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Sri Durga Ashtottara Shatanama Stotram 1 – श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (विश्वसार तंत्र)

Sri Durga Ashtottara Shatanama Stotram 1 – श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् (विश्वसार तंत्र)
॥ श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् (विश्वसारतंत्रोक्तम्) ॥ ईश्वर उवाच । शतनाम प्रवक्ष्यामि शृणुष्व कमलानने । यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता सदा भवेत् ॥ १ ॥ सती साध्वी भवप्रीता भवानी भवमोचनी । आर्या दुर्गा जया आद्या त्रिनेत्रा शूलधारिणी ॥ २ ॥ पिनाकधारिणी चित्रा चन्द्रघण्टा महातपा । मनोबुद्धिरहङ्कारा चित्तरूपा चिता चितिः ॥ ३ ॥ सर्वमन्त्रमयी सत्या सत्यानन्दस्वरूपिणी । अनन्ता भाविनी भाव्या भवा भव्या सदागतिः ॥ ४ ॥ शम्भुपत्नी देवमाता चिन्ता रत्नप्रिया सदा । सर्वविद्या दक्षकन्या दक्षयज्ञविनाशिनी ॥ ५ ॥ अपर्णा चैव पर्णा च पाटला पाटलावती । पट्‍टाम्बरपरीधाना कलमञ्जीररञ्जिनी ॥ ६ ॥ अमेया विक्रमा क्रूरा सुन्दरी सुरसुन्दरी । वनदुर्गा च मातङ्गी मतङ्गमुनिपूजिता ॥ ७ ॥ ब्राह्मी माहेश्वरी चैन्द्री कौमारी वैष्णवी तथा । चामुण्डा चैव वाराही लक्ष्मीश्च पुरुषाकृतिः ॥ ८ ॥ विमलोत्कर्षिणी ज्ञानक्रिया सत्या च वाक्प्रदा । बहुला बहुलप्रेमा सर्ववाहनवाहना ॥ ९ ॥ निशुम्भशुम्भहननी महिषासुरमर्दिनी । मधुकैटभहन्त्री च चण्डमुण्डविनाशिनी ॥ १० ॥ सर्वासुरविनाशा च सर्वदानवघातिनी । सर्वशास्त्रमयी विद्या सर्वास्त्रधारिणी तथा ॥ ११ ॥ अनेकशस्त्रहस्ता च अनेकास्त्रविधारिणी । कुमारी चैव कन्या च कौमारी युवती यतिः ॥ १२ ॥ अप्रौढा चैव प्रौढा च वृद्धमाता बलप्रदा । श्रद्धा शान्तिर्धृतिः कान्तिर्लक्ष्मीर्जातिः स्मृतिर्दया ॥ १३ ॥ तुष्टिः पुष्टिश्चितिर्भ्रान्तिर्माता क्षुच्चेतना मतिः । विष्णुमाया च निद्रा च छाया कामप्रपूरणी ॥ १४ ॥ ॥ फलश्रुति ॥ य इदं च पठेत् स्तोत्रं दुर्गानामशताष्टकम् । नासाध्यं विद्यते देवि त्रिषु लोकेषु पार्वति ॥ १५ ॥ धनं धान्यं सुतन् जायां हयं हस्तिनमेव च । चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं च शाश्वतीम् ॥ १६ ॥ कुमारीः पूजयित्वा तु ध्यात्वा देवीं सुरेश्वरीम् । पूजयेत्परया भक्त्या पठेन्नामशताष्टकम् ॥ १७ ॥ तस्य सिद्धिर्भवेद्देवि सर्वैः सुरवरैरपि । राजानो दासतां यान्ति राज्यश्रियमवाप्नुयात् ॥ १८ ॥ गोरोचनालक्तककुङ्कुमेन सिन्दूरकर्पूरमधुत्रयेण । विलिख्य यन्त्रं विधिना विधिज्ञो भवेत्सदा धारयता पुरारिः ॥ १९ ॥ भौमावास्या निशाभागे चन्द्रे शतभिषां गते । विलिख्य प्रपठेत् स्तोत्रं स भवेत् सम्पदां पदम् ॥ २० ॥ ॥ इति श्रीविश्वसारतन्त्रे श्री दुर्गाष्टोत्तरशतनाम स्तोत्रम् सम्पूर्णम् ॥

स्तोत्र का महत्त्व (Significance of Vishvasara Tantra Stotram)

श्री दुर्गा अष्टोत्तर शतनाम स्तोत्रम् के दो प्रमुख संस्करण प्रचलित हैं। यह पहला संस्करण है जो विश्वसार तंत्र (Vishvasara Tantra) से लिया गया है। यह अत्यंत गुप्त और शीघ्र फलदाई माना जाता है। भगवान शिव स्वयं कहते हैं कि "यस्य प्रसादमात्रेण दुर्गा प्रीता सदा भवेत्" - केवल इसके पाठ से ही दुर्गा सदा के लिए प्रसन्न हो जाती हैं।

इस स्तोत्र में देवी के सौम्य (Shanta) और उग्र (Ugra) दोनों रूपों का अद्भुत संगम है। एक ओर वे 'सुन्दरी' और 'सुरसुन्दरी' हैं, तो दूसरी ओर 'क्रूरा' और 'महिषासुरमर्दिनी' भी हैं।

यह स्तोत्र 'सिद्धि' प्रदायक है। जो साधक नवरात्री या सामान्य दिनों में इसका पाठ करता है, उसके लिए तीनों लोकों में कुछ भी 'असाध्य' (Impossible) नहीं रहता।

नामावली का रहस्य (Secrets of the Names)

  • सती और साध्वी: दक्ष प्रजापति की पुत्री के रूप में 'सती' और भगवान शिव के प्रति अटूट निष्ठा के कारण 'साध्वी'। ये नाम पवित्रता के प्रतीक हैं।

