मिलता है। प्रातः वे हंस पर सवार ब्रह्माणी हैं, मध्याह्न में वृषभ पर सवार माहेश्वरी हैं, और सायंकाल में गरुड़ पर सवार वैष्णवी हैं।

आध्यात्मिक दृष्टि से यह स्तोत्र साधक को 'ब्रह्मविद्या' की ओर ले जाता है। इसमें माँ गायत्री को केवल एक मन्त्र तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उन्हें 'पराम्नाय' (सर्वोच्च वेद) और 'भवोत्तारणी' (संसार सागर से तारने वाली) कहा गया है। इस स्तोत्र का पाठ हृदय में भक्ति का संचार करता है और बुद्धि को उस 'सविता' (सूर्य) के प्रकाश से प्रकाशित करता है जो हमारे भीतर और बाहर समान रूप से व्याप्त है।

विशिष्ट महत्व और योगिक रहस्य

गायत्री भुजङ्ग स्तोत्र का महत्व इसके दार्शनिक और योगिक अर्थों में निहित है। यह साधक की चेतना को भौतिक से सूक्ष्म की ओर मोड़ता है:

  • षडाधार और सुषुम्ना: श्लोक ५ और ६ में स्पष्ट उल्लेख है—'षडाधाररूपां' और 'सुषुम्नान्तरस्थां'। यह दर्शाता है कि माँ गायत्री हमारे शरीर के छह चक्रों (मूलाधार से आज्ञा चक्र तक) और मुख्य प्राण वाहिनी सुषुम्ना नाड़ी में अमृत रूप में निवास करती हैं।

  • अक्षर विज्ञान: स्तोत्र में 'अकार' और 'उकार' जैसी ध्वनियों का प्रवेश वर्णित है, जो गायत्री के ॐकार स्वरूप और प्रणव की सूक्ष्म व्याख्या करते हैं। यह साधक को 'नाद योग' की अनुभूति कराता है।

  • तुर्य सन्ध्या का रहस्य: श्लोक ९ में 'तुर्यसन्ध्या' की बात की गई है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के बाद जो चौथी अवस्था 'तुरीय' होती है, माँ गायत्री उसी परमानन्द का स्वरूप हैं। यह अवस्था मोक्ष का मार्ग है।

  • सर्वात्मक स्वरूप: श्लोक ११ में माँ को 'देवदेवादि देवस्य पत्नीं' (महादेव की शक्ति) और 'तत्पदैस्तूयमानां' (तत् पद से स्तुति की जाने वाली) कहकर उन्हें साक्षात् परब्रह्म की ऊर्जा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

फलश्रुति लाभ (Divine Benefits)

गायत्री भुजङ्ग स्तोत्र के भक्तिपूर्ण पाठ से निम्नलिखित लाभ सुनिश्चित रूप से प्राप्त होते हैं:
१. समस्त पापों का समूल नाश
स्तोत्र के अंतिम श्लोक के अनुसार, जो व्यक्ति चित्त को माँ भवानी (गायत्री) में लगाकर इसका पाठ करता है, वह 'सर्वपापैरजस्रम्'—अर्थात जन्मों के संचित पापों से मुक्त हो जाता है।
२. बौद्धिक प्रखरता और विवेक
माँ गायत्री बुद्धि की अधिष्ठात्री हैं। 'स्थूलबुद्धिं' (जड़ बुद्धि) वाला व्यक्ति भी यदि माँ की शरण लेता है (श्लोक १२), तो उसकी प्रज्ञा जाग्रत होती है और वह विद्वान् बनता है।
३. मानसिक शांति और सुरक्षा
यह स्तोत्र साधक के चारों ओर एक सुरक्षा कवच निर्मित करता है। इसके कम्पनों से भय, व्याधि और नकारात्मक विचार 'स्तम्भित' (रुक) जाते हैं।
४. मोक्ष की प्राप्ति
श्लोक ९ इसे 'महामोक्षमार्गैक पाथेयरूपाम्' कहता है। अर्थात यह भवसागर पार करने के लिए मार्ग की एकमात्र पूँजी (संबल) है।

पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Guide)

गायत्री साधना के इस सिद्ध स्तोत्र का पाठ निम्नलिखित विधि से करना श्रेयस्कर है:
  • समय: प्रातः काल (सूर्योदय), मध्याह्न (दोपहर १२ बजे) या सायंकाल (सूर्यास्त) का समय सर्वश्रेष्ठ है।
  • शुद्धि: स्नान के उपरान्त स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पीला या श्वेत रंग गायत्री साधना हेतु शुभ है।
  • आसन: पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश या ऊन के आसन पर बैठें।
  • ध्यान: श्लोक १-३ में वर्णित माँ के 'पूर्वसन्ध्या' स्वरूप (हंसारूढ़ा) का ध्यान हृदय में करें।
  • जप: स्तोत्र पाठ के बाद न्यूनतम १०८ बार मूल गायत्री मन्त्र का जप अवश्य करें।
नोट: यदि आप विशेष संकट में हैं, तो श्लोक १२ का बार-बार मानसिक स्मरण माँ की तत्काल करुणा का अनुभव कराता है।

FAQ - अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

1. 'भुजङ्ग' (Bhujanga) स्तोत्र का क्या अर्थ है?

भुजङ्ग का अर्थ है सर्प। यह स्तोत्र 'भुजङ्गप्रयात' छन्द में निबद्ध है, जिसकी लय सर्प की गति के समान मानी जाती है। यह छन्द गम्भीरता और संगीत का अनूठा मिश्रण है।

2. गायत्री भुजङ्ग स्तोत्र का पाठ कौन कर सकता है?

माँ गायत्री वेदों की जननी हैं। कोई भी श्रद्धावान भक्त, जो शुचिता और पवित्रता का पालन करता है, इस स्तोत्र का पाठ कर सकता है।

3. क्या इस स्तोत्र से मन्त्र सिद्धि प्राप्त होती है?

हाँ, यह स्तोत्र गायत्री मन्त्र की शक्ति को जाग्रत करने वाला सेतु है। यह साधक की चेतना को मन्त्र के सूक्ष्म अर्थों से जोड़ता है।

4. 'आदिसन्ध्या' (Adi Sandhya) का क्या तात्पर्य है?

आदि सन्ध्या प्रातः काल की बेला है, जब माँ गायत्री हंस पर सवार होकर ज्ञान और प्रकाश का संचार करती हैं।

5. इस स्तोत्र में कितने श्लोक हैं?

इस स्तोत्र में कुल १३ श्लोक हैं। १२ श्लोकों में स्तुति है और १३वें श्लोक में फलश्रुति दी गई है।

6. क्या इसके पाठ से बुद्धि तीव्र होती है?

बिल्कुल, माँ गायत्री प्रज्ञा (Wisdom) की देवी हैं। उनके किसी भी स्तोत्र का पाठ एकाग्रता बढ़ाकर जड़ बुद्धि को भी प्रखर बनाता है।

7. क्या पाठ के लिए माला अनिवार्य है?

स्तोत्र पाठ के लिए माला अनिवार्य नहीं है, लेकिन पाठ के उपरान्त मन्त्र जप हेतु तुलसी या चन्दन की माला का उपयोग श्रेष्ठ है।

8. 'त्रिसन्ध्या' (Tri-Sandhya) का पालन कैसे करें?

संभव हो तो सूर्योदय, दोपहर और सूर्यास्त के समय ३-३ बार पाठ करें। यदि समय कम हो, तो केवल प्रातः काल पाठ करना भी पुण्यदायी है।

9. क्या यह स्तोत्र रोगों को दूर करता है?

हाँ, इसमें वर्णित अमृतमयी ऊर्जा शारीरिक और मानसिक ताप को शांत करती है, जिससे स्वास्थ्य में सुधार होता है।

10. माँ गायत्री को 'परमेश्वरी' क्यों कहा गया है?

क्योंकि वे ही सर्वोच्च शक्ति हैं जो ब्रह्मा, विष्णु और महेश की शक्तियों का मूल आधार और सृजन का कारण हैं।