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श्री गणपति गकार अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (108 Names starting with 'Ga')

Sri Ganapati Gakara Ashtottara Shatanama Stotram

श्री गणपति गकार अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (108 Names starting with 'Ga')
॥ श्री गणपति गकार अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् ॥ ओं गकाररूपो गम्बीजो गणेशो गणवन्दितः । गणनीयो गणो गण्यो गणनातीतसद्गुणः ॥ १ ॥ गगनादिकसृद्गङ्गासुतो गङ्गासुतार्चितः । गङ्गाधरप्रीतिकरो गवीशेड्यो गदापहः ॥ २ ॥ गदाधरनुतो गद्यपद्यात्मककवित्वदः । गजास्यो गजलक्ष्मीवान् गजवाजिरथप्रदः ॥ ३ ॥ गञ्जानिरतशिक्षाकृद्गणितज्ञो गणोत्तमः । गणरात्रसमाराध्यो गर्हणस्तुतिसाम्यधीः ॥ ४ ॥ * (नोट: पाठांतर में श्लोक क्रम भिन्न हो सकते हैं) गण्डदानाञ्चितो गन्ता गण्डोपलसमाकृतिः । गगनव्यापको गम्यो गमानादिविवर्जितः ॥ ५ ॥ गण्डदोषहरो गण्डभ्रमद्भ्रमरकुण्डलः । गतागतज्ञो गतिदो गतमृत्युर्गतोद्भवः ॥ ६ ॥ गन्धप्रियो गन्धवाहो गन्धसिन्दुरबृन्दगः । गन्धादिपूजितो गव्यभोक्ता गर्गादिसन्नुतः ॥ ७ ॥ गरिष्ठो गरभिद्गर्वहरो गरलिभूषणः । गविष्ठो गर्जितारावो गभीरहृदयो गदी ॥ ८ ॥ गलत्कुष्ठहरो गर्भप्रदो गर्भार्भरक्षकः । गर्भाधारो गर्भवासिशिशुज्ञानप्रदायकः ॥ ९ ॥ गरुत्मत्तुल्यजवनो गरुडध्वजवन्दितः । गयेडितो गयाश्राद्धफलदश्च गयाकृतिः ॥ १० ॥ गदाधरावतारी च गन्धर्वनगरार्चितः । गन्धर्वगानसन्तुष्टो गरुडाग्रजवन्दितः ॥ ११ ॥ गर्ताभनाभिर्गव्यूतिः दीर्घतुण्डो गभस्तिमान् । गर्हिताचारदूरश्च गरुडोपलभूषितः ॥ १२ ॥ गजारिविक्रमो गन्धमूषवाजी गतश्रमः । गवेषणीयो गहनो गहनस्थमुनिस्तुतः ॥ १३ ॥ गवयच्छिद्गण्डकभिद्गह्वरापथवारणः । गजदन्तायुधो गर्जद्रिपुघ्नो गजकर्णिकः ॥ १४ ॥ गजचर्मामयच्छेत्ता गणाध्यक्षो गणार्चितः । गणिकानर्तनप्रीतो गच्छन्गन्धफलीप्रियः ॥ १५ ॥ गन्धकादिरसाधीशो गणकानन्ददायकः । गरभादिजनुर्हर्ता गण्डकीगाहनोत्सुकः ॥ १६ ॥ गण्डूषीकृतवाराशिः गरिमालघिमादिदः । गवाक्षवत्सौधवासी गर्भितो गर्भिणीनुतः ॥ १७ ॥ गन्धमादनशैलाभो गण्डभेरुण्डविक्रमः । गदितो गद्गदारावसंस्तुतो गह्वरीपतिः ॥ १८ ॥ गजेशाय गरीयसे गद्येड्यो गतभीर्गदितागमः । गर्हणीयगुणाभावो गङ्गादिकशुचिप्रदः ॥ १९ ॥ फलश्रुति गणनातीतविद्याश्रीबलायुष्यादिदायकः । एवं श्रीगणनाथस्य नाम्नामष्टोत्तरं शतम् ॥ २० ॥ पठनाच्छ्रवणात् पुंसां श्रेयः प्रेमप्रदायकम् । पूजान्ते यः पठेन्नित्यं प्रीतस्सन् तस्यविघ्नराट् ॥ २१ ॥ यं यं कामयते कामं तं तं शीघ्रं प्रयच्छति । दूर्वयाभ्यर्चयन् देवमेकविंशतिवासरान् ॥ २२ ॥ एकविंशतिवारं यो नित्यं स्तोत्रं पठेद्यदि । तस्य प्रसन्नो विघ्नेशस्सर्वान् कामान् प्रयच्छति ॥ २३ ॥ इति श्री गणपति गकाराष्टोत्तरशतनामस्तोत्रम् ।