  • मनोबुद्धिरहङ्कारा: देवी केवल बाहरी शक्ति नहीं हैं, वे हमारे अंतःकरण में 'मन', 'बुद्धि' और 'अहंकार' के रूप में विराजमान हैं। वे ही हमारी चेतना ('चित्तरूपा') हैं।

  • सत्यानन्दस्वरूपिणी: वे 'सत्य' (Truth) और 'आनंद' (Bliss) का मूर्त रूप हैं। उनकी उपासना से जीवन में झूठ और दुख का नाश होता है।

  • मातङ्गी: दस महाविद्याओं में से एक 'मातंगी' देवी का नाम भी यहाँ आया है, जो वाणी और ज्ञान की अधिष्ठात्री हैं और मतंग ऋषि द्वारा पूजित हैं।

  • क्रिया शक्ति (ज्ञानक्रिया): वे केवल ज्ञान नहीं, बल्कि कर्म (Action) भी हैं। 'ज्ञान' और 'क्रिया' का संतुलन ही जीवन को सफल बनाता है।

पाठ के लाभ (Benefits)

1. चतुर्वर्ग की प्राप्ति

'चतुर्वर्गं तथा चान्ते लभेन्मुक्तिं' - धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष - जीवन के ये चारों पुरुषार्थ इस एक स्तोत्र के पाठ से सिद्ध हो जाते हैं।

2. राज भय से मुक्ति

'राजानो दासतां यान्ति' - इसका नियमित पाठ करने वाले के सामने बड़े-बड़े राजा (या आज के संदर्भ में अधिकारी/बॉस) भी दास बन जाते हैं या अनुकूल हो जाते हैं।

3. संतान और धन सुख

जो निःसंतान हैं उन्हें 'सुत' (पुत्र) और जो निर्धन हैं उन्हें 'धन-धान्य' की प्राप्ति होती है। यह वंश वृद्धि के लिए अमोघ है।

4. यंत्र प्रयोग

श्लोक 19-20 में वर्णित 'गोरोचनादि' विधि से यंत्र बनाकर धारण करने से व्यक्ति साक्षात् शिव ('पुरारि') के समान शक्तिशाली और ऐश्वर्यवान हो जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

1. यह स्तोत्र किस तंत्र से लिया गया है?

यह 'विश्वसार तंत्र' (Vishvasara Tantra) से लिया गया है। यह दुर्गा के 108 नामों का सबसे प्रचलित और प्रामाणिक संस्करण है।

2. ईश्वर (शिव) ने किसे यह ज्ञान दिया?

भगवान शिव (ईश्वर) ने यह ज्ञान स्वयं 'कमलानने' (कमल के समान मुख वाली) देवी पार्वती को दिया, ताकि भक्त आसानी से उनकी कृपा पा सकें।

3. 'सती' और 'साध्वी' नामों का क्या अर्थ है?

'सती' का अर्थ है - जो अग्नि में जलकर भस्म हो गई (दक्ष यज्ञ में), और 'साध्वी' का अर्थ है - परम पवित्र और पतिव्रता स्त्री।

4. पाठ से क्या फल मिलता है?

फलश्रुति (श्लोक 16-18) के अनुसार, इससे धन, धान्य, पुत्र, स्त्री, हाथी, घोड़ा और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है। राजा भी ऐसे भक्त के वश में हो जाते हैं।

5. 'दुर्गा' नाम का क्या अर्थ है?

'दुर्गम' (कठिन) मार्ग से बचाने वाली, या 'दुर्ग' (किले) की तरह रक्षा करने वाली देवी को 'दुर्गा' कहते हैं।

6. क्या इसका यंत्र बनाकर धारण कर सकते हैं?

हाँ, श्लोक 19 में विधान है: गोरोचन, लाक्षा, कुंकुम, सिन्दूर, कपूर और घी (या शहद) से यंत्र लिखकर धारण करने से भगवान शिव के समान शक्ति प्राप्त होती है।

7. 'वनदुर्गा' कौन हैं?

श्लोक 7 में 'वनदुर्गा' नाम आया है। यह देवी का वह स्वरूप है जो जंगलों और प्राकृतिक संपदा की रक्षा करती हैं। वनवासी इन्हें अपनी कुलदेवी मानते हैं।

8. क्या नवमी या एकादशी को विशेष पाठ करना चाहिए?

नवरात्रि की नवमी और एकादशी तिथियाँ देवी उपासना के लिए सिद्ध मानी गई हैं। अमावस्या की रात (भौमवती अमावस्या) को पाठ करना विशेष फलदायी है (श्लोक 20)।

9. 'महिषासुरमर्दिनी' क्यों कहलाती हैं?

महिषासुर नामक दैत्य का वध करने के कारण उन्हें 'महिषासुरमर्दिनी' कहा गया है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है।

10. क्या कुमारियों की पूजा अनिवार्य है?

श्लोक 17 में कहा गया है - 'कुमारीः पूजयित्वा तु'। कन्या पूजन करके इस स्तोत्र का पाठ करने से देवी अत्यंत प्रसन्न होती हैं और शीघ्र वरदान देती हैं।

11. 'चित्तरूपा' का क्या भाव है?

वह देवी जो हमारे 'चित्त' (मन/चेतना) के रूप में हमारे भीतर ही विद्यमान हैं। वे बाहर भी हैं और भीतर भी।

12. क्या पुरुष और स्त्री दोनों पाठ कर सकते हैं?

हाँ, इसमें कोई भेद नहीं है। 'य इदं च पठेत् स्तोत्रं' - जो भी (स्त्री या पुरुष) भक्ति भाव से इसका पाठ करेगा, उसे सिद्धियाँ प्राप्त होंगी।