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Sri Durga Parameshwari Stotram by Sringeri Jagadguru – श्री दुर्गा परमेश्वरी स्तोत्रम्

Sri Durga Parameshwari Stotram by Sringeri Jagadguru – श्री दुर्गा परमेश्वरी स्तोत्रम्
॥ श्री दुर्गा परमेश्वरी स्तोत्रम् ॥ (शृङ्गेरी जगद्गुरु विरचितम्)
संकल्पः - अधुना सर्वत्र जगति प्रसरतः जनानां प्राणापायकरस्य रोगविशेषस्य निवारणार्थं शृङ्गेरी जगद्गुरु विरचित श्री दुर्गा परमेश्वरी स्तोत्र पारायणं करिष्ये ।
एतावन्तं समयं सर्वापद्भ्योऽपि रक्षणं कृत्वा । देशस्य परमिदानीं ताटस्थ्यं केन वहसि दुर्गाम्ब ॥ १ ॥ अपराधा बहुशः खलु पुत्राणां प्रतिपदं भवन्त्येव । को वा सहते लोके सर्वांस्तान्मातरं विहायैकाम् ॥ २ ॥ मा भज मा भज दुर्गे ताटस्थ्यं पुत्रकेषु दीनेषु । के वा गृह्णन्ति सुतान् मात्रा त्यक्तान्वदाम्बिके लोके ॥ ३ ॥ इतः परं वा जगदम्ब जातु देशस्य रोगप्रमुखापदोऽस्य । न स्युस्तथा कुर्वचलां कृपां इत्यभ्यर्थनां मे सफलीकुरुष्व ॥ ४ ॥ पापहीनजनतावनदक्षाः सन्ति निर्जरवरा न कियन्तः । पापपूर्णजनरक्षणदक्षां त्वां विना भुवि परां न विलोके ॥ ५ ॥ ॥ इति शृङ्गेरी जगद्गुरु विरचितं श्री दुर्गा परमेश्वरी स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का ऐतिहासिक संदर्भ (Context of Composition)

आमतौर पर स्तोत्र देवताओं की स्तुति (तारीफ) होते हैं, लेकिन यह स्तोत्र एक 'उपालंभ' (Loving Complaint) है। इसमें भक्त (जगद्गुरु) माँ दुर्गा से शिकायत करते हैं कि "हे माँ! आपने हमेशा हमारी रक्षा की है, फिर आज आप इतनी 'तटस्थ' (चुप) क्यों हैं? क्या माँ अपने बच्चों को मुसीबत में देख सकती है?"

यह भाव इतना प्रबल है कि इसे सुनकर किसी भी सहृदय व्यक्ति की आँखों में आंसू आ जाते हैं।

श्लोकों का मर्म (Heart of the Verses)

  • श्लोक 1 (शिकायत): "एतावन्तं समयं..." - इतने समय तक आपने हर आपदा से हमारी रक्षा की। लेकिन अब देश (दुनिया) पर इतना बड़ा संकट आया है, तो आप उदासीन (Indifferent) क्यों हैं?

  • श्लोक 2 (स्वीकारोक्ति): "अपराधा बहुशः खलु..." - हम जानते हैं कि हमसे हर कदम पर गलतियाँ होती हैं। हम पापी हैं। लेकिन दुनिया में माँ के अलावा और कौन है जो अपनी संतान के अपराधों को सह सकता है?

  • श्लोक 3 (याचना): "मा भज मा भज दुर्गे..." - हे दुर्गे! हम दीनों पर उदासीनता मत दिखाओ। अगर माँ ही बच्चे को त्याग दे, तो दुनिया में कौन उसे अपनाएगा? (यह सबसे मार्मिक श्लोक है)।

  • श्लोक 5 (पापी का आश्रय): "पापहीनजनतावनदक्षाः..." - जो लोग पुण्यवान और पापहीन हैं, उनकी रक्षा तो कोई भी साधारण देवता कर सकता है। लेकिन जो 'पाप-पूर्ण' हैं (जैसे हम कलयुगी मनुष्य), उनकी रक्षा करने की समर्थता केवल आप में (जगदम्बा में) ही है।

पाठ के लाभ (Benefits)

1. दैवीय सुरक्षा (Divine Protection)

यह स्तोत्र एक 'सुरक्षा चक्र' की तरह काम करता है। महामारी, संक्रामक रोगों और प्राकृतिक आपदाओं के समय इसका सामूहिक पाठ (Group Chanting) अत्यंत लाभकारी है।

2. क्षमा प्राप्ति (Forgiveness)

यह स्तोत्र हमें विनम्र बनाता है। जब हम स्वीकार करते हैं कि "हमसे गलतियाँ हुई हैं", तो हमारा अहंकार मिटता है और दैवीय कृपा का द्वार खुलता है।

3. भय मुक्ति

'के वा गृह्णन्ति सुतान्...' - यह पंक्ति विश्वास दिलाती है कि चाहे दुनिया ठुकरा दे, माँ हमें कभी नहीं छोड़ेगी। इससे अकेलेपन और असुरक्षा का भय दूर होता है।

4. जगद्गुरु का आशीर्वाद

इस स्तोत्र के पाठ से शृंगेरी परंपरा और जगद्गुरु का सूक्ष्म आशीर्वाद प्राप्त होता है, जो साधक की आध्यात्मिक उन्नति में सहायक है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. इस स्तोत्र की रचना किसने की?

इसकी रचना शृंगेरी शारदा पीठ के 36वें जगद्गुरु श्री भारती तीर्थ महास्वामीजी ने की है।

2. इस स्तोत्र की रचना का उद्देश्य क्या था?

जगद्गुरु ने इसे कोरोना (COVID-19) महामारी और अन्य वैश्विक आपदाओं से मानवता की रक्षा के लिए रचा था। यह 'संकट मोचन' के लिए एक सामूहिक प्रार्थना है।

3. 'ताटस्थ्यं' (Tatasthyam) का क्या अर्थ है?

श्लोक 1 और 3 में 'ताटस्थ्यं' शब्द आया है, जिसका अर्थ है 'तटस्थ रहना' (Indifference/Remaining aloof)। भक्त माँ से शिकायत कर रहा है कि वे संकट के समय चुप क्यों हैं?

4. क्या यह स्तोत्र पापों की क्षमा के लिए है?

हाँ, श्लोक 5 में कहा गया है कि 'पापहीन' लोगों की रक्षा तो देवता भी कर सकते हैं, लेकिन 'पापपूर्ण' (पापी) लोगों की रक्षा केवल दयामयी माँ ही कर सकती हैं।

5. क्या इसे रोज पढ़ा जा सकता है?

बिल्कुल। यह नित्य प्रार्थना है। इसे सुबह या शाम को परिवार के साथ मिलकर पढ़ना चाहिए।

6. 'अम्बिके' संबोधन का क्या महत्व है?

'अम्बिका' का अर्थ है 'माँ'। यह स्तोत्र ईश्वर को एक शासक के रूप में नहीं, बल्कि एक वात्सल्यमयी माँ के रूप में देखता है जो अपने बच्चों के अपराधों को क्षमा कर देती है।

7. श्लोक 2 का क्या भाव है?

श्लोक 2 में भक्त स्वीकार करता है कि 'पुत्रों से गलतियाँ (अपराध) तो होती ही रहती हैं', लेकिन एक माँ के अलावा और कौन उन्हें सहन कर सकता है? (कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति)।

8. शृंगेरी पीठ का दुर्गा से क्या संबंध है?

शृंगेरी पीठ की अधिष्ठात्री देवी 'शारदा' हैं, जो सरस्वती का रूप हैं। लेकिन आदि शंकराचार्य की परंपरा में दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती में अभेद माना गया है।

9. क्या यह किसी विशेष राग में गाया जाता है?

भक्त इसे अपनी श्रद्धा अनुसार किसी भी राग में गा सकते हैं, लेकिन करुण रस प्रधान राग (जैसे राग शिवरंजनी या राग मिश्र पीलू) इसके लिए उपयुक्त हैं।

10. स्तोत्र में 'देशस्य' शब्द क्यों आया है?

यह स्तोत्र व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि 'समष्टि' (पूरे देश और विश्व) के कल्याण के लिए है। यह 'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना को दर्शाता है।

11. बच्चों के लिए इसका क्या महत्व है?

यह बहुत सरल संस्कृत में है। बच्चे इसे आसानी से याद कर सकते हैं और उनमें ईश्वर के प्रति प्रेम और विश्वास का भाव जागृत होता है।

12. रोग निवारण में यह कैसे सहायक है?

यह स्तोत्र मानसिक बल (Willpower) को बढ़ाता है और सामूहिक प्रार्थना की शक्ति से वातावरण में सकारात्मक ऊर्जा (Healing Vibes) उत्पन्न करता है।