स्तोत्र परिचय (Introduction)

श्री गणपति गकार अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् भगवान गणेश की उपासना साहित्य में एक अद्वितीय और दुर्लभ मणि है। इसकी विशेषता यह है कि इसमें भगवान के 108 नाम हैं और प्रत्येक नाम 'ग' (G) अक्षर से प्रारंभ होता है
संस्कृत वर्णमाला में 'ग' (ग्) भगवान गणेश का बीज अक्षर है। उनका बीज मंत्र 'गम्' (Gam) भी इसी अक्षर से बनता है। 'ग' ज्ञान, बुद्धि और मोक्ष का प्रतीक है। इसलिए, 'ग' से शुरू होने वाले इन नामों का उच्चारण साक्षात् गणेश तत्व को जाग्रत करता है।
यह स्तोत्र न केवल एक नामावली है, बल्कि ध्वन्यात्मक ऊर्जा (Phonetic Energy) का एक शक्तिशाली स्रोत है। लगातार 'ग' ध्वनि का उच्चारण साधक के मूलाधार चक्र को उत्तेजित करता है, जहाँ गणेश जी का वास होता है।

स्तोत्र का महत्व (Significance)

  • गकार रूप: पहला ही नाम "गकाररूपो" है, जिसका अर्थ है "वह जिनका स्वरूप 'ग' अक्षर है।" यह दर्शाता है कि भगवान शब्द-ब्रह्म के रूप में 'ग' में निहित हैं।
  • सर्वव्यापकता: नाम "गगनव्यापको" (श्लोक 5) बताता है कि वे आकाश (Gagan) की तरह अनंत और सर्वव्यापी हैं। "गर्भार्भरक्षक" (श्लोक 8) बताता है कि वे गर्भ में पल रहे शिशु की भी रक्षा करते हैं।
  • शत्रु और भय नाशक: नाम "गजारिविक्रमो" (श्लोक 13) उनकी वीरता को सिंह (गजारि) के समान बताता है, और "गतभी" (श्लोक 19) का अर्थ है "भय से मुक्त"। वे अपने भक्तों को निडर बनाते हैं।
  • काव्य और कला: "गद्यपद्यात्मककवित्वद" (श्लोक 3) - वे गद्य और पद्य दोनों प्रकार की कवित्व शक्ति देने वाले हैं। कला और साहित्य के साधकों के लिए यह अत्यंत महत्वपूर्ण है।

लाभ एवं फलश्रुति (Benefits)

श्लोक 20 से 23 तक इस स्तोत्र की फलश्रुति (लाभ) का वर्णन किया गया है:

1. असीमित विद्या और धन

यह "गणनातीत विद्या श्री" (Verses 20) प्रदान करता है, अर्थात ऐसी विद्या और धन जिसे गिना न जा सके (असीमित)।

2. बल और आयु

यह साधक को शारीरिक बल (Bala) और लंबी आयु (Ayushya) प्रदान करता है, जिससे वह स्वस्थ जीवन जी सके।

3. शीघ्र फल प्राप्ति

श्लोक 22 में कहा गया है "यं यं कामयते कामं तं तं शीघ्रं प्रयच्छति" - जो भी कामना की जाती है, वह "शीघ्र" (जल्दी) पूरी होती है, विलंब नहीं होता।

