Sri Gayatri Bhujanga Stotram – श्री गायत्री भुजङ्ग स्तोत्रम्

श्री गायत्री भुजङ्ग स्तोत्रम् - एक आध्यात्मिक परिचय
श्री गायत्री भुजङ्ग स्तोत्रम् (Sri Gayatri Bhujanga Stotram) वैदिक और तान्त्रिक साधना का एक अनूठा संगम है। 'भुजङ्ग' शब्द का अर्थ है सर्प, और यह स्तोत्र 'भुजङ्गप्रयात' छन्द में रचा गया है। इस छन्द की विशेषता इसकी गति है, जो सर्प के रेंगने के समान लयबद्ध, तीव्र और कर्णप्रिय होती है। योग शास्त्र में सर्प को 'कुण्डलिनी शक्ति' का प्रतीक माना गया है, और माँ गायत्री उसी कुण्डलिनी चेतना की परम अधिष्ठात्री हैं।
यह स्तोत्र मात्र शब्दों का संकलन नहीं है, बल्कि यह त्रिकाल सन्ध्या का काव्यमय सार है। सनातन धर्म में दिन के तीन महत्वपूर्ण संधिकालों—सूर्योदय (प्रातः), मध्याह्न (दोपहर) और सूर्यास्त (सायं)—को साधना के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। गायत्री भुजङ्ग स्तोत्र में इन तीनों समयों की अधिष्ठात्री देवियों के स्वरूप का बड़ा ही सूक्ष्म और तात्विक वर्णन मिलता है। प्रातः वे हंस पर सवार ब्रह्माणी हैं, मध्याह्न में वृषभ पर सवार माहेश्वरी हैं, और सायंकाल में गरुड़ पर सवार वैष्णवी हैं।
आध्यात्मिक दृष्टि से यह स्तोत्र साधक को 'ब्रह्मविद्या' की ओर ले जाता है। इसमें माँ गायत्री को केवल एक मन्त्र तक सीमित नहीं रखा गया, बल्कि उन्हें 'पराम्नाय' (सर्वोच्च वेद) और 'भवोत्तारणी' (संसार सागर से तारने वाली) कहा गया है। इस स्तोत्र का पाठ हृदय में भक्ति का संचार करता है और बुद्धि को उस 'सविता' (सूर्य) के प्रकाश से प्रकाशित करता है जो हमारे भीतर और बाहर समान रूप से व्याप्त है।
विशिष्ट महत्व और योगिक रहस्य
गायत्री भुजङ्ग स्तोत्र का महत्व इसके दार्शनिक और योगिक अर्थों में निहित है। यह साधक की चेतना को भौतिक से सूक्ष्म की ओर मोड़ता है:
षडाधार और सुषुम्ना: श्लोक ५ और ६ में स्पष्ट उल्लेख है—'षडाधाररूपां' और 'सुषुम्नान्तरस्थां'। यह दर्शाता है कि माँ गायत्री हमारे शरीर के छह चक्रों (मूलाधार से आज्ञा चक्र तक) और मुख्य प्राण वाहिनी सुषुम्ना नाड़ी में अमृत रूप में निवास करती हैं।
अक्षर विज्ञान: स्तोत्र में 'अकार' और 'उकार' जैसी ध्वनियों का प्रवेश वर्णित है, जो गायत्री के ॐकार स्वरूप और प्रणव की सूक्ष्म व्याख्या करते हैं। यह साधक को 'नाद योग' की अनुभूति कराता है।
तुर्य सन्ध्या का रहस्य: श्लोक ९ में 'तुर्यसन्ध्या' की बात की गई है। जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति के बाद जो चौथी अवस्था 'तुरीय' होती है, माँ गायत्री उसी परमानन्द का स्वरूप हैं। यह अवस्था मोक्ष का मार्ग है।
सर्वात्मक स्वरूप: श्लोक ११ में माँ को 'देवदेवादि देवस्य पत्नीं' (महादेव की शक्ति) और 'तत्पदैस्तूयमानां' (तत् पद से स्तुति की जाने वाली) कहकर उन्हें साक्षात् परब्रह्म की ऊर्जा के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।
फलश्रुति लाभ (Divine Benefits)
पाठ विधि और विशेष अवसर (Ritual Guide)
- समय: प्रातः काल (सूर्योदय), मध्याह्न (दोपहर १२ बजे) या सायंकाल (सूर्यास्त) का समय सर्वश्रेष्ठ है।
- शुद्धि: स्नान के उपरान्त स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पीला या श्वेत रंग गायत्री साधना हेतु शुभ है।
- आसन: पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश या ऊन के आसन पर बैठें।
- ध्यान: श्लोक १-३ में वर्णित माँ के 'पूर्वसन्ध्या' स्वरूप (हंसारूढ़ा) का ध्यान हृदय में करें।
- जप: स्तोत्र पाठ के बाद न्यूनतम १०८ बार मूल गायत्री मन्त्र का जप अवश्य करें।