4. सभी मनोकामनाएं

अंततः, विघ्नेश प्रसन्‍न होकर "सर्वान् कामान्" (सभी इच्छाओं) को पूर्ण करते हैं (श्लोक 23)।

पाठ की विधि (Vidhi for Chanting)

फलश्रुति में इस स्तोत्र की सिद्धि के लिए एक विशिष्ट विधि बताई गई है, जिसका पालन करने से चमत्कारिक परिणाम मिलते हैं:
• अवधि (Duration): 21 दिन (एकविंशति वासरान् - श्लोक 22)। किसी विशेष कार्य की सिद्धि के लिए 21 दिनों का संकल्प लें।
• संख्या (Count): प्रतिदिन 21 बार (एकविंशति वारं - श्लोक 23) इस स्तोत्र का पाठ करें।
• मुख्य सामग्री: दूर्वा (Doob Grass)। श्लोक 22 में स्पष्ट निर्देश है "दूर्वयाभ्यर्चयन्" - अर्थात पाठ करते समय भगवान को दूर्वा अर्पित करें।
• नियम: स्नान करके शुद्ध वस्त्र पहनें। पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करें। गणेश जी की मूर्ति या चित्र के सामने गाय के घी का दीपक जलाएं।
• सामान्य पाठ: यदि विशिष्ट अनुष्ठान नहीं कर रहे हैं, तो नित्य पूजा के अंत में (पूजान्ते) एक बार पाठ करना भी अत्यंत कल्याणकारी है।

प्रश्नोत्तरी (FAQ)

श्री गणपति गकार अष्टोत्तरशतनाम स्तोत्र की क्या विशेषता है?

इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके सभी 108 नाम 'ग' (ग्) अक्षर से शुरू होते हैं। 'ग' गणेश जी का बीज अक्षर है, इसलिए यह स्तोत्र बहुत शक्तिशाली है।

"गकार" का क्या अर्थ है?

'गकार' का अर्थ है 'ग' अक्षर। शास्त्रों में 'ग' को बुद्धि, विवेक और मोक्ष का प्रतीक माना गया है।

भगवान के लिए 'ग' अक्षर क्यों महत्वपूर्ण है?

क्योंकि यह उनके मूल मंत्र "गम्" का आधार है। उनका पहला नाम ही 'गकाररूप' है, यानी वे साक्षात् 'ग' अक्षर का स्वरूप हैं।

इसके पाठ के मुख्य लाभ क्या हैं?

श्लोक 20 के अनुसार, यह विद्या (ज्ञान), श्री (धन), बल (ताकत) और आयुष्य (लंबी उम्र) प्रदान करता है।

सिद्धि के लिए कितनी बार पाठ करना चाहिए?

विशेष कामना पूर्ति के लिए प्रतिदिन 21 बार पाठ करने का विधान श्लोक 23 में बताया गया है।

अनुष्ठान कितने दिनों का होना चाहिए?

ग्रंथ के अनुसार, शीघ्र फल प्राप्ति के लिए 21 दिनों (एकविंशति वासरान्) तक लगातार पाठ करना चाहिए।

पाठ में कौन सी वस्तु चढ़ाना अनिवार्य है?

दूर्वा (हरी घास)। श्लोक 22 में दूर्वा से अर्चन (पूजा) करने का विशेष निर्देश दिया गया है।

क्या विद्यार्थी शिक्षा के लिए इसका पाठ कर सकते हैं?

हाँ, बिल्कुल। इसे 'गणनातीत विद्या' (असीमित ज्ञान) देने वाला कहा गया है, जो छात्रों के लिए सर्वोत्तम है।

क्या यह भय (Fear) को दूर करता है?

हाँ। श्लोक 19 में उनका एक नाम "गतभी" है, जिसका अर्थ है "जिन्होंने भय को दूर कर दिया है" या "जो निडर हैं"।

क्या यह नामावली है?

यह मूल रूप से एक स्तोत्र है, लेकिन इसके 108 नामों का प्रयोग करके "ॐ गकाररूपाय नमः", "ॐ गम्बीजाय नमः" इत्यादि बोलकर अर्चन (नामावली) भी किया जा सकता